गुरु पर उद्धरण
मध्यकालीन काव्य में
गुरु की महिमा की समृद्ध चर्चा मिलती है। प्रस्तुत संचयन में गुरु-संबंधी काव्य-रूपों और आधुनिक संदर्भ में शिक्षक-संबंधी कविताओं का संग्रह किया गया है।
श्री गोपालकृष्ण गोखले का नाम मेरे लिए एक पवित्र नाम है। वह मेरे राजनीतिक गुरु हैं।
जो जीव अपने पक्ष को छोड़कर सद्गुरु के चरण में समर्पित होता है, वह जीव निज शुद्धात्मा के आश्रय से परमपद को पाता हैं।
जिस समाज में धन के साथ पाप का समझौता ही प्रतिष्ठा का कारण है, वहाँ समाज का गुरु अवहेलना का पात्र हो, यह आश्चर्य की बात तो नहीं है—दु:ख की अवश्य है। और वह इस देश के दुर्भाग्य पर है, जो एक बार किसी समय अपने ज्ञान के आलोक से संसार को चकाचौंध करके, अब धीरे-धीरे अंधकार ही पसंद करता जा रहा है।
रुखाई अच्छी शिक्षक है, पर यह बहुत रूखी होती है।
किसी मूर्त आदर्श में; जिनकी कर्ममय अटूट आसक्ति ने समय या सीमा को अतिक्रम कर, उन्हें सहज भाव से भगवान बना दिया है, जिनके काव्य, दर्शन एवं विज्ञान मन के भले-बुरे विच्छिन्न संस्कारों को भेद कर; उस आदर्श में ही सार्थक हो उठे हैं—वे ही हैं सद्गुरु।
आत्मभ्रांति के समान कोई रोग नहीं है। सद्गुरु के समान कोई वैद्य नहीं है। सद्गुरु की आज्ञा के समान कोई उपचार नहीं हैं। विचार और ध्यान के समान कोई औषधि नहीं है।
गुरु के उपदेश से तो मंदबुद्धि व्यक्ति भी शास्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन काव्य तो किसी प्रतिभाशाली को कभी-कभी ही (सदा-सर्वदा नहीं) स्फुरित होता है।
यदि गुरु (बड़ा) भी घमंड में आकर कर्त्तव्याकर्त्तव्य का ज्ञान खो बैठे और कुमार्ग पर चलने लगे तो उसे भी दंड देना आवश्यक हो जाता है।
श्री वीतरागी भगवान ने ऐसा जो विनय का मार्ग कहा है, उस मार्ग के मूल आशय को कुछ ही सौभाग्यशाली जीव समझते हैं। यदि असद्गुरु उस विनय का दुरुपयोग करे, तो महामोहनीय कर्म के फल में भवसागर में डूबता है।
एक गुरु का संसार में कार्य है—मानवजाति के दुःख कम करना। चाहे वह आध्यात्मिक उपायों से हो या बौद्धिक उपदेशों से, या इच्छाशक्ति के द्वारा हो या उनके रोगों को अपने ऊपर लेने के द्वारा हो।
इस दुनिया में उतने ही नकली और क्षुद्र गुरु हैं, जितने आसमान में तारे हैं।
हर गुरु का यह दुर्भाग्य है कि उसके सच्चे चेले बनने वाले बंदर, उसकी लँगोटी उड़ाकर उसे नंगा कर देते हैं।
गुरु में पहले तो यह देखना चाहिए कि वे शास्त्रों के मर्म को जानते हों। सारा संसार बाइबिल, वेद, कुरान आदि धर्मशास्त्रों को पढ़ा करता है, पर ये सब तो केवल शब्दसमूह, व्याकरण के नियमसूत्रों द्वारा संगठित वाक्यरचना, शब्दरचना और शब्दशास्त्र ही हैं। ये तो धर्म की सूखी, नीरस अस्थियाँ मात्र है।
आध्यात्मिक नियम यह अनिवार्य नहीं बनाता कि कोई गुरु या सिद्ध पुरुष; जब-जब दूसरे किसी मनुष्य को रोगमुक्त करें, तो वह स्वयं बीमार हो जाएँ।
जो शिष्य होकर भी शिष्योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहने वाले गुरु को उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिए।
एक सच्चा और आध्यात्मिक गुरु कभी नहीं चाहेगा कि आप ख़ुद को महिमामंडित करें या सम्मान दें। बल्कि, वह आपको ख़ुद को पसंद करने और ख़ुद का सम्मान करने की सलाह देगा। वे कांच की तरह पारदर्शी होते हैं। वे ईश्वर के प्रकाश को अपने से होकर गुज़रने देते हैं।
