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‘अर्थात्’ की छठी कड़ी : प्रगतिवाद पर बात

चैत्र में बसंत के उनींदे से जागा ग्रीष्म वैशाख में अपना वैभव खोजता है। दुपहरें अपनी दीर्घता से ऊबकर अलसाती हैं और निस्पंद हो जाती हैं। अगर उमस न हो तो ऐसी दुपहर पढ़ने-लिखने को अनुकूल है। इसी समय में ‘अर्थात्’ के छठे सत्र का आयोजन हुआ। आम तौर पर दो सत्रों के मध्य कम-से-कम मास भर का अंतर तो ठीक किया ही जाता है, लेकिन यह अकादमिक सत्रांत का समय है और विद्यार्थी कुछ समय में पहले तो परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त होंगे, फिर परीक्षाओं में न्यस्त होंगे और फिर दूर-देस से उनका घर उन्हें पुकारेगा। इसीलिए ‘अर्थात्’ का यह सत्र पहले ही संपन्न किया गया और विषय रहा—‘प्रगतिवाद’। सत्र में वक्ता थे—मृत्युंजय और रामायन राम।

कार्यक्रम अतिथियों का सम्मान करने के क्रम से खुला और उज्जवल ने प्रस्तावनास्वरूप प्रगतिवाद पर एक आम अकादमिक समझ को रखा और उससे जुड़ी हुई समस्याओं को रेखांकित किया और इस तरह सत्र की शुरुआत हुई।

प्रगतिवादसंबंधी वक्तव्यों के पूर्व विद्यार्थियों ने प्रगतिवादी कविताओं का पाठ किया। कविताएँ थीं—‘मैंने उसको जब जब देखा’, कवि : केदारनाथ अग्रवाल, पाठ : अर्चना; ‘शहतूत’, कवि : साबीर हाका, पाठ : प्रिया; ‘जीवन की कमान’, कवि : शमशेर, पाठ : मानसी; ‘बसंती हवा’, कवि : केदारनाथ अग्रवाल, पाठ : दानिश; ‘अकाल और उसके बाद’, कवि : नागार्जुन, पाठ : डिम्पल; ‘प्रेत का बयान’, कवि : नागार्जुन, पाठ : फ़ातिमा; ‘गुलाबी चूड़ियाँ’, कवि : नागार्जुन, पाठ : राज जी तिवारी; ‘इंदु जी क्या हुआ आपको’, कवि : नागार्जुन, पाठ : अतुलप्रिया; ‘बहुत दिनों से’, कवि : मुक्तिबोध), पाठ : जितेंद्र; इसके अतिरिक्त दिव्यांशु, आँचल आदि ने भी कविता-पाठ किया।

रामायन राम ने अपने वक्तव्य का आरंभ इस स्थापना से किया कि प्रगतिशील लेखक संघों का उद्भव एक अंतरराष्ट्रीय परिघटना थी, जोकि फ़ाशिस्ट विचारधारा के प्रत्युत्तर में जन्मी थी। इसके केंद्र में यह प्रश्न था कि साहित्यकारों की साहित्यिक पक्षधरता क्या होनी चाहिए! लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में प्रेमचंद के अध्यक्षीय भाषण को वे प्रगतिवाद का घोषणा-पत्र मानते हैं, जिसमें नवीन सौंदर्यशास्त्र विकसित करने की आवश्यकता पर बल है। यह सौंदर्यशास्त्र सामाजिक एवं यथार्थवादी प्रश्नों को केंद्र में लाता है और हाड़-मांस के मनुष्यों की बात शुरू करता है। प्रगतिवाद सिर्फ़ कविता-आंदोलन के रूप में सीमित नहीं रह जाता, बल्कि इसका विस्तार गद्य तक भी होता है और यह पुरानी और नई पीढ़ी, दोनों को एक साथ प्रभावित करता है।

रामायन राम ने रेखांकित किया कि प्रगतिवाद अन्य साहित्यिक धाराओं से बहस तो करता ही है, साथ ही इसके भीतर भी विमर्श चल रहे थे। इसके अंतर्गत प्रगतिवादी दर्शन, इसकी भारतीयता-अभारतीयता के प्रश्न, राष्ट्रवाद से संबंध एवं परंपरा की भूमिका जैसे विषयों पर ज्वलंत बहसें हुईं। आंदोलन में विविधता को दिखाते हुए, उन्होंने उदाहरण दिया कि एक तरफ़ रांगेय राघव हैं जो तुलसीदास पर प्रश्न उठाते हैं और महाकाव्यों के नायकों को पुष्यमित्र शुंग और चंद्रगुप्त, विक्रमादित्य जैसे चरित्रों से जोड़कर वर्णाश्रम आधारित पुनरुत्थानवाद का आरोप लगाते हैं; तो वहीं रामविलास शर्मा हैं जो तुलसीदास को सामंतविरोधी कवि के रूप में स्थापित करते हैं और हिंदी जाति की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। इसी समय में संतकाव्य पर विचार किया जाना और हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा कबीर के मूल्यांकन को प्रगतिवाद की मूल्यव्यवस्था के अंतर्गत देखा जा सकता है, जिसे बाद में नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ कहा।

प्रगतिवाद की भारतीयता और अभारतीयता के प्रश्न पर उनका मत था कि प्रगतिवादी आंदोलन के दौरान यह समझ थी कि सभी राष्ट्रीय चरित्र धीरे-धीरे आपस में घुल जाएँगे और एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का निर्माण होगा। हालाँकि यह निरपेक्ष नहीं होगा और विभिन्न राष्ट्रों की संस्कृतियों की आवश्यकतानुसार अपना रूप लेगा। राष्ट्रवाद के प्रश्न पर उन्होंने अनेक शोधों में इस स्थापना के सिद्ध होने की बात कही कि नवजागरण के दौरान जिस राष्ट्र की बनावट की बात थी, वह हिंदू पहचान पर आधारित था। वहीं प्रगतिवाद राष्ट्र की समावेशी अवधारणा का समर्थन करता है और इसका राष्ट्र के विचार से कोई विरोध नहीं है। साहित्य प्रॉपगैंडा है या नहीं इस प्रश्न पर उनका मत था कि साहित्य विचारधारा का हथियार नहीं है, लेकिन वह अपनी वर्गीय पक्षधरता तय करता है। प्रगतिवाद इसी पक्षधरता का काव्य है।

मृत्युंजय ने अपने वक्तव्य में प्रगतिवादी कविता के विश्लेषण के ज़रिए अपनी स्थापनाएँ रखीं। प्रगतिवाद का आंदोलन के रूप में उभरना दो विश्व-व्यवस्थाओं के मॉडल के बीच चुनाव से हुआ, जहाँ एक तरफ़ पूँजी के आधिपत्य का विचार था और दूसरी ओर राज्यनियंत्रित संपत्तिव्यवस्था थी जो मनुष्य को उसकी आवश्यकतानुसार संसाधन उपलब्ध कराना राज्य का दायित्व समझती थी।

उनका मत था कि प्रगतिवाद का हिंदी कविता में ‘हुस्न के मेयार’ को बदलने का आग्रह था। वह शिल्प और सौंदर्य दोनों में मूलभूत परिवर्तन करती है। यह औपनिवेशिक सौंदर्य मूल्यों के विरुद्ध प्रगतिशील एवं स्वाभाविक जीवन के सौंदर्य की स्थापना करती है और कहन में सीधी-सीधी भाषा का प्रयोग सामाजिक समस्याओं की तीव्रतम अभिव्यक्ति के लिए गीतात्मक एवं आंतरिक लय दोनों के साथ करती है।

उन्होंने कहा कि प्रगतिवादी साहित्य-परंपरा के प्रतिरोधी मूल्यों को उभारता है। ए.के. रामानुजन के हवाले से उन्होंने एक परंपरा के बजाय ‘परंपराओं’ के होने की बात कही। साहित्यकार ‘संग्रहत्याग’ के विवेक से अनुकूल परंपरा का चुनाव करता है और प्रतिगामी परंपरा से जूझता है। वह अपनी परंपरा का पुनर्मूल्यांकन करते हुए प्रगतिवादी मूल्यों को पीछे की ओर लंबा बढ़ाता है—अपभ्रंश और पालि तक भी।

मृत्युंजय ने यह नोटिस भी किया कि प्रगतिवाद की आंतरिक विमर्श की संस्कृति ने ही उसको लंबे समय तक जिलाये रखा है।

प्रगतिशील कविता में कवियों के आधारमूल्य तो एक ही हैं लेकिन उनके केंद्र अलग-अलग हैं। नागार्जुन जहाँ सीधी राजनीति के कवि हैं (तुलसीदास के बाद दूसरे), वहीं केदारनाथ अग्रवाल की कविता में श्रम एवं सौंदर्य का मिश्रण है और त्रिलोचन ग्रामीण जीवन के भीतर से प्रतिरोधी परंपरा को खींच निकालते हैं। रामविलास शर्मा के साहित्य के सरोकार सामंतवाद और साम्राज्यवाद विरोधी हैं।

प्रगतिशील कविता न केवल ‘कला कला के लिए’ या ‘जनता के लिए’ जैसे सवाल से दो-चार होती है, वहीं लैंगिक समानता, ऐंद्रियता, सभ्यता-समीक्षा जैसे प्रश्नों से भी टकराती है। वह आज़ादी के अंतर्विरोधों को पहचानती है और उसे ज़बान देती है।

उनके अनुसार साहित्य का कार्य सत्ता की पहचान और उसका प्रतिरोध करना है और प्रगतिशील आंदोलन सत्ताओं की पहचान साफ़-साफ़ करती है।

वक्ता के अनुसार विचार और कला को अलगाया नहीं जा सकता। रचनाकार के विचारधारात्मक आग्रह के बावजूद उसकी रचना में कुछ काम के तत्त्व होते हैं, जहाँ जीवन उसकी विचारधारा को चीरकर ऊपर चला आता है।

प्रयोगवाद के संदर्भ में उन्होंने रेखांकित किया कि वह प्रगतिवादी ‘इंडिविजुअल इरेज’ की ख़ामी को सुधारता है और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य पर बल देता है। वह संक्रमण का दस्तावेज़ है; एकांगी नहीं है। इसमें एक तरफ़ तो अज्ञेय हैं और दूसरी तरफ़ रामविलास शर्मा और मुक्तिबोध हैं जो विभिन्न विधाओं में प्रगतिवादी मानदंडों को विकसित करते हैं। इस तरह प्रयोगवादी कविता प्रगतिवाद की विरोधी नहीं है, बल्कि वह प्रगतिवादी मूल्यों के कवियों को अपने पथान्वेषण का विकल्प देती है।

मृत्युंजय के वक्तव्य के बाद विचारोत्तेजक प्रश्नोत्तर सत्र रहा जिसमें विमर्शों से प्रगतिवादी कविता का संबंध, फ़ार्मूला राइटिंग के प्रति सुभेद्यता, कला में मूल्यचित्रण बनाम उसका निर्वाह, उत्तर-आधुनिक समय में प्रगतिवाद, आंदोलन के प्रतिक्रियावादी हो जाने के जोख़िम जैसी कई थीम मुखर थीं। सवाल-जवाब का दौर चाय के आग्रह के साथ ही ख़त्म हुआ।

इस अकादमिक सत्रांत तक ‘अर्थात्’ की छह गोष्ठियाँ हुई हैं। इनका सबसे बड़ा हासिल विद्यार्थियों में विचारोत्तेजक प्रश्नोत्तर की क्षमता का विकास रहा है। कुछ कच्चे-पक्के सवालों के बावजूद अधिकांश सवाल पैने रहे हैं जो एक तरफ़ तो विद्यार्थियों की सत्र के दौरान सक्रियता दिखाते हैं, दूसरी ओर वक्ता की जवाबदेही भी तय करते हैं। ‘अर्थात्’ का प्रयत्न पर्चा पढ़ने की अकादमिक संस्कृति के विकास का भी है—जहाँ पर्चा-लेखक शोधपरक कार्य करने को प्रेरित होते हैं, वहीं अकादेमी के बाहर के विद्वानों को वक्ता के तौर पर आमंत्रण एक वैकल्पिक पाठ की पद्धति को भी प्रोत्साहित करता है। ‘अर्थात्’ की यह यात्रा अभी बहुत लंबी नहीं हुई है, लेकिन विद्यार्थियों की उत्साहपूर्वक भागीदारी और विद्वानों का तैयारी के साथ बोलना यह आश्वस्त करता है कि पठन-पाठन और जिज्ञासाओं का लोकतांत्रिक वैभव अभी क्षीण नहीं होगा।

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‘अर्थात्’ की गई गोष्ठियों की रपटें यहाँ पढ़िए : लंबी कविताओं पर खुलकर हुई बहस : ‘अर्थात्’ की पाँचवीं कड़ी रही ख़ास‘अर्थात्’ की चौथी कड़ी में जमकर हुई चेख़व-चर्चा | ‘अर्थात्’ की तीसरी गोष्ठी में खुले छायावाद के बंध | नई कविता और संवाद का दूसरा पड़ाव | ‘अर्थात्’ की शुरुआत

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