जगत् के सभी महान् पैग़ंबरों का प्राण पर अत्यंत अद्भुत संयम था, जिसके बल से वे प्रबल इच्छाशक्तिसम्पन्न हो गए थे।
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जो लोग महापुरुष बन गए वे पागल हो सकते हैं।
नीति जानने वाले चाहे निंदा करें, चाहे स्तुति और लक्ष्मी चाहे घर में बहुत सी आवे, चाहे चली जाए, प्राण चाहे अभी जाए, चाहे कल्पांत में, परंतु धीर लोग न्याय का मार्ग छोड़कर एक पग भी उससे बाहर नहीं चलते।
जैसे फल लगने से वृक्ष नम्र हो जाते हैं; जैसे नवीन जल भरने से मेघ भूमि पर झुक जाते है, वैसे ही सत्पुरुष भी संपत्ति प्राप्त कर के उद्धत नहीं होते, किंतु नम्र हो जाते हैं।
प्रथम हृदय है, और फिर बुद्धि। प्रथम सिद्धांत और फिर प्रमाण। प्रथम स्फुरणा और फिर उसके अनुकूल तर्क। प्रथम कर्म और फिर बुद्धि। इसीलिए बुद्धि कर्मानुसारिणी कही गई है। मनुष्य जो भी करता है, या करना चाहता है उसका समर्थन करने के लिए प्रमाण भी ढूँढ़ निकालता है।
जो आदमी पूर्व में असंबद्ध प्रतीत होने वाले तथ्यों के बीच नया रिश्ता जोड़ता है; वह आइन्सटाइन जैसा महान् वैज्ञानिक होता है, अथवा गांधी और लेनिन जैसा सामाजिक क्रांतिकारी।
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श्रेष्ठता की कसौटी को लेकर हमारे साहित्य में रचनाकारों और आलोचकों के दो-तीन बड़े मज़बूत और सुपरिचित खेमे हैं; इनकी मान्यताएँ और दृष्टियाँ अत्यंत सुपरिभाषित हैं और अपने को एक-दूसरे से भिन्न मानने में ही उनकी सैद्धांतिक सार्थकता समझी जाती है, पर एक मामले में दोनों खेमों के सदस्य एक जैसे हैं। वे एक ओर भावुकता-विरोध को एक स्वतः सिद्ध मूल्य मानते हैं और दूसरी ओर अकेले में वे सभी भावुक होने की अपार क्षमता दिखा सकते हैं—सब नहीं तो अधिकांश। उन्हीं अधिकांश में एक मैं भी हूँ।
संसार में जिन लोगों को अत्यधिक श्रद्धा की दृष्टि से देखा गया है, वे दुःख के अवतार होते हैं। सुख-चैन में जीवन बितानेवाले लक्ष्मी के दास कभी पूजनीय नहीं हुए, और न भविष्य में होंगे।
कलाकार होने मात्र से, रचनाकार होने मात्र से कोई व्यक्ति श्रेष्ठ वांछनीयता का अधिकारी नहीं होता।
अप्रियवचन से दरिद्र, प्रिय वचनों से संपन्न, अपनी ही स्त्री से संतुष्ट और पराई निंदा से रहित जो पुरुष हैं, उनसे कहीं-कहीं पृथ्वी शोभायमान है, अर्थात् ऐसे पुरुष सभी जगह नहीं मिलते।
जो व्यक्ति छोटा है वह विश्व-संसार को असंख्य बाधाओं का राज्य समझता है। बाधाएँ उसकी दृष्टि को अवरुद्ध करती हैं और उसकी आशाओं पर आघात करती हैं, इसीलिए वह सत्य को नहीं जानता, बाधाओं को ही सत्य के रूप में देखता है। लेकिन जो व्यक्ति महान् है, वह बाधाओं से मुक्त होकर सत्य को देख सकता है। तभी महान् लोगों की बातें छोटे व्यक्तियों की बातों के बिल्कुल विपरीत होती हैं।
