जहाँ सीधे प्रमाण नहीं मिलते, वहाँ दर्शन हावी हो जाता है।
केवल हिंदुस्तान में दर्शन संगीत के रूप में कहा गया। जब दर्शन और संगीत का जोड़ हो जाए तो मज़ा ही आएगा।
किसी विशुद्ध ‘बकवास’ को प्रदर्शित करना, और बोध के द्वारा भाषा की सीमाओं से सिर फोड़ने से आई चोटों को दिखाना दर्शन के परिणाम हैं। इन चोटों से हमें खोज की महत्ता पता चलती है।
मूलतत्त्व की बहुविध कल्पना, मीमांसा और दर्शन—भारतीय संस्कृति और साहित्य का व्यापक सत्य है।
यह जीवन आता और जाता है—नाम, यश, भोग, यह सब थोड़े दिन के हैं। संसारी कीड़े की तरह मरने से अच्छा है, कहीं अधिक अच्छा है—कर्तव्य क्षेत्र में सत्य का उपदेश देते हुए मरना। आगे बढ़ो।
सब जीवों में ब्रह्मदर्शन ही मनुष्य का आदर्श है।
जायसी की दृष्टि में मानव-जीवन का सच्चा मार्गदर्शन प्रेम है, धार्मिक कट्टरता नहीं।
भारतवर्ष में जितने वेदमतानुयायी दर्शनशास्त्र हैं, उन सबका एक ही लक्ष्य है और वह है—पूर्णता प्राप्त करके आत्मा को मुक्त कर लेना। इसका उपाय है योग। 'योग' शब्द बहुभावव्यापी है। सांख्य और वेदांत उभय मत, किसी न किसी प्रकार से योग का समर्थन करते हैं।
हे भगवान! दार्शनिक को सभी व्यक्तियों की आँखों के सामने रखी वस्तुओं को देखने की अंतर्दृष्टि प्रदान कर।
किसी बेहूदा जासूसी कहानी में कही गई बात किसी बेहूदा दार्शनिक द्वारा कही जाने वाली बात से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और स्पष्ट होती है।
सभी धर्म, निम्नतम मूर्तिपूजा से लेकर उच्चतम निरपेक्षता तक, मानव आत्मा द्वारा अनंत को समझने और अनुभव करने के अनेक प्रयास मात्र हैं।
नारी के सच्चे रूप का दर्शन कितनी बड़ी दुर्लभ वस्तु है, इस बात को जगत के अधिकांश लोग जानते ही नहीं।
यदि दर्शन और बुद्धि का उपयोग मनुष्यों की समानता की घोषणा करने के लिए किया जाता है, तो उनका उपयोग मनुष्यों के विनाश को उचित ठहराने के लिए भी किया जाता है।
यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है।
अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को ही देखो : इसमें मानसिक घटनाएँ बाहर की भौतिक घटनाओं की तुलना में कितनी अधिक हैं। यह अंतर्जगत् प्रबल वेगशील है और इसका कार्यक्षेत्र भी कितना विस्तृत है—इंद्रिय-ग्राह्य व्यापार इसकी तुलना में बिल्कुल अल्प है।
जिसके साथ हमारा सामान्य परिचय मात्र होता है, वह हमारे पास भले बैठा रहे; किंतु उसके और हमारे बीच समुद्र जैसा व्यवधान बना रहता है, वह होता है अचैतन्य का समुद्र, उदासीनता का समुद्र।
अद्वैत-वेदांत ही आध्यात्मिक सत्य का सब से सहज और सरल रूप है।
दरिद्रनारायण के दर्शन करने हों, तो किसानों के झोंपड़ों में जाओ।
वेदांत तुम्हारे कर्म-फल के लिए क्षुद्र देवताओं को उत्तरदायी नहीं बनाता; वह कहता है, तुम स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम अपने ही कर्म से अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के फल भोग रहे हो, तुम अपने ही हाथों से अपनी आँखें मूँदकर कहते हो—अंधकार है। हाथ हटा लो—प्रकाश दीख पड़ेगा। तुम ज्योतिस्वरूप हो, तुम पहले से ही सिद्ध हो।
वेदांत में वैराग्य का अर्थ है—जगत् को ब्रह्मरूप देखना। जगत् को हम जिस भाव से देखते हैं, उसे हम जैसा जानते हैं, वह जैसा हमारे सम्मुख प्रतिभात होता है—उसका त्याग करना और उसके वास्तविक स्वरूप को पहचानना।
वेदांत कहता है, इसी प्रकार कार्य करो—सभी वस्तुओं में ईश्वर-बुद्धि करो; समझो कि ईश्वर सब में है, अपने जीवन को भी ईश्वर से अनुप्राणित, यहाँ तक कि ईश्वररूप ही समझो।
