कहना न होगा कि शिल्प की दृष्टि से शमशेर हिंदी के एक अद्वितीय कवि है।
शमशेर की आत्मा ने अपनी अभिव्यक्ति का एक प्रभावशाली भवन अपने हाथों तैयार किया है, उस भवन में जाने से डर लगता है—उसकी गंभीर प्रयत्नसाध्य पवित्रता के कारण।
रवींद्रनाथ जिस सतह से बोलते हैं, जिस व्यापक जीवन के सर्वोच्च बिंदु पर खड़े होकर देश-देशांतर के जन-समुदाय के सामने वे अपने को प्रकट करते हैं, उस स्थान के अन्य अनुगामी कलाकार नहीं बोल पाते। उतना ही उनमें बौनापन है, जितनी कि रवींद्र में ऊँचाई।
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शमशेर की मूल मनोवृत्ति एक इंप्रेशनिस्टिक चित्रकार की है।
प्रसाद के साहित्य में मुझे जो कमी महसूस होती है, वह कला की नहीं—कला और जीवन के बीच घनिष्ठता की है।
मलयज की निगाह से कविता को पढ़ना, एक कवि की परिष्कृत संवेदना और एक समीक्षक के धीर विवेक से कविता को पढ़ना है।
श्रीकांत वर्मा का 'मगध'; राजनीतिक कुचक्र में फँसे एक संवेदनशील मन का इतिहास में संतरण है, जहाँ से वह वर्तमान को एक धुँध की तरह चित्रित करता है।
अपनी समग्रता और जीवनपरकता में मुक्तिबोध की कविताएँ जिन मानवीय आयामों को छूती हैं, उनमें कविता के बृहत्तर उद्देश्यों की व्यापकता, ईमानदारी और ताक़त है।
निराला का निजी संसार उनकी कविता का उतना ही आवश्यक हिस्सा है, जितना वह समाज जिसमें वे जी रहे थे।
साही की प्रगतिशीलता भारतीय जीवन-पद्धति का निषेध नहीं है, नए और ज़रूरी को निष्पक्षता से जाँच कर स्वीकार या अस्वीकार करने की सतर्कता है।
मुक्तिबोध जब 'फंतासी' की विधा में कुछ कहना चाहते हैं; तो इसका यह मतलब नहीं कि वे 'सामाजिकता' से पलायन कर रहे हैं, जिसका एक रूप 'फंतासी' भी है।
शमशेर को पढ़ना केवल उनकी कविताओं के अर्थ को ग्रहण करना नहीं है, रचनात्मकता के अर्थ को भी अनुभव करना है।
शमशेर का अकेलापन एक ईमानदार रचनाकार की अनिवार्य नियति का अकेलापन है।
आदमी की दुविधा, तनाव, पीड़ा, अभाव का समसामयिक अर्थ-संदर्भ—मुक्ति-बोध की कविता को समकालीन बनाता है।
शमशेर उन ख़ास अर्थों में कवि हैं; जिन अर्थों में ज़्यादातार कवि, कवि नहीं हो पाते। क्योंकि उनके अंदर अपनी कला, अपने कवि-धर्म को लेकर पहली चिंता है।
शमशेर की साहित्यिक चेतना में कला के सार्वभौमिक आदर्शों (यूनीवर्सलआइडल्स) की व्याप्ति है।
मुक्तिबोध की ही तरह शमशेर की कविताओं को भी आत्मसात् करने के लिए उनके राजनीतिक विचारों को ही नहीं; उनके साहित्यिक आदर्शों और मान्यताओं को समझना पहली ज़रूरत है, अन्यथा हम उस प्रतिभा को ही गौण मानेंगे जो उन्हें अनेक कवियों से बिल्कुल अलग करती है।
सौन्टैग के अनुसार यह धारणा ही कि कला ‘कथ्य ही कथ्य’ है; उसे एक इस्तेमाली सामान में बदल देती है, जो कला की मूल प्रकृति के साथ हिंसा है।
