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ढोंग पर उद्धरण

भारत में जितना व्यवस्थित धंधा ब्राह्मण का है, उतना मारवाड़ी का भी नहीं।

हरिशंकर परसाई

गाँधीवाद, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता की जो बात की जाती है, वह ख़ास अर्थ नहीं रखती। मूल है, जो भी हाथ पड़ जाए, सत्ता पा लेना।

हरिशंकर परसाई

हर तरह के चोर कर्म—घूस, कालाबाज़ारी, मुनाफ़ाख़ोरी, राजनैतिक बेईमानी, पाखँड—सबकी साधना धर्म की मदद से होती है

हरिशंकर परसाई

धन की प्रभुता या पूँजीवाद जितना गर्हित है, उतना ही गर्हित रूप धर्म और अधिकार का हो सकता है; फिर उसके विषय में तो कहना ही व्यर्थ है, जिसे धन, धर्म और अधिकार—तीनों प्रकार की प्रभुता प्राप्त हो चुकी हो।

महादेवी वर्मा

धर्म का जन्म अज्ञान और डर से हुआ—आदिम मनुष्य के प्रकृति और जगत के बारे में अज्ञान और डर से। फिर धर्म संस्थागत हुआ, राजसत्ता के साथ मिला, शोषण का जरिया बना।

हरिशंकर परसाई

पुजारी जानता है; भगवान चाहे कहीं और हों, मगर मंदिर में तो क़तई नहीं है। मुसलमान जानता है कि ख़ुदा कहीं होगा तो मस्जिद के बाहर होगा, यहाँ तो नहीं है। मगर अपना धंधा इसी में सुरक्षित है कि लोगों को विश्वास दिलाएँ कि यज्ञ से उनका कल्याण होगा। मंदिर और मस्जिद में की गई पुकार भगवान एकदम सुनता है—सीधी ‘हॉट लाइन’ है।

हरिशंकर परसाई

धर्म कोई भी हो, भगवान या ख़ुदा का निवास काले धन की तिजोरी में और ग़ैरकानूनी शराब की बोतल में रहता है। भगवान क्षीर सागर में नहीं, ग़ैरकानूनी मदिरा सागर में विश्राम करते हैं।

हरिशंकर परसाई

जिस जाति के धर्मगुरु कविता पर, साहित्य पर बंदिश लगाते हैं, उस जाति पर हम साधुओं को दया आती है। हमें उस जाति के भविष्य के बारे में भी चिंता होती है। कालिदास बच गए। उन्होंने 'कुमार संभव' में तो शिव-पार्वती के रमण का वर्णन किया है, तो शैव उन्हें त्रिशूल से मार डालते, पर तब धर्मगुरु संकीर्ण नहीं थे।

हरिशंकर परसाई

महान सभ्यता जब बीच में आकर सड़ती है, तब उसमें अछूत-प्रथा, सती-प्रथा और दहेज-प्रथा की बीमारियाँ पैदा होती हैं।

हरिशंकर परसाई

अच्छा भोजन करने के बाद मैं अक्सर मानवतावादी हो जाता हूँ।

हरिशंकर परसाई

कोई-कोई सनकी राजा ऐसे होते थे कि अपने नौकर को कोड़ों से ख़ूब पीटते थे, मगर उनकी चिकित्सा के लिए डॉक्टर तैयार रखते थे। अपनी सरकार भी सनकी ज़मींदार है। शिक्षक को ख़ूब कष्ट होने देगी, मगर कल्याण-निधि ज़रूर खोल देगी।

हरिशंकर परसाई

एक संगठित धर्माचार्यों और पुरोहितों की परंपरा; जब भगवान के नाम पर अज्ञान और अंधविश्वास का राज चलाए, और राजनैतिक सत्ता इसमें सहयोग दे क्योंकि उसकी भी इससे रक्षा होती है—तब ये दोनों सत्ताएँ क्रूर और मानव-प्रगति-विरोधी होती हैं।

हरिशंकर परसाई

कुसंस्कारों, कुप्रथाओं और मिथ्या विश्वासों में आपादमस्तक ढँके हुए; विशाल जनसमूह का उपयोग बिल्कुल उस तरह किया जा रहा है, जिस तरह कारख़ानेवाला ‘कच्चे माल’ का उपयोग करता है।

हरिशंकर परसाई

जिस जाति में बच्चे की बलि को धर्म-साधना माना जाए, विधवा को पति की चिंता में डाल देना नैतिकता माना जाए, जिस धर्म में ऐसी कथा हो कि मोरध्वज और उसकी पत्नी भगवान को ख़ुश करने के लिए बेटे को आरी से चीरते हैं, जिस देश में मनु महाराज विधान देते हैं कि यदि द्विज शूद्र को मार डाले; तो वह उतना ही प्रायश्चित करे, जितना सूअर या कुत्ते को मारने पर—उस जाति की संवेदना, मूल्यचेतना, मानव-गरिमा की भावना, अध्यात्म चेतना को फूल चढ़ाए जाएँ या उस पर थूका जाए।

