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अभिमान पर उद्धरण

धन-संपत्ति मिथ्या अभिमान से उन्मत्त कर देती है।

बाणभट्ट
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हम दुर्बल मनुष्य राग-द्वेष से ऊपर रहकर कर्म करना नहीं जानते, अपने अभिमान के आगे जाति के अभिमान को तुच्छ समझ बैठते हैं।

हरिकृष्ण प्रेमी