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भ्रांति पर उद्धरण

जब मन आलस्य और भीरुतावश सच-झूठ, भला-बुरा सबको बिना प्रश्न मान लेता है, तभी से मनुष्यत्व की सर्वांगीण दुर्गति आरंभ हो जाती है।

रवींद्रनाथ टैगोर

पुरुष स्वचालित रूप से अंतरंगता और स्वतंत्रता की आवश्यकताओं के बीच झूलते रहते हैं।

जॉन ग्रे

जब तक मनुष्य प्रकृति की जिन द्वंदात्मक भ्रांतियों में उलझा रहता है, तब तक छल-कपटी माया ही उसकी आराध्य देवी होती है और वह एकमात्र सच्चे ईश्वर को नहीं जान सकता।

परमहंस योगानंद

जब तक इस संसार से पाप बिल्कुल ही मिटा दिया जाएगा, जब तक मनुष्य का मन पत्थर बन जाएगा, तब तक इस पृथ्वी में अन्याय-मूल भ्रांति होती ही रहेगी और उसे क्षमा करके प्रश्रय भी देना ही पड़ेगा।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय