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महापुरुष पर उद्धरण

जगत् के सभी महान् पैग़ंबरों का प्राण पर अत्यंत अद्भुत संयम था, जिसके बल से वे प्रबल इच्छाशक्तिसम्पन्न हो गए थे।

स्वामी विवेकानन्द

देह-भूमि पर ईश्वर-साक्षात्कार की फ़सल काट लेने के बाद, सिद्ध पुरुष अपने शरीर की चिंता नहीं करता। फिर वह दूसरों के कष्ट कम करने के लिए अपने शरीर को रोगग्रस्त होने भी देता है, तो भी उसके कभी दूषित हो सकने वाले मन पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता।

परमहंस योगानंद

जो महान संत विश्वमाया के स्वप्न से जाग जाते हैं; और इस सत्य को पहचान लेते हैं कि यह विश्व तो ईश्वर के मन की केवल एक कल्पना है, वे शरीर के साथ जो चाहे कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें यह ज्ञान हो जाता है शरीर ऊर्जा का केवल एक ऐसा घनीभूत या संघनित रूप है जिसमें जैसा चाहे परिवर्तन किया जा सकता है।

परमहंस योगानंद

गुणवान् व्यक्ति समाज में आदर का पात्र होता है। गुण विरूप व्यक्ति को भी सौभाग्यशाली बना देते हैं।

वात्स्यायन

जो लोग महापुरुष बन गए वे पागल हो सकते हैं।

रघुवीर चौधरी

महान् बनने के उपदेशों और उद्बोधनों से किसी का लाभ नहीं है। साधारण आदमी उनका पालन नहीं कर सकता। अगर पालन करने लगे, तो मज़े में उसकी ज़िंदगी बरबाद हो सकती है। और जिसे महान् होना ही है, वह महान् होने के लिए इन उपदेशों की राह नहीं देखेगा—उसे ख़ुद राह दिखती है।

हरिशंकर परसाई

नीति जानने वाले चाहे निंदा करें, चाहे स्तुति और लक्ष्मी चाहे घर में बहुत सी आवे, चाहे चली जाए, प्राण चाहे अभी जाए, चाहे कल्पांत में, परंतु धीर लोग न्याय का मार्ग छोड़कर एक पग भी उससे बाहर नहीं चलते।

भर्तृहरि

महापुरुष मूल रूप से विद्रोही होता है, विद्रोही हुए बिना वह महान् हो ही नहीं सकता। भीतर विद्रोह की यह ज्वाला जितनी बलवती होगी, उतना ही महान् उसका जीवन होगा।

हरिशंकर परसाई

जैसे फल लगने से वृक्ष नम्र हो जाते हैं; जैसे नवीन जल भरने से मेघ भूमि पर झुक जाते है, वैसे ही सत्पुरुष भी संपत्ति प्राप्त कर के उद्धत नहीं होते, किंतु नम्र हो जाते हैं।

भर्तृहरि

प्रथम हृदय है, और फिर बुद्धि। प्रथम सिद्धांत और फिर प्रमाण। प्रथम स्फुरणा और फिर उसके अनुकूल तर्क। प्रथम कर्म और फिर बुद्धि। इसीलिए बुद्धि कर्मानुसारिणी कही गई है। मनुष्य जो भी करता है, या करना चाहता है उसका समर्थन करने के लिए प्रमाण भी ढूँढ़ निकालता है।

महात्मा गांधी

आध्यात्मिक नियम यह अनिवार्य नहीं बनाता कि कोई गुरु या सिद्ध पुरुष; जब-जब दूसरे किसी मनुष्य को रोगमुक्त करें, तो वह स्वयं बीमार हो जाएँ।

परमहंस योगानंद

परतंत्र देशवासी के लिए वही मनुष्य पूज्य हो जाता है, जिसने किसी भी देश के लिए बंधन काटने के लिए अपना हाथ बढ़ाया हो।

गणेश शंकर विद्यार्थी

जो आदमी पूर्व में असंबद्ध प्रतीत होने वाले तथ्यों के बीच नया रिश्ता जोड़ता है; वह आइन्सटाइन जैसा महान् वैज्ञानिक होता है, अथवा गांधी और लेनिन जैसा सामाजिक क्रांतिकारी।

