कामकला पर उद्धरण
भारतीय चिंतन-परंपरा
में संस्कृति का मूलाधार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—पुरुषार्थचतुष्टय है। इनमें काम को जीवन की परिधि में केवल विषय-भोग ही नहीं, बल्कि अन्य जीवनोपयोगी ज्ञान की तरह मानव-अस्तित्व का एक मूर्धन्य और सृजनात्मक हेतु माना गया है। आचार्य वात्स्यायन ने ‘कामसूत्रम्’ में उपायभूत चौंसठ कलाओं का सुचिंतित एवं व्यवस्थित विवेचन प्रस्तुत किया है। ‘कामकला’ के अंतर्गत मानव जीवन से संबद्ध विविध प्रसंगों, व्यवहारों और क्रियाकलापों का वर्णन तथा उनकी परंपरा समाहित है।
नायिका को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए, नायक नायिका की विश्वासपात्र सहेलियों तथा धाय की लड़की से मेल-जोल बढ़ाए। क्योंकि वे नायिका के मनोभावों को अच्छी तरह समझकर, उससे नायक के गुणों की प्रशंसा कर, नायक की ओर उसे आकृष्ट कर सकती हैं।
जब नायक को यह विश्वास हो जाए कि मनोभिलाषित कन्या मुझे चाहती है, तो वह उस कन्या की प्राप्ति के लिए उपाए करे।
संध्या के समय, रात में और अंधकार में—स्त्रियाँ निर्भय होकर सुरत-व्यापार में रागयुक्त होती हैं। उस समय वे सुरत-क्रिया के लिए पुरुष को मना नहीं करती। इसलिए उस समय नायिका को संभोग के लिए तैयार करना चाहिए।
दाम्पत्य जीवन में संभोग-सुख को आनंदमय बनाने के लिए चौंसठ कलाओं का ज्ञान आवश्यक है।
जिस असमर्थता से प्रेमिका प्रेमी से नहीं मिल पाती, तो प्रेमी उस असमर्थता को दूर करने का उपाय उसे बता दे।
मृगी नायिका प्रचंडवेग पुरुष के साथ, योनि-पीड़ा के भय से सहवास नहीं करती।
स्त्रियों की आकृति और शरीर के लक्षणों को देखकर, उनकी चेष्टाओं तथा आकृति के द्वारा स्त्रियों की प्रवृत्ति को समझना चाहिए।
स्त्री-पुरुष का संभोगसुख, लज्जा और लोकभय से परतंत्र होता है अर्थात् उनमें लोक-लज्जा और लोक-भय होता है, वे स्वतंत्र रूप से संभोग में प्रवृत्त नहीं होते। अतः उसके लिए उपायों की अपेक्षा होती है और उन उपायों का ज्ञान शास्त्र से होता है।
जिस प्रकार 'राजा है' अर्थात् राजा की विद्यमानता को जानकर दूर रहने वाली प्रजा, राजा के अनुशासन का उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार कामशास्त्र को बिना पढ़े ही लोग कामशास्त्र के अनुशासन का पालन करते हैं।
सर्वत्र अर्थात् कन्या, विवाहिता—सभी नायिकाओं को प्राप्त करने के लिए स्वयं उपाय करना, दूती की अपेक्षा अधिक उत्तम होता है। यदि स्वयं उपाय करने में असमर्थ हों, तो दूती का प्रयोग करना चाहिए।
आलिङ्गनादि प्रासाङ्गिक सुख से अनुविद्ध; स्तनादि विशेष अंगो के स्पर्श से जो फलवती अर्थप्रतिति, अर्थात वास्तविक सुखोपलब्धि होती है—वह 'काम' है।
यज्ञ में, विवाह में, यात्रा के समय, उत्सव में, विपत्तिकाल में या नाटकादि खेल-तमाशा देखने के अवसर पर, लोगों के निमग्न हो जाने पर नायिका की चेष्टाओं और इशारों से उसके भावों को भाँपकर, उस अकेली नायिका के साथ संभोग के लिए उपक्रम करे।
नायक अपनी प्रेयसी नायिका को देर तक; बार-बार देखने के लिए अपने घर पर गोष्ठी का आयोजन करे, जिसमें और भी बहुत-सी लड़कियों को आहूत करे। उस गोष्ठी में नायक अन्य लड़कियों के साथ भी गोष्ठी-बातचीत छेड़ता रहे, जिससे उसकी प्रेयसी नायिका भी रुकी रहे। किंतु किसी से घुल-मिल कर बात न करे, क्योंकि स्त्रियाँ घुल-मिल कर बात करने वाले युवक नायक से प्रेम करने में हिचकती हैं और उन्हें कार्यसिद्धि में संदेह रहता है।
