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राजनीति पर उद्धरण

राजनीति मानवीय अंतर्क्रिया

में निहित संघर्षों और सहयोगों का मिश्रण है। लेनिन ने इसे अर्थशास्त्र की सघनतम अभिव्यक्ति के रूप में देखा था और कई अन्य विद्वानों और विचारकों ने इसे अलग-अलग अवधारणात्मक आधार प्रदान किया है। राजनीति मानव-जीवन से इसके अभिन्न संबंध और महत्त्वपूर्ण प्रभाव के कारण विचार और चिंतन का प्रमुख तत्त्व रही है। इस रूप में कविताओं ने भी इस पर पर्याप्त बात की है। प्रस्तुत चयन में राजनीति विषयक कविताओं का एक अनूठा संकलन किया गया है।

नेता और अफ़सर और इनके चुने हुए विशेषज्ञ मिलकर तय करते है कि अब और कहाँ धरती का उत्पीड़न करना है ताकि कोई पैसा बनाए, कोई मौज करने आए, कोई कूड़ा बीनने, कोई सड़क बनाने।

कृष्ण कुमार
  • संबंधित विषय : देश

जनसंघ के अंधविश्वासी लोग कहते हैं कि गाय भारतीय संस्कृति की अंग है, तो वह जानते नहीं कि अनजाने में कितनी बड़ी सच्चाई कह गए हैं।

राजेंद्र माथुर

लीडरी ऐसा बीज है जो अपने घर से दूर की ज़मीन में ही पनपता है।

श्रीलाल शुक्ल

ज़ोर से बोलने का वही नतीजा हुआ जो प्रायः होता है। विपक्ष धीरे-धीरे बोलने लगा।

श्रीलाल शुक्ल

कहीं सत्य, कहीं असत्यवादी, कहीं कठोर, कहीं प्रियभाषिणी, कहीं हिंसा करने वाली, कहीं दयालु, कहीं लोभी, कहीं उदार, कहीं नित्य प्रति बहुत द्रव्य व्यय करने वाली और कहीं बहुत से संचय करने वाली यह राजनीति—वेश्या के सामान अनेक रूप से रहती है।

भर्तृहरि

राजनीति से संन्यास, उससे बड़ी राजनीति करने के लिए लिया जाता है।

हरिशंकर परसाई

आदमी फ़िल्मी अभिनेता हो या नेता, तभी वह इच्छा-मात्र से रो सकता है।

श्रीलाल शुक्ल

सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक कल्याण की एक ही नींव है, और वह यह जानना कि ‘मैं और मेरा भाई एक हैं।’ यह सब देशों और सब जातियों के लिए सत्य है।

स्वामी विवेकानन्द

शोषकों के वर्ग-स्वार्थों को जब कोई चुनौती देता है; तो उस वर्ग के प्रवक्त्ता कहते हैं, यह आदमी ख़ुदा से लड़ रहा है। ख़ुदा को प्राइवेट संपत्ति का रक्षक और शोषण का एजेंट तभी से बना लिया गया था—जब मनुष्य ने उसके होने की कल्पना की थी।

हरिशंकर परसाई

अपने दल को बलवान बनाने के लिए प्रधानमंत्री पार्लियामेन्ट से कैसे-कैसे काम करवाता है—इसकी मिसालें जितनी चाहिए उतनी मिल सकती हैं। यह सब सोचने लायक है।

महात्मा गांधी

वास्तव किसी क्रांति से सामान्य आदमी को आज़ादी नहीं मिलती, वह हमेशा ग़ुलाम रहता है। आज़ादी हमेशा शासक और शोषक वर्ग को मिलती है।

हरिशंकर परसाई

आजकल सत्ता की भाषा काफ़ी नम्र हो चली है और जिसे दबाया जाता है, उसे 'उसी के हित में' दबाया जाता है।

जॉन स्टुअर्ट मिल

प्यार गहराई से राजनीतिक है। हमारी सबसे गहरी क्रांति तब आएगी, जब हम इस सचाई को समझ लेंगे।

बेल हुक्स

नेताओं और मंत्रियों को नैतिक स्तर की बड़ी चिंता है। यानी जीवन-स्तर चाहे रसलात को चला जाए, नैतिक स्तर हिमालय के शिखर पर चढ़ा रहना चाहिए।

हरिशंकर परसाई

राजनीति से लेखक को दूर रखने की बात वही करते हैं, जिनके निहित स्वार्थ हैं—जो डरते हैं कि कहीं लोग हमें समझ जाएँ।

हरिशंकर परसाई

अब कोई आदमी सुरक्षित नहीं है। एक दिन ऐसा आएग, जब इस देश के आधे आदमियों की जाँच हो रही होगी और बाक़ी आधे जाँच कमीशनों में होंगे।

