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बेईमानी पर उद्धरण

बेईमानी इतनी पुरानी बात हो गई है कि अब कोई बेईमानी की बात करे, तो लगता है बड़ा पिछड़ा हुआ आदमी है।

हरिशंकर परसाई

विज्ञापनों द्वारा की गई दुनिया की व्याख्या और वास्तविक दुनिया में बहुत विरोध है।

जॉन बर्जर

ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है, सब माया है—यह शंकराचार्य सिखाते हैं, पर सोने के सिंहासन पर बैठते हैं और सोने के कमंडल से पानी पीते हैं।

हरिशंकर परसाई

हर तरह के चोर कर्म—घूस, कालाबाज़ारी, मुनाफ़ाख़ोरी, राजनैतिक बेईमानी, पाखँड—सबकी साधना धर्म की मदद से होती है

हरिशंकर परसाई

डॉक्टर कैंसर के रोगी को बताए कि उसे कैंसर है, तो वह स्वस्थ मानसिकता का है। पर अगर कैंसर के रोगी को डॉक्टर राग जयजयवन्ती सुनवाने लगे, तो डॉक्टर ज़रूर मानसिक रोग से ग्रस्त है। मैं जानता हूँ, कई लेखक इस देश में कैंसर से बीमार समाज को राग जयजयवन्ती सुनाते हैं।

हरिशंकर परसाई

इनकमटैक्स-विभाग के ईमानदार और शिक्षा-विभाग के ईमानदार में फ़र्क़ होता है—वैसे ईमानदार दोनों है।

हरिशंकर परसाई

चरित्रवान और चरित्रहीन में कुल इतना फ़र्क़ है—एक पकड़ा नहीं जाता और दूसरा पकड़ा जाता है। जिसकी दबी है, वह चरित्रवान और जिसकी खुल गई वह चरित्रहीन।

हरिशंकर परसाई

रोटी खाने से ही कोई मोटा नहीं होता, चंदा या घूस खाने से भी होता है। बेईमानी के पैसे में ही पौष्टिक तत्त्व बचे हैं।

हरिशंकर परसाई

जनता अच्छी तरह जानती है कि नेता भावनाओं के व्यापारी होते हैं, फिर भी उनकी बातों में जाती है।

कृष्ण कुमार

चोरी के माल के साथ पकड़ा हुआ चोर अब कह ही क्या सकता है?

कालिदास

चालबाज़ी का एक तरीक़ा, व्यक्तियों में निजी सफलता की पूंजीवादी भूख पैदा करना है। यह चालबाज़ी कभी सीधे-सीधे अभिजनों द्वारा की जाती है, तो कभी परोक्ष रूप से अंधलोकवादी (पॉपुलिस्ट) नेताओं द्वारा कराई जाती है।

पॉलो फ़्रेरा

जो लोग दोनों आँखें खोले हुए देखते हैं, लेकिन वास्तव में देख नहीं पाते, उन्हीं के कारण सारी गड़बड़ी है। वे आप भी ठगे जाते हैं और दूसरों को भी ठगने से बाज़ नहीं आते।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

इस दुनिया में उतने ही नकली और क्षुद्र गुरु हैं, जितने आसमान में तारे हैं।

शम्स तबरेज़ी

जब हम कविता की तीव्रता और ताज़गी लेते हैं और उस भावना को बनाए नहीं रख पाते, तो हम रूढ़ि अपना लेते हैं और उस भावना को खोखली श्रद्धांजलि अर्पित करने लगते हैं, जो किसी समय थी।

राजेंद्र माथुर

धर्म, उपकार और दया की पाखंड-महिमा अपार है। सुबह नियम से मछलियों को दाना खिलाते हैं और रात को ‘फ़िश करी’ खाते हैं।

हरिशंकर परसाई

'भारतीय बनिया संस्कृति' एक अलग ही संस्कृति है। इस संस्कृति का लक्षण है कि किसी भी मामले में आदमी के मन में पहिले यह विचार आता है कि मैं इसमें कहाँ बेईमानी कर सकता हूँ।

हरिशंकर परसाई

गाँधीजी की समाधि पर अपने आपको देश के लिए समर्पित करने की शपथ लें, और लौटकर देश को अपने लिए समर्पित करा लें, तो भी गाँधीवाद निभ जाता है। हरिजन की ज़मीन छीन लें, उसे कुएँ से पानी भरने दें, मगर उसे मंदिर में प्रवेश कर लेने दें, तो भी गाँधीवाद का पालन हो जाता है।

हरिशंकर परसाई

लेक्चर का मज़ा तो तब है जब सुननेवाले भी समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलनेवाला भी समझे कि मैं बकवास कर रहा हूँ। पर कुछ लेक्चर देनेवाले इतनी गंभीरता से चलते कि सुननेवाले को कभी-कभी लगता था यह आदमी अपने कथन के प्रति सचमुच ही ईमानदार है।

श्रीलाल शुक्ल

बुद्धि, कौशल, सभी का नियोजन जब से द्रोण ने एकलव्य का अँगूठा कटवाया, तब से शुरू हुआ।

दुर्गा भागवत

भूगर्भशास्त्री पत्थरों का, धातुओं का, पानी का पता लगाते हैं, मगर यह खोज नहीं कर पाते कि इस देश का ईमान कहाँ कितनी परतों के नीचे दफ़न है।

हरिशंकर परसाई

पैसा खाने वाला सबसे डरता है। जो सरकारी कर्मचारी जितना नम्र होता है, वह उतने ही पैसे खाता है।

हरिशंकर परसाई

कहना कुछ और, करना कुछ और अर्थात् अपने ही शब्दों को गंभीरता से लेना—दूसरों को आप पर भरोसा करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता।

पॉलो फ़्रेरा

पहिले जो विद्या; पंडितों के चित्त के क्लेश को दूर करने के निमित्त थी, कुछ दिन परे वही विद्या विषयी लोगों के विषयमुख सिद्ध करने के लिए हो गई।

भर्तृहरि

आज विकसित देशों में क्या काम्य है और क्या काम्य नहीं है, इसके झूठे मानक थोपकर इसे हासिल किया जा रहा है।

जॉन बर्जर
  • संबंधित विषय : देश

मानववाद पर भाषण देना और मनुष्य का निषेध करना, एक झूठ है।

पॉलो फ़्रेरा

आस्था का बाहरी दिखावा जल्दी ही ख़त्म हो जाता है।

शम्स तबरेज़ी

मैं स्वयं यदि कोई झूठ कहूँ तो उससे जो पाप होता है, उतना ही पाप तब भी होता है; जब मैं दूसरे को झूठ कहने में लगाता हूँ, अथवा दूसरे की किसी झूठ बात का अनुमोदन करता हूँ।

स्वामी विवेकानन्द
  • संबंधित विषय : झूठ

खाने में लोभ करने वाला कुत्ते के समान, मिथ्या बोलने वाला भंगी, छल-कपट से दूसरे को खाने वाला शव-भक्षक होता है

गुरु नानक

पंडित का ये हाल है कि परमात्मा के भजन तो गाता है, परंतु स्वयं ज्ञान से हीन है। भजन गायन को वह रोज़ी-रोटी का साधन बनाए रखता है, समझ ऊँची नहीं हो सकी।

गुरु नानक