रविवासरीय 4.0 : कविता और उसके संपादक
अविनाश मिश्र
17 मई 2026
• एक बार की बात है : ‘कथानक’ नामधारी एक पत्रिका ने अपना कविता-विशेषांक घोषित किया।
कविता-विशेषांक निकालना संसार की सारी भाषाओं में एक दुष्कर कार्य है, क्योंकि इसके लिए कवियों से संपर्क करना पड़ता है। इस पर संपादक अगर कवि न हो, तब यह कार्य और ज़्यादा दुष्कर हो जाता है।
‘कथानक’ के संपादक एक कथाकार हैं; इसके बावजूद ऊपर व्यक्त तथ्य कविताविशेषांकविषयक उनका उत्साह भंग न कर सके और उन्होंने जैसे और कवियों से किया होगा, मुझसे भी संपर्क किया।
उन्होंने कहा कि आपकी दो अप्रकाशित कविताएँ चाहिए।
मैंने कहा कि मेरे पास एक भी नहीं है।
इस पर वह बोले कि आपके बग़ैर कोई कविता-विशेषांक संभव ही नहीं है...
इस प्रकार की प्रशंसाओं में सचाई हो न हो, लेकिन ये अच्छी लगती हैं और प्रशंसक को कुछ भी दे देने का भाव एक अभाव में आकार लेने लगता है। यहाँ फ़िलहाल एक कविता संभव करनी थी। मैंने की :
जब आपकी राय पूछी जाए
जब आपकी राय पूछी जाए
तब आप एक अमूर्तन से काम लें
इस अमूर्तन में आपकी बेरंग प्रतिबद्धता
और अंधी युयुत्सा नज़र आए
जब आपकी राय पूछी जाए
जहाँ तक मुमकिन हो
ढुलमुल उद्धरण याद कर लें
संस्मरणों में घालमेल से काम लें
आपका अनुभव ख़ुद को अकेला पाए
जब आपकी राय पूछी जाए
कुछ ऐसा करें कि आप पैदाइशी कमीने न लगें
यों लगे कि आप
समकालीन प्रशिक्षण की उपज हैं
बार-बार आपकी ज़रूरत पड़ती जाए
जब आपकी राय पूछी जाए
वक़्त लें ताकि शब्दों में सफ़ाई रहे
और वाक्यों में ठहराव
आवेश अगर कहीं हो तो उसे नियंत्रित रखें
आपके चेहरे पर आपका डर न नज़र आए
जब आपकी राय पूछी जाए
यह कविता मैंने संपादक को प्रेषित की, उन्हें मिली, उन्होंने पढ़ी और पुन: मुझसे संपर्क किया।
वह बोले कि हम आभारी हैं! यह कविता विशेषांक में ले रहे हैं... पर एक अनुरोध है : इसमें एक सुधार करना है और वह आप ही करेंगे।
इस पर मैंने कहा कि मैं कविताएँ पर्याप्त सुधार कर लिखता हूँ, फिर भी कहें...
उन्होंने कहा कि इस कविता में ‘कमीने’ शब्द की जगह कुछ और कर दीजिए।
मैं कमीने की जगह कमीने से बुरे [माताओं-बहनों से जुड़ी अश्लील गालियाँ छोड़कर] जो भी शब्द रख सकता था, वह सब एक साँस में उन्हें कहता गया। वह इससे कुछ आहत हुए, [संभवतः अपमानित भी] और बोले आप समझे नहीं...
इस पर मैंने कहा कि आप कविता-विशेषांक निकालने के योग्य नहीं हैं, लेकिन आप मानेंगे नहीं और निकालेंगे ही; क्योंकि जब सब ही इस वक़्त अपनी-अपनी अयोग्यता के साथ जहाँ-तहाँ पिले पड़े हैं, तब भला आपको रोकने का किसे अधिकार है?
बहरहाल, कमीने-कमीनों-कमीनगी से मुक्त ‘कथानक’ का वह कविता-विशेषांक कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ... और मेरी यहाँ प्रस्तुत कविता इस विशेषांक के प्रकाशन से कुछ माह पूर्व ‘समालोचन’ और ‘पूर्वग्रह’ के कविता-विशेषांक में और इसके बाद मेरे कविता-संग्रह ‘वक़्त ज़रूरत’ [राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण : सितंबर 2024] में आई।
• ‘आलोचना’ पत्रिका के तीन कविता-विशेषांक इधर बीच प्रकाशित हुए हैं। ‘आलोचना’ के पहले दो और अब तीन संपादकों में कोई भी कवि नहीं है और न ही कविता की कोई विशेष समझ रखता है। पर जैसा कि यहाँ ऊपर कहा जा चुका है कि जब सब ही इस वक़्त अपनी-अपनी अयोग्यता के साथ जहाँ-तहाँ पिले पड़े हैं, तब भला...