राजेंद्र माथुर

विशाल बुद्धि की कार्य-प्रणाली भी विशाल होती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

श्रेष्ठता की कसौटी को लेकर हमारे साहित्य में रचनाकारों और आलोचकों के दो-तीन बड़े मज़बूत और सुपरिचित खेमे हैं; इनकी मान्यताएँ और दृष्टियाँ अत्यंत सुपरिभाषित हैं और अपने को एक-दूसरे से भिन्न मानने में ही उनकी सैद्धांतिक सार्थकता समझी जाती है, पर एक मामले में दोनों खेमों के सदस्य एक जैसे हैं। वे एक ओर भावुकता-विरोध को एक स्वतः सिद्ध मूल्य मानते हैं और दूसरी ओर अकेले में वे सभी भावुक होने की अपार क्षमता दिखा सकते हैं—सब नहीं तो अधिकांश। उन्हीं अधिकांश में एक मैं भी हूँ।

श्रीलाल शुक्ल

संसार में जिन लोगों को अत्यधिक श्रद्धा की दृष्टि से देखा गया है, वे दुःख के अवतार होते हैं। सुख-चैन में जीवन बितानेवाले लक्ष्मी के दास कभी पूजनीय नहीं हुए, और भविष्य में होंगे।

रवींद्रनाथ टैगोर

जो व्यक्ति छोटा है वह विश्व-संसार को असंख्य बाधाओं का राज्य समझता है। बाधाएँ उसकी दृष्टि को अवरुद्ध करती हैं और उसकी आशाओं पर आघात करती हैं, इसीलिए वह सत्य को नहीं जानता, बाधाओं को ही सत्य के रूप में देखता है। लेकिन जो व्यक्ति महान् है, वह बाधाओं से मुक्त होकर सत्य को देख सकता है। तभी महान् लोगों की बातें छोटे व्यक्तियों की बातों के बिल्कुल विपरीत होती हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर

महापुरुषों के निधन पर पार्कों में होनेवाली सार्वजनिक सभाएँ या बाज़ार की हड़ताल बहुत हद तक रस्म-अदायगी है। पर रस्में भी हमारी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक जीवन का अविभाज्य अंग है और यदि यशपाल जैसे साहित्यकार के रहने पर भी ऐसी रस्में अदा नहीं की जाति तो उससे कुछ ऐसे निष्कर्ष निकलते हैं जिनसे इस देश के साहित्यकर्मियों को साहित्य की स्थिति के विषय में यथार्थ दृष्टि मिल सकती है।

श्रीलाल शुक्ल

अप्रियवचन से दरिद्र, प्रिय वचनों से संपन्न, अपनी ही स्त्री से संतुष्ट और पराई निंदा से रहित जो पुरुष हैं, उनसे कहीं-कहीं पृथ्वी शोभायमान है, अर्थात् ऐसे पुरुष सभी जगह नहीं मिलते।

भर्तृहरि

कलाकार होने मात्र से, रचनाकार होने मात्र से कोई व्यक्ति श्रेष्ठ वांछनीयता का अधिकारी नहीं होता।

गजानन माधव मुक्तिबोध

सत्पुरुषों को ज्ञान मानमदादि नष्ट करने हेतु होता है, और वही ज्ञान दुर्जनों को मदमान उत्पन्न करता है, जैसे एकांत स्थान; संयमी पुरुषों को मुक्ति साधन का हेतु होता है, और कामातुरों को कामसाधन का कारण होता है।

भर्तृहरि

सत्पुरुष वे हैं, जो अपना स्वार्थ छोड़ कर दूसरे के कार्य को साधते हैं, सामान्य पुरुष वे हैं; जो अपने और पराए दोनों के कार्यों को साधन करते हैं और मनुष्यों में राक्षस वे पुरुष हैं, जो अपने हित के लिए पराए के कार्य को नष्ट करते हैं और जो व्यर्थ पराए कार्य की हानि करते हैं।

