अलंकार मिश्रा का क्या है!?
रचित
10 जुलाई 2026
एक दुबला-पतला आदमी अलंकार मिश्रा! बीड़ी (या...) पीते हुए रील्स में दिखता है। गाँव-क़स्बे जैसा बैकग्राउंड, बिना माइक की आवाज़, मुँह से धुँआ निकल रहा है। वीडियो इंटरेस्टिंग लगता है। हम उस पर रुकते हैं। नैनो-सेकेंड्स भर की इस ज़रा-सी देर में हमारे पूर्वाग्रह सक्रिय हो जाते हैं और हमें लगता है कि यह आदमी ज़रूर कोई मूर्खतापूर्ण बात करेगा या अजीब-सा मुँह बनाकर कुछ गाएगा या गाली बकेगा जिसके लिए शायद हमें हेडफ़ोन या ईयरफ़ोन लगाना पड़े।
लेकिन...
लेकिन...
लेकिन...
जब वह मुँह खोलता है तो उसका पहला वाक्य ही हमें चौंका देता है, “लुईस हैमिल्टन का क्या है!”
इसके आगे वह लुईस हैमिल्टन और फ़ॉर्मूला-वन पर के बारे में बात करता है।
हमें झटका लगता है, “अरे ये गाँव का लगने वाला आदमी कैसे दुनिया के सबसे महँगे खेल पर इतनी गहराई से बात कर रहा है!”
इस तरह ही वह किम कार्दशियन जैसे वैश्विक सितारों पर ऐसे बात करता है, जैसे वह उनका पड़ोसी हो।
एक दूसरी रील में वह कहता है, “मेस्सी का क्या है! मेस्सी ने फिर साबित कर दिया कि वह सर्वश्रेष्ठ बकरी (GOAT—Greatest Of All Time) नहीं, सर्वश्रेष्ठ चरवाहा है।”
वह मेस्सी-रोनाल्डो और नार्थ-अमेरिका में चल रहे फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप पर बहुत चुटीले और सधे हुए तरीक़े से अपनी बातें रखता है। हम जैसे-जैसे उसकी और रील्स देखते जाते हैं; साहित्य, दर्शन, राजनीति, खेल वग़ैरा पर मज़ेदार-ज्ञानदार कंटेट मिलता जाता है। हमारा वह भरोसा और समझदारी और मज़बूत होती है कि किसी इंसान को देखकर उसकी प्रतिभा, रुचि और कुशलता का अंदाज़ा नहीं लगाना चाहिए। यह एक सामान्य दर्शक का रिएक्शन है, लेकिन जैसे जॉर्ज ऑर्वेल के ‘एनिमल फ़ॉर्म’ में सब जानवर एक-दूसरे के बराबर होने के बावजूद कुछ जानवर दूसरों के मुक़ाबले ज़्यादा बराबर थे, इसी तरह दूसरों की तुलना में ज़्यादा बराबर कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर इस आदमी की समझदारी पर हैरानी जताते हुए कहा कि यह असली हो ही नहीं सकता... यह ज़रूर AI है, बॉट है।
इसके पीछे वही सोच है जो हर आदमी को उसके कपड़ों से पहचानती है। अगर उसने ब्रांडेड दिखने वाले कपड़े नहीं पहने हैं तो इनके लिए हर दुबला-पतला आदमी कुपोषित है और हर स्थूल आदमी आलसी है। इस मामले में इस दुनिया में अलंकार पहले नहीं है।
वर्ष 2016 के आस-पास बांग्लादेश के कलाकार ‘हीरो आलोम’ को भी अपने लुक्स और पतले होने के कारण इन वोकरों (वोक होने का दिखावा करने वाले जोकरों) से बहुत गंदगी झेलनी पड़ी थी। इसी तरह के कमेंट कई अन्य क़स्बाई दिखने वाले क्रिएटर्स पर भी आए दिन होते रहते हैं। इन्हें अलंकार मिश्रा असली नहीं लगता। इसी तरह साधारण दिखते हुए अच्छी अँग्रेज़ी में सोशल इश्यूज़ पर बोलने वाली पुजारिनी प्रधान भी इन्हें समझ में नहीं आती; पर ग़ौर करने की बात यह है कि कीचड़ में लोटते पुनीत सुपस्टार पर इन्हें कभी संदेह नहीं हुआ, क्योंकि इनके लिए कीचड़ में लोटता आम आदमी सामान्य है। इससे इनकी राय और जानकारी और पूर्वाग्रह और मूढ़ता और हिंदुस्तान के एलिवेटेड और वोक समुदाय के मानसिक स्तर का पता चलता है और समझ में आता है कि बढ़िया बैकग्रांउड, साफ़ वॉइस-क्वालिटी और सुधरे कपड़ों वाले इन ‘वान्ना बी एलीट्स’ के दिमाग़ में जितना गोबर भरा है, उतना तो पुनीत सुपरस्टार भी खा नहीं सकता।
मैं थोड़ा ठहरता हूँ और उन बड़ों/दोस्तों को याद करता हूँ जिन्होंने कभी डाँटकर तो कभी प्यार से समझाया था कि किसी को इस तरह जज करना अनैतिक है। सबको अपने जैसा मत बनाओ, न सब तुम्हारे जैसे हो सकते हैं। एक मनुष्य की तरह लोगों से जुड़ो और अपने संस्कारों की सड़ाँध और परवरिश की पेशाब का निपटान घर से/पे ही करके निकलो।
दरअस्ल, यह नया नहीं है : बीड़ी वाले कृशकाय हमेशा अपनी हदों और औक़ात से बाहर की बात करते रहे हैं। शरत्चंद्र, मुक्तिबोध से लेकर विद्रोही तक नायकों की एक पूरी पीढ़ी है जो मुख्यतः नकारे गयों का एक सतत सिलसिला है। साहित्य से उदाहरण दे रहा हूँ; क्योंकि यह मेरी सीमा है, वरना ऐसे उदाहरण आपको सर्वत्र मिल जाएँगे। शरत्चंद्र से भद्रलोक की घृणा, मुक्तिबोध का लगभग त्रासद जीवन-मरण और विद्रोही का कंगाल-आवारापन... बीड़ी पीने वालों की दुनिया बहुत विचित्र बन पड़ी है। यह अब एक परंपरा है—अपरंपरागत जनों की परंपरा!
