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रघुवर प्रसाद और सोनसी की दुनिया का रचयिता

1 जनवरी 2026 को विनोद कुमार शुक्ल 89 वर्ष के हो जाते लेकिन उसके नौ दिन पहले ही वह इस दुनिया से चले गए। हिंदी साहित्य में संभवतः अज्ञेय के बाद वह गिनती के ऐसे साहित्यकारों में थे जो गद्य और पद्य दोनों में अपनी गहरी लयात्मक अभिव्यक्ति के लिए जाने जाते थे। उनकी हर गहरी अभिव्यक्ति लय से भरी थी। उसका रूप चाहे कविता हो या उपन्यास। यहाँ तक कि प्रतिरोध भरी पंक्तियों में भी एक समझदारी भरी गहरी लय मिलती है, जैसे ‘नौकर की क़मीज़’ उपन्यास में विनोद कुमार शुक्ल लिखते हैं—“दो दिन के भूखे आदमी को अगर समझदारी से गुदगुदाया जाए तो उसे भी हँसी आ जाएगी। भारत की करोड़ों जनता इस गुदगुदी की शिकार है”। यह उपन्यास 1979 का है। आज अड़तालीस वर्षों के बाद इस भूमंडलीकृत, उपभोक्तावादी और ‘इंफ़ोटेंमेंट’ की त्रासदीपूर्ण दुनिया में इससे ज़्यादा समझदार, प्रतिरोध-धर्मी और लयभरी पंक्ति भला क्या हो सकती है? पूरे देश का सच इन दो पंक्तियों में खुलकर सामने आ जाता है।

विनोद कुमार शुक्ल आम नागरिक की औसत मान ली गई ज़िंदगी का सौंदर्यशास्त्र गढ़ने वाले लेखक थे। साहित्य अकादेमी से सम्मानित उनका उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ तो इस दिशा में मॉडर्न क्लासिक की उपाधि ले चुका है। जहाँ छतीसगढ़ के सुदूर क़स्बे का एक स्कूल मास्टर रघुवर प्रसाद और उसकी पत्नी सोनसी को जब हिंदी जगत ने पहली बार देखा तो अचरज से भर गए। कहीं कोई ‘विलेन’ ही नहीं था इस उपन्यास में और न किसी तरह का सामाजिक संघर्ष था। विनोद कुमार शुक्ल ने रघुवर के माध्यम से दुनिया को समझाया कि फूल के खिलने से भले क़साईख़ाने बंद नहीं पड़ते पर फूल का खिलना ही अपने आप में विद्रूपताओं का प्रतिरोध रचता है। मनुष्य की सहज गति में ही सुंदरता के राज़ छिपे हैं, यह ‘थीम’ इस उपन्यास के मूल में है। भागमभाग की दुनिया ने हमसे हमारा ‘आज’ हर लिया है। विनोद कुमार शुक्ल बार-बार ‘आज’ पर बल देते हैं। यह उपन्यास शुरू ही होता है—“आज की सुबह थी” से। सूरज, चाँद, सितारे, दिन, रात, पशु-पक्षी तक ‘आज’ की निगाह से देखते थे वह, यहाँ तक कि “खिड़की से जो पेड़ दिख रहे थे, वे आज के पेड़ दिख रहे थे। आम के पेड़ों के बीच वही पुराना नीम का पेड़ आज का पेड़ था”। सोनसी भी जब रघुवर प्रसाद को देखती है तब “हर बार देखने में उसे छूटा हुआ नया दिखता... देखने में इतना ही मालूम होता होगा कि यह (पहले) नहीं देखा था”। प्रतिदिन के रूप में हर दिन अटका था उनके यहाँ “वर्तमान का सुख इतना था कि भविष्य आगे उपेक्षित-सा रस्ते में पड़ा रहता, जब तक वहाँ पहुँचो तो लगता ख़ुद बेचारा रस्ते से हटकर और आगे चला गया”, इस दुनिया को वह व्यक्ति बिल्कुल ही नहीं देख सकता है जो जल्दी के चक्कर में हो। इसी चक्कर में हिंदी के कई मार्क्सवादी आलोचक लंबे समय तक इस उपन्यास की तारीफ़ करने से बचते रहे।