भर्तृहरि

मनस्वी पुरुष कार्यसिद्धि के लिए सुख-दुःख की चिंता नहीं करता है।

भर्तृहरि

जिनको परमार्थ अर्थात् मोक्षपर्यंत का साधन प्राप्त है; ऐसे पंडितों का अपमान मत करो, क्योंकि तुम्हारी तृण के समान तुच्छ लक्ष्मी उनको रोक सकेगी। जैसे नवीन मद की धारा से शोभित श्याम मस्तक वाले हाथी को, कमल के डंठल का सूत नहीं रोक सकता।

भर्तृहरि

बुद्धि नहीं आएगी, बुद्धि नहीं आएगी यदि महान संतों की बात नहीं सुनोगे। बुद्धि नहीं आएगी, चाहे अनेक प्रकार की विद्या सीख लो।

त्यागराज

जो वास्तव में महापुरुष होते हैं, वे जन्म लेते ही महान युग में स्थान ग्रहण करते हैं। अतीत में भी वे वर्तमान होते हैं और सुविस्तीर्ण भविष्य में भी विराजते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर

आदमी अमर वह होता है, जिसका नाम ख़ुदा देखकर यह पूछा जाए कि यह क्या था।

हरिशंकर परसाई

वे बड़भागी है; कर रखा है सत्य, जिन्होंने उर में धारण।

गुरु नानक

अपने महान पुरुषों को देवता का रूप दे देना और देवता के आसन पर बिठाने के बाद उनके उपदेशों को छोड़ देना, मनुष्य जाति को ज़्यादा पसंद है।

जवाहरलाल नेहरू

जब अन्य सब लोग एक स्वर से कहते है: 'हमारे सामने केवल अंधकार है', तब महापुरुष विश्वास के साथ यह कह सकता है: 'वेदाहमेतं पुरुषं महांतं आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्'—समस्त अंधकार से मुक्त होकर मैं उसी को जानता हूँ जो महान् है, ज्योतिर्मय है।

रवींद्रनाथ टैगोर

भारतवर्ष के जिन महापुरुषों का मानव जाति के विचारों पर स्थायी प्रभाव पड़ा है, उनमें श्रीकृष्ण का स्थान प्रमुख है।

वासुदेवशरण अग्रवाल

कोई विरला विचारवान ही जानता है कि इस दुनिया में सर्वश्रेष्ठ कर्म, प्रभु की स्तुति करनी है।

गुरु नानक

दोष और त्रुटियाँ तो उन बड़े-बड़े वीर पुरुषों में भी रही हैं जो अपने माहात्म्य से उन्नतमस्तक हैं। उन त्रुटियों को आत्मसात् करके वे ही बड़े हुए हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर

उच्च आचरण के आशिक़ अपनी शारीरिक इंद्रियों को विकारों से बचाने के लिए, कई तरह के तप, कष्ट झेलते हैं।

गुरु नानक

मैं उन सज्जनों-मित्रों पर बलिहारी जाता हूँ, जिस पर माया का पर्दा नहीं पड़ा, जिनकी संगति करके मैंने अपना मन उनसे जोड़ लिया है।

गुरु नानक

कोई भी देश अपनी भौतिक उपलब्धियों के कारण नहीं, बल्कि अपने महापुरुषों के कारण जीवित रहता है।

परमहंस योगानंद
  • संबंधित विषय : देश

पागल बने बिना कोई महान नहीं हो सकता। परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि प्रत्येक पागल व्यक्ति महान होता है।

सुभाष चंद्र बोस

संतों की संगति में नाम रूपी ख़ज़ाना मिलता है और आत्मिक जीवन देने वाला, नाम रूपी अमृत भंडार चखा जाता है।

गुरु नानक

महान आत्माओं को हमेशा ही औसत सोच वाले लोगों के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा है।

अल्बर्ट आइंस्टीन

नागरक के समस्त वैभव-सुख को भोग कर चुका कलाविद् गुणवान विट, सपत्नीक होता है और वेश्याओं एवं नागरकों की गोष्ठी में सम्मानित होता है तथा वेश्याओं और नागरकों के संपर्क से जीविका चलाता है।

वात्स्यायन