हमें लगा था कि वह भद्रलोक ख़त्म हो गया और अब तो हम गालियों तक को कूल बना चुके हैं। हम शायद अब बीड़ी, बनियान और बैकग्राउंड से आगे बढ़ गए हैं; लेकिन जैसे बीड़ी नहीं मरती, वैसे ही वह भद्रलोक भी नहीं मरता जो किसी अलंकार मिश्रा की राय से इतना अचंभित है कि उसके अस्तित्व तक पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए शर्माता नहीं।
यह सच ही है कि हम तीसरी दुनिया हैं, यूरोप का डस्टबिन हैं, अँग्रेज़ों के लिए सपेरे हैं और काले अँग्रेज़ों के लिए कॉकरोच...
लेकिन हम अलंकार हैं; अपनी धुन अपनी राय के साथ अपने हिस्से की साँसों को अपनी मर्ज़ी के ज़हर में बुझाते बीड़ी के कश खींच रहे हैं और हमारे मुँह से धुएँ के साथ सिर्फ़ बातें नहीं, बल्कि इस देश के एलीट की वह घृणा भी दिख रही है जो यूरोप की हर चीज़ पर अपना पैदाइशी हक़ माने बैठी है।
यह शहरी समझदारी चाहती है कि तुम रोनाल्डो, मेस्सी, किम कार्दशियन पर बात करने के लिए हमारे जैसे दिखो; हमारे उतारे हुए कपड़े पहनो जिसके लिए देश के हर शहर में एक सरोजिनी मार्केट खुला है; हमारी तरह सिगरेट पीओ, अपनी तरह बीड़ी क्यों पीते हो! रील बनाना है तो बनाओ, कीचड़ में लोटो, हुमचाओ... हम मान लेंगे, गाली दो—हम तुम्हें बड़ा आदमी बना देंगे, पर अगर तुमने अपनी ‘इस’ छवि से इतर कुछ किया तो... वी आर रियली फ़किंग... सॉरी, लेकिन तुम एग्ज़िस्ट ही नहीं करते। तुम घोस्ट हो जैसे मुक्तिबोध ब्रह्मराक्षस था जैसे शरत्चन्द्र के बारे ‘शेष प्रश्न’ अब भी अनुत्तरित हैं जैसे विद्रोही को ‘कूल’ बनने के लिए मरना पड़ा। तुम्हारी हैसियत ही क्या है अलंकार! तुम कौन हो बे! हमारी कोर-कंपीटेंसी में हमारी दया के बिना घुसने वाले... तुम्हारा क्या है अलंकार मिश्रा!?
अलंकार और पुजारिनी प्रधान जैसे लोगों के न कपड़ों का कोई ब्रांड है न चेहरे का न धुँए का न बैकग्राउंड का, यह इस सतही समय के प्रति-ब्रांडनायक हैं जिनसे बड़े-बड़े ब्रांडुओं के फ़ैब्रिक सुलग गए हैं। इन क़स्बाइयों के पास मनुष्य द्वारा विकसित किए गए सबसे महँगे ब्रांड हैं—योग्यता, कुशलता और आत्मविश्वास। इन्हें ख़रीदना सबके बस की बात नहीं।
अलंकार बहुत सही गुरू! काश तुम सच में AI ही निकलो, मनुष्य नहीं; क्योंकि मनुष्य और मनुष्यता के दुःख संवेदनशीलों का स्थायी अपराधबोध हैं। लेकिन ये दुःख, ये संवेदन, ये अपराधबोध ही कुछ मनुष्यों को अमर कर देते हैं। काश! काश! काश... तुम AI ही निकलो और अनंतकाल तक इस (इस्स नहीं) सामंती भद्रलोक का अस्ल चेहरा सामने लाते रहो—मनुष्यों की तरह!
अलंकार—अगर हम सहपाठी होते तो तुम मेरे पक्के दोस्त होते।
पुनश्च बतर्ज़ टोबा टेक सिंह
लव यू एंड,
एलीट एंड दी अभिजात्य एंड दी भद्रलोका दी विको दंतकांति दी खीसे नपोर ही ही ही रोनाल्डो दी क्रिस्टियानो दी मेस्सी दी एफ़-वन दी क्रिस्टियन बेल दी स्टीव वॉ दी डेनिस लिली दी मार्टिना हिंगिस दी शारापोवा ते अगासी ते स्टीफ़न फ्लेमिंग दी इयान फ्लेमिंग दी हिली दी तेंजिंग नोरगे दी बाइचुंग भूटिया दी सुनील क्षेत्री दुर फिटेमूं...
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बेला पॉपुलर
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