हरिशंकर परसाई

हमारी राजनीति की आत्मा, वर्चस्व को ख़त्म करने की प्रतिबद्धता है।

बेल हुक्स

सारी समस्याएँ मुहावरों, नारों और अपीलों से सुलझ जाती हैं। सांप्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया—हिंदू-मुस्लिम, भाई-भाई।

हरिशंकर परसाई

जनता अच्छी तरह जानती है कि नेता भावनाओं के व्यापारी होते हैं, फिर भी उनकी बातों में जाती है।

कृष्ण कुमार

चालबाज़ी का एक तरीक़ा, व्यक्तियों में निजी सफलता की पूंजीवादी भूख पैदा करना है। यह चालबाज़ी कभी सीधे-सीधे अभिजनों द्वारा की जाती है, तो कभी परोक्ष रूप से अंधलोकवादी (पॉपुलिस्ट) नेताओं द्वारा कराई जाती है।

पॉलो फ़्रेरा

राजनैतिक मुख्य धारा वह है; जिसमें चाहे मैला उतराता हो, पर जिसमें बहने से सत्ता के द्वीप पर पहुँचा जा सकता है।

हरिशंकर परसाई

उत्पीड़क संपूर्ण समुदाय की उन्नति के पक्ष में नहीं, बल्कि उसके कुछ गिने-चुने नेताओं की उन्नति के पक्ष में होते हैं।

पॉलो फ़्रेरा

राजनीति में जब एक गुट पिट जाता है, तो वह असंतुष्ट होकर जनता के दुःखों पर विलाप करने लगता है।

हरिशंकर परसाई

धार्मिक उन्माद पैदा करना, अंधविश्वास फैलाना, लोगों को अज्ञानी और क्रूर बनाना—राजसत्ता, धर्मसत्ता और पुरुषसत्ता का पुराना हथकंडा है।

हरिशंकर परसाई

मूल्य आज संपदा और सत्ता के संग्रह का बना हुआ है। धर्म अब वह है जो बताता है कि मूल्य संग्रह नहीं बल्कि अपरिग्रह है। संग्रह में आदमी हर किसी के पास से चीज़ों को अपनी ओर बटोरता है, लेकिन इसमें वह हर किसी के स्नेह को गँवाता भी जाता है। स्नेह को खोकर चीज़ को पा लेना, पाना नहीं गँवाना है। यह दृष्टि धर्म ही देता है और वह भोग की जगह त्याग की प्रतिष्ठा करता है। इसीलिए वह राजनीति और कर्म नीति परिणाम नहीं ला पाएगी जो धर्म नीति से हीन है।

जैनेंद्र कुमार

जब कोई सैद्धांतिक आधार नहीं होता, कार्यक्रम नहीं होता, आत्मविश्वास नहीं होता, तो सयाने नेता भी फ़िल्मी हीरो, चमत्कारी साधु और नौटंकीवीर के चक्कर लगाते हैं और संयुक्त मोर्चा बनाते हैं।

हरिशंकर परसाई

राजनीति से दूर रहना ख़ुद में एक राजनीतिक दृष्टिकोण है।

सिमोन द बोउवार

चतुर सरकार मुँह पर कपड़ा डालकर, लचकती-फचकती फ़ूर्ती से कमीशन की गली से निकल जाती है, और उधर समस्याएँ हुड़दंग करती रहती हैं।

हरिशंकर परसाई

राजनीतिक रूप से, तर्क की कमज़ोरी हमेशा से यह रही है कि जो लोग कम बुराई को चुनते हैं, वे बहुत जल्द भूल जाते हैं कि उन्होंने बुराई को चुना है।

हाना आरेन्ट

राजनीति और श्रेष्ठ कर्मों के आरंभ के मूल में धन ही होता है।

दण्डी
  • संबंधित विषय : धन

जो आदमी सबसे बड़ी गप्प हाँक सकता है, उसे सरकार विदेश मंत्रालय का सलाहकार बना लेती है और उसे यह काम दिया जाता है कि विदेशी मामलों में वह अच्छा-से-अच्छा झूठ ईजाद करे।

हरिशंकर परसाई
  • संबंधित विषय : झूठ

एक क़िस्म के नेता होते हैं—'ख़ानदानी नेता।' ख़ानदानी पटवारी, ख़ानदानी पुरोहित की तरह ये भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते जाते हैं। पटवारी का बेटा 'ख़सरा-जमाबंदी' सीख लेता है और बाप की जगह संभाल लेता है। पंडित का बेटा संकल्प का मंत्र और सत्यनारायण की कथा सीखकर बाप के यजमानों को सँभाल लेता है। हमारे यहाँ नेता पिता का बेटा नेता हो जाता है।

हरिशंकर परसाई

उत्पीड़ितों के पक्ष में किया जाने वाला राजनीतिक कर्म, सच्चे अर्थ में शिक्षाशास्त्रीय कर्म होना चाहिए। अतः यह कर्म उनसे अलग रह कर नहीं, बल्कि उनके साथ किया जाना चाहिए।

