सतलुज : बहता हुआ इतिहास
संगीता मनराल विज
10 जुलाई 2026
कुछ फ़िल्में शहीद होने के लिए ही बनती हैं। इस तरह देखें तो ‘सतलुज’ भी एक शहीद फ़िल्म है। यह फ़िल्म जब वर्ष 2023 में रिलीज़ के लिए तैयार हुई, तभी से विवादों में घिर गई। इस फ़िल्म का पहला शीर्षक ‘ग़ल्लूघारा’ था, जिसका अर्थ होता है—नरसंहार। बाद में इसका नाम बदलकर ‘पंजाब-95’ किया गया और आख़िरकार वह ‘सतलुज’ के नाम से रिलीज़ के लिए तैयार हुई। सेंसर बोर्ड ने इसमें 127 कट सुझाए थे। सवाल यह है कि इतने कट्स के बाद किसी फ़िल्म में बचता ही क्या है?
वैसे, ‘सतलुज’ शीर्षक भी अपने भीतर एक अर्थ रखता है। पंजाब का तरनतारन, हरिके बैराज और सतलुज का किनारा शायद उस हिंसक दौर की स्मृतियों को आज भी अपने भीतर सँजोए हुए हैं।
मैं लंबे समय से इस फ़िल्म का इंतिज़ार कर रही थी। मेरा मानना है कि इतिहास, चाहे जितना भी क्रूर क्यों न हो; उसे देखना चाहिए, उससे सीखना चाहिए ताकि वही ग़लतियाँ दुबारा न दोहराई जाएँ। लेकिन अक्सर होता इसका उलटा है। हम इतिहास से संवाद करने के बजाय उसे ढक देने की कोशिश करते हैं। शायद इसलिए कि अतीत के कुछ सच आज भी असुविधाजनक हैं।
जब फ़िल्म ZEE 5 नाम के ओटीटी पर रिलीज़ हुई तो सोचा कि इतवार को आराम से देखूँगी। आख़िर ऐसा क्या है इस फ़िल्म में कि इतने वर्षों से विवाद इसका पीछा नहीं छोड़ रहे। लेकिन जब देखने बैठी तो पता चला कि फ़िल्म प्लेटफ़ॉर्म से हटाई जा चुकी है।
बहरहाल, इंसानी फ़ितरत भी अजीब है। जिस चीज़ पर मनाही हो, वही सबसे ज़्यादा खोजी जाती है। इस फ़िल्म के साथ भी यही हुआ। जिन-जिन लोगों से फ़िल्म माँगी, लगभग सबने भेज दी। तब मन में यही सवाल आया—आख़िर फ़िल्म हटाकर हासिल क्या हुआ?
फ़िल्म का पहला संवाद ही भीतर तक हिला देता है—“बहती हुई लाशें बहता हुआ इतिहास होती हैं, वे कभी आँकड़े नहीं बन पातीं।”
कुछ क्षण पहले तक वे लाशें साँस लेता हुआ जीवन थीं। उनके अपने घर थे, अपने लोग थे, अपने नाम थे। फिर वे लाश बन गईं और थोड़ी देर बाद रिकॉर्ड में सिर्फ़ एक संख्या या एक ‘लावारिस’ शरीर।
फ़िल्म का केंद्र जसवंत सिंह खालड़ा हैं। उनके इर्द-गिर्द बुनी गई यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरे दौर की है जिसे भारत के हालिया इतिहास के सबसे कठिन अध्यायों में गिना जाएगा।
वर्ष 1995 भारत में बदलावों का साल था। देश आर्थिक उदारीकरण के अगले पड़ाव पर था। इंटरनेट आम लोगों तक पहुँचने लगा था। भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना। बॉम्बे का नाम बदलकर मुंबई हुआ। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे रिलीज़ हुई। उसी वर्ष पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या हुई।
लेकिन इन्हीं घटनाओं के समानांतर पंजाब एक और इतिहास से गुज़र रहा था। वर्षों से लोग ग़ायब हो रहे थे। आतंकवाद और उसके ख़िलाफ़ चल रहे अभियान के बीच असंख्य परिवार अपने प्रियजनों को खोज रहे थे। उसी समय बैंक अधिकारी और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा उन कथित गुमशुदगियों और अवैध दाह-संस्कारों की पड़ताल कर रहे थे। बाद में उनका पंजाब पुलिस द्वारा अपहरण हुआ और उनकी हत्या कर दी गई।
‘सतलुज’ उस दौर की पुलिस-व्यवस्था की निर्ममता, उसके भीतर मौजूद भय और सत्ता के साथ उसके रिश्ते को सामने लाती है और यह भी दिखाती है कि कई बार पुलिसवाला भी पुलिसवाले से डरता है। व्यवस्था के भीतर भय ऊपर से नीचे तक बहता है।
‘सतलुज’ का एक संवाद है—“वॉर और पीस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।” लेकिन फ़िल्म देखते हुए मुझे लगा कि वह सिक्का हमेशा ग़रीब और बेगुनाह लोगों की ज़मीन पर उछाला जाता है। हेड आए या टेल, हार अक्सर उसी की होती है जिसके हाथ में सत्ता नहीं होती।
पंजाब का इतिहास पढ़ते हुए कई बार लगता है कि इस प्रदेश ने जितने घाव सहे हैं, उतने शायद ही किसी और ने। बँटवारे की त्रासदी, उग्रवाद, 1984 के दंगे, उसके बाद का पुलिस-अभियान और आज की नशे की समस्या—हर दौर में सबसे अधिक कीमत आम लोगों और युवाओं ने चुकाई है। इन प्रश्नों पर असहमति हो सकती है, बहस हो सकती है; लेकिन इन्हें पूछे बिना इतिहास पूरा नहीं होता।
इस फ़िल्म के भारत में उपलब्ध न होने के कारणों पर अलग-अलग मत हैं और इस पर क़ानूनी प्रक्रिया भी चल रही है। लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि किसी फ़िल्म को लोगों की पहुँच से हटा देने से उसके बारे में जिज्ञासा कम नहीं होती। कई बार वह और बढ़ जाती है।
मुझे लगता है कि कुछ फ़िल्में शहीद होने के लिए ही बनती हैं। उनका महत्त्व केवल उनकी कहानी में नहीं, बल्कि उस बेचैनी में होता है जिसे वे समाज के भीतर जगा देती हैं। उनकी शहादत उन्हें एक मुकम्मल और अनिवार्य फ़िल्म में बदल देती हैं... यही सार्थक सिनेमा की सबसे बड़ी सफलता भी है।
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‘सतलुज’ पर और आलेख यहाँ पढ़िए : ‘मैं हनेरे नूं चैलेंज करदां’ | एक धारा को रोकने की कोशिश
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