वैसे तीखी आलोचना का शिकार तो उनकी कविताएँ भी रहीं, विशेषकर विनोद कुमार शुक्ल द्वारा कविताओं में प्रयोग किए बिम्ब, रूपक का प्रतीक। पर विनोद कुमार शुक्ल यहाँ भी बिना किसी की परवाह किए रचते चले गए और दस काव्य-संग्रह पर जाकर रुके। ‘लगभग जय हिन्द’ उनका पहला काव्य-संग्रह था जो 1971 में आया था और वहीं से विनोद कुमार शुक्ल की कविता ने अपनी तरह की छलांग लगानी शुरू की। तब हिंदी की ज़्यादातर कविताएँ बड़बोलेपन की शिकार थी और ऐसे में विनोद कुमार शुक्ल मितभाषी और लयात्मकता कविताओं के साथ आए जिनमें बेहद औसत हरकतों का आदमी अपने मामूली इरादों के साथ बताता है—

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।

आख़िरी दिनों में वह बच्चों के लिए भी कविताएँ और कहानियाँ लिखने लगे थे। उनका अंतिम काव्य-संग्रह—‘केवल जड़े हैं’ 2023 के आस-पास आया था और जिनमें साठ के दशक की ही उनकी लिखी कविताएँ थी। इन कविताओं का समय-चक्र कलेंडर के अनुशासन से नहीं बल्कि सभ्यता की धीमी गति में पैदा हुए विमर्शों का आख्यान रचती हैं। चूँकि विश्वभर में कविताओं का इतिहास दो-ढाई हज़ार वर्षों से भी पीछे का है, इसलिए कविताओं ने, विशेषकर भारतीय कविताओं ने अभिव्यक्ति के कई गहरे कौशल ईजाद कर लिए हैं। हिंदी भी इसमें पीछे नहीं। विनोद कुमार शुक्ल ‘डाइरेक्ट स्पीच’ के कवि नहीं रहे कभी। मसलन ‘घर’ को लेकर वह लिखते हैं—

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।

यहाँ मिलने की उत्कंठा देखिए। असंभव को संभव बनाती हुई शुभ-इच्छाएँ पसरी पड़ी हैं। विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ अर्थ की परतों के बीच ही खुलती हैं, पर यह अनेकार्थता (एंबुईग्वीटि) नहीं है, बल्कि अर्थ के पीछे की अंतरध्वनियों की सिम्फ़नी में खुलती हैं।

पिछले कुछ वर्षों में विनोद कुमार शुक्ल और हिंदी के प्रकाशकों का भी विवाद सबके सामने आया, जहाँ लेखकों की हक़मारी का मुद्दा भी विनोद कुमार शुक्ल के बहाने ही गरम हुआ था। इसी बीच सोशल-मीडिया में विनोद कुमार शुक्ल को लेकर कुछ साहित्यकारों ने आक्षेप भी किया कि विनोद कुमार शुक्ल ने कभी भी समकालीन राजनीति और समकालीन सामाजिक मुद्दों को लेकर कोई यादगार हस्तक्षेप नहीं किया। उत्साही लोग कई बार भूल जाते हैं कि एक लोकतांत्रिक समाज में कवि बंदूक़ लेकर नहीं चल सकता, वह शब्द लेकर चलेगा और सही जगह चोट भी करेगा। हमारे समय के भारत का एक नक़्शा विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में कुछ ऐसे उभरता है—

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं
और पूरा आकाश देख लेते हैं
सबके हिस्से का आकाश
पूरा आकाश है।
अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं
और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं
सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।
अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं
वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ
अख़बार पढ़ रहा है
और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है।
सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।
अपने हिस्से की भूख के साथ
सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात
बाज़ार में जो दिख रही है
तंदूर में बनती हुई रोटी
सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।
जो सबकी घड़ी में बज रहा है
वह सबके हिस्से का समय नहीं है।
इस समय।

•••

यह आलेख मूल रूप से Outlook में अँग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित हुआ था। उपरोक्त गद्य उसी आलेख का हिंदी अनुवाद—स्वयं लेखक द्वारा किया गया—है।

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