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बुद्धिजीवी पर उद्धरण

योग्य आदमियों की कमी है। इसलिए योग्य आदमी को किसी चीज़ की कमी नहीं रहती। वह एक ओर छूटता है तो दूसरी ओर से पकड़ा जाता है।

श्रीलाल शुक्ल

शत्रु में दोष देखकर बुद्धिमान झट वहीं क्रोध को व्यक्त नहीं करते हैं, अपितु समय को देखकर उस ज्वाला को मन में ही समाए रखते हैं।

तिरुवल्लुवर

जो लोग तमस से भरे हुए हैं, अज्ञानी और सुस्त हैं, जिनका मन कभी किसी विचार पर स्थिर नहीं होता, जो केवल मनोरंजन की लालसा रखते हैं—उनके लिए धर्म और दर्शन मात्र मनोरंजन की वस्तुएँ हैं। ये लोग दृढ़ निश्चयी नहीं होते। वे कोई बात सुनते हैं, उसे बहुत अच्छा समझते हैं, फिर घर जाकर सब कुछ भूल जाते हैं। सफल होने के लिए आपको अदम्य दृढ़ता और दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

स्वामी विवेकानन्द

अज्ञान की निवृत्ति में ज्ञान ही समर्थ है, कर्म नहीं, क्योंकि उसका अज्ञान से विरोध नहीं है और अज्ञान की निवृत्ति हुए बिना राग-द्वेष का भी अभाव नहीं हो सकता।

आदि शंकराचार्य

जाति और कुल में सभी एक समान हो सकते हैं परंतु उद्योग, बुद्धि और रूप संपत्ति में सबका एक-सा होना संभव नहीं है।

वेदव्यास

मेरे विचार से जिस आदमी में थोड़ा-सा भी विवेक होता है, वह हमेशा अपनी परिस्थितियों को तर्कसंगत ढंग से समझना चाहता है।

भगत सिंह

मैंने कितनी ही बार सोचा है कि क्या व्यक्तियों से संबंध बनाना संभव है, जब किसी के मन में किसी के लिए भी कोई भावना रही हो; अपने माता पिता के लिए भी नहीं। अगर किसी को कभी भी गहराई से प्यार नहीं किया गया, तो क्या उसके लिए सामूहिकता में रहना संभव है? क्या इन सबका मेरे जैसे युद्धप्रिय के ऊपर कोई प्रभाव नहीं रहा? क्या इस सबसे मैं और बंध्य नहीं हुआ? क्या इन सबसे एक क्रांतिकारी के रूप में मेरी गुणवत्ता कम नहीं हुई? मैं जिसने हर चीज़ को बौद्धिकता और शुद्ध गणित के पैमाने पर रख दिया।

अंतोनियो ग्राम्शी

सभी मनुष्य बुद्धिजीवी हैं, लेकिन सभी मनुष्य समाज में बुद्धिजीवियों का कर्म नहीं करते।

अंतोनियो ग्राम्शी

ब्रह्मज्ञानी अपने सद्विचारों के कारण असाधारण कार्य करते हैं। वह सभी समय में भोगों की, धन की इच्छा निःस्पृह भाव से त्याग देते हैं।

भर्तृहरि

यह असार संसार; जिसकी अंत अवस्था अतिचंचल है, उसमें पंडितों के लिए दो ही सुलभ गति हैं कि या तो तत्त्वज्ञानरूपी अमृत रस में स्नान करने वाली निर्मल बुद्धि से उनका काल अच्छा व्यतीत होता रहे, अथवा सुंदरकामिनी जो कि पुष्ट स्तन और जघन से भोग में सुखदायी हैं; उनके शरीर पर हाथ दिए, चंचलता से उद्योग में तत्पर रहते हुए उनका काल भली-भाँति व्यतीत होता रहे।

