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बिंदुघाटी 2.0 : शिक्षा मंत्री चला जाएगा, शिक्षा रह जाएगी

• धर्मेंद्र प्रधान ने अपना इस्तीफ़ा लिखने में काफ़ी समय लगाया। हालाँकि इस बीच जिस रचनात्मकता की सृष्टि हुई, उसे देखते हुए उनका इतना वक़्त लेना कम अखर रहा है। उनका दो पन्नों का इस्तीफ़ा क्या कॉकरोचों की सारी रचनात्मकता का उपसंहार है! यह तो समय ही बताएगा, क्योंकि हर परिघटना का मुख्य अभिनेता तो वही है। इसलिए हम फ़िलहाल यहाँ इस सबकी पृष्ठभूमि में चलेंगे—रणनीति और रचनात्मकता की झाँकी देखने...

मुख्य मंच से एक ही नारा बार-बार उठता रहा है—“धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दो।” इसके साथ वंदे मातरम्, भारत माता की जय और इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे भी गूँजते रहे हैं। मुख्य मंच हो या उससे जुड़े सहयोगी संगठन, लगभग सभी की आवाज़ एक ही माँग पर आकर टिकी रही—शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा... पहली नज़र में यह एक साधारण राजनीतिक माँग लग सकती है, पर थोड़ा ठहरकर देखें तो इसमें ही आंदोलन की सबसे महत्त्वपूर्ण रणनीति है। जिस राजनीतिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री का इस्तीफ़ा पूरी सरकार के इस्तीफ़े का पर्याय माना जाता हो, वहाँ किसी एक मंत्री की जवाबदेही तय करने की माँग आंदोलन को एक अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक लक्ष्य देती है। यही वजह थी कि कॉकरोच जनता पार्टी [सीजेपी] द्वारा आहूत आंदोलन ने अपना केंद्रीय आग्रह प्रधानमंत्री के बजाय शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े पर रखा। यह केवल एक राजनीतिक माँग नहीं है, बल्कि आंदोलन की रणनीतिक संरचना का हिस्सा है। जनांदोलनों की प्रभावशीलता केवल उनके नैतिक बल से नहीं; बल्कि इस बात से भी तय होती है कि उनकी माँग कितनी स्पष्ट, केंद्रित और आम लोगों के लिए सहज रूप से समझ में आने वाली है।

भारतीय जनांदोलनों के इतिहास में यह कोई नया सूत्र नहीं है। महात्मा गांधी भी आंदोलनों के लक्ष्य और उनके सार्वजनिक नैरेटिव का चयन इस तरह करते थे कि वे लोगों के रोज़मर्रा के अनुभवों से जुड़ सकें। व्यापक राजनीतिक प्रश्नों को वह अक्सर एक ऐसे प्रतीक या माँग में रूपांतरित कर देते थे, जिसके साथ बड़ी संख्या में लोग अपने को जोड़ सकें। इस आंदोलन में शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की माँग को केंद्रीय स्थान देना भी इसी राजनीतिक समझ की नज़ीर माना जा सकता है।

• मुख्य मंच के नीचे मुक्त दीर्घा में वह रचनात्मकता है, जिसमें कोई पॉलिशिंग नहीं होती। वहाँ ग़ुस्सा और विट होता है। वहाँ बोल्ड स्टेटमेंट होते हैं। अवाम की बिल्कुल कच्ची-खरी भाषा, जिसमें इशारे हैं और इशारों में अभिजात्य का टूटता दायरा है और इस टूटन से उड़कर सीधे लक्ष्य को भेदती चिब्भियाँ हैं। कई बार यह भाषा पकी हुई मिट्टी से बनी चिब्भियों जैसी ही होती है जो महज तालाब में छिछली खाकर डूब जाती है, लेकिन डूबने के पहले कौतुक छोड़ जाती है। यहाँ बीसवीं सदी की शुरुआत का योरोपीय साहित्य या फिर अकविता के दौर की वह भाषा है जो एब्सर्ड्स से भरी है। रचना में एब्सर्ड्स के बारे में ‘बिंदुघाटी’ के प्रथम सत्र में ज्ञानरंजन की रचना के हवाले से पहले ही बात की जा चुकी है।

• मेरे सहकर्मी और दोस्त संजीव बताते हैं : “जो हमारा जेन-ज़ी है, वह पहले मीम देखता है। कोई मीम चल रहा है, यानी कुछ तो हो रहा है। फिर हम उसकी न्यूज़ खोजते हैं...” संजीव जेन-ज़ी हैं, वह एमिनेम से लेकर सारे फ़ेमस रैपरों को डूबकर सुनते हैं। उनकी ज़िंदगियों के बारे में जानते हैं। उन्हें भाषाई आडंबरों से भरे झमेले नहीं, सच और कौतुक भरी बातें पसंद हैं। वह वैसे ही जेन-ज़ी हैं, जैसे कि उनके वर्ग के बाक़ी सब। 