भाषा में शब्दों का ट्रिक कामयाब होने पर कविता, और असफल होने पर चमत्कार बनता है। रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा की अधिकांश कविताएँ ऐसा ही चमत्कार है।
सुजान सौन्टैग का कहना कि हर युग को अपने लिए तरह आत्मिकता के सार को खोजना पड़ता है—आज की कला के लिए उतना ही सच है, जितना किसी भी युग की कला के लिए रहा है।
प्रसाद भारतीय इतिहास को राष्ट्रीय गौरवगाथा और महानायकवाद की परिकल्पना के रूप में पढ़ते हैं।
शमशेर ने सीधे कथन के स्तर पर कविता में आसान समीकरण नहीं ढूँढ़े हैं। वे उस अंतर के प्रति पूरी तरह सचेत हैं, जो एक मौलिक कवि को दूसरे से अलग करता है।
मुक्तिबोध की भाषा किसी पुराने पोख़्ता खंडहर की दीवार सरीख़ी है। भारी, बुलंद किंतु प्रतिध्वनि से हीन, किंतु जहाँ कहीं उस पोख़्ता और उबाऊ और प्रतिध्वनि-हीन भाषा में, पत्थर-सी बेजान भाषा में, आज के आदमी की बातचीत की भाषा आ गई है, वहीं से लगता है ईंटें जगह-जगह गल गई है और दीवारों में झिर्रियाँ बन गई है, जिन से घने अँधेरे में भी प्रकाश झर रहा है और यही उसकी बुनियादी सहजता है—यह प्रकाश ही अर्थ है।
नेरुदा की अधिकांश कविताओं की प्रकृति रोमांटिक है—कहीं-कहीं तो बिल्कुल छायावादी ढंग की। लेकिन वे सभी अच्छे और श्रेष्ठ साहित्य की तरह उन तत्त्वों को केंद्र में रखती हैं, जिनके बिना हम कला और मनुष्य को सही-सही परिभाषित नहीं कर सकते।
प्रसाद के साहित्य को पढ़ना नाटक देखने की तरह है। वह जीवन का हूबहू चित्रण नहीं है, जीवन की नाटकीय प्रस्तुति है। हम उसे यथार्थ की शर्तों पर नहीं, नाटक की शर्तों पर स्वीकार करते हैं।
मुक्तिबोध की कविता जब चूकती है; तब भी वह मुझे एक फ़िल्म की तरह चूकती लगती है, मानो वे लंबे-लंबे अनकट रशेज़ हों जिनका कुशल संपादन अभी बाक़ी हो, या पढ़नेवाले पर छोड़ दिया गया हो।
कविता में प्रयोगशाीलता को भी एक चरम बिंदु पर ले जाकर; फिर अचानक गीतों की ओर मुड़नेवाले निराला एक ऐसे सतत प्रयत्नशील कवि का उदाहरण हैं, जो अपनी उपलब्धियों के किसी भी शिखर पर ठहर जाने को तैयार न था।
उद्देश्य या सीमित अनुभवों की कविता भी हो सकती है, लेकिन शमशेर का काव्यानुभव उसके प्रतिकूल पड़ता है। वह अर्थ के विस्तार के लिए भाषा में ज़्यादा से ज़्यादा छूट और खुलापन माँगता है।
कबीर यथार्थवादी ही नहीं, एक गंभीर तत्त्वदर्शी सबसे पहले थे। और उनकी कविता इसका सटीक उदाहरण है कि दोनों के बीच समन्वय संभव है।
साही की कविताओं में जो एक ख़ास तरह की दृढ़ता है; उसका गारा भर क्लासिक रहता है लेकिन स्थापत्य—साही का बिल्कुल अपना और अपने समय की, या जीवन की प्रमुख समस्याओं से रगड़ खाता हुआ।
इंप्रेशनिस्टिक स्वभाव ने शमशेर को ‘विशिष्ट’ के प्रति प्रेरित किया है।
शेक्सपीयर या कबीर या तुलसीदास का साहित्य; किसी एक विचार का पुष्टीकरण नहीं है, वह पूरे जीवन की सच्चाई है—जिससे किसी विचार की वैधता सिद्ध होती है।
शेक्सपियर के 'टेंपेस्ट' नाटक के साथ कालिदास की 'शकुंतला' की तुलना मन में सहज ही उठ सकती है। इनका बाह्य सादृश्य और आंतरिक विभिन्नता, ध्यानपूर्वक विचार करने की चीज़ है।
प्रणय-जीवन के सर्वोतम कवि आज भी मीरा और सूर हैं।
तुलसीदास दुरूह होते हुए भी भारतीय आत्मा के सबसे निश्छल छवि है, जिस प्रकार राम की शक्ति पूजा पुरुषार्थ की सबसे उदात्त अभिव्यक्ति।
राजकमल चौधरी की कविताओं में (विशेषतः मुक्ति प्रसंग) परिवेश तो समसामयिक है, किंतु उन का आवेग काफ़ी रूमानी है। होता यह है कि उस की रचनाएँ एक अजीब क़िस्म का मानसिक संघात पैदा करती है। कभी-कभी वे प्रसाद की छायावादी स्थितियों का छायाभास होती है।
पंतजी में कोमल संवेदनाओं से आप्लुत, एक विशेष प्रकार की अंतर्मुखता थी।
ऑक्टेवियो पाज़ ने कहा है कि प्रत्येक पाठक एक दूसरा कवि है।
आत्म-चेतना को विकास के प्रश्न की दृष्टि से देखा जाए, तो यह कहना होगा कि शमशेर आत्मपरक साहित्य की यूरोपीय परंपरा से काफ़ी प्रभावित हैं।
अज्ञेय से पहले हिंदी का कोई ऐसा कवि नहीं हुआ जो शुद्ध रूप से नागरिक कवि हो।
कवि को चित्रकार का स्थानापन्न बना देने से और उस स्थानापन्न कवि के सम्मुख कार्यक्षेत्र विस्तृत कर देने से, शमशेर की रचनात्मक प्रतिभा ने बहुत बार घोटाला कर दिया है—ऐसा मेरा ख़याल है।
जीवन के विविध क्षेत्रों का और अनेकानेक मानव-प्रसंगों का, जितना अनुभव प्रसादजी को था—उतना पंतजी को प्राप्त नहीं हो सका।
निराला का संघर्ष, स्थिति-रक्षा का संघर्ष है।
प्रसाद के लेखन का मूल नाटकीय और रोमांटिक तत्त्व; भारतीय इतिहास के यथार्थ से इतना नहीं जुड़ता, जितना प्रसाद की इतिहास के बारे में उनकी कल्पना से।
पंतजी अंतर्तम के गहन भाव-दृश्यों के चित्रकार नहीं हैं।
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हमारे आधुनिक साहित्य के क्षेत्र में सर्वप्रथम सामंती संस्काराच्छन्न उच्च-मध्यवर्ग ही सक्रिय हुआ—चाहे वे भारतेंदु हरिश्चंद्र हों, अथवा बिगड़े रईस जयशंकर प्रसाद हों, अथवा आधुनिक परिष्कार-युक्त विलायती शिक्षा-प्राप्त अथवा उससे प्रभावित अन्य कविजन हों।
कामायनी में विचारों और अनुभवों के सामान्यीकरण का दर्शन है।
इंप्रेशनिस्टिक ढंग का चित्रकार, जीवन की उलझी हुई स्थितियों का चित्रण नहीं कर सकता—वह उसके किसी दृश्य-खंड को ही प्रस्तुत कर सकता है।
शमशेर के शिल्प के संबंध में यह बात भी मुझे कहनी है कि प्रसंगबद्ध भावना की प्रसंग-विशिष्टता सुरक्षित रखकर, प्रसंग को पार्श्वभूमि में हटाते हुए उसको बिल्कुल ही उड़ा देने से, काव्य के रसास्वादन में कुछ तो बाधा होती ही है।