यदि अकेले प्रयोग सिद्ध न हो; एकाकी किए गए उपायों से सिद्धि न मिले, तो नायक धाय की लड़की अथवा नायिका की सहेली से सहायता ले। नायिका की अंतरंग सहेली होने के कारण, वे उसे नायक के पास जाने के लिए राजी कर लेती हैं। इस युक्ति से सफल होने पर वह यथोक्त विधि से रतिक्रिया में संलग्न हो।
जब नायक-नायिका परस्पर शतरंज आदि खेल-खेल रहे हों, तो नायक नायिका से किसी बात पर बनावटी झगड़ा कर ले और झगड़ते हुए उसका हाथ इस प्रकार पकड़ ले कि मानो उसका पाणिग्रहण (विवाह) कर रहा।
जिस स्त्री का चरित्र पहली बार खंडित हुआ हो और जिससे बातचीत करने में कोई रुकावट न हो, उसे प्राप्त करने में स्वयं प्रयत्न करना चाहिए, किंतु जिसका चरित्र पहले ही खंडित हो चुका हो, उसे दूती के माध्यम से सिद्ध करना चाहिए।
पुरुषों की भाँति स्त्रियों को भी कामशास्त्र और तदङ्गभूत सङ्गीतशास्त्र आदि विद्याओं का अध्ययन करना चाहिए।
दूती बनकर नायिका के पास जाने वाली धाय की लड़की, नायिका को समझाए कि और वरों की अपेक्षा, यह वर सब वरों में श्रेष्ठ और विवाह करने के योग्य है। इसके साथ विवाह करके तुम अखंड सुख प्राप्त करोगी।
जब नायिका अपने अंगों के हाव-भाव दिखा; सद्भाव प्रकट कर चुकी हो, तो निशानी के तौर पर अपनी कोई प्रिय वस्तु उपभोग के लिए नायिका को दे, और नायिका की कोई प्रिय वस्तु स्वयं उपभोग के लिए ले लेना चाहिए।
काम (कामकला) को कामसूत्र से तथा कामकला में निपुण नागरिक जनों से सीखना चाहिए।
विवाहिता स्त्रियों को वश में करने के लिए स्फुट उपाय करने चाहिए, क्योंकि वे पहले से ही कामकला में अभ्यस्त होती हैं।
शास्त्र के मर्म को न समझने वाली ऐसी अनेक गणिकाएँ, राजकुमारियाँ और अमात्यों एवं धनिकों की कन्याएँ भी हैं, जो कामकला एवं संगीतकला में स्वभावतः निपुण होती हैं।
पति पत्नी को चौंसठ कलाओं की शिक्षा दे, उसके प्रति अपने अनुराग को प्रदर्शित करे और पहले मनोरथों, अभिलाषाओं और कल्पनाओं की चर्चा करे तथा 'भविष्य में जीवन भर मैं तुम्हारे अनुकूल रहूँगा, तुम्हारे कहने पर चलूँगा' इस प्रकार की प्रतिज्ञा भी करे और सपत्नियों (सौतों) के भय को दूर करे तथा यथासमय कन्याभाव से मुक्त युवती पत्नी के साथ बिना उद्विग्न किए रतिक्रीड़ा का उपक्रम करे।
चेष्टाओं और इशारों द्वारा अपनी भावनाओं को प्रकट कर चुकी नायिकाएँ, उचित स्थान और उचित समय पर नायक के आग्रह को मना नहीं कर सकतीं, और नायक की प्रार्थना स्वीकार कर संभोग के लिए तैयार हो जाती हैं।
यदि नायिका को सोनार, जौहरी, मणिकार, नीलगर, रंगरेज, बढ़ई आदि से कुछ काम कराना हो, तो नायक अपने मित्रों से उस काम को कराए अथवा स्वयं उस काम को कराने का प्रयत्न करे।
जिसकी सगाई टूट चुकी हो, जो बुद्धि, शील, स्वभाव, मेघा, अनुष्ठान आदि में समान हो, जो सदा परपुरुष का पक्ष लेती हो, जो बिना अपराध के पति द्वारा अपमानित की गई हो, जो सौतों द्वारा तिरस्कृत की गई हो, जिसका पति परदेश में रहता हो, जिसका पति ईर्ष्यालु, मलिन, बेड़िया जाति का, नपुंसक, दीर्घसूत्री, कायर, कुबड़ा, बौना, कुरूप, मणिकार, गँवार, दीर्घरोगी और वृद्ध हो गया हो—ये स्त्रियाँ सहज सिद्ध हो जाती हैं।
