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भ्रांति पर बेला

02 अप्रैल 2026

गद्य होती कविता, थकता हुआ कवि

गद्य होती कविता, थकता हुआ कवि

जिस दौरान नवंबर बीत रहा था, उसी दौरान घर में एक नया जीवन उतर रहा था। मेरा मन हर घड़ी लगभग बैठा जाता था। लगभग घंटे दो घंटे बाद लगता—अब निकले प्राण कि तब निकले, लेकिन निकले अभी तक नहीं। अब यह कहने की को