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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

1888 - 1969 | पबना, अन्य

प्रसिद्ध चिकित्सक और आध्यात्मिक चिंतक।

प्रसिद्ध चिकित्सक और आध्यात्मिक चिंतक।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र की संपूर्ण रचनाएँ

कविता 1

 

उद्धरण 138

अनुभव करो; किंतु अभिभूत मत हो पड़ो, अन्यथा चल नहीं पाओगे। यदि अभिभूत होना है, तो ईश्वरप्रेम में हो जाओ।

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मेरे काम-क्रोधादि नहीं गए, चिल्लाने से वे कभी नहीं जाते। नहीं गए कहकर ऐसा कर्म, ऐसी चिंता का अभ्यास कर लेना चाहिए, जिसमें काम-क्रोधादि की गंध भी नहीं रहे—मन जिससे उन सबको भूल जाए।

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अपना दोष जानकर भी यदि तुम उसे त्याग नहीं सकते, तो किसी भी तरह उसका समर्थन कर दूसरे का सर्वनाश करो।

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जभी अपने कुकर्म के लिए तुम अनुतप्त होगे, तभी परमपिता तुम्हें क्षमा करेंगे और क्षमा मिलने पर ही समझोगे, तुम्हारे हृदय में पवित्र सांत्वना रही है और तभी तुम विनीत, शांत और आनंदित होगे।

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जितने दिनों तक तुम्हारे शरीर और मन में व्यथा लगती है, उतने दिनों तक तुम एक चींटी की भी व्यथा के निराकरण की ओर चेष्टा रखो। और ऐसा यदि नहीं करते हो, तो तुमसे बढ़कर हीन और कौन है?

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