पुरुष का जीवन संघर्ष से आरंभ होता है और स्त्री का आत्मसमर्पण से।
नितांत बर्बर समाज में स्त्री पर पुरुष वैसा ही अधिकार रखता है, जैसा वह अपनी अन्य स्थावर संपत्ति पर रखने को स्वतंत्र है।
पुरुष और स्त्री का संबंध केवल आध्यात्मिक न होकर व्यावहारिक भी है, इस प्रत्यक्ष सत्य को समाज न जाने कैसे अनदेखा करता रहा है।
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एक सफल विवाह में ऐसा कभी नहीं होता कि सभी अधिकार सिर्फ़ एक तरफ़ हैं, और सारी आज्ञाकारिता दूसरी तरफ। अगर कहीं ऐसा है तो वह एक असफल विवाह है और उससे दोनों को ही मुक्ति मिलनी चाहिए।
पतित कही जाने वाली स्त्रियों के प्रति समाज की घृणा, हाथी के दाँत के समान बाह्य प्रदर्शन के लिए हैं और उसका उपयोग स्वयं उसकी मिथ्या प्रतिष्ठा की रक्षा तक सीमित है।
स्त्रियों को पुरुषों के साथ खुली प्रतियोगिता न करने देना, अन्यायपूर्ण और एक तरह का सामाजिक अपराध है।
छाया का कार्य आधार में अपने आपको इस प्रकार मिला देना है, जिसमें वह उसी के समान जान पड़े और संगिनी का अपने सहयोगी की प्रत्येक त्रुटि को पूर्ण कर, उसके जीवन को अधिक से अधिक पूर्ण बनाना।
पुरुष अगर अपनी पूरी सत्ता का इस्तेमाल करता है तो स्त्री निसंदेह कुचली जाती है, पर अगर वह भरपूर लाड़-प्यार में सत्ता स्त्री के हाथों में सौंप देता है, तो स्त्री द्वारा अधिकारों की अतिक्रमण की कोई सीमा नहीं रहती।
जब किसी महिला को अहसास होता है कि वह सचमुच प्रेम पाने की हक़दार है, तो वह एक दरवाज़ा खोल रही है; ताकि पुरुष उसे प्रेम दे सके, लेकिन जब विवाह में दस बरस तक महिला ही प्रेम देती रहती है और उसे बदले में कुछ नहीं मिलता, तब जाकर उसे यह अहसास होता है कि वह ज़्यादा की हक़दार है।
अपने पूर्ण से पूर्ण गौरव से गौरवांवित स्त्री भी इतनी पूर्ण न होगी कि पुरुषोचित स्वभाव को भी अपनी प्रकृति में समाहित कर ले, अतएव मानव-समाज में साम्य रखने के लिए, उसके अपनी प्रकृति से भिन्न स्वभाव वाले का सहयोग श्रेय रहेगा—इस दशा में प्रतिद्वंद्विता संभव नहीं।
हम पुरुषों की वर्गीय तहों के जितना नीचे जाएँगे, उतना ही पुरुषों का 'पुरुष होने का घमंड' बढ़ता दिखेगा। और यह सबसे ज्यादा उन पुरुषों में मिलेगा, जिनमें पत्नी और बच्चों को छोड़कर और किसी पर राज करने की न तो हिम्मत है, न योग्यता।
युवती कन्या; वर-प्राप्ति के लिए उपाय करती हुई जिस नायक को आश्रय के योग्य, रतिसुख का हेतु, अपने अनुकूल एवं वशीभूत समझे—उस नायक का वरण कर ले।
जहाँ तक सामाजिक प्राणी का संबंध है; स्त्री उतनी ही अधिक अधिकार-संपन्न है, जितना पुरुष—चाहे वह अपने अधिकारों का उपयोग करे या न करे।
आजकल तलाक़ बहुत आम हैं, इसलिए यह और भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि पुरुष आश्वासन देने का ध्यान रखें। जिस तरह छोटे परिवर्तन करके; पुरुष महिलाओं का समर्थन कर सकते हैं, उसी तरह महिलाओं को भी करना चाहिए।