भर्तृहरि

शास्त्रोक्त शब्दों से जिनकी वाणी सुंदर है; और शिष्यों के पढ़ाने योग्य जिनकी विद्या है और वे स्वयं भी प्रसिद्ध हैं, ऐसे कवि-विद्वान् जिस राजा के देश में निर्धन रहते हैं, तो यह उस राजा की मुर्खता ही है।

भर्तृहरि

कुल, धन, ज्ञान, रूप, पराक्रम, दान और तप- ये सात मुख्य रूप से मनुष्यों के अभिमान के हेतु हैं।

क्षेमेंद्र

वहाँ एक नीम का लंबा-चौड़ा पेड़ था जो बहुत-से बुद्धिजीवियों की तरह दूर-दूर तक अपने हाथ-पाँव फैलाए रहने पर भी तने में खोखला था।

श्रीलाल शुक्ल

मस्तिष्क देख सके इसके पहले हृदय सदैव देख लेता है।

थॉमस कार्लाइल

श्युआन च्वाङ नामक चीनी यात्री सम्राट; हर्ष के समय सातवीं शताब्दी में भारत में आया था। वह चीन से मध्य-एशिया और गंधार देश के रास्ते से यहाँ आया। सिंधु नदी के समीप शलातुर गाँव में जाकर उसने जो कुछ वहाँ सुना और देखा, उसका वर्णन अपने यात्रा-ग्रंथ में लिखा है—"यह स्थान ऋषि पाणिनि का जन्मस्थान है। जहाँ वे उत्पन्न हुए थे, वहाँ उनकी मूर्ति बनी है। यहाँ के लोग पाणिनि के शास्त्र का अब भी अध्ययन करते हैं। इसी कारण यहाँ के मनुष्य अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक प्रतिभाशाली और विद्वान् है।"

वासुदेवशरण अग्रवाल

आधुनिक व्यक्तित्व का प्रमुख गुण है—विवेकशील और तर्कसंगत दृष्टिकोण—जो जीवन और उसके बदलते परिवेश को कार्य-कारण संबंधो के आधार पर देख सके।

श्यामाचरण दुबे

विद्वान पुरुष सर्वत्र आनंद में रहता है और सर्वत्र उसकी शोभा होती है। उसे कोई डराता नहीं है और किसी से डराने पर भी वह डरता नहीं है।

वेदव्यास

एक रूपदक्ष को एक छवि अथवा एक कविता लिखने के समय अक्लांत भाव से अनेक शक्तियों के प्रयोग करना पड़ता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

संसार में जो क्षेत्र बुद्धि का है, वहाँ मानव-मानव का सत्य-मिलन बुद्धि के योग से ही संभव है।

रवींद्रनाथ टैगोर

विवेक-विवर्जित अतिरेक का परिणाम हमेशा अशुभ होता है।

कृष्ण बिहारी मिश्र

हे अर्जुन! मन को मथने वाली इंद्रियाँ प्रयत्न करने वाले ज्ञानी पुरुष के मन को भी बलात्कारपूर्वक हर लेती हैं।

वेदव्यास

हम अपने विवेक से ज्योति को तम से अलग पहचान लेते हैं, यही ज्योति या देवों की विजय है।

वासुदेवशरण अग्रवाल

विशेषज्ञ और पुरोधा में अंतर होता है। विशेषज्ञ अपने शोध की दमक, से एक संकरी-सी जगह को प्रकाशित करता है; विशेषज्ञता दृष्टि से ज़्यादा ज्ञान देती है, जो कई बार दृष्टि के दरिद्र लोगों के हाथ में पड़कर दुरुपयोग का शिकार हो जाती है। पुरोधा की कल्पना करने के लिए हमें ज्ञान और दृष्टि के साथ आगे चलने वाले की प्रेरक भूमिका को समझना होगा।

कृष्ण कुमार

बुद्धि प्रारब्ध को अपना ग्रास नहीं बना सकती। प्रारब्ध ही बुद्धि को अपना ग्रास बना लेता है। प्रारब्ध से प्राप्त होने वाले अर्थों को बुद्धिमान पुरुष भी नहीं जान पाता।

