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सुकरात

- 399 BC

सुकरात की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 19

अधिक श्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करने वाले जीवन से श्रेष्ठतर जीवन नहीं हो सकता; और स्वच्छ अंतःकरण होने से बढ़कर अधिक समानुकूलता वाला जीवन नहीं हो सकता।

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दर्शन का वास्तविक विषय मृत्यु है। सच्चा दार्शनिक मृत्यु के लिए इच्छुक रहता है, क्योंकि दार्शनिक ज्ञान चाहता है और इस शरीर में रहते हुए सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्महत्या करने से हमें मुक्ति मिल सकती है। आत्महत्या से तो जिस ईश्वर ने हमें शरीर-रूपी कारागार में डाला है, उसके नियमों का उल्लंघन होगा। ज्ञान-प्राप्ति की दृष्टि से मृत्यु का स्वागत करो।

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मनुष्य को चाहिए कि वह जिस स्थिति में भी हो, मृत्यु की परवाह करके कर्तव्य का पालन करे। मृत्यु की अपेक्षा अधर्म से अधिक डरना चाहिए।

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मनुष्य को अंधे के समान जीवन-यापन नहीं करना चाहिए, जीवन के तत्वों की मीमासा करनी चाहिए। अपरीक्षित जीवन जीने योग्य नहीं।

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मैं ज्ञान नहीं सिखाता, ज्ञानी तो केवल ईश्वर ही है। मैं तो लोगों के ज्ञानाभिमान को नष्ट कर, उनको अपने अज्ञान का परिचय कराता हूँ। अपने अज्ञान को जानना ज्ञान का प्रथम चरण है।

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