सुकरात की संपूर्ण रचनाएँ
उद्धरण 19
दर्शन का वास्तविक विषय मृत्यु है। सच्चा दार्शनिक मृत्यु के लिए इच्छुक रहता है, क्योंकि दार्शनिक ज्ञान चाहता है और इस शरीर में रहते हुए सच्चे ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसका अर्थ यह नहीं कि आत्महत्या करने से हमें मुक्ति मिल सकती है। आत्महत्या से तो जिस ईश्वर ने हमें शरीर-रूपी कारागार में डाला है, उसके नियमों का उल्लंघन होगा। ज्ञान-प्राप्ति की दृष्टि से मृत्यु का स्वागत करो।