महापुरुषों के निधन पर पार्कों में होनेवाली सार्वजनिक सभाएँ या बाज़ार की हड़ताल बहुत हद तक रस्म-अदायगी है। पर रस्में भी हमारी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक जीवन का अविभाज्य अंग है और यदि यशपाल जैसे साहित्यकार के न रहने पर भी ऐसी रस्में अदा नहीं की जाति तो उससे कुछ ऐसे निष्कर्ष निकलते हैं जिनसे इस देश के साहित्यकर्मियों को साहित्य की स्थिति के विषय में यथार्थ दृष्टि मिल सकती है।
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सत्पुरुषों को ज्ञान मानमदादि नष्ट करने हेतु होता है, और वही ज्ञान दुर्जनों को मदमान उत्पन्न करता है, जैसे एकांत स्थान; संयमी पुरुषों को मुक्ति साधन का हेतु होता है, और कामातुरों को कामसाधन का कारण होता है।
सत्पुरुष वे हैं, जो अपना स्वार्थ छोड़ कर दूसरे के कार्य को साधते हैं, सामान्य पुरुष वे हैं; जो अपने और पराए दोनों के कार्यों को साधन करते हैं और मनुष्यों में राक्षस वे पुरुष हैं, जो अपने हित के लिए पराए के कार्य को नष्ट करते हैं और जो व्यर्थ पराए कार्य की हानि करते हैं।
मनस्वी पुरुष कार्यसिद्धि के लिए सुख-दुःख की चिंता नहीं करता है।
जिनको परमार्थ अर्थात् मोक्षपर्यंत का साधन प्राप्त है; ऐसे पंडितों का अपमान मत करो, क्योंकि तुम्हारी तृण के समान तुच्छ लक्ष्मी उनको रोक न सकेगी। जैसे नवीन मद की धारा से शोभित श्याम मस्तक वाले हाथी को, कमल के डंठल का सूत नहीं रोक सकता।
बुद्धि नहीं आएगी, बुद्धि नहीं आएगी यदि महान संतों की बात नहीं सुनोगे। बुद्धि नहीं आएगी, चाहे अनेक प्रकार की विद्या सीख लो।
अपने महान पुरुषों को देवता का रूप दे देना और देवता के आसन पर बिठाने के बाद उनके उपदेशों को छोड़ देना, मनुष्य जाति को ज़्यादा पसंद है।
जब अन्य सब लोग एक स्वर से कहते है: 'हमारे सामने केवल अंधकार है', तब महापुरुष विश्वास के साथ यह कह सकता है: 'वेदाहमेतं पुरुषं महांतं आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्'—समस्त अंधकार से मुक्त होकर मैं उसी को जानता हूँ जो महान् है, ज्योतिर्मय है।
भारतवर्ष के जिन महापुरुषों का मानव जाति के विचारों पर स्थायी प्रभाव पड़ा है, उनमें श्रीकृष्ण का स्थान प्रमुख है।
जो वास्तव में महापुरुष होते हैं, वे जन्म लेते ही महान युग में स्थान ग्रहण करते हैं। अतीत में भी वे वर्तमान होते हैं और सुविस्तीर्ण भविष्य में भी विराजते हैं।
उच्च आचरण के आशिक़ अपनी शारीरिक इंद्रियों को विकारों से बचाने के लिए, कई तरह के तप, कष्ट झेलते हैं।
कोई विरला विचारवान ही जानता है कि इस दुनिया में सर्वश्रेष्ठ कर्म, प्रभु की स्तुति करनी है।
दोष और त्रुटियाँ तो उन बड़े-बड़े वीर पुरुषों में भी रही हैं जो अपने माहात्म्य से उन्नतमस्तक हैं। उन त्रुटियों को आत्मसात् करके वे ही बड़े हुए हैं।
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मैं उन सज्जनों-मित्रों पर बलिहारी जाता हूँ, जिस पर माया का पर्दा नहीं पड़ा, जिनकी संगति करके मैंने अपना मन उनसे जोड़ लिया है।
पागल बने बिना कोई महान नहीं हो सकता। परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि प्रत्येक पागल व्यक्ति महान होता है।
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