वेदांत सभी धर्मों में सर्वाधिक साहसी था (और है)। सत्य का अन्वेषण करते हुए वह रुका कहीं भी नहीं।
वेदांत यह नहीं कहता कि स्वर्णपत्र से घाव को ढाँके रखो और घाव जितना ही पकता जाए, उसे और भी स्वर्ण पत्रों से मढ़ दो।
दर्शनशास्त्र के मत में एक ऐसा आनंद है, जो निरपेक्ष और अपरिणामी है। वह आनंद हमारे ऐहिक सुखोपभोग के समान नहीं है, तो भी वेदांत प्रमाणित करता है कि इस जगत् में जो कुछ आनंदकारी है; वह उसी यथार्थ आनंद का अंश मात्र है, क्योंकि एकमात्र उस आनंद का ही वास्तविक अस्तित्व है।
वेदांत-दर्शन का एक मात्र विषय है—एकत्व की खोज।
समस्त उपनिषदों का केंद्रीय भाव—साक्षात्कार या अपरोक्षानुभूति ही है।
भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार सारा जगत् दो पदार्थों से निर्मित है। उनमें से एक का नाम है आकाश। यह आकाश एक सर्वव्यापी, सर्वानुस्यूत सत्ता है। जिस किसी वस्तु का आकार है; जो कोई वस्तु कुछ वस्तुओं के मिश्रण से बनी है, वह इस आकाश से ही उत्पन्न हुई है। यह आकाश ही वायु में परिणत होता है; यही तरल पदार्थ का रूप धारण करता है, यही फिर ठोस आकार को प्राप्त होता है।'
"विचारों को छोड़ों और निर्विचार हो रहो, पक्षों को छोड़ो और निष्पक्ष हो जाओ—क्योंकि इसी भाँति
वह प्रकाश उपलब्ध होता है, जो कि सत्य को उद्घाटित करता है।’’
प्रामाणिक चिंतन न तो मनुष्य को अमूर्त समझता है, न विश्व को मनुष्यों से रहित समझता है।
मैं तो यह बिल्कुल नहीं मानता कि संसार में अद्वैत-तत्त्व के प्रचार से दुर्नीति या दुर्बलता बढ़ेगी, बल्कि मुझे इस बात पर अधिक विश्वास है कि दुर्नीति और दुर्बलता के निवारण की वही एकमात्र औषधि है।
सांख्य दर्शन पर पूरा राजयोग आधारित है।
फ़िलासफ़ी बघारना प्रत्येक कवि और कथाकार के लिए अपने-आपमें एक ‘वैल्यू’ है, क्योंकि मैं कथाकार हूँ, क्योंकि ‘सत्य’, ‘अस्तित्व’ आदि की तरह ‘गुटबंदी’ जैसे एक महत्त्वपूर्ण शब्द का ज़िक्र आ चुका है, इसीलिए सोलह पृष्ठ के लिए तो नहीं, पर एक-दो पृष्ठ के लिए अपनी कहानी रोककर मैं भी पाठकों से कहना चाहूँगा कि सुनो-सुनो हे भाइयो, वास्तव में तो मैं एक फ़िलासफ़र हूँ, पर बचपन के कुसंग के कारण...।
ईसा की वाणी में भारतीय चिंतन ही बोला था, यूरोप में उस वाणी की कोई परंपरा ही नहीं थी। इराक़ तक फैले हुए बौद्ध, शैव और वैष्णव चिंतनों का दर्शन ही उसकी पृष्ठभूमि में था।
दर्शन तर्क-वितर्क कर सकता है और शिक्षा दे सकता है, धर्म उपदेश दे सकता है और आदेश दे सकता है; किंतु कला केवल आनंद देती है और प्रसन्न करती है।
जिस केंद्र में विषय-अभिघात से उत्पन्न संवेदनाओं के अवशिष्ट अंश या संस्कार मानो संचित से रहते हैं, उसे मूलाधार कहते हैं और उस कुण्डलीकृत क्रियाशक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं।
अद्वैत दर्शन के अनुसार विश्व में केवल एक ही वस्तु सत्य है, और वह है ब्रह्म।
विज्ञान में जो बुद्धि है, दर्शन में जो दृष्टि है—वही कविता में कल्पना है।
सभी द्वैतवादी सिद्धांतों के साथ पहली कठिनाई यह है कि असंख्य सद्गुणों के भंडार, न्यायी तथा दयालु ईश्वर के राज्य में इतने कष्ट कैसे हो सकते हैं? यह प्रश्न हर द्वैतवादी धर्म के समक्ष है, पर हिंदुओं ने कभी भी इसे सुलझाने के लिए शैतान की कल्पना नहीं की।