बड़ा भाई, पिता तथा जो विद्या देता है, वह गुरु—ये तीनों धर्म-मार्ग पर स्थित रहने वाले पुरुषों के लिए पिता के तुल्य माननीय हैं।
शक्तिशाली और आत्म-धर्मी लोगों को बिना सोचे-समझे कभी गुरु नहीं बनाना चाहिए।
बंधुओं तथा मित्रों पर नहीं, शिष्य का दोष केवल उसके गुरु पर आ पड़ता है। माता-पिता का अपराध भी नहीं माना जाता क्योंकि वे तो बाल्यावस्था में ही अपने बच्चों को गुरु के हाथों में समर्पित कर देते हैं।
आँखों का काम है देखना। उनमें यह विवेक नहीं कि सुंदर-असुंदर का फ़र्क़ कर सके। उसके लिए तो सभी समान हैं। जिन भाग्यवानों को सौंदर्य को परखने की दृष्टि मिली हो, वे ही सुंदर-असुंदर का फ़र्क़ कर सकते हैं। बहुधा यह दृष्टि गुरु से मिलती है। अगर वह न हो, तो सामने सौंदर्य का पारावार हो फिर भी हमें दिखाई न देगा। आज की भाषा में कहूँ तो हमारी आँखों में भी कई चैनल होते हैं। अगर सौंदर्य का चैनल नहीं होगा, तो हम सौंदर्य को पकड़ नहीं पाएँगे। उसे देखकर भी अनदेखा कर देंगे। हमारे भीतर सोए पड़े इस सौंदर्य-बोध को प्रायः गुरु जगाते हैं।
वेद से बड़ा शास्त्र नहीं है, माता के समान गुरु नहीं है, धर्म से बड़ा लाभ नहीं है तथा उपासना से बड़ी तपस्या नहीं है।
ज्ञान की प्रथम गुरु माता है। कर्म का प्रथम गुरु पिता है। प्रेम का प्रथम गुरु स्त्री है और कर्त्तव्य का प्रथम गुरु संतान है।
स्वामी का कार्य, गुरु भक्ति, पिता के आदेश का पालन, यही विष्णु की महापूजा है।
तुम गुरु या सत् में चित्त संलग्न करके आत्मोन्नयन में यत्नवान रहो, दूसरे तुम्हारे विषय में क्या बोलते हैं, देखने जाकर आकृष्ट न हो पड़ो। ऐसा करने से आसक्त हो पड़ोगे, आत्मोन्नयन नहीं होगा।
स्कूल जाने से ही किसी को छात्र नहीं कहते, और मंत्र लेने से ही किसी को शिष्य नहीं कहते। हृदय को शिक्षक या गुरु के आदेश पालन के लिए सर्वदा उन्मुक्त रखना चाहिए।
जो मनुष्य गुरु की कृपा से परमात्मा का नाम सिमरन की विद्या प्राप्त करता है, सीखता है, वह उस विद्या को पढ़-पढ़ कर जगत में आदर हासिल करता है, नामामृत को पाकर वह अंतर्मन में प्रकाश अनुभव करता है। उसका आत्मिक जीवन रौशन हो जाता है, उसके मन से अज्ञानता का अँधेरा दूर हो जाता है। उस मनुष्य को आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल मिल जाता नाता।
गुरु इस संसार सागर से पार उतारने वाले हैं और उनका दिया हुआ ज्ञान यहाँ नौका के समान बताया गया है। उस ज्ञान को पाकर भवसागर से पार और कृतकृत्य हुआ मनुष्य (नदी को पार कर लेने पर नाव और नाविक को छोड़ने के समान) मुक्त हुआ दोनों को छोड़ दे।
सतिगुरु जीव को मुक्ति प्रदान करता है और परमात्मा के ध्यान में लगाता है। इस प्रकार हरिपद को जानकर जीव प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।
केवल कान में मंत्र देना गुरु का काम नहीं है।"संकट से रक्षा करना" शिष्य के कर्म को गति देना भी गुरु का काम है।
सद्गुरु के शरणापन्न होओ, सत्-नाम मनन करो, और सत्संग का आश्रय ग्रहण करो—मैं निश्चय कहता हूँ, तुम्हें अपने उन्नयन के लिए सोचना नहीं पड़ेगा।
आप इस चराचर जगत् के पिता और गुरु से भी बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अप्रतिम प्रभाव! तीनों लोकों में आप के समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक श्रेष्ठ कैसे होगा?
