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क्रेज़ी किया रे : AI के दौर में मौलिकता की बात

21 नवंबर को मंचित नाटक ‘क्रेज़ी किया रे’ ने एक बार फिर यह सशक्त संदेश दिया कि जब व्यक्ति अपनी मौलिकता छोड़कर किसी और की नक़ल में डूब जाता है, तो वह अनजाने में ही हास्य का पात्र बन जाता है। समाज में ऊँचा दिखने या अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने की चाह अक्सर मनुष्य को ऐसे रास्तों पर ले जाती है, जहाँ वह अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होता जाता है। परंतु यह भूल जाना कि उच्च वर्ग की आदतें अपनाने भर से कोई उच्च वर्ग का नहीं हो जाता, मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी है। ‘यूनिवर्सिटी थियेटर’ और ‘स्वराज विद्यापीठ’ की संयुक्त प्रस्तुति ‘क्रेज़ी किया रे’ इसी त्रासदी को अत्यंत मनोरंजक, व्यंग्यपूर्ण और मार्मिक ढंग से मंच पर जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है।

यह नाटक मौलियर (Molière) के विश्वप्रसिद्ध व्यंग्य नाटक ‘द बुर्जुआ जेंटलमैन’ (The Bourgeois Gentleman) की हिंदी प्रस्तुति है, जिसे यूनिवर्सिटी थियेटर ने आज के समय, आज के समाज और आज की नई पीढ़ी की मानसिकताओं से जोड़कर नए रूप में ढाला है। अपने मूल में यह कहानी एक साधारण व्यक्ति कुमार की है—ऐसा व्यक्ति जो अपनी रोज़मर्रा की पहचान से संतुष्ट नहीं, बल्कि तथाकथित उच्च वर्ग का हिस्सा बनने की आकांक्षा में बुरी तरह उलझा हुआ है। वह मान बैठता है कि यदि वह संगीत, नृत्य, दर्शन, अँग्रेज़ी उच्चारण और तलवारबाज़ी जैसी कलाएँ सीख लेगा, तो शायद समाज में उसका कद बढ़ जाएगा और लोग उसे ‘विशेष’ मानने लगेंगे। लेकिन यह सीखने का प्रयास उसके शौक़ का परिणाम नहीं है; यह उसकी भीतर दबी असुरक्षा, हीनताबोध और लगातार महसूस किए जाने वाले सामाजिक दबाव का परिणाम है। जब वह विभिन्न शिक्षकों से सीखता है, जब वह अपने परिवार के साथ व्यवहार करता है, तब उसके भीतर की उलझनें, उसकी हास्यास्पद बेचैनी और उसकी मानवीय कमज़ोरियाँ दर्शकों के सामने हँसी और करुणा के बीच का एक अनूठा अनुभव बनकर उभरती हैं।

‘क्रेज़ी किया रे!’ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि यह हमें यह भी याद दिलाता है कि दुनिया को प्रभावित करने की होड़ में हम धीरे-धीरे स्वयं से कितनी दूर होते चले जाते हैं। आश्चर्य की बात है कि सत्रहवीं सदी में लिखा गया यह नाटक आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना अपने समय में रहा होगा। समाज की प्रवृत्तियाँ, मनुष्य की इच्छाएँ और उसके भीतर छिपी असुरक्षाएँ सदियों में नहीं बदलतीं। यही कारण है कि आज के तेज़-रफ़्तार सामाजिक परिदृश्य में भी मौलियर का यह व्यंग्य उतना ही पैना और प्रभावशाली रहता है।

यूनिवर्सिटी थियेटर के सदस्यों ने अपने अभिनय, ऊर्जा और प्रतिबद्धता से इस प्रस्तुति को जीवंत बना दिया। हास्य और व्यंग्य के साथ-साथ प्रस्तुति में हिंदी फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतों और संगीतमय अंशों को शामिल किया गया, जिससे दर्शकों के लिए यह अनुभव और भी अधिक रंगमय और सहज बन गया। नृत्य, भाव-भंगिमाएँ और मंच-सज्जा—सब कुछ इस तरह गढ़ा गया कि दर्शक उस दुनिया में स्वाभाविक रूप से खिंचते चले जाते हैं जहाँ एक साधारण व्यक्ति अपनी महत्वाकांक्षा और असुरक्षाओं के बीच झूलता नज़र आता है।

इस प्रस्तुति की सबसे उल्लेखनीय बात यह भी रही कि अभिनेता अपने रोज़मर्रा के अध्ययन, परीक्षाओं और व्यक्तिगत दायित्वों के बीच समय निकालकर निरंतर अभ्यास और मंच-तैयारी में जुटे रहे। उनकी यह लगन दर्शकों तक सीधी पहुँचती है और प्रस्तुति को जीवंतता प्रदान करती है।

नाटक के मूल प्रश्न आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं—हम मनुष्य हीनताबोध के कारण अपनी मौलिकता क्यों गँवा देते हैं? हम क्यों मान लेते हैं कि नक़ली मूल्यों को अपनाने से हमारा मूल्य बढ़ जाएगा? और अब जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) हमारे जीवन में इतनी गहराई से प्रवेश कर चुकी है, क्या हम उसके सामने अपनी मानवीय मौलिकता खो देंगे?

‘क्रेज़ी किया रे’ इन जटिल सवालों की खोज को सरल, रोचक और व्यंग्यपूर्ण ढंग से मंच पर लाता है। नाटक हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हमारी पहचान क्या है—जो हम दूसरों को दिखाना चाहते हैं या जो हम वास्तव में हैं?
इस प्रस्तुति में अभिनय करने वाले कलाकारों में सन्नु, प्रियांशी, सृष्टि, ऋतु, अंकिता, शुभम, शक्ति, अनंत, प्राची, ईशु, हर्षित,सृष्टि, स्वीटी, श्वेता, सृष्टि, रिया, दीपशिखा, अर्पिता, आशीष, दुर्गेश, कीर्ति, ताशु, रक्षा, सत्यवान, नंदिनी, ममता और अमन शामिल रहे। सभी ने अपने-अपने किरदारों को संजीदगी और मज़ाक़िया अंदाज़ के संतुलन के साथ निभाया।

प्रस्तुति-प्रबंधन हिमांशु द्वारा किया गया। संगीत संचालन शिवम ने संभाला, जबकि अभिनय मार्गदर्शन अमर द्वारा प्रदान किया गया। संगीत की तैयारी में अजीत, सानु, हर्ष और विप्लव का अहम योगदान रहा। मंच संचालन माधवी ने किया। नाटक का निर्देशन अमितेश कुमार ने संभाला और मंच प्रबंधन की ज़िम्मेदारी शुभम, आदित्य, प्रखर, निशांत और विवेक ने निभाई।

दर्शक दीर्घा विद्यार्थियों से खचाखच भरी हुई रही और पूरे समय उत्साह-आनंद के साथ प्रस्तुति से जुड़ी रही। नाटक समाप्त होने के बाद भी दर्शकों की मुस्कान, तालियाँ और प्रतिक्रिया यह बताने के लिए पर्याप्त थीं कि इस प्रस्तुति ने न केवल मनोरंजन किया बल्कि सोचने के लिए भी प्रेरित किया।‘क्रेज़ी किया रे’ केवल एक नाटकीय प्रस्तुति नहीं बल्कि मौलिकता बनाम दिखावे की ख़ामोश बहस का आनंददायक लेकिन विचारशील रूप है, जो हर पीढ़ी के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना मौलियर के समय में था।

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