
वेद और लोक, इन दोनों के बीच संवाद के द्वारा भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है। कभी तनाव भी रहा है, द्वन्द भी रहा है लेकिन चाहे वह द्वन्द हो, चाहे वह तनाव हो—इन सबके साथ बराबर एक संवाद बना रहा हैं।

जब मनुष्य अपने अंदर युद्ध करने लगता है तब वह अवश्य ही किसी योग्य होता है।


ताक़त के विरुद्ध मनुष्य का संघर्ष भूलने के विरुद्ध स्मृति का संघर्ष है।

संघर्ष में हार की कल्पना हमेशा होनी चाहिए। इसलिए अपने हार के उत्तराधिकार की तैयारी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितनी अपनी विजय।

संघर्ष पहाड़ की चोटियों पर नहीं, लोगों के दिलों और दिमाग़ों में शुरू और ख़त्म होता है।

हमें जिस पाप ने घेर रखा है, वह हमारा मतभेद नहीं बल्कि हमारा ओछापन है। हम शब्दों पर झगड़ा करते हैं। कई बार तो हम परछाई के लिए लड़ते हैं और मूल वस्तु को खो बैठते हैं।

आनंदमय आत्मा की उपलब्धि विकल्पात्मक विचारों और तर्कों से नहीं हो सकती।

कार्य-क्षेत्र में स्वार्थों की संघर्षस्थली में महान् आदर्शों की रक्षा करना कठिन काम है।

सभी शास्त्रों का विरोध करने वाली प्रतिज्ञा सर्वागमविरोधिनी प्रतिज्ञा कहलाती है। यथा, शरीर पवित्र है, प्रमाण तीन हैं अथवा प्रमाण हैं ही नहीं।
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अपने ही सिद्धांत का विरोध करने वाली प्रतिज्ञा—सिद्धांत विरोधिनी प्रतिज्ञा कहलाती है। यथा, कणाद-ऋषि कहें कि शब्द अविनश्वर (नित्य) है।
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जो मन पूर्वाग्रह तथा द्वंद्व से मुक्त है वही देख सकता है कि सत्य क्या है।

अहिंसा श्रद्धा और अनुभव की वस्तु है, एक सीमा से आगे तर्क की चीज़ वह नहीं है।

साहित्य एवं समाज का एक शाश्वत द्वंद्व होता है, जो किसी भी युग के लिए सत्य उतरता है।

भौतिकवादी द्वंद्ववाद के दृष्टिकोण के अनुसार, प्रकृति में परिवर्तनों का मुख्य कारण प्रकृति में मौजूद आंतरिक अंतर्विरोधों का विकास होता है।

द्वंद्व वस्तुतः ऊर्जा का अपव्यय है।

जो चीज़ वास्तविक परिवर्तनों में निहित एकरूपता को वैज्ञानिक ढंग से प्रतिबिंबित करती है, वही मार्क्सवादी द्वंद्ववाद है।
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