पुरुष रबर बैंड जैसे होते हैं, यह समझे बिना महिलाएँ बड़ी आसानी से पुरुषों की प्रतिक्रियाओं की ग़लत व्याख्या कर सकती हैं। एक आम दुविधा तब उत्पन्न होती है, जब वह कहती है 'चलो बात करते हैं,' लेकिन यह सुनते ही वह तुरंत भावनात्मक दूरी बढ़ा लेता है।
अग्नि में बैठकर अपने आपको पति-प्राणा प्रमाणित करने वाली स्फटिक-सी स्वच्छ सीता में, नारी की अनंत युगों की वेदना साकार हो गई है।
कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र या किसी समाज की स्वतंत्रता की भावना को कैसे समझ सकता है, जबकि घर में तो वह अपने बीवी-बच्चों का तानाशाह बना बैठा है।
पुरुष; सौंदर्य के अधिकतर विशुद्ध दृष्टिगत गुण के द्वारा ही यौन दृष्टि से प्रभावित होते हैं, पर स्त्रियाँ ऐसी दृष्टिगत छापों से ही अधिकतर प्रभावित होती हैं, जो मौलिक रूप से अधिकतर यौन अनुभूति यानी स्पर्शनुभूति के गुणों को अभिव्यक्त करती हैं।
पुरुष समाज का न्याय है, स्त्री दया, पुरुष प्रतिशोधमय क्रोध है, स्त्री क्षमा, पुरुष शुष्क कर्तव्य है, स्त्री सरस सहानुभूति और पुरुष बल है, स्त्री हृदय की प्रेरणा।
किसी भी रिश्ते की शुरुआत में महिला अपने मनपसंद पुरुष को आँख के हल्क़े इशारे से बता देती है कि तुम मुझे सुखी बना सकते हो। यह इशारा करके वह दरअसल उनका संबंध शुरू करती है। यह निगाह पुरुष को क़रीब आने के लिए प्रोत्साहित करती है। इससे पुरुष के मन से संबंध बनाने का डर दूर हो जाता है, और वह आगे क़दम उठाता है। दुर्भाग्य से; जब एक बार रिश्ता जुड़ जाता है और समस्याएँ सामने आने लगती हैं, तो महिला यह भूल जाती है कि वह संदेश अब भी पुरुष के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है, इसलिए वह इसे भेजने की उपेक्षा कर देती है।
संबंधों में पुरुषों और महिलाओं की अपनी-अपनी लय और चक्र होते हैं। पुरुष दूर जाते हैं और फिर क़रीब आते हैं, जबकि महिलाओं में ख़ुद को और दूसरों को प्रेम करने की सामर्थ्य ऊपर उठती और नीचे गिरती रहती है।
सभ्यता के हर बड़े केंद्र में सौंदर्य का राष्ट्रीय आदर्श, अद्भुत दिशाओं में पल्लवित होता रहता है और वैदेशिक आदर्शों तथा फ़ैशनों को, देशी आदर्शों तथा फ़ैशनों के मुक़ाबले में तरजीह दी जाती है।
हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।
हमारी राष्ट्रीय जागृति इसे प्रमाणित कर चुकी है कि अवसर मिलने पर गृह के कोने की दुर्बल बंदिनी, स्वच्छंद वातावरण में बल प्राप्त पुरुष से शक्ति में कम नहीं।
मेरा विश्वास है कि अधिकारों की समानता के बाद; स्त्री की आत्म-आहुति का बढ़ा-चढ़ाकर बनाया गया मिथक ज़मीन पर उतरेगा, और तब एक श्रेष्ठ स्त्री श्रेष्ठतम पुरुष से ज़्यादा त्यागमयी नहीं होगी, पर साथ ही तब पुरुष भी आज की तुलना में ज़्यादा निस्वार्थ और आत्म-त्यागी होंगे, क्योंकि उन्हें बचपन से यह नहीं सिखाया जाएगा कि उनकी ज़िद दूसरों के लिए क़ानून के समान है।