• संपादक अगर कवि न हो तब उसका अहंकार खजूर छूता रहता है, जबकि आसमान से गिरना तो दूर उसने आसमान देखा भी नहीं होता। इस सिलसिले में ‘आलोचना’ के एक संपादक संजीव कुमार ने फ़ेसबुक पर ‘आलोचना’ के कविता-विशेषांकों में प्रकाशित कवियों के लिए अपमानजनक और अपने लिए हास्यप्रद एक टिप्पणी [23 अप्रैल 2026] की, पढ़िए :
“कोई डेढ़ साल पहले की बात है, ‘आलोचना’ के लिए कविताएँ बहुत सारी इकट्ठा हो गई थीं। तो पत्रिका की एक बैठक में यह सुझाव आया कि क्यों न इन कविताओं से एक विशेषांक बना दिया जाए। इन्हें बारी-बारी ‘आलोचना’ में जगह देने पर तो सालों गुज़र जाते!
आशुतोष [कुमार] राज़ी हुए, पर उनका गुणवत्ता-प्रेमी दिमाग़ दो बिंदुओं के बीच की न्यूनतम दूरी तय करना नहीं जानता। उन्होंने साथ में यह जोड़ दिया कि इन कवियों से वक्तव्य मँगा लेते हैं, विशेषांक में थोड़ी और जान आ जाएगी।
जान लाने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से उन्हें सौंप दी गई। धीरे-धीरे कुछ छूटे हुए कवियों को भी शामिल कर लेने का विचार बना, और इस तरह बात बढ़ती हुई एक से दो और दो से तीन जिल्दों तक चली गई। आशुतोष मनोयोगपूर्वक अपनी मंद तथापि अनवरत चाल में इस काम को पूरा करते रहे।
ताज़ा ख़बर ये है कि चौथी जिल्द भी तैयार हुआ ही चाहती है। इसलिए मित्रगण इन तीन जिल्दों के आधार पर दाख़िल-ख़ारिज की सूची न बनाएँ!”
यह टिप्पणी समग्रतः न सही, लेकिन अंशतः असत्यकथा पर आधारित है। मैं ‘आलोचना’ के तीन में से एक नंबर के कविता-विशेषांक में शामिल एक कवि के रूप में यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैंने अपनी कविताएँ कभी ‘आलोचना’ के लिए स्वयं से नहीं भेजीं, इसलिए कम से कम वे बहुत सारी इकट्ठा हो गई कविताओं में से नहीं थीं। मुझसे इस विशेषांक के लिए कविताएँ माँगी गई थीं—डेढ़ नहीं, लगभग ढाई साल पहले। वे माँगने के बहुत समय बाद प्रकाशित हुईं, क्योंकि शायद इस विशेषांक के लिए और कवियों की कविताएँ इकट्ठा होने का इंतिज़ार किया जा रहा होगा।
यहाँ उद्धृत टिप्पणी का दूसरा अनुच्छेद देखें तो मैं कहना चाहता हूँ कि आशुतोष कुमार का दिमाग़ क़तई गुणवत्ता-प्रेमी नहीं है, क्योंकि उनमें गुणवत्ता की कोई समझ ही नहीं है। वह हिंदी में बुरी कविताओं के सबसे बेहतर प्रसारक हैं।
अब इस टिप्पणी के तीसरे अनुच्छेद और उसके भी असत्यांश पर आते हैं, जिसमें मनोयोग की बात की गई है। यहाँ प्रश्न यह है कि जब आप सारा का सारा इकट्ठा और आया हुआ माल छापकर ही ‘आलोचना’ के पेड़ काटकर बनाए गए पन्ने बर्बाद कर रहे हैं, तब इसमें मनोयोग कैसा! न कोई योजना, न कोई दृष्टि, न कोई चयनबोध, न कोई सौंदर्य... मुझे यक़ीन है कि ‘आलोचना’ के दोनों आलोचक-संपादकों ने ‘पहल’ और ‘उद्भावना’ के वे कविता-विशेषांक नहीं देखे-पढ़े हैं, जो इस दिशा में हिंदी में मानक सदृश हैं। अगर देखे-पढ़े हैं; तब तो यह गति और भी चिंतादायी है, क्योंकि दृश्य मानकों से आगे के मानक स्थापित करने से ही सशक्त बनता है; जब संसाधनों का कोई अभाव नहीं, तब मानकों से नीचे का काम क्यों!?
