
युग का धर्म यही है दूसरे को दी गई पीड़ा उलटकर अपने आप पर पड़ती है।

आविष्कार से एक क्षण में इतना विनाश हो जाता है जिसके पुनर्निर्माण में सारा युग लगता है।

खन्ता और कुदाल से मनुष्य अनेक तरह की रेखाएँ खोदता गया। युगों के बाद युग बीत गए किंतु रूप के साथ वे सब रेखाएँ एक नहीं हो सकीं, यद्यपि रूप की देह के साथ-साथ बनी रहीं, किंतु उससे मिल नहीं पाईं।

काल की कसौटी पर खरी उतरकर कई वस्तुएँ सुंदर के रूप में प्रशंसा पाती रहती हैं, कई वस्तुएँ इस कसौटी पर आज भी खरी न उतरने के कारण असुंदर ही बनी रह गई हैं।

काल की छवि, मूर्ति, कविता वह धारणतीत काल के सारे रहस्य को वहन करती है।

नए युग को अत्यंत संक्षेप में बताना हो तो कहेंगे यह युग मानवता का युग है।

एक सभ्यता के एक भाव की परिक्रमा और आंदोलन बहुत से देशों, बहुत-सी जातियों में युगों तक होता रहा है।