हरिशंकर परसाई

माँ गाय ने कितने दंगे करवाए हैं, असंख्य आदमी मरवाए हैं। अभी भी गाय के दंगे होते जाते हैं। गाय को माँ मानने से साँड पिता हो गया, और गौ-भक्तों में साँडपन और उसी की अक्ल गई।

हरिशंकर परसाई

विचार मंच की स्थापना दो तरह से होती हैं : कोई विचारक हो तो उसके नाम से विचार मंच इसलिए बनता है, ताकि उसके विचारों के आधार पर उसके अनुयायी विचार करेंगे। दूसरे कोई विचारहीन हो; लेकिन दूसरे कारणों से मशहूर हो, तो इसलिए विचार मंच की स्थापना होती है कि उसने तो विचार नहीं किया, मगर बाक़ी लोग विचार करें।

हरिशंकर परसाई

शोभा यात्रा उनकी निकलती है, जो भभूत रमाने-वाले शिव के पत्थर के लिंग पर सोना मढ़ते हैं। शोभा यात्रा उनकी निकलती है, जो दसवीं शताब्दी के बाद दुनिया में क्या हुआ, यह नहीं जानते और आधुनिक समाज को उपदेश देते हैं।

हरिशंकर परसाई

जो यज्ञ करते हैं, वे जानते हैं कि यज्ञ से कोई देवता प्रसन्न नहीं होता। जिन मंत्रों का उच्चारण किया जाता है; वे अगर संस्कृत से हिंदी में कर दिए जाएँ, तो प्राइमरी स्कूल की किताब के लायक हैं।

हरिशंकर परसाई

मज़हबी कर्मकांड तथा रस्मो-रिवाज की रक्षा करने के स्थान पर देश तथा राष्ट्र की रक्षा करना, अपनी तथा मनुष्य जाति की उन्नति के लिए कहीं अधिक आवश्यक है।

गणेश शंकर विद्यार्थी

नेताओं और मंत्रियों को नैतिक स्तर की बड़ी चिंता है। यानी जीवन-स्तर चाहे रसलात को चला जाए, नैतिक स्तर हिमालय के शिखर पर चढ़ा रहना चाहिए।

हरिशंकर परसाई

ईमानदारी का उपदेश देनेवाला अगर ख़ुद ईमानदारी बरतेगा, तो गड़बड़ होगी। सत्य का उपदेश देनेवाले को मिथ्या बोलना चाहिए। और इस तरह 'चाहिए-चाहिए' की गूँज होती रहती है।

हरिशंकर परसाई

हिंसा और अपराध के तनाव, सनसनी, उत्तेजना के साथ ही देश के मानस को चाहिए—धर्मांधता। धर्मांधता इस देश के आदमी की ज़रूरत बनाई गई है।

हरिशंकर परसाई

संपन्न आदमी किराए पर जप कराके बड़े संतोष का अनुभव करता है, मानो वह अपने भगवान से साफ़ कह देता है—'हे ईश्वर, मुझे तो फ़ुर्सत नहीं है, मुझे दूकान जाना है। इस पंडित को पैसे दे दिए हैं, यही तुम्हारी स्तुति गा देगा।'

हरिशंकर परसाई

प्राचीनता की पूजा बुरी नहीं, उसकी दृढ़ नींव पर नवीनता की भित्ति खड़ी करना भी श्रेयस्कर है, परंतु उसकी दुहाई देकर जीवन को संकीर्णतम बनाते जाना और विकास के मार्ग को चारों ओर से रुद्ध कर लेना—किसी जीवित व्यक्ति पर समाधि बना देने से भी अधिक क्रूर और विचारहीन कार्य है।

महादेवी वर्मा

अद्भुत सहनशीलता है इस देश के आदमी में, और बड़ी भयावह तटस्थता। कोई उसे पीटकर पैसे छीन ले, तो वह दान का मंत्र पढ़ने लगता है।

हरिशंकर परसाई

धर्म ने ज्ञान-प्रचार का आदेश दिया, धार्मिक आडंबर ने घोर अज्ञान फैलाया। धर्म ने मनुष्य के सामने धर्म का सर्वश्रेष्ठ आदर्श रखा, धार्मिक आडंबरों ने उसे पग-पग पर पीछे धकेला।