अब इस टिप्पणी के चौथे अनुच्छेद को भी देखें तो इस तरफ़ सब कुछ और भयावह लगेगा। इसे पढ़कर लगेगा कि ‘आलोचना’ के कविता-विशेषांक में आने से अब कोई भी कवि छूटेगा नहीं, सिवाय उनके जो आशुतोष कुमार की आलोचना करते रहे हैं। दुर्भाग्य से मैं अब इस ‘संकट’ से सुरक्षित हूँ।
आशुतोष कुमार के कुछ और अवगुण ये हैं कि वह तकनीक से डरते हैं और उसे साध नहीं पा रहे हैं। एक संपादक के रूप में वह प्रशिक्षित और अनुभवी नहीं हैं, पक्षपाती और पूर्वाग्रही हैं। इसलिए ‘आलोचना’ के कविता-विशेषांकों में कुछ ब्राह्मण कवियों के नामों और उनकी कविताओं के साथ भयानक हादसे हुए हैं। कवियों के साथ यह विशेषण यहाँ इसलिए देना पड़ रहा है, क्योंकि स्वयं आशुतोष कुमार [जाति से कायस्थ] ने इन विशेषांकों में शामिल कवियों को अपने संपादकीय में संप्रदाय, लिंग, जाति और वर्ग के आधार पर चिह्नित-रेखांकित किया है।
आशुतोष कुमार का एक और उल्लेखनीय अवगुण यह है कि वह वृक्षों की परवाह नहीं करते हैं, लेखक संगठन की करते हैं; यह भूलकर कि जलेसियों-जसमियों के पक्ष में, जलेसियों-जसमियों के कमेंट्स कोई अर्थ नहीं रखते हैं।
• ‘आलोचना’ के कविता-विशेषांक पहले भी आते रहे हैं, वे भी बुरे ही थे और उस प्रकार के ही मनोयोग से संचालित थे; जिसका ज़िक्र यहाँ ऊपर हुआ है, लेकिन यह कहना ही होगा कि वे इतने बुरे फिर भी नहीं थे जितने ये नए वाले हैं।
यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि ‘आलोचना’ पत्रिका कविता की पत्रिका कहीं से भी नहीं है; अगर वह एक भी कविता कभी प्रकाशित न करे तो उससे कोई प्रश्न नहीं करेगा, लेकिन ज़रा सोचिए अगर उसके तीन-चार अंक दो-तीन आलोचकों द्वारा संपादित होने के बावजूद आलोचनात्मक आलेखों से हीन होकर गुज़र जाएँ और यह गुज़रना लगभग नब्बे प्रतिशत मामूली और मामूलीतरीन कविता की शर्त पर हो! यह सब तब जब अब यह एकदम स्पष्ट है कि इस दौर में प्रिंट पत्रिकाओं के कविता-विशेषांक निकालना एक मूढ़तायुक्त प्रयत्न है।
• संपादक होने के लिए एक उम्र वाक्यभक्ति में गुज़ारनी पड़ती है। यह इतना सहज नहीं है, जितना आजकल समझा जा रहा है। संपादन सेवानिवृत्ति के बाद का या अन्य सेवाओं के समानांतर चलने वाला शुग़्ल नहीं है। गए दिनों तीन हो रहे कवियों ने अपनी कविताएँ एक ऑनलाइन प्रकाशन-स्थल से यह कहकर हटवाईं कि इस उपक्रम के संपादक ने हमारे एक साथी की कविताओं-रचनाओं के साथ टेम्परिंग की है! अब ये तीन-चार जन बहुत ख़ुश-संतुष्ट हैं कि इनकी रचनाएँ अन्य नई जगहों पर बहुत करुण ढंग से, पर बग़ैर टेम्परिंग के जस की तस छप रही हैं। आजकल के ऑनलाइन संपादकों [?] का काम ही यही है, वह महज़ प्रस्तोता भर हैं और अपने जैसा सोचने-समझने वाले या अपने से सहमत दस-बारह लोगों की कथित रचनाओं का सफलतापूर्वक एक जगह ctrl+c — ctrl+v करते रहते हैं। इस प्रकार की चार पोस्ट डैशबोर्ड पर सबमिट/पब्लिश करते ही; वे सब जगह अपना परिचय बहुत गर्व-गुमान के साथ एक संपादक के रूप में देने लगते हैं, जबकि संपादन इन्होंने कभी अपनी रचनाओं तक का नहीं किया होता।