वेदव्यास

हमारी सारी बौद्धिक गतिविधियाँ, शब्दकोष से सीखी गई कृत्रिम अँग्रेज़ी के सहारे चलती हैं।

यू. आर. अनंतमूर्ति
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जिनको परमार्थ अर्थात् मोक्षपर्यंत का साधन प्राप्त है; ऐसे पंडितों का अपमान मत करो, क्योंकि तुम्हारी तृण के समान तुच्छ लक्ष्मी उनको रोक सकेगी। जैसे नवीन मद की धारा से शोभित श्याम मस्तक वाले हाथी को, कमल के डंठल का सूत नहीं रोक सकता।

भर्तृहरि

प्रत्येक बुद्धिजीवी, गुटबंद होने के बावजूद, गुटबंदी का खुला इलज़ाम लगते ही तिलमिला उठता है।

श्रीलाल शुक्ल

भविष्य निश्चय रूप से वैदिक दर्शन के हाथ है, क्योंकि उसका संदेश कविता के द्वारा कहा गया है।

वासुदेवशरण अग्रवाल

जैसे बुद्धिमत्ता एक वैल्यू है, वैसे ही बेवकूफ़ी भी अपने-आपमें एक वैल्यू है। बेवकूफ़ की बात चाहे तुम काट दो, चाहे मान लो, उससे उसका कुछ बनता है, बिगड़ता है। वह बेवकूफ़ है बेवकूफ़ रहता है।

श्रीलाल शुक्ल

कर्मकाण्ड साधन है, साध्य नहीं है,...किन्तु साध्य से कम महत्त्वपूर्ण साधन नहीं होता, यह सूझ भारतीय मेधा की स्वकीय विशिष्टता है।

कृष्ण बिहारी मिश्र

हम मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक रूप से यांत्रिक हो चुके हैं।

जे. कृष्णमूर्ति

कूपमण्डूकता को भारत के विवेक ने कभी प्रोत्साहन नहीं दिया।

कृष्ण बिहारी मिश्र

अक़्लिय्यत के लिए सम्मान रखना अक्सरियत का भूषण है।

महात्मा गांधी

बुद्धि से थके हुए मानव की भावी भाषा कविता ही होगी।

वासुदेवशरण अग्रवाल

राम ने लौकायतिकों के लिए दुर्बुध—इस विशेषण का प्रयोग किया है। आज की भाषा में इसे छद्म बुद्धिजीवी कह सकते हैं।

राधावल्लभ त्रिपाठी
  • संबंधित विषय : नक़ल

बुद्धि के तीक्ष्णता के स्पर्श के बिना; भाव मवाद बनता है, भाव के संपर्क के बिना बुद्धि राक्षस बन जाती है।

यू. आर. अनंतमूर्ति

इस लोक में बुद्धिमानों की बुद्धि से अगम्य कुछ भी नहीं है। देखो शस्त्रास्रधारी नंदवंशी राजाओं को चाणक्य ने बुद्धि द्वारा ही नष्ट कर दिया था।

विष्णु शर्मा

जो दो छोरों में से एक छोर को पकड़ते हैं, वह एक एक्सट्रीम को पकड़ते हैं—चाहे संसार हो, चाहे व्यवस्था के बारे भी कोई आदमी एक एक्सट्रीम चुने। जो दो छोरों में से एक छोर को छोड़ दे और एक को पकड़े, वह एक्सट्रीमिस्ट है। बड़ा वह होता है जो दोनों में से किसी छोर को छोड़ सके, दोनों को बाँधने की कोशिश करे।

नामवर सिंह

अतः बुद्धिमान मनुष्य को, संसार में फैले हुए मोह रूपी बादल में यह रूप निश्चय ही बिजली की कौंध के समान है- ऐसा विचार करके आश्चर्यपूर्ण सौंदर्य-विलास का अभिमान नहीं करना चाहिए।

क्षेमेंद्र