गणेश शंकर विद्यार्थी

तमाम झूठे विश्वासों, मिथ्याचारों, कर्मकांडों, तर्कहीन धारणाओं, पाखंडों को कंठ में अंगुली डाल-डालकर और पानी भरकर उल्टी करानी पड़ती है, तब धर्म की अफ़ीम का नशा उतरता है।

हरिशंकर परसाई

सप्रयास धर्म, जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। वह जीवन की गहराई तक पहुँच सकता है, और उनकी प्रत्येक शिरा में व्याप्त होकर उसे रसमय ही कर सकता है।

महादेवी वर्मा

यज्ञ करने और करानेवालों का यही उद्देश्य है कि वही पिछड़ी हुई रुग्ण मानसिकता बनी रहे, जिससे वर्ण और वर्ग-भेद बने रहें। वही मानसिकता बनी रहे कि हरिजन दूल्हा घोड़े पर बैठे, तो ऊँची जाति के लोग भड़ककर कहें—'देखो इस ‘चमरे’ की हिम्मत, हमारे सामने घोड़े पर बैठता है।'

हरिशंकर परसाई

हमारे यहाँ लड़के का बाप दाँत निपोरकर, बेशर्मी का संकोच करते हुए लड़की के बाप से कहता है, 'कौन हम माँगते हैं आपसे, जो देंगे अपनी लड़की को ही तो देंगे। हम भी आधुनिक विचारों के हैं। हम भी प्रगतिशील हैं। मगर धर्म थोड़े ही छोड़ा जाता है, बाप-दादों की रीति है।'

हरिशंकर परसाई

किसी का कल्याण करने के लिए पहले उसे दयनीय बनाना चाहिए, अपाहिज बनाना चाहिए। इसके लिए वेतन कम हो, नौकरी अनिश्चित हो और पेंशन का कोई इंतज़ाम हो। ऐसा होने पर आदमी दयनीय हो जाएगा, तब आप उसके लिए सहायता कोष खोलिए।

हरिशंकर परसाई

जिस संगठन में ज़्यादा अध्ययन करना, शंका और प्रश्न करना अनुशासनहीनता है, वह अपने विद्वानों से कहता है कि सांप्रदायिक इतिहास लिखो।

हरिशंकर परसाई

दुनिया-भर के आडंबरों की छाया में अपने उद्देश्यों की ओर बढ़ने की इच्छा रखना, भ्रम में पड़ना है।

गणेश शंकर विद्यार्थी

बच्चा जब माँ के पेट में आता है, तभी से पोथी-पत्री और पूजा शुरू हो जाते हैं। आदमी पैदा हुआ तो ब्राह्मण तैयार बैठा है। फिर चालू होता है लंबा सिलसिला—छठी, नामकरण, मुंडन, कनछेदन, जनेऊ, विवाह—सब में है ब्राह्मण। आदमी मर जाए तो तेरहवें दिन ब्राह्मण भोजन करके दक्षिणा ले जाएँगे। आगे जब तक उसका वंश चलेगा, हर साल पितृपक्ष में ब्राह्मण भोजन करेगा उसी के नाम से, और दक्षिणा ले लेगा।

हरिशंकर परसाई

बहुत कम लोग आपको स्नेह या आत्मीयता के कारण बुलाते हैं। अधिकांश इसलिए बुलाते हैं कि वे लोगों को यह बता सकें कि उनके यहाँ आप आए हैं।

हरिशंकर परसाई

जिस मठ में लगातार यज्ञ होता है, देवी बैठी हैं, सिंह देवी-दर्शन को आता है, वहाँ चोर घुसकर चोरी कर ले जाते हैं। धर्म, अनुष्ठान, मंत्र, यज्ञ का ज़ोर एटमी शक्ति को तो नष्ट कर सकता है, मगर चोरों से हार जाता है।

हरिशंकर परसाई

घरों के भीतर अंधकार है, धर्म के नाम पर ढोंग की पूजा है, और शील तथा आचार के नाम पर रूढ़ियों की।

जयशंकर प्रसाद

हमारे यहाँ जादू-टोनेवाले हैं, जो मंत्र पढ़कर 'मूठ' फेंकते हैं। इसे 'मूठ मारना' कहते हैं। मुट्ठी-भर चने टोनिया फेंकता है। बंबई से तो चने जाकर छर्रें की तरह कलकत्ता में यजमान के दुश्मन को लगते हैं। ये जादुई मिसाइल हैं, जो रडार पर दिखते हैं और रोके जा सकते हैं।

हरिशंकर परसाई

आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता; उनसे निपट लेता हूँ, पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूँ।

हरिशंकर परसाई

दूध में ज़हर है तो हम दूध को फेंकते हैं। उसी तरह अच्छे के साथ पाखंड रूप ज़हर है तो उसे फेंको।

महात्मा गांधी