जब महिलाएँ समस्याओं के बारे में बोलती हैं, तो आम तौर पर पुरुष प्रतिरोध करते हैं। पुरुष को लगता है कि महिला उसके सामने अपनी समस्याओं का दुखड़ा इसलिए रो रही है, क्योंकि वह उसे ज़िम्मेदार ठहरा रही है।
कोई भी इस बात का दावा नहीं कर सकता कि अगर स्त्रियों की प्रकृति को सहज रूप से विकसित होने दिया जाता, अगर उसे एक बनावटी स्वरूप देने के प्रयास न किए गए होते—तो भी स्त्री और पुरुष के चरित्र और क्षमता में कोई व्यावहारिक अंतर, या शायद कुछ भी अंतर होता।
प्रत्येक भारतीय पुरुष; चाहे वह जितना सुशिक्षित हो, अपने पुराने संस्कारों से इतना दूर नहीं हो सका है कि अपनी पत्नी को अपनी प्रदर्शिनी न समझे। उसकी विद्या, उसकी बुद्धि, उसका कला-कौशल और उसका सौंदर्य—सब उसकी आत्मश्लाघा के साधन मात्र हैं।
हमारे समाज में अपने स्वार्थ के कारण, पुरुष मनुष्यता का कलंक हैं और स्त्री अपनी अज्ञानमय निस्पंद सहिष्णुता के कारण पाषाण-सी उपेक्षणीय। दोनों के मनुष्यत्व-युक्त मनुष्य हो जाने से ही जीवन की कला विकास पा सकेगी, जिसका ध्येय मनुष्य की सहानुभूति, सक्रियता, स्नेह आदि गुणों को अधिक-से-अधिक व्यापक बना देना है।
जब ग़लतफ़हमियाँ पैदा हों, तो याद रखें कि हम अलग भाषाएँ बोलते हैं; पार्टनर की बात का असली अर्थ क्या है या वह सचमुच क्या कहना चाहता है, उसका अनुवाद करने में थोड़ा समय लगाएँ। इसके लिए निश्चित रूप से अभ्यास की ज़रूरत होती है, लेकिन यह इतना महत्त्वपूर्ण काम है कि आपको इसे करना चाहिए।
आधुनिक सभ्यता और शिक्षा ने मानवीय विकास में जो भूमिका निभाई है; वह तब तक अधूरी और अपूर्ण ही रहेगी, जब तक कि ताक़त के क़ानून वाली पुरानी सभ्यता के गढ़ पर हमला नहीं किया जाता। और वह गढ़—गृहस्थ और दांपत्य-जीवन है।
जब कोई पुरुष किसी महिला से प्रेम करता है, तो वह प्रेम और संतुष्टि से दमकने लगती है।
महिला को सम्मान और पुरुष को सराहना की ज़रूरत होती है।
समाज ने किसी ऐसी स्थिति की कल्पना ही नहीं की, जिसमें स्त्री पुरुष से सहायता बिना माँगे हुए ही जीवन-पथ पर आगे बढ़ सके।
दंपतियों को बहस नहीं करनी चाहिए। जब दो लोगों में सेक्स का संबंध न हो, तो बहस या वाद-विवाद करते समय विरक्त और तटस्थ रहना ज़्यादा आसान होता है। लेकिन पति-पत्नी भावनात्मक रूप से और ख़ास तौर पर शारीरिक रूप से जुड़े होते हैं, इसलिए जब वे बहस करते हैं, तो वे आसानी से चीज़ों को बहुत व्यक्तिगत रूप से ले सकते हैं और लेते भी हैं। बुनियादी सलाह : कभी बहस मत करो। इसकी बजाय किसी भी मसले के सभी पहलुओं पर चर्चा करें। आप जो चाहते हैं, उसके लिए ज़ोर दें, लेकिन कभी बहस न करें।
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स्नेह जहाँ पुरुष-पुरुष का है; वहाँ वह उसी निराकार सीमा में सीमित रह सकता है, लेकिन पुरुष और स्त्री का स्नेह कभी प्लेटोनिक प्रेम तक सीमित नहीं रह सकता।
भारतवर्षीय संहिता में नर-नारी का संयत संबंध, कठिन अनुशासन के भीतर आदिष्ट है—कालिदास के काव्य में वही सौंदर्य के उपकरण में गठित है।
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जब कोई पुरुष तनाव में होता है, तो वह सिर्फ़ एक ही समस्या पर अपना ध्यान केंद्रित करता है और बाक़ी समस्याओं को भूल जाता है। दूसरी तरफ़; जब कोई महिला तनाव में होती है, तो वह अपनी समस्याओं को फैला लेती है और उनके बोझ से दबी हुई महसूस करती है।
कोई पुरुष क्यों बात नहीं कर रहा है, इस बारे में महिलाओं में गलत मान्यताएँ व्याप्त रहती हैं। कोई हैरानी नहीं कि महिलाएँ पुरुषों से कुंठित होती हैं।
जब पुरुष और महिलाएँ अपनी भिन्नताओं को समझ लेते हैं; उनका सम्मान करते हैं और उन्हें स्वीकार कर लेते हैं, तो प्रेम को पल्लवित और विकसित होने का मौक़ा मिल जाता है।
पुरुष स्वचालित रूप से अंतरंगता और स्वतंत्रता की आवश्यकताओं के बीच झूलते रहते हैं।
स्त्री और पुरुष यदि अपने सुखों के लिए एक-दूसरे पर समान रूप से निर्भर रहते, तो उनके संबंध में विषमता आने की संभावना ही न रहती, परंतु वास्तविकता यह है कि भारतीय स्त्री की सापेक्षता सीमातीत हो गई।
पुरुष की शक्ति और दुर्बलता उस आदिम नारी से नहीं छिपी रही होगी, जिसने पुरुष की बर्बरता को पराभूत कर उसकी सुप्त भावना को जगाया।
मृगी नायिका प्रचंडवेग पुरुष के साथ, योनि-पीड़ा के भय से सहवास नहीं करती।
मैथुन में पुरुष को अधिक कर्मशक्तिवाला हिस्सा और स्त्री को सूक्ष्म कर्म शक्तिवाला भाग अदा करना पड़ता है। इसलिए स्त्री में कर्मशक्ति का होना; प्रेम के सफल होने का कोई सूचक नहीं है, पर पुरुष में कर्मशक्ति उस शक्ति के प्राथमिक गुण के अस्तित्व का सूचक है, जिसकी कि स्त्री यौन-आलिंगन में अपेक्षा करती है।
जब महिला अपने विचार बताती है, तो वह स्वाभाविक रूप से पुरुष को बोलने के लिए प्रोत्साहित करती है, लेकिन जब पुरुष महसूस करता है कि उसके बोलने की माँग की जा रही है, तो उसका दिमाग़ खाली हो जाता है।
पुरुष स्वतंत्र होने के अधिकार के लिए तर्क देते हैं, जबकि महिलाएँ नाराज़ होने के अधिकार के लिए तर्क देती हैं। पुरुष कभी-कभी दूरी चाहते हैं, जबकि महिलाएँ चाहती हैं कि उन्हें समझा जाए।
महिला की बात सुनना किसी पुरुष के लिए मुश्किल होता है; क्योंकि वह ग़लती से तार्किक क्रम की उम्मीद करता है, जबकि महिला एक समस्या से दूसरी समस्या पर बिना किसी क्रम के कूदती रहती है।
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स्त्रियों के प्रति किसी पुरुष के दृष्टिकोण से यह बात भी पता चलती है कि ख़ुद उसकी पत्नी कैसी है।
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