मनुष्य ने नियम-कायदों के अनुसार; अपने सजग ज्ञान द्वारा भाषा की सृष्टि नहीं की, और न उसके निर्माण की उसे आत्म-चेतना ही थी। मनुष्य की चेतना के परे ही प्रकृति, परम्परा, वातावरण, अभ्यास व अनुकरण आदि के पारस्परिक संयोग से भाषा का प्रारम्भ और उसका विकास होता रहा।
इस देश की परंपरा रही है कि लोक और शास्त्र, लगातार संवाद करते रहे हैं।
महाभारत कोई धर्मग्रंथ नहीं है। वह इस ज़मीन के बाशिंदों के अनुभवों का निचोड़ है और होमर या शेक्सपीयर की तरह का सार्वकालिक और पंथ-निरपेक्ष है।
भारत की सभ्यता अद्भुत इस माने में रही है कि इतना स्थिर समाज, इतनी सदियों तक चीन के अलावा और कहीं क़ायम नहीं रहा। लेकिन इस सामाजिक स्थिरता के साथ-साथ; जितनी राज्य-गत अराजकता और अस्थिरता भारत में रही है, उतनी पृथ्वी पर और कहीं नहीं रही।
धर्म के बिना तो हिंदुस्तान का या किसी भी देश का काम चल सकता है; लेकिन एक साझा मिथकावली के बिना, किसी देश का काम नहीं चल सकता।
संगीत का विशेष, पनपता-बढ़ता इसलिए है कि स्वर और स्वर के संबंध—जिनसे संगीत बनता है—उनकी उधेड़बुन, हर परंपरा की अपनी होती है।
हर नई पीढ़ी अपने पुरखों से वसीयत के रूप में 'शब्द-ज्ञान' का भंडार प्राप्त करती है और अपने नए अनुभवों द्वारा आवश्यकता पड़ने पर, उन परम्परागत शब्दों को नए अर्थों का नया बाना पहनाती रहती है।
जन-रागिनी और उसकी अंत:श्रद्धा जाने कितनी घटनाओं को अपनी गहराई के जादू से दैवी रूप प्रदान कर देती है, इतिहास विफल रहता है, कला समय का आघात बर्दाश्त नहीं कर पाती और साहित्य कभी-कभी पन्नों में सोया रह जाता है, किन्तु लोक-रागिनी का स्वर आँधी-पानी के बीच समय की उद्दाम-धारा के बहाव के बीच, विस्मृति के कितने अभिचारों के बीच भी शाश्वत बना रहता है और यद्यपि यह नहीं पता चलता कि किस युग से, किस घटना से और किस देश से उसका संबंध है और यह भी नहीं पता चलता कि उसके कितने संस्करण अपने-आप अनजाने कण्ठों द्वारा हो गए हैं, पर उसमें जो सत्य सत्त बनकर खिंच आता है, उसे कोई भी हवा उड़ा नहीं पाती, क्योंकि वह सत्य बहुत भारी होता है।
यदि कोई वामपंथी विशेषज्ञ यह नुस्ख़ा सुझाए कि आप महाभारत की कथाओं को अपनी याददाश्त से बाहर निकाल दीजिए और फिर देश बनाइए, तो यह काम ब्रह्मा और विश्वकर्मा मिलकर भी नहीं कर सकते।
यह पूजा-परस्ती जो आज की सबसे झूठी पूजाओं में से एक है; शायद तब तक क़ायम रहेगी, जब तक कोई ठोस मनोविज्ञान इस 'इंस्टिंक्ट' का पर्दाफ़ाश नहीं कर देता, जिसे 'प्रकृति का इरादा' और 'ईश्वर का आदेश मान कर नतमस्तक हुआ जा रहा है।
महान सभ्यता जब बीच में आकर सड़ती है, तब उसमें अछूत-प्रथा, सती-प्रथा और दहेज-प्रथा की बीमारियाँ पैदा होती हैं।
हम प्रायः अपनी सनातन धारणा का जितना अधिक मूल्य समझते हैं, उतना दूसरे व्यक्ति के अभाव और दुःख का नहीं। यही कारण है कि जब तक व्यक्तिगत असंतोष सीमातीत होकर हमारे संस्कार-जनित विश्वासों को आमूल नष्ट नहीं कर देता, तब तक हम उसके अस्तित्व की उपेक्षा ही करते रहते हैं।
कवि, परंपरा से प्राप्त विषयवस्तु को आत्मानुभूति, चिंतन और मनन द्वारा काव्यवस्तु बनाता है।
कालिदास ने कहा था कि पुराना सब अच्छा नहीं होता, नया सब बुरा नहीं होता। दोनों का समन्वय ज़रूरी है। मनुष्य का विवेक सर्वोपरि है और उसी के आधार पर वह समन्वय संभव होगा।
जिस जाति में बच्चे की बलि को धर्म-साधना माना जाए, विधवा को पति की चिंता में डाल देना नैतिकता माना जाए, जिस धर्म में ऐसी कथा हो कि मोरध्वज और उसकी पत्नी भगवान को ख़ुश करने के लिए बेटे को आरी से चीरते हैं, जिस देश में मनु महाराज विधान देते हैं कि यदि द्विज शूद्र को मार डाले; तो वह उतना ही प्रायश्चित करे, जितना सूअर या कुत्ते को मारने पर—उस जाति की संवेदना, मूल्यचेतना, मानव-गरिमा की भावना, अध्यात्म चेतना को फूल चढ़ाए जाएँ या उस पर थूका जाए।
परंपरा से हर समाज की कुछ संगतियाँ होती हैं, सामंजस्य होते हैं, अनुपात होते हैं। ये व्यक्ति और समाज दोनों के होते हैं। जब यह संगती गड़बड़ होती है, तब चेतना में चमक पैदा होती है।
परंपरा समूह की होती है, उसका मर्म हमें किसी एक व्यक्ति में नहीं; किसी समूह-विशेष में ही मिल सकता है—किसी एक का आचरण परंपरा का प्रमाण नहीं होता।
लोक की रूढ़ियाँ, शास्त्र की रूढ़ियों से कम दमनकारी नहीं होतीं।
कोई भी कवि परंपरा से विषयवस्तु प्राप्त करता है, लेकिन वह उसे काव्यवस्तु स्वयं बनाता है।
प्राचीनता की पूजा बुरी नहीं, उसकी दृढ़ नींव पर नवीनता की भित्ति खड़ी करना भी श्रेयस्कर है, परंतु उसकी दुहाई देकर जीवन को संकीर्णतम बनाते जाना और विकास के मार्ग को चारों ओर से रुद्ध कर लेना—किसी जीवित व्यक्ति पर समाधि बना देने से भी अधिक क्रूर और विचारहीन कार्य है।
प्राचीन भारतीय साहित्य में सभी मानवी कामनाओं में संतति की इच्छा मुख्य है। बच्चे, पोते-पोतियों पर ही गृहस्थाश्रम का श्रेय निर्भर है। किन्तु आश्चर्य यह कि प्राचीन साहित्य के विशाल विश्व में पितामह-पोतों के प्रेम-प्रसंगों को तो छोड़ो, किसी विशिष्ट पितामह तक का उल्लेख नहीं है। भीष्म एक पितामह हैं—और वह भी सद्गुणों से बने पितामह हैं, सांसारिक परंपरा से नहीं।
परंपरा और विद्रोह, जीवन में दोनों का स्थान है। परंपरा घेरा डालकर पानी को गहरा बनाती है। विद्रोह घेरों को तोड़कर पानी को चोड़ाई में ले जाता है। परंपरा रोकती है, विद्रोह आगे बढ़ना चाहता है। इस संघर्ष के बाद जो प्रगति होती है, वही समाज की असली प्रगति है।