यदि नायिका पति-प्रेम, संतति-स्नेह, अवस्था का आधिक्य, दुःख की अनुभूति, धार्मिक भावना आदि कारणों से नायक से नहीं मिलती, तो नायक उससे अधिक अनुराग बढ़ाए।
दूती को चाहिए कि वह स्वयं वर चुन लेने की नायिका को सलाह दे। अपनी बुद्धि और इच्छा से विवाह करके प्रसन्न रहने वाली सजातीय अन्य कन्याएँ तथा शकुंतला आदि की कहानियाँ सुनाकर, नायिका को गांधर्व विवाह के लिए प्रेरित करे और यह बताए कि धनी परिवार में अनेक पत्नियों वाले वर से शादी करके कन्याएँ बहुत दुःखी रहती हैं। अतः उसे अपनी इच्छा से अपने मनोऽनुकूल वर चुनना चाहिए और उसके साथ विवाह कर लेना चाहिए।
काम के परवश होने पर भी युवती, नायक से स्वयं संभोग की इच्छा प्रकट न करे। क्योंकि स्वयं अपनी ओर से संभोग में प्रवृत्त होने वाली नायिका अपने सौभाग्य को खो बैठती है, अपनी प्रतिष्ठा नष्ट कर देती है, किंतु नायक की ओर से संभोग क्रिया का प्रयोग (उपक्रम) किए जाने पर अनुकूलता तथा उत्सुकता से स्वीकार कर ले।
यदि नायिका पति-प्रेम, संतति-स्नेह, अवस्था का आधिक्य, दुःख की अनुभूति, धार्मिक भावना आदि कारणों से नायक से नहीं मिलती, तो नायक को उससे अधिक अनुराग बढ़ाना चाहिए।
नायिका के गोद में स्थित बालक को नायक लाड़-प्यार करे, उसे खेलने के लिए खिलौना दे और फिर ले-ले और उसके पास आकर प्रेमिका से बातचीत का क्रम प्रारंभ करे। नायिका से बातचीत करने में समर्थ, अन्य परिजनों से मित्रता जोड़कर उसके द्वारा अपना काम सिद्ध करे। फिर किसी बहाने नायिका के घर आने-जाने का सिलसिला जारी कर दे। जब नायिका समीप में हो, तो नायक अपने मित्र से कामकला संबंधी बातें कहें, जिन्हें नायिका सुन सके।
दूती को यह विश्वास हो जाए कि नायिका; नायक के प्रति पूर्ण रूप से अनुरक्त हो गई है, तो वह उस नायिका के मन से नायक के प्रति शंका, माता-पिता तथा गुरुजनों का भय और लज्जा निकाल दे।
जो पुरुष नवविवाहिता कन्या के मनोभावों को समझता है, बिना सहसा (बलात) उपसर्पण (संभोग करने की चेष्टा) करता है—उससे कन्या भयभीत, त्रसित और उद्विग्न रूप से द्वेष करने लगती है।
जब नायिका को यह विश्वास हो जाए कि 'नायक मुझ पर पूर्ण रूप से अनुरक्त है और वह मुकरेगा नहीं अर्थात किसी भी दशा में मुझे छोड़ेगा नहीं' तभी वह संभोग के लिए नायक के कहने पर, अपने कौमार्य को भंग करने के लिए जल्दी करे अर्थात संभोग के लिए तैयार हो।
यदि कामातुर पुरुष अवस्था से अवस्थांतर मरणवस्थापर्यंत पहुँच जाए, तो वह उपघात अपने शरीर की रक्षा के लिए परस्त्री से संभोग कर सकता है।
नायिका को जिन कामों की आवश्यकता हो, जिन वस्तुओं को वह चाहती हो, जिन कला-कौशल को वह जानना चाहती हो—नायक उनके प्रयोग, उत्पत्ति, उपाय, जानकारी रखने तथा प्रयत्न करने की अपनी योग्यता, विशेषज्ञता नायिका से प्रदर्शित करे।
जब नायिका पूर्ण रूप से सिद्ध (वश में) हो जाए, तब उसके साथ संभोग करने का उपक्रम करे।
जिस प्रकार पुरुष अपने उपायों, योग्यताओं की सफलता पर विचार करता है, उसी प्रकार सरलता से वश में होने वाली स्त्रियों की प्रकृति को भी समझना चाहिए।