पॉलो फ़्रेरा

तबादले का सीजन विधायक के लिए बसंत है। बासंती बयार बहती है। सुंदर फूल खिलते हैं। उद्दीपनकारी वातावरण होता है। विधायक स्वर्गसुख में होता है।

हरिशंकर परसाई

साधारण जनता के लिए शासक-वर्ग की राजनीति की लीला, हमेशा अबूझ पहेली होती है।

मैनेजर पांडेय

मैं यह नहीं मानता कि धर्म का राजनीति से कोई वास्ता नहीं है। धर्मरहित राजनीति शव के समान है, जिसे दफ़ना देना ही उचित है।

महात्मा गांधी

…धनी आदमी के पास भावावेग होते हैं, और किसान के पास सिर्फ़ ज़रूरतें होती हैं। इसलिए किसान दोहरी निर्धनता का मारा है; और भले ही राजनीतिक रूप से उसकी आक्रामकताओं का निष्ठुरता के साथ दमन आवश्यक हो, मानवता और धर्म की नज़रों में वह पवित्र है।

ओनोरे द बाल्ज़ाक

चाहिए यह कि लीडर तो जनता की नस-नस की बात जानता हो, पर लीडर के बारे में कुछ भी जानता हो।

श्रीलाल शुक्ल

राजनीति को नकारना भी एक राजनीति है।

हरिशंकर परसाई

हमारे यहाँ भाषा और साहित्य के मामले भी मंत्रियों के द्वारा तय होते हैं। भाषा या लिपि के निर्णय विशेषज्ञ नहीं लेते, मंत्रिगण बैठकर तय कर लेते हैं। इन मंत्रियों को शिक्षा, साहित्य और भाषा के विषय में कितना ज्ञान है—यह कोई बताने की बात नहीं है।

हरिशंकर परसाई

त्याग के और ज़िंदगी से इनकार करने के ख़याल लोगों में उस वक़्त पैदा होते हैं, जब राजनीतिक या आर्थिक मायूसी का उन्हें सामना करना पड़ता है।

जवाहरलाल नेहरू

गाँधीजी की समाधि पर अपने आपको देश के लिए समर्पित करने की शपथ लें, और लौटकर देश को अपने लिए समर्पित करा लें, तो भी गाँधीवाद निभ जाता है। हरिजन की ज़मीन छीन लें, उसे कुएँ से पानी भरने दें, मगर उसे मंदिर में प्रवेश कर लेने दें, तो भी गाँधीवाद का पालन हो जाता है।

हरिशंकर परसाई

हमारी हर वस्तु का भाग्य-विधाता राजपुरुष और राजनेता है। वह सर्वोपरि है, सर्वज्ञ है।

हरिशंकर परसाई

क्रांति तो नेताओं द्वारा जनता के लिए होती है, जनता द्वारा नेताओं के लिए—वह तो दोनों की अटल एकजुटता में होती है

पॉलो फ़्रेरा

गांधी के बावजूद मुस्लिम लीग ने कांग्रेस से पाकिस्तान ले लिया, लेकिन वामपंथी कुछ नहीं ले पाए।

राजेंद्र माथुर

मेरी आज चलती कहाँ है? मेरी चलती तो पंजाब हुआ होता, बिहार होता, नोआखाली। आज कोई मेरी मानता नहीं। मैं बहुत छोटा आदमी हूँ। हाँ, एक दिन मैं हिंदुस्तान में बड़ा आदमी था। तब सब मेरी मानते थे, आज तो कांग्रेस मेरी मानती है, हिंदु और मुसलमान। कांग्रेस आज है कहाँ? वह तो तितर-बितर हो गई है। मेरा तो अरण्य-रोदन चल रहा है।

महात्मा गांधी

यह कहना बिल्कुल ग़लत है कि कलाकर के लिए राजनैतिक प्रेरणा कलात्मक अनुभूति नहीं है, बशर्ते कि वह सच्ची वास्तविक अनुभूति हो—छद्मजाल हो।

गजानन माधव मुक्तिबोध

मेरी कहानियाँ उन महिलाओं के बारे में हैं जिनसे धर्म, समाज और राजनीति—बिना किसी सवाल के आज्ञाकारिता की माँग करते हैं और ऐसा करते हुए उन पर अमानवीय क्रूरता करते हैं, बल्कि उन्हें केवल अधीनस्थ बना देते हैं।

बानू मुश्ताक़

पार्लियामेंट का काम इतना सरल होना चाहिए कि दिन-ब-दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर होता जाए, लेकिन इससे उल्टे इतना तो सब क़ुबूल करते हैं कि पार्लियामेन्ट के मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी पाये जाते हैं।

महात्मा गांधी

अख़बारों में 'वर चाहिए' या 'वधू चाहिए' विज्ञापन जैसे छपते हैं, वैसे ही राजनेताओं के बयान छप रहे हैं कि 'समान विचारधारा' के दलों को मिल जाना चाहिए।

हरिशंकर परसाई