धन पर उद्धरण
"धन" का अर्थ है "सम्पत्ति"
या "मूल्यवान वस्तुएँ"। यह शब्द मुख्य रूप से किसी व्यक्ति के पास मौजूद संपत्ति, पैसा, या वित्तीय साधनों को दर्शाने के लिए प्रयोग होता है।
जो अधिक धन या अधिक विद्या या अधिक ऐश्वर्य को प्राप्त करके भी गर्वरहित होकर व्यवहार करता है, उसी को पंडित कहा जाता है।
मैं अनावश्यक चीज़ों को छोड़ दूँगी, मैं अपना धन दे दूँगी, मैं अपने बच्चों के लिए अपनी जान दे दूँगी; लेकिन मैं ख़ुद को नहीं दूँगी।
आलस्य मनुष्य के द्वारा समय को बर्बाद करना है, लालच उसके द्वारा भोजन या धन को बर्बाद करना है, क्रोध उसके द्वारा शांति को बर्बाद करना है। लेकिन ईर्ष्या—ईर्ष्या उसके द्वारा साथी मनुष्य को बर्बाद करना है। दूसरे मनुष्यों की सांत्वना बर्बाद करना है।
कामोपभोग का लक्ष्य सुखप्राप्ति है तथा धर्म और अर्थ का फल भी सुखप्राप्ति है।
धर्म का पालन करते हुए ही जो धन प्राप्त होता है, वही सच्चा धन है जो अधर्म से प्राप्त होता है वह धन तो धिक्कार देने योग्य है। संसार में धन की इच्छा से शाश्वत धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए।
समाज ने स्त्री के संबंध में अर्थ का ऐसा विषम विभाजन किया है कि साधारण श्रमजीवी वर्ग से लेकर, संपन्न वर्ग की स्त्रियों तक की स्थिति दयनीय ही कही जाने योग्य है। वह केवल उत्तराधिकार से ही वंचित नहीं है, वरन् अर्थ के संबंध में सभी क्षेत्रों में एक प्रकार की विवशता के बंधन में बंधी हुई है।
समाज की दो आधार शिलाएँ हैं—अर्थ का विभाजन और स्त्री-पुरुष का संबंध। इनमें से यदि एक की भी स्थिति में विषमता उत्पत्र होने लगती है, तो समाज का संपूर्ण प्रासाद हिले बिना नहीं रह सकता।
हे राजा! धन से धर्म का पालन, कामना की पूर्ति, स्वर्ग की प्राप्ति, हर्ष की वृद्धि, क्रोध की सफलता, शास्त्रों का श्रवण और अध्ययन तथा शत्रुओं का दमन—ये सभी वही कार्य सिद्ध होते हैं।
बुद्धि से धन प्राप्त होता है और मूर्खता दरिद्रता का कारण है—ऐसा कोई नियम नहीं है। संसार चक्र के वृत्तांत को केवल विद्वान पुरुष ही जानते हैं, दूसरे लोग नहीं।
धन की प्रभुता या पूँजीवाद जितना गर्हित है, उतना ही गर्हित रूप धर्म और अधिकार का हो सकता है; फिर उसके विषय में तो कहना ही व्यर्थ है, जिसे धन, धर्म और अधिकार—तीनों प्रकार की प्रभुता प्राप्त हो चुकी हो।
विवश आर्थिक पराधीनता; अज्ञात रूप में व्यक्ति के मानसिक तथा अन्य विकास पर ऐसा प्रभाव डालती रहती है, जो सूक्ष्म होने पर भी व्यापक तथा परिणामतः आत्मविश्वास के लिए विष के समान है।
जिन स्त्रियों की पाप-गाथाओं से समाज का जीवन काला है; जिनकी लज्जाहीनता से जीवन लज्जित है, उनमें भी अधिकांश की दुर्दशा का कारण अर्थ की विषमता ही मिलेगी।
स्त्री के जीवन की अनेक विवशताओं में प्रधान, और कदाचित् उसे सबसे अधिक जड़ बनाने वाली—अर्थ से संबंध रखती है और रखती रहेगी, क्योंकि वह सामाजिक प्राणी की अनिवार्य आवश्यकता है।
पैसा एक तरह की कविता है।
धन की कमी सभी बुराइयों की जड़ है।
जिसके पास धन होता है, उसी के बहुत से मित्र होते हैं। जिसके पास धन है, उसी के भाई-बंधु हैं। संसार में जिसके पास धन है, वही पुरुष कहलाता है। और, जिसके पास धन हैं, वही पंडित माना जाता है।
जो शास्त्र और कला मर्मज्ञ हो, कलाओं में विचक्षण हो, मल्लिका(माला), फेनिल (स्नानोपयोगी पदार्थ साबुन आदि) तथा कषाय मात्र धन ही जिसके पास शेष बचा हो, ऐसा धनहीन एकाकी नागरक; अपने ज्ञान और कौशल के द्वारा सभाओं में नागरकों और वेश्याओं को शिक्षा देकर अपनी जीविका चला सकता है। इस प्रकार कलाओं और शास्त्र का अध्यापक होने पर भी, वेश्याओं के मार्गदर्शक होने के कारण वह ‘पीठमर्द’ कहलाता है।
सच्चा धन तो है बस धर्म, जो हिंदू का जीवन मर्म।
पैसा बोलता है, लेकिन मुझे बताओ कि यह सिर्फ़ अलविदा क्यों कहता है।