अपनी सिद्ध कुशलता को जानकर; स्त्रियों के लक्षणों, हाव-भाव, संकेतों तथा उनकी कामनाओं को युक्ति से निश्चय करके, नायिका के विराग के कारणों को दूर करके, पुरुष अयत्नसाध्य स्त्रियों को वश में करने में सफल होता है।
प्रेयसी नायिका को प्राप्त करने के लिए, नायक को बाह्य उपायों के बाद आभ्यंतर उपायों का प्रयोग करना चाहिए। नायक को चाहिए कि वह नायिका के पैर धोते समय; उसके पैर की अँगुलियों को अपने पैर की अँगुलियों से दबाए, कोई वस्तु लेते-देते समय नाख़ून से उस पर निशान बना दे, हाथ-मुख धोने से बचे हुए जल से नायिका के ऊपर छींटा मारे, एकांत अथवा अँधेरे में एक साथ; एक आसन पर सटकर बैठे हुए नखक्षत करे या चिकोटी काटे और अपने प्रेम-भाव को प्रकट करे। फिर 'मैं तुमसे एकांत में कुछ कहना चाहता हूँ' ऐसा कहकर नायिका के मनाभावों को समझने का प्रयास करे।
यदि पत्नी विवाह के पूर्व परिचिता है, तो उन्मत्तयौवना पत्नी का दीपक के प्रकाश में आलिंगन करना चाहिए और यदि विवाह के पहले दोनों का पूर्व परिचय न हो, तो अभुक्तपूर्वा लज्जाशील बाला का अंधकार में आलिंगन करना चाहिए।
जिस असमर्थता से प्रेमिका प्रेमी से नहीं मिल पाती, तो प्रेमी को उस असमर्थता को दूर करने का उपाय उसे बताना चाहिए।
पराई स्त्री के साथ गमन करने के पूर्व इस बात पर विचार कर लेना चाहिए कि वह सरलता से प्राप्त हो सकती है या नहीं, इसके प्राप्ति करने में बाधा तो नहीं उपस्थित होगी, यह स्त्री गम्या (समागम) के योग्य है या नहीं, इस स्त्री के समागन से भविष्य में क्या परिणाम मिल सकता है?
अभियोगमात्र से साध्य, घर के दरवाज़े पर खड़ी होकर प्रायः बाहर झाँकने वाली, घर की छत पर चढ़कर सड़क की ओर देखने वाली, जवान पड़ोसियों के घर में गोष्ठी करने वाली, आने-जाने वालों को निरंतर देखने वाली, नायक के द्वारा देखे जाने पर तिरछी नज़र से देखने वाली, बिना कारण जिसका पति दूसरा विवाह कर लिया हो, पति से द्वेष करने वाली, जिसका पति उससे घृणा करता हो, जो निर्लज्ज एवं व्यभिचारिणी हो और जो संतानहीन हो—ये सहज सिद्ध हो जाती हैं।
यदि कोई नायक अपनी प्रेयसी नायिका से मिलना या उसे देखना चाहता है, किंतु उसे ऐसा अवसर नहीं मिल पाता कि वह प्रेयसी से मिल सके, तो उसे चाहिए कि वह अपनी प्रेयसी नायिका की सहेली या उसकी धाय की लड़की को पैसे आदि देकर उसे अनुकूल करे, और उसे दूती बनाकर अपनी प्रेयसी के पास भेजे।
जहाँ; जिस स्थान पर दो प्रेमिकाएँ हों और एक से संबंध हो चुका हो, तो दूसरी से प्रेम-व्यवहार का संबंध न करे।
अनादर की भावना से उत्पन्न अवरोध, वृद्ध होने अथवा देश-काल की परिस्थितियों से अनभिज्ञता का भय हो, तो काम-कला-कौशल से उन्हें दूर कर दें।
अनादर की भावना से उत्पन्न अवरोध, वृद्ध होने अथवा देश-काल की परिस्थितियों से अनभिज्ञता का भय हो, तो काम-कला-कौशल से उन्हें दूर कर दें।
यदि पत्नी आलिंगन, चुम्बन आदि को प्रसन्नता से स्वीकार कर ले, तो मुख में ताम्बूल रखकर उसे दे। यदि वह उसे स्वीकार न करे, तो प्यार भरी मीठी-मीठी बातों से आग्रह करे, गिड़गिड़ाए और क़सम दिलाकर पान लेने के लिए प्रार्थना करे।
धीरे-धीरे एकांत में मिलना-जुलना और आलिंगन-चुंबन करना; तांबूल तथा अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान और गुह्य अंगों का स्पर्श करना—यही अभियोग है।