दर्शनशास्त्र की स्थिति चाहे जो भी हो, तत्वमीमांसा की स्थिति चाहे जो भी हो, जब तक संसार में मृत्यु है, जब तक मनुष्य के हृदय में कमजोरी है, तब तक मनुष्य के हृदय से पुकार निकलती रहेगी
बहस के स्वरूप को लेकर जितनी बहस संस्कृत के शास्त्रकारों ने की है, उतनी कदाचित् संसार की किसी अन्य भाषा के साहित्य में नहीं मिलेगी।
-
संबंधित विषय : तर्क-वितर्कऔर 3 अन्य
एक बार अपने भीतर निहार का देखो, प्रतिदिन तुम किस जगह पर स्थित हो।
-
संबंधित विषय : आत्म-चिंतनऔर 3 अन्य
द्वैतवादी मानते हैं कि ‘मैं और मेरा’ का प्रयोग केवल ईश्वर के संबंध में ही करना चाहिए। ‘मैं’ का संबोधन केवल वही कर सकता है, और सारी चीज़ें भी उसी की हैं। जब मनुष्य इस स्तर पहुँच जाए कि ‘मैं और मेरा’ का भाव उसमें न रहे, सारी चीज़ों को ईश्वरीय मानने लगे, हर प्राणी से प्रेम करने लगे, और किसी पशु के लिए भी अपना जीवन देने के लिए तैयार रहे और ये सारे भाव बिना किसी प्रतिफल की आकांक्षा से हों, तो उसका हृदय स्वतः पवित्र हो जाएगा, तथा उस पवित्र हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम उत्पन्न होगा। ईश्वर ही सभी आत्माओं के आकर्षण का केंद्र है।
काव्यप्रणयन के लिए व्याकरणशास्त्र, छंदःशास्त्र, शब्दकोश, व्युत्पत्ति-शास्त्र, ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं, लोकव्यवहार, तर्कशास्त्र और कलाओं का मनन करना चाहिए।
एक समय था जब हमारे दार्शनिक कवि; भारत के विशाल चमकते आकाश के नीचे खड़े होकर, विश्व भर का प्रेमविभोर हृदय से स्वागत करते थे—इस कल्पना से ही मेरा हृदय, आनंद और मानवता के लिए आशामय भविष्य के स्वप्नों से भर जाता है।
मार्क्सवाद मनुष्य को कृत्रिम रूप से बौद्धिक नहीं बनाता है, वरन उसे ज्ञानालोकित आदर्श प्रदान करता है।
-
संबंधित विषय : गजानन माधव मुक्तिबोधऔर 3 अन्य
मनुष्य प्रभु को पाने का मार्ग है, और जो मंज़िल को छोड़ मार्ग से ही संतुष्ट हो जावें, उनके दुर्भाग्य को क्या कहें?
अंतर्मुखता के बिना अपने ही भावों का स्पष्ट दर्शन, उनकी जटिलता और समग्रता का आकलन, तथा उनकी विश्लेषित और संश्लेषित अभिव्यक्ति—असंभव है।
वेदांत का दृष्टिकोण न तो आशावादी है और न निराशावादी ही।
भक्ति-आंदोलन व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन है; जिसकी अभिव्यक्ति दर्शन, धर्म, कला, साहित्य, भाषा और संस्कृति के दूसरे रूपों में दिखाई देती है।
कोई ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम साधारणीकरण की सहायता लेते है और साधारणीकरण घटनाओं के पर्यवेक्षण पर आधारित है। हम पहले घटनावली का पर्यवेक्षण करते हैं, फिर उनका साधारणीकरण करते हैं और फिर उनसे अपने सिद्धान्त या मतामत निकालते हैं।
संबंधित विषय
- आकाश
- आँख
- आत्म-चिंतन
- आत्म-तत्व
- आत्मा
- आनंद
- आनंदमय
- आलोचना
- इंद्रियाँ
- ईश्वर
- ईसाई
- उपदेश
- एहसास
- क्रांति
- कल्पना
- कवि
- किसान
- गजानन माधव मुक्तिबोध
- ग़रीबी
- गीता
- चेतना
- चीज़ें
- ज्ञान
- जनता
- जवाहरलाल नेहरू
- जीवन
- झूठ
- तर्क-वितर्क
- तार्किक
- दुख
- दर्शन
- देश
- दार्शनिक
- दिल
- धर्म
- पृथ्वी
- प्रकृति
- परंपरा
- प्रेम
- प्रमाण
- बुद्ध
- बुद्धिजीवी
- ब्रह्म
- भक्ति
- भक्ति काव्य
- मुक्त
- मृत्यु
- मनुष्य
- मनुष्यता
- मोक्ष
- योग
- रवींद्रनाथ ठाकुर
- राग दरबारी
- व्यंग्य
- विज्ञान
- विडंबना
- सुख
- संघर्ष
- सच
- सुनना
- संपत्ति
- संबंध
- समकालीन
- समस्या
- समाज
- स्वर्ग
- संस्कृत
- संस्कृत साहित्य
- संस्कृति
- संसार
- सौंदर्य
- हिंदी साहित्य
- हिंसा