व्यक्ति यदि धार्मिक है तो उसे अपना धन याचकों में वितरित कर देना चाहिए, यदि वह नास्तिक है तो उसे धन का भोग-विलास में उपयोग करना चाहिए, यदि मनुष्य धन को स्पर्श भी न करके छिपा कर रखता है तो उसमें उसका क्या हेतु है, यह हमारी समझ में नहीं आता।
धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों के समवाय में पूर्व-पूर्व श्रेष्ठ होता है, अर्थात् काम से अर्थ और अर्थ से धर्म श्रेष्ठ होता है।
संसार में दो वस्तुएँ बहुत ही कम पाई जाती हैं। एक तो शुद्ध कमाई का धन और दूसरे सत्य-शिक्षक मित्र।
अपने रुपए उन चीज़ों पर ख़र्च करें जो रुपए से मिल सकती हैं। अपना समय उन चीज़ों पर ख़र्च करें जो रुपए से नहीं मिल सकती हैं।
आज के ज़माने में ऐसा होता है कि बहुत सी बातें क़ानून के अनुकूल होने पर भी न्यायबुद्धि के प्रतिकूल होती हैं। इसलिए न्याय के रास्ते धन कमाना ही ठीक हो, तो मनुष्य का सबसे पहला काम न्याय-बुद्धि को सीखना है।
संसार में शरीरधारियों की दरिद्रता ही मृत्यु है और न ही आयु है।
जो धर्म करने के लिए धनोपार्जन की इच्छा करता है, उसका धन की इच्छा न करना ही अच्छा है। कीचड़ लगा कर धोने की अपेक्षा मनुष्यों के लिए उसका स्पर्श न करना ही श्रेष्ठ है।
धन-संचय से ही धर्म, काम, लोक तथा परलोक की सिद्धि होती है। धन को धर्म से ही पाने की इच्छा करे, अधर्म से कभी नहीं।
धन प्राप्ति के सभी उपाय मन का मोह बढ़ाने वाले हैं। कृपणता, दर्प, अभिमान, भय और उद्वेग-इन्हें विद्वानों ने देहधारियों के लिए धनजनित दुःख माना है।
तुम्हारी जेब में एक पैसा है, वह कहाँ से और कैसे आया है, वह अपने से पूछो। उस कहानी से बहुत सीखोगे।
इस प्रकार संसार में धन पाकर जो लोग उसे मित्रों और धर्म में लगाते हैं, उनके धन सारवान हैं, नष्ट होने पर अंत में वे धन ताप नहीं पैदा करते।
धन की इच्छा सबसे बड़ा दुःख है, किंतु धन प्राप्त करने में तो और भी अधिक दुःख है और जिसकी धन में आसक्ति हो गई है, उसे धन का वियोग होने पर उससे भी अधिक दुःख होता है।
सज्जन पुरुष धर्म के लिए ही प्रयत्नपूर्वक धन-संग्रह करते हैं।
आयु के बीत जाने पर भी जिनके पास धन है, वे तरुण हैं। धन-हीन युवक होते हुए भी वृद्ध हो जाते हैं।
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राजन्! चाहे मनुष्य धन को छोड़े और चाहे धन ही मनुष्य को छोड़ दे—एक दिन ऐसा अवश्य होता है। इस बात को जानने वाला कौन मनुष्य धन के लिए चिंता करेगा?
सारा धन भगवान का है और यह जिन लोगों के हाथ में है, वे उसके रक्षक हैं, स्वामी नहीं।
मनुष्य रुपया कमाना जानता है, परंतु सभी को यह मालूम नहीं होता कि कमाई का सदुपयोग कैसे किया जाए।
धन में बल है सत्य नहीं।
धन के बिना संसार व्यर्थ है परंतु अत्यधिक धन भी व्यर्थ है, जैसे अन्न के बिना तन नहीं रहता, परंतु अत्यधिक भोजन करने से प्राण चले जाते हैं।
जो देता है और भोगता नहीं है, उसके पास करोड़ों क्यों न संग्रहीत हों, सब व्यर्थ ही है।
निर्धन को दुर्बल कहा जाता है। धन से मनुष्य बलवान् होता है। धनवान् को सब कुछ सुलभ है। जो कोशवान् है, वह सारे संकटों से पार हो जाता है।
धन जीवन का सवोपरि साधन है अतः उसका नाश जीवन की हानि है।
नम्र व्यवहार सबके लिए अच्छा है, पर उस में भी धनवानों के लिए तो अमूल्य धन के समान होता है।
जैसे जंगल में एक हाथी के पीछे बहुत से हाथी चले आते हैं, उसी प्रकार धन से ही धन बँधा चला आता है।
जनता को यह सिखाना कि वह किसी भी क़ीमत पर धनवान बने, उसे विपरीत बुद्धि सिखाने जैसा है।
जिसका धन मात्र धन के लिए है, वह धन के तत्त्व को नहीं जानता। जैसे सेवक वन में गायों की रक्षा करता है, उसी प्रकार वह भी दूसरे के लिए धन का रक्षक मात्र है।
धन के उपार्जन में दुःख होता है। और उपार्जित धन की रक्षा में भी दुःख होता है। आय में दुःख व्यय में दुःख। सब प्रकार से दुःख देने वाले धन को धिक्कार है।