कबीर यह नहीं मानते कि लोक में धर्म के नाम पर जो कुछ है, वह सब विवेक-सम्मत है।
हर युग के भूत से वर्तमान की कुश्ती हुई है। कालिदास की अवहेलना जब केवल उनकी नवीनता के कारण होने लगी, तो उन्हें ललकारना पड़ा कि जो पुराना है, वही श्रेष्ठ नहीं है।
साहित्य एक तरह का ज्ञान है : ब्रह्मांड, प्रकृति, समाज और मनुष्य की मानसिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में—मानवीय अस्तित्व का ज्ञान।
परंपराएँ हर समाज और उसके भिन्न समुदायों और समूहों की आत्म-छवि का अविभाज्य अंग होती हैं, और जीवन के अनेक क्षेत्रों में उनका दिशा-निर्देश करती हैं।
द्रौपदी के मन की छटपटाहट, भारत की विलक्षण ख़ूबसूरत अशांतता का मूल स्रोत है।
जैसे नदियाँ समुद्र से मिलती हैं, वैसे ही सामाजिक शास्त्र की शाखाएँ अपनी ऐतिहासिक यात्रा में मोड़ लेते हुए, भरसक कोशिशें करती हुई अंततः महाभारत में ही मिलती हैं।
परंपरा को जड़ और विकास को गतिमान मानना, हमारी विचार प्रक्रिया में रूढ़ हो गया है।
संस्कृति मनुष्य को जकड़ती नहीं, मुक्त करती है। संस्कृति वह जीवन-मूल्य है, जिसे अपनी विकास-यात्रा में मनुष्य, समाज विकसित और अंगीकार करता है। संस्कृति मनुष्य का उदात्तीकरण करती है, उसे क्षुद्रता से ऊँचा उठाती है।
मनुष्य के अन्य कर्मों की तरह चिंतन भी परंपरा-कर्म है, परंपरा-साध्य है।
जो मनीषी परम्परागत मूल्यों के विरोध में खड़े हैं, उनकी ईमानदारी पर शंका करने की कोई गुंजाइश नहीं है। मूल्यों की महिमा यह होनी चाहिए कि वे मनुष्य के भीतर मानवीय भावनाओं को जगाएँ। मनुष्य को सोचने को बाध्य करें, उसे व्याकुल और बेचैन बनायें।
कुसंस्कारों की जड़ें बड़ी गहरी होती हैं।
हमारी जाति मुर्दे को अरसे तक चिपकाए रहती है। रूढ़ि को छोड़ने में बहुत समय लेती है और बरबाद होती है।
परंपरा सीखी नहीं जाती…
हिंदी में भूमिका एक सिफ़ारिश होती है, एक प्रकार का विज्ञापन होता है—क्रय-शील माल का जैसे विज्ञापन किया जाता है, बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की जाती है, कल्पित गुणों का आरोप किया जाता है।
प्रत्येक प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का पतन, विनाश और अंत, जीवन के गतिशील सिंद्धांतों और आदर्शों में अनास्था के फलस्वरूप होता है।
परंपरा साधन है, साध्य नहीं।
पता नहीं यह परंपरा कैसी चली कि भक्त का मूर्ख होना ज़रूरी है।
अगर मेरे दिमाग़ में लिखे हुए इतिहास और कमोबेश जाने हुए वाक्यों के चित्र भरे हुए थे, तो मैंने अनुभव किया कि अनपढ़ किसान के दिमाग़ में भी एक चित्रशाला थी, हाँ! इसका आधार परंपरा, पुराण की कथाएँ और महाकाव्य के नायकों और नायिकाओं के चरित्र थे। इसमें इतिहास कम था, फिर भी चित्र काफ़ी सजीव थे।
