आनंदविहीन मंगलभावना स्वयं बुझ जाती है, तथा व्यक्ति में श्रेष्ठता की भावना आ जाती है।
जब कोई रस से उत्पन्न सौंदर्य के अनुभव का आनंद लेता है, उसी क्षण 'संसार' विलीन हो जाता है।
ज्ञान, प्रेम और शक्ति—इन तीन धाराओं का जहाँ एक साथ संगम होता है, वहीं पर आनंदतीर्थ बन जाता है।
किसी भी इंसान की ख़ुशी के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि उसे अपनी स्वाभाविक इच्छाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की स्वतंत्रता हो।
कामोपभोग का लक्ष्य सुखप्राप्ति है तथा धर्म और अर्थ का फल भी सुखप्राप्ति है।
हमारे हृदय में ज्ञान, प्रेम और कर्म का जिस मात्रा में पूर्ण मिलन होता है, उसी मात्रा में हमारे हृदय में पूर्ण आनंद रहता है।
नागरक को चाहिए कि वह महीने में एक-दो बार किसी निश्चित तिथि को सुंदर वेश-भूषा से सज-धज कर, घोड़े पर चढ़कर, नौकर-चाकरों तथा वेश्याओं के साथ उद्यान-यात्रा के लिए प्रस्थान करे। वहाँ पहुँच कर नित्यकर्म का संपादन कर मुर्ग़ा, तित्तर, बटेर, बुलबुल आदि पालतू पक्षियों की युद्धकला देखे; जूआ, शतरंज आदि खेलों को खेलते हुए वेश्याओं के साथ मनोरंजन का सुख अनुभव करे, फिर शाम को घर लौट आए।
खाना और पढ़ना दो सुख हैं जो अद्भुत रूप से समान हैं।
ख़ुशी का पूरा आनंद लेने के लिए आपके पास इसे बाँटने वाला कोई होना चाहिए।
जो सचमुच में रूपदक्ष होते हैं, उनके आनंद की कोई सीमा नहीं रहती है, आँख, मन सभी के द्वारा वे एक रूप चिरकाल तक नए-नए रूपों में अचरज भरे भाव से देखते जाते हैं।
जितनी अधिक अस्पष्टता होगी, आनंद उतना ही अधिक होगा।
प्रेमानंद में प्रेमी अपनी आत्मा का प्रिय की आत्मा से संयोग करता है।
ज्ञान की भित्ति अगर कठोर न होती, तो वह एक बेतुका स्वप्न बन जाता और आनंद की भित्ति अगर कठोर न होती, तो वह सरासर पागलपन बन जाता।
किलकिंचित विलास से शिथिल हो प्रियतमा के संग रहना, कान से कोकिला के शब्द की कलकलाहट सुनना और चाँदनी का सुख उठाना—ऐसी सामग्री से चैत्रमास की विचित्र रातें, किसी पुण्यवान् के हृदय और नेत्रों को सुख देती हुई बीतती हैं।
आत्मा से संयुक्त एवं मन से अधिष्ठित श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण आदि पाँच ज्ञानेंद्रियों की अपने-अपने विषयों में जो अनुकूल प्रवृत्ति है—वही 'काम' है।
अपराह्न में तीसरा पहर गोष्ठी-विहार में जाने के लिए उपयुक्त है। नागरक को वहाँ वस्त्रालंकार से सज-धज कर जाना चाहिए।
दुनिया को झपट्टा मार कर हमला करने और आनंद लेने के लिए बनाया गया है, और पीछे हटने के लिए कोई वजह नहीं है।
जीवन-व्यापार में मनोरंजन हेतु, पाँच प्रकार की क्रीड़ाओं में नागरक के प्रवृत्त होना चाहिए—घटानिबंध, गोष्ठीसमवाय, समापानक, उद्यानगमन और समस्याक्रीड़ा।
स्त्री-पुरुष का संभोगसुख, लज्जा और लोकभय से परतंत्र होता है अर्थात् उनमें लोक-लज्जा और लोक-भय होता है, वे स्वतंत्र रूप से संभोग में प्रवृत्त नहीं होते। अतः उसके लिए उपायों की अपेक्षा होती है और उन उपायों का ज्ञान शास्त्र से होता है।
संसार का चमत्कार यह नहीं है कि यहाँ कष्ट और बाधाएँ हैं, बल्कि इसमें है कि यहाँ व्यवस्था, सौंदर्य, आनंद, कल्याण और प्रेम का वास है।
उत्साह एक यौगिक भाव है, जिसमें साहस और आनंद का मेल रहता है।
शिशु का जन्म आनंद में होता है, केवल कार्य-कारण में ही नहीं।
रसविधायक कवि का काम श्रोता या पाठक में भावसंचार करना नहीं, उसके समक्ष भाव का रूप प्रदर्शित करना है, जिसके दर्शन से श्रोता के हृदय में भी उक्त भाव की अनुभूति होती है, जो प्रत्येक दशा में आनंदस्वरूप ही रहता है।
आलिङ्गनादि प्रासाङ्गिक सुख से अनुविद्ध; स्तनादि विशेष अंगो के स्पर्श से जो फलवती अर्थप्रतिति, अर्थात वास्तविक सुखोपलब्धि होती है—वह 'काम' है।
जिस आनंद से कर्म की उत्तेजना होती है और जो आनंद कर्म करते समय तक बराबर चला चलता है, उसी का नाम उत्साह है।
प्रेमी प्रिय में अपनी आत्मा को ही खोजता और पाता है।
प्रेमकाल जीवन का आनंद काल ही है।
जब तक आनंद का लगाव किसी क्रिया, व्यापार या उसकी भावना के साथ नहीं दिखाई पड़ता, तब तक उसे 'उत्साह' की संज्ञा प्राप्त नहीं होती।
दर्शनशास्त्र के मत में एक ऐसा आनंद है, जो निरपेक्ष और अपरिणामी है। वह आनंद हमारे ऐहिक सुखोपभोग के समान नहीं है, तो भी वेदांत प्रमाणित करता है कि इस जगत् में जो कुछ आनंदकारी है; वह उसी यथार्थ आनंद का अंश मात्र है, क्योंकि एकमात्र उस आनंद का ही वास्तविक अस्तित्व है।
भविष्य चाहे जितना भी सुखद हो, उस पर विश्वास न करो, भूतकाल की भी चिंता न करो, हृदय में उत्साह भरकर और ईश्वर पर विश्वास कर वर्तमान में कर्मशील रहो।
वर्षा से दो विशेष प्रसन्न होते हैं—कवि और चोर।
कवि को यदि रचना की प्रक्रिया से अलौकिक आनन्द की प्राप्ति नहीं हो, तो उसकी कविता से पाठकों को भी आनन्द नहीं मिलेगा। कला की सारी कृतियाँ पहले अपने-आपके लिए रची जाती हैं।
यदि कोई स्त्री लकड़ी के बने हुए कृत्रिम लिंग से संतुष्ट हो, तो लकड़ी के लिंग का प्रयोग करना चाहिए।
प्रायः धनी लोगों की अनेक स्त्रियाँ निरंकुश होती हैं। बाहरी सुखभोग प्राप्त होने पर भी, आंतरिक सुख अर्थात् संभोग रूप सुख से रहित होती हैं।
सुख के समय थोड़ा-थोड़ा आँखों को बंद कर, जो सुख का अनुभव दो युवा प्रेमियों को होता है—वह वास्तव में कामदेव का पुरुषार्थ है।
सत्, चित् और आनंद-ब्रह्म के इन तीन स्वरूपों में से काव्य और भक्तिमार्ग 'आनंद' स्वरूप को लेकर चले। विचार करने पर लोक में इस आनंद की दो अवस्थाएँ पाई जाएँगी—साधनावस्था और सिद्धावस्था।
एक ओर सत्य, दूसरी ओर आनंद, बीच में होता है मंगल, इसलिए इस मंगल के भीतर से ही हमें आनंदलोक में जाना पड़ता है।
आत्म-संयम अर्थात् आत्मानुशासन ही कलात्मक सौंदर्य को सुंदर एवं व्यवस्था को सुव्यवस्थित और आनंददायक बनाता है।
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अगर टॉलस्टॉय ने सारी ज़िंदगी प्रसन्नता के भीतर छिपी रहस्यमय शक्तियों की खोज में लगाई थी, तो काफ़्का प्रसन्नता का सामना भी नहीं कर पाता था—उसे भान था कि जीवन का आनंद उसे नियति की आवाज़ के प्रति बेपरवाह बना देगा।
जिस प्रकार हर रंग और रेखा चित्र नहीं है, हर ध्वनि संगीत नहीं है, शरीर की हर भाव-भंगिमा नृत्य नहीं है, वस्तु की हर आकृति शिल्प नहीं है, हर शब्द साहित्य नहीं है—उसी प्रकार हर ध्वनि, हर मुद्रा, हर रंग व रेखा और हर आकृति से प्राप्त होने वाला आनन्द कला का आनन्द नहीं है।
शीघ्र खिलनेवाली मालती की कलियों की माला गले में पहिने हों, केसरयुक्त चंदन अंग में लगाए हों और सुंदर प्यारी स्त्रियों को छाती से लिपटाए हों—तो यह जानो कि शेष स्वर्ग का भोग यहाँ प्राप्त हुआ है।
प्रथम समागम में नायिका, लज्जा के कारण अपनी दोनों जंघाओं को सटाकर अपने गुप्तांग को छिपा लेती है। ऐसे में नायक को दोनों जंघाओं के बीच में हाथ से सहलाते हुए, जाँघो को अलग करना चाहिए। नायिका के स्तनों, हाथ, काँख, कंधे, गर्दन आदि का स्पर्श करते हुए, उसे धीरे-धीरे सहलाना और दबाना चाहिए। कुमारी कन्या के साथ भी, प्रथम समागम में इसी प्रकार का व्यवहार करना उचित है।
जिस प्रकार इन्द्रियों का प्राकृतिक बोध—ज्ञान नहीं—बल्कि एक भ्रान्त प्रतीति है—उसी प्रकार इंद्रियों द्वारा अनुभूत प्रत्येक आनन्द वास्तविक और सच्चा आनन्द नहीं है।
छंद ही ऐकांतिक रूप से काव्य हो, ऐसी बात नहीं है। काव्य की मूल वस्तु है रस; छंद आनुषंगिक रूप से इसी रस का परिचय देता है।
संसार का श्रेष्ठ साहित्य, मनुष्य जीवन की गहराइयों को मापने में समर्थ हुआ है।
प्राकृतिक सौंदर्य के साथ अपने हृदय को एकाकार करना, मन को संयत करके, प्रकृति की भाषा समझने का प्रयास करना, कष्टसाध्य अवश्य है, परंतु सामान्य रूप में यदि कोई यह कर सके तो उसका हृदय आनंद से ओत-प्रोत हो जाएगा।
जब आपके पास परम संवेदनशीलता होती है, तो प्रज्ञा के साथ-साथ प्रेम का भी प्रादुर्भाव होता है—प्रेम तब आनंद ही, प्रेम तब समयातीत है।
हमारा आनंद, हमारा प्रेम, अकारण ही आत्म विसर्जन में अपने को चरितार्थ करता है।
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