भले-बुरे का विचार कर विध्वस्त होने के बजाए, सत् में (गुरु में) आकृष्ट रहो—निर्विघ्न रूप से सफल होगे निश्चय ही।
अहम् भाव दूर करके गुरु के दर पर जाएँ तो ही हृदय को पवित्र करने की सूझ मिलती है।
गुरु होना मत चाहो, गुरुमुख होने की चेष्टा करो—गुरुमुख ही होते हैं जीव के प्रकृत उद्धारकर्त्ता।
वही मनुष्य पापों के अँधेरे को पार कर पाता है, जिसने अपनी बुद्धि गुरु को सौंप दी हो।
पूरे गुरु से नाम प्राप्त होता है, योग-मुक्ति है यही कि सत्य में लीन रहो।
जभी देखोगे; गुरु के आदेश से शिष्य को आनंद हुआ है, मुख प्रफुल्लित हो उठा है, तभी समझोगे कि उसके हृदय में शक्ति आई है।
शिष्य का कर्त्तव्य है—प्राणपण से गुरु के आदेश को कार्य में परिणत करना, गुरु को लक्ष्य करके चलना।
जहाँ सुपात्र जीव को प्रत्यक्ष सद्गुरु का सानिध्य प्राप्त न हो, वहाँ आत्मादि अस्तित्व के निरुपक शास्त्र आधारभूत हैं।
गुरु में हम पूर्णता की कल्पना करते हैं। अपूर्ण मनुष्यों को गुरु बना कर हम अनेक भूलों के शिकार बन जाते हैं।
गौरव में उपाध्याय दस आचार्यों से बड़ा, पिता दस उपाध्यायों से बड़ा और माता दस पिताओं से बड़ी है। माता अपने गौरव से सभी पृथ्वी को भी तिरस्कृत कर देती है। अतः माता के समान कोई दूसरा गुरु नहीं है।
तीक्ष्ण प्रतिभा गुरु के उपदेश की प्रतीक्षा नहीं करती है और पीड़ा समय की प्रतीक्षा नहीं करती है।
जिस छात्र या शिष्य ने प्राणपण से आनंद सहित गुरु का आदेश पालन किया है, वह कभी भी विफल नहीं हुआ।
हे भारत! यदि किसी गुरुजन को 'तू' कह दिया जाए तो यह उसका वध ही हो जाता है।
गुर के शब्द द्वारा जो मन मर कर जीवे, उसे मिलेगा मोक्ष-द्वार।
गुरु का उपदेश निर्मल होने पर भी असाधु पुरुष के कान में जाने पर उसी प्रकार दर्द उत्पन्न करता है जैसे जल।
सद्गुरु की परीक्षा करने के लिए उनके निकट संकीर्ण-संस्कारविहीन होकर, प्रेमभरा हृदय लेकर, दीन एवं जहाँ तक संभव हो, निरहंकार होकर जाने से उनकी दया से कोई संतुष्ट हो सकता है।
जिस मनुष्य पर प्रभु की कृपा दृष्टि होती है, उस मनुष्य को गुरु द्वारा दिन-रात प्रभु-नाम लाभ मिलता रहता है।
सद्गुरु के आदेश पालन के समान दूसरा मंत्र क्या है?