• शब्दों के क्रम को महज़ पलट देने भर से लघुकथाएँ कविताएँ नहीं बन जातीं।
• कविता दुनियादार कवियों से दूर चली जाती है। उनके संग्रह पर संग्रह आते रहते हैं, लेकिन वह उनमें कहीं नज़र नहीं आती।
• घरवालों के बिना जैसे घर लगते हैं, वैसे इन दिनों बहुत सारे कविता-संग्रह लगते हैं।
• कुछ कविताएँ संग्रह में दबकर मर जाती हैं।
कुछ और कविताएँ संग्रह से दबकर मर जाती हैं।
• गए तीन-चार वर्षों में कई हिंदी कवियों के कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। इनमें प्रथमदृष्टया दो बातें मुझे नज़र आईं—पहली : इनमें से ज़्यादातर 150 से लेकर 220 पृष्ठों के बीच हैं; दूसरी : ये ठीक-ठाक कवियों के हैं, यानी पढ़े जाने योग्य।
इस सिलसिले में मुझे क़रीब 20-25 कविता-संग्रहों से गुज़रने का मौक़ा मिला। इनमें से अधिकांश संग्रह कवियों के पहले संग्रह हैं। यह दुःखद है कि इनमें दर्ज कविताएँ एक सीमा के बाद उन्हें मिले पन्नों के साथ न्याय नहीं करती हैं। पृष्ठ संख्या : 80 तक आते-आते या उससे पहले ही प्रत्येक कवि बोल जाता है। इसके आगे वह अपठनीय और दयनीय है। एक साथी ने तो हमारे एक साथी के कविता-संग्रह के 80 पृष्ठों के बाद के पन्ने स्टेपल कर दिए।
कविता की किताब अगर कवि का प्रतिनिधि चयन या समग्र नहीं है, तब वह 100 पृष्ठों से अधिक की होने पर फूहड़ लगती है।
• कविता-संग्रह तैयार करना भी कविताएँ रचने की तरह ही एक कला है।
कलाकारों को अपने से पहले की कला देखनी चाहिए। एक चालू उक्ति के आश्रय से कहें तो यह देखना भूसे के बीच से बीज चुनना सिखाता है। यह काम संपादक भी कर सकते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से फ़िलहाल उनका बहुत अभाव है या वे प्रभावहीन हैं। इस पर प्रकाशक पतले संग्रह के कवि को हतोत्साहित और मोटे संग्रह के कवि को प्रोत्साहित करते हैं। प्रकाशक पतले को मोटा और मोटे को और मोटा करने में माहिर होते हैं। कविता-संग्रह को कैसे भी करके कम से कम 128 पृष्ठों का बना देने का उनमें एक विचित्र उत्साह होता है।
मुआफ़ कीजिएगा, मैं यहाँ वह पंक्ति नहीं दुहराऊँगा जिसमें हत्या कला में बदल जाती है। लेकिन यह कहना ही होगा कि इस प्रकाशन-प्रक्रिया में यदि कवि थके हुए जल्दबाज़ अनाड़ी हों तो प्रकाशक और संपादक उनकी या कहें उनके कविता-संग्रह की हत्या कर देते हैं।
कविता-संग्रह कैसे तैयार किए जाएँ—हिंदी में—इस प्रसंग में पुराने कविता-संग्रहों में ‘अपने सामने’, ‘पहाड़ पर लालटेन’, ‘बहनें और अन्य कविताएँ’, ‘दुनिया रोज़ बनती है’, ‘समुद्र पर हो रही है बारिश’ को देखना चाहिए और इधर के कविता-संग्रहों में ‘आश्चर्यवत्’, ‘कम से कम’ और ‘खोई चीज़ों का शोक’ को। इस प्रसंग में दूरस्थ दुनिया तक न भी जाएँ तो कम से कम बांग्ला और मलयालम की आधुनिक-समकालीन कविता के संग्रह तो देखने ही चाहिए, जिन्हें पढ़ा न सही देखा तो जा ही सकता है।
कृपया ध्यान दीजिए : संपादक और प्रकाशक विशेषांक और कविता-संग्रह चाहते हैं, लेकिन दृश्य को कविताएँ चाहिए।
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