• कॉकरोच कृत आंदोलन शुरू से ही जेन-ज़ी को संबोधित है। यह शुरू भी वहीं से हुआ, जेन-ज़ी जहाँ सबसे ज़्यादा समय बिताता है, यानी—इन्स्टाग्राम... यहीं से सीजेपी की लोकप्रियता चढ़ी, यहीं से इस पार्टी का मेम्बरशिप-फ़ॉर्म भरकर लोग इसके सदस्य बने। 

विगत कई वर्षों से यह एक प्रचलित प्रलाप है कि फ़ेसबुक बूढ़ा होता हुआ प्लेटफ़ॉर्म है, इसका अर्थ है कि इस समय इन्स्टा ही सबसे ज़्यादा अपडेटेड है। फ़ेसबुक ने बहुत से फ़ीचर उसे अपग्रेड करने के लिए पिछले दशक से उसमें जोड़े, लेकिन यह बात फिर भी सही है कि बिल्कुल युवा पीढ़ी [तीस से कम उम्र वाली] इन्स्टा पर ही अधिक सक्रिय है। फ़ेसबुक पैंतीस की वय छू रहे या उससे ऊपर निकल गए पुराने पोस्टमैनों की जगह है, जो साहित्यिक-वैचारिक होने के पेच-ओ-ख़म से भरे हुए हैं। 

• मुख्य मंच के नीचे शामिल होती है—मुक्त अवाम... हर मायने में स्फूर्त—अभिव्यक्ति के सारे पैमानों पर स्फूर्त—पहनावे, ग्रुपिंग्स, हाथ में हाथ से लिखे पोस्टर, रीलें बनाती... यहाँ कुछ पोस्टरों को उद्धृत किया जाएगा जो कि तथाकथित भाषाई गरिमा को ध्वस्त करते हैं। नज़र अगर साहित्यिक मूल्यों पर हो तो ये पोस्टर विरोध के प्रचलित जार्गनों को झटका देते हैं। इन्हें उद्धृत करने का उद्देश्य भाषा की ऐसी नवनिर्मित अस्मिता का विश्लेषण करना है; उनके निहितार्थों को समझना है, न कि किसी को आहत करना या किसी अभियान का हिस्सा बनना। इन पोस्टरों की भाषा से आपको समस्या हो सकती हैं, लेकिन इनको बरतने वालों की समस्याएँ आपकी वाली समस्याओं से बड़ी हैं और वे अपने इस बर्ताव में निर्द्वंद हैं। अधिकांश पोस्टरों की लिपि रोमन होती है, ज़ाहिर है कि चैट की भी सबसे प्रचलित लिपि रोमन ही है। इसके अलावा इन पोस्टरों में वेबसीरीजों के वायरल संवादों और फ़िल्मी संवादों की पैरोडियाँ भी हैं। इनके अतिरिक्त लोगों का ध्यान आकृष्ट कर पाने में कम सफल परंपरागत पोस्टर्स भी हैं।

• इन दिनों सब तरफ़ प्रसारशील पोस्टरों में रहा यू फ़क्ड विद रॉन्ग जेनेरेशन ही इस जेन-ज़ी पीढ़ी का सबसे मजबूत स्टेटमेंट है। उनकी यह पीढ़ीगत अस्मिता अपने में खोए रहने वाली पीढ़ी के रूप में निर्मित हुई है, लेकिन अब वह इस स्टेटमेंट के साथ जागा है—अपनी समस्त चैट-भाषा, श्रग-ऑफ़ एटीट्यूड और हीनताबोध से मुक्त देहभाषा के साथ। 

• एक पोस्टर में लिखा मिला : इवन माई पैड हैज बेटर लीक प्रोटेक्शन... ज़ाहिर है कि यह पोस्टर एक लड़की लेकर खड़ी है। उसके साथ में उसका दोस्त भी है। यह पोस्टर न सिर्फ़ पेपर-लीक्स पर एक व्यंग्य कर रहा है; बल्कि उस टैबू को भी चैलेंज कर रहा है, जिसमें सैनिटरी पैड्स पेपर में लपेटकर दिए जाते हैं। यही नहीं, कुछ पोस्टरों में तो इसी कॉन्सेप्ट के साथ बाक़ायदा सैनिटरी पैड्स चिपकाए हुए मिले। 