ईसा की वाणी में भारतीय चिंतन ही बोला था, यूरोप में उस वाणी की कोई परंपरा ही नहीं थी। इराक़ तक फैले हुए बौद्ध, शैव और वैष्णव चिंतनों का दर्शन ही उसकी पृष्ठभूमि में था।
हम जिस समाज, संस्कृति, परंपरा, युग और ऐतिहासिक आवर्त में रह रहे हैं—उन सबका प्रभाव हमारे हृदय का संस्कार करता है।
इतिहास विश्वास की नहीं, विश्लेषण की वस्तु है। इतिहास मनुष्य का अपनी परंपरा में आत्म-विश्लेषण है।
भाषा, समाज और परंपरा के जरिये मनुष्य के ज्ञान में विकास होता है; उस नए ज्ञान से भौतिक जगत के नए तत्वों का अनुसंधान होता है। नए तत्वों का संपर्क फिर मनुष्य के मानस में नए ज्ञान का सर्जन करता है।
साहित्य और कला की हमारी पूरी परंपरा में, जीव की प्रधान कामना आनंद की अनुभूति है।
हमने विलायती तालीम तक देसी परंपरा में पाई है और इसलिए हमें देखो, हम आज भी उतने ही प्राकृत हैं! हमारे इतना पढ़ लेने पर भी हमारा पेशाब पेड़ के तने पर ही उतरता है, बंद कमरे में ऊपर चढ़ जाता है।
बच्चा जब माँ के पेट में आता है, तभी से पोथी-पत्री और पूजा शुरू हो जाते हैं। आदमी पैदा हुआ तो ब्राह्मण तैयार बैठा है। फिर चालू होता है लंबा सिलसिला—छठी, नामकरण, मुंडन, कनछेदन, जनेऊ, विवाह—सब में है ब्राह्मण। आदमी मर जाए तो तेरहवें दिन ब्राह्मण भोजन करके दक्षिणा ले जाएँगे। आगे जब तक उसका वंश चलेगा, हर साल पितृपक्ष में ब्राह्मण भोजन करेगा उसी के नाम से, और दक्षिणा ले लेगा।
परिवार मर्यादाओं से बनता है। परस्पर कर्त्तव्य होते हैं, अनुशासन होता है और उस नियत परंपरा में कुछ जनों की इकाई एक हित के आसपास जुटकर व्यूह में चलती है। उस इकाई के प्रति हर सदस्य अपना आत्मदान करता है, इज़्ज़त ख़ानदान की होती है। हर एक उससे लाभ लेता है और अपना त्याग देता है।
किसी इंसान, किसी प्रजाति या फिर किसी भी राष्ट्र की—कहीं न कहीं एक जड़ ज़रूर होती है।
-
संबंधित विषय : जवाहरलाल नेहरूऔर 3 अन्य
परंपराएँ अतीत को वर्तमान और वर्तमान को भविष्य से जोड़ती हैं। उनके माध्यम से सामाजिक जीवन को निरंतरता मिलती है, और उसका स्वरूप निर्धारित होता है।
संबंधित विषय
- अतीत
- अनुभव
- आधुनिकता
- आलोचना
- इतिहास
- ईसाई
- कबीर
- कला
- कवि
- कविता
- कृष्ण
- गजानन माधव मुक्तिबोध
- चेतना
- ज्ञान
- जवाहरलाल नेहरू
- जातिवाद
- जिज्ञासा
- जीवन
- डर
- ढोंग
- दुख
- दर्शन
- देश
- दिल
- धर्म
- प्रगति
- परंपरा
- प्रवृत्ति
- पुस्तक
- बुरा
- भक्ति काव्य
- भाषा
- मनुष्य
- मर्यादा
- महात्मा गांधी
- युग
- राग दरबारी
- रामायण
- राष्ट्र
- लोक
- वेद
- व्यंग्य
- वर्तमान
- विश्लेषण
- विश्वास
- शब्द
- शांति
- शिल्प
- सुख
- संगीत
- सभ्यता
- समाज
- संस्कृति
- संसार
- साहित्य
- सौंदर्य