भाषा स्वयं सुनती है।
कविता की रचना सुनने से जुड़ी है।
कुत्ते भी बोलते हैं, लेकिन केवल उन्हीं से जो सुनना जानते हैं।
अफ़वाह सुनना नहीं, सुनना तो मानना नहीं।
…मौन ऐसा होता है जिसे आप वास्तव में सुन सकते हैं।
शिक्षक बोलता है और छात्र सुनते हैं—चुपचाप।
भक्ति-लता संतों की कृपा से ही उत्पन्न होती है। दीनता एवं दूसरों को मान देने की वृत्ति आदि शिलाओं की बाढ़ द्वारा उस लता को संतापराध रूपी हाथी से बचाकर, श्रवण-कीर्तन आदि जल से सींचते और बढ़ाते रहना चाहिए।
यदि तदनुसार आचरण नहीं किया तो केवल कहने या पढ़ने से क्या लाभ?
तार्किक जिस प्रकार श्रोता को अपनी विचार-पद्धति पर लाना चाहता है उसी प्रकार कवि अपनी भाव-पद्धति पर।
प्रेम के बिना श्रुति, स्मृति, ज्ञान, ध्यान, पूजन, श्रवण, कीर्तन सब व्यर्थ है।
सुनने वाले लाखों हैं, सुनाने वाले हज़ारों हैं, समझने वाले सैंकड़ों हैं, परंतु करने वाले कोई विरले ही हैं। सच्चे पुरुष वे ही हैं और सच्चा लाभ भी उन्हीं को प्राप्त होता है, जो करते हैं।
देखने और सुनने की क्रिया ही सावधानी है; इसकी आपको साधना नहीं करनी है, यदि आप साधना करते हैं तो आप तत्काल असावधानी की अवस्था में आ जाते है।
संकट में हर अफ़वाह सुनने योग्य समझी जाती है।
एक अच्छा श्रोता उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना अच्छा वक्ता होना।
कोई छोटा हो तो भी उसकी बातें सुननी चाहिए। वे भी विशिष्ट गौरव प्रदान करेंगे।