एक लड़के के पोस्टर में यह ख़ालिसपन दिखा : मोदी’ज़ बॉडी काउंट : 1.48 बिलियंस... यह पोस्टर एक टैबू को बल दे रहा है कि क्या बॉडी काउंट या सेक्सुअल अफ़ेयर कोई अत्याचार है! हालाँकि अभी तक अनुभूत समाजों में बहुत से सेक्सुअल अफ़ेयर्स को कभी ठीक नहीं माना गया है और यहाँ पर सत्ता के बिल्कुल तात्कालिक संदर्भों में यह ज़बरदस्ती या अनाचार में गिना जा रहा है, लोगों को अपील कर रहा है। एक लड़की के हाथ में पोस्टर है जो कि ‘सोनम सर’ के लिए अपनी बहन के बिहाफ़ पर आई : जस्ट बिकाज़ यू डोंट हैव स्पाउस, मोदी जी डोंट फ़क द नेशन... #140cr बॉडी काउंट... साथ में है प्राइम मिनिस्टर की फ़ोटो। यहाँ भी भाषा क्रूड है, पर सीधा वार कर रही है। 

• कुछ दिलचस्प पोस्टर ऐसे भी मिले, जिन्हें बिल्कुल अपने दोस्तों को चिढ़ाने के लिए लड़के अपने हाथ में लिए हुए हैं : मेरे वे भड़वे दोस्त जो नहीं आए, मोदी उनका पापा है... यह पूरी तरह से लोगों को फ़ोमो महसूस करवाने का बिल्कुल नया तरीक़ा है।  

दिल्ली में पढ़ाई और जॉब साथ-साथ करने की संस्कृति है। कुछ जेन-ज़ी लड़कियों के हाथ एक ऐसा भी पोस्टर था : डीपी [धर्मेंद्र प्रधान] जल्दी रिज़ाइन कर, रोज़ ऑफ़िस से पाँच बज़े नहीं आ सकते... यह पोस्टर रोमन में था। 

• यहाँ कुछ दिलजले पोस्टर्स भी दिखाई दिए। एक लड़के के पोस्टर में कुछ यों लिखा है : मेरे भाई की बंदी भी उसका ऐसा नहीं काटती जितना मोदी ने देश का काटा... तो एक लड़की के पोस्टर में : मेरा बॉयफ़्रेंड और मोदी, दोनों यूजलेस हैं... यह दोटूक भाषा, हर तरह के आग्रहों के सम्मुख बेझिझक है। साहित्यिक और राजनीतिक विमर्शों से परे यहाँ बेलौसपन का समभाव है। 

• महानगर रात को देर तक जागता है। पिकनिक, आउटिंग, सिनेमा, पब, शॉपिंग-कॉम्प्लेक्स, मेले... सब रात को ही गुलज़ार होते हैं। यह बात इस आंदोलन के साथ भी सच है। यहाँ शाम को जुटान काफ़ी बढ़ जाती है। जंतर-मंतर का उमस से भरा मौसम युवा गर्मी से पिघलने-पिघलने को ही होता है। लोग समूहों में मोबाइल फ़ोन में साउंड एम्प्लीफ़ायर लगाकर प्रधानमंत्री का भाषण चला देते हैं [जैसे : लवणेन भोज्यं...] और फिर रोस्ट करते हुए शोर करते हैं। विरोध का यह रोस्ट-क्राफ़्ट बिल्कुल जेन-ज़ी है। 

• बारहवीं कक्षा की पाँच लड़कियाँ कहती हैं : आई एम हेयर ओनली फ़ॉर सोनम सर... उनके हाथ में पोस्टर : एक एजुकेशन चली जाएगी, मिनिस्टर ही रह जाएगा... यह भी रोमन में लिखा मिला। इसकी व्यंजना भी तीर की तरह लग रही है। लोग इन पोस्टरों को तस्वीरों में बदल रहे हैं। ये अपनी जगह से बाहर सब तरफ़ दूर-दूर तक फैल रहे हैं।  

• एक पोस्टर में प्रधानमंत्री की ध्यान-मुद्रा वाली तस्वीर के साथ यह भी टिपिकल जेन-ज़ी चैट-भाषा मिली : idk, idc, n, idgaf... यानी देश का प्रधानमंत्री—मुझे नहीं पता, मैं परवाह नहीं करता, आई डोंट गिव अ फ़क... की मुद्रा में रहता है। एक लड़की के हाथ में पोस्टर है : इंडियन बैडीज़ अगेंस्ट एजुकेशन मिनिस्टर... बैडीज़ शब्द विलेन के लिए प्रयुक्त होता था; लेकिन अभी तो इसे स्लैंग की तरह लोग विशेषकर लड़कियाँ अपने कॉन्फ़िडेंट और लड़ाकू हाव-भाव के लिए प्रयोग करती हैं। 

धर्मेंद्र प्रधान की तस्वीर के साथ एक पोस्टर पर कुच्चू-मुच्चू इस्तीफ़ा दे दो लिखा हुआ है। लोकतंत्र की परिभाषा—फ़ॉर द पीपल, ऑफ़ द पीपल, बाय द पीपल में से पहले दो वाक्य ग़लत काटे गए हैं और साथ में तीन कोनों पर लिखा है : lol, Umm!... Not really और Who we are kidding??

