पुरुष अगर अपनी पूरी सत्ता का इस्तेमाल करता है तो स्त्री निसंदेह कुचली जाती है, पर अगर वह भरपूर लाड़-प्यार में सत्ता स्त्री के हाथों में सौंप देता है, तो स्त्री द्वारा अधिकारों की अतिक्रमण की कोई सीमा नहीं रहती।
आधुनिक सभ्यता और शिक्षा ने मानवीय विकास में जो भूमिका निभाई है; वह तब तक अधूरी और अपूर्ण ही रहेगी, जब तक कि ताक़त के क़ानून वाली पुरानी सभ्यता के गढ़ पर हमला नहीं किया जाता। और वह गढ़—गृहस्थ और दांपत्य-जीवन है।
एक सफल विवाह में ऐसा कभी नहीं होता कि सभी अधिकार सिर्फ़ एक तरफ़ हैं, और सारी आज्ञाकारिता दूसरी तरफ। अगर कहीं ऐसा है तो वह एक असफल विवाह है और उससे दोनों को ही मुक्ति मिलनी चाहिए।
स्त्रियों को पुरुषों के साथ खुली प्रतियोगिता न करने देना, अन्यायपूर्ण और एक तरह का सामाजिक अपराध है।
हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।
मेरा विश्वास है कि अधिकारों की समानता के बाद; स्त्री की आत्म-आहुति का बढ़ा-चढ़ाकर बनाया गया मिथक ज़मीन पर उतरेगा, और तब एक श्रेष्ठ स्त्री श्रेष्ठतम पुरुष से ज़्यादा त्यागमयी नहीं होगी, पर साथ ही तब पुरुष भी आज की तुलना में ज़्यादा निस्वार्थ और आत्म-त्यागी होंगे, क्योंकि उन्हें बचपन से यह नहीं सिखाया जाएगा कि उनकी ज़िद दूसरों के लिए क़ानून के समान है।
कोई भी इस बात का दावा नहीं कर सकता कि अगर स्त्रियों की प्रकृति को सहज रूप से विकसित होने दिया जाता, अगर उसे एक बनावटी स्वरूप देने के प्रयास न किए गए होते—तो भी स्त्री और पुरुष के चरित्र और क्षमता में कोई व्यावहारिक अंतर, या शायद कुछ भी अंतर होता।
कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र या किसी समाज की स्वतंत्रता की भावना को कैसे समझ सकता है, जबकि घर में तो वह अपने बीवी-बच्चों का तानाशाह बना बैठा है।
हम पुरुषों की वर्गीय तहों के जितना नीचे जाएँगे, उतना ही पुरुषों का 'पुरुष होने का घमंड' बढ़ता दिखेगा। और यह सबसे ज्यादा उन पुरुषों में मिलेगा, जिनमें पत्नी और बच्चों को छोड़कर और किसी पर राज करने की न तो हिम्मत है, न योग्यता।
स्त्रियों के प्रति किसी पुरुष के दृष्टिकोण से यह बात भी पता चलती है कि ख़ुद उसकी पत्नी कैसी है।
पुरुषों और स्त्रियों के बीच अगर कोई मानसिक अंतर है भी, तो वह उनकी शिक्षा और हालत के अंतर का स्वाभाविक परिणाम है—उसमें प्रकृति प्रदत अंतर बहुत कम है।
आज हम मनुष्यों में स्वार्थ, आत्म-केंद्रिता और अन्यायपूर्ण पक्षपात के जो दोष देखते हैं, उनकी जड़ में असमान स्त्री-पुरुष संबंध ही हैं।
स्त्री और पुरुष के बीच सभी बाहरी मामलों में पूरी साझेदारी और एकात्मकता होने के बाद भी, ऐसा मुमकिन है कि भीतर से वे एक-दूसरे को बहुत कम जानते हों।
एक तरफ जहाँ ऐसे पुरुष हैं, जो अंतरात्मा और प्रेम की पुकार सुनने वाले साँचे में ढले होते हैं; तो दूसरी तरफ़ ऐसे पुरुष भी हैं, जो जिम्नेज़ियमों और दूसरी अकादमियों में सिर्फ़ यह सीखते हैं कि अपने अहंकार और दूसरों पर दबाव को कैसे बनाए रखा जाए।
कोई-कोई पुरुष समझता है कि वह स्त्रियों को बहुत अच्छी तरह से जानता है, क्योंकि वह उनमें से बहुतों के साथ प्रेम-संबंध बना चुका है।
प्रेम की चरम परिणति दांपत्य में, स्त्री-पुरुष के प्रेम में प्रस्फुटित होती है। स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के सहभाव से परिपूर्ण बनते हैं, यही बात सीता और राम के प्रसंग में वाल्मीकि ने कई बार कही है।
शास्त्रीय वाङ्मय ही नहीं; रामायण, महाभारत, कालिदास, भवभूति और बाणभट्ट जैसे कतिपय महाकवियों को छोड़ दें, तो लगभग सारा का सारा संस्कृत साहित्य ही पुरुषवादी दृष्टि और पुरुष के वर्चस्व के आख्यान से रचा हुआ है।
योगियों के मतानुसार, सारा व्यक्त जगत्-प्रकृति से उत्पन्न हुआ है; पर प्रकृति का अपना कोई उद्देश्य नहीं है, केवल पुरुष को मुक्त करना ही उसका प्रयोजन है।
समाज के द्वंद्र के कारण सीता और राम का दांपत्य, स्थूल स्तर पर खंडित होता है—हृदयसंवाद खंडित नहीं होता।
संस्कृत के समाज में शास्त्रार्थ की शताब्दियों की परंपरा है; पर उसमें स्त्री की भूमिका पर बात कम हुई है, स्त्री की भूमिका भी कहीं है तो वह उपेक्षित रही है।
एक पुरुष की उपस्थिति कुछ ऐसे आशय रखती है कि वह तुम्हारे लिए या तुम्हारे समक्ष क्या करने में समर्थ है। जबकि इसके विपरीत, स्त्री की उपस्थिति निश्चित करती है कि उसके साथ क्या किया जा सकता है और क्या नहीं।
वाल्मीकि ने अपनी मानवीय दृष्टि द्वारा उस युग में स्त्री-पुरुष के साहचर्य की प्रतिष्ठा की।
कुछ शास्त्रार्थ ऐसे भी हुए जिनमें स्त्री उपस्थिति की आँच अभी भी मंद नहीं हुई है। यह भी बहुधा हुआ है कि स्त्री अकेली होने के बावजूद, अपनी प्रखरता और तेजस्विता में पुरुष समाज को हतप्रभ कर देती है।
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जो पुरुष पत्नी के साथ बहुत विनम्रता से पेश आते है। उनके बाहरी संसार और मित्रों, सगे-संबंधियों से जुड़े मामलों में पत्नी के अनुचित प्रभाव की बहुत ज़्यादा संभावना रहती है।
वह न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है। न सत् है, न असत् है और न सदसत् उभयरूप ही है। ब्रह्मज्ञानी पुरुष ही उसका साक्षात्कार करते हैं। उसका कभी क्षय नहीं होता, इसलिए वह अविनाशी परब्रह्म परमात्मा अक्षर कहलाता है। यह समझ लो।
दुष्ट पुरुषों का बल है हिंसा। राजाओं का बल है दंड देना। स्त्रियों का बल है सेवा और गुणवानों का बल है क्षमा।
संभवतः विवेकवादियों की आदर्श-भावना के कारण, इस शब्द में केवल स्त्री-पुरुष-संबंध के अर्थ का ही भाव होने लगा। किंतु काम में जिस व्यापक भावना का समावेश है, वह इन सब भावों को आवृत्त कर लेती है।
वाल्मीकि रामायण का नायक वह मनुष्य है, जिसके दुर्लभ गुण देवों में भी नहीं मिल सकें, देवता भी जिसके समक्ष भयभीत प्रतीत हों।
कर्तव्यनिष्ठ पुरुष कभी निराश नहीं होता।
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आदर्श पुरुष वह है; जो सबसे बड़े मौन और एकांत के बीच में सबसे तीव्र गतिविधि पाता है, और सबसे तीव्र गतिविधि के बीच में रेगिस्तान का मौन और एकांत पाता है।
पुरुष स्त्रियों को निहारते हैं, स्त्रियाँ अपने निहारे जाने को देखती हैं।
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