• कुछ रील प्रचलित वाक्यों को भी पोस्टरों में आंदोलन के मुद्दे से जोड़ा गया है। एक पोस्टर में धर्मेंद्र प्रधान की फ़ोटो बनी है और लिखा गया है : यहाँ अकाउंटिबिलिटी चलता बाबू, न त घरे जा के सुत्ती बाबू... यह पोस्टर उस मूल वाक्य से प्रेरित है, जिसे एक भोजपुरी सिंगिंग कॉम्पिटिशन में रवि किशन ने बोला : इहाँ ईमानदारी चलअ ता बाबू, न त घरे जइके सुत्ती बाबू... भाजपा सांसद रवि किशन ने हाल ही में नीट पेपर लीक्स को एक इंटरव्यू में नीट-अख़बार लीक्स बोल दिया। इस पर भी कुछ चिढ़ाने वाले पोस्टर नज़र आए। 

• इस बीच आंदोलनकारी विद्यार्थी और उनके समर्थक कई-कई समूहों में ढपली बजाते हुए बहुत प्रयोगहीन और रूढ़ नज़र आए। इन पर लेफ़्ट के छात्र-संगठनों की सुपरिचित रिद्म और नारों की गढ़न का असर साफ़ दिखा। प्रायः छह-सात समूह लेफ़्ट के छात्र संगठन—आइसा, एसएफ़आई, एआईएसएफ़, एआईडीएसो, दिशा और केवाईएस और पछास के ही ढपली-नारे-गीत के साथ सक्रिय दिखते हैं। ढोल और ढपली के साथ इन समूहों के बीच उठती तरंगों में गुज़र रहा आदमी सहज ही थिरक सकता है। ये संगठन आंदोलन की शुरुआत से ही, जब तक आम पब्लिक इतनी नहीं जुड़ी थी, सतत सक्रिय रहे। इन संगठनों के माध्यम से संख्या की जुटान भले ही कम हो, लेकिन सालों-साल से अनवरत चलने वाले रचनात्मक संघर्ष का असर सबकी अभिव्यक्तियों पर रहा। पिछले दशक में लेफ़्ट के द्ववारा विकसित किए गए ‘आज़ादी के गीत’ और ‘जय-जय-जय जय-भीम’ को भी ख़ूब गाया गया। यहाँ भगत सिंह, चे ग्वेरा, महात्मा गांधी के ए-फ़ोर साइज़ स्केचेज लेकर भी लोग घूमते हुए मिले। सरफ़रोशी के गीतों से बने हुए पोस्टरों भी छाए रहे... यानी आज़ादी की लड़ाई की विरासत भी, आंदोलन कोई भी हो, दिखती ही है। 

• जंतर-मंतर पर शुरुआत में ज़्यादातर सीजेपी के ऑनलाइन सदस्य और लेफ़्ट के सांगठनिक लोग ही रहे हैं, लेकिन बाद में सोनम वांगचुक के विजुअल्स ने लोगों को खींचा और बीस जुलाई के ऐन पहले उनको प्रशासन द्वारा उठा लेने ने लोगों को बिल्कुल उद्वेलित कर दिया और उसके बाद से अब तक जेन-ज़ी पर हुए लाठीचार्ज के विजुअल्स ने। यह मुद्दा और इससे प्रभावित होने वाली जेनरेशन ही वह सबसे बड़ी चीज़ है जिसने यहाँ किसी भी अपील को प्रासंगिक बनाए रखा। आम लोग खिंचे चले आए। चंद्रशेखर आज़ाद रावण के युवा समर्थक भी भरपूर दिखे। एक रानोपाली [फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश] से आए रवि मिले। वह सीजेपी के सदस्य हैं और ‘चंद्रशेखर भैया’ जहाँ धरने पर बैठे हैं, वह जगह कितनी दूर है... यह पूछते हैं। 

• हाथ में पोस्टर लेकर खड़े रहना और फ़ोटो खिंचवाने की विरोध-शैली को नई पीढ़ी ने संभवतः पिछले एक दशक से पूरी दुनिया में होने वाले विरोध-प्रदर्शनों के विजुअल्स से सीखा होगा। इसमें मुँह से कुछ नहीं बोलना है, लेकिन फ़ोटोज़ और रील्स में तब्दील होकर उन चुटीले वाक्यों के साथ इंटरनेट पर फैल जाना है। यह आंदोलन ज़मीन पर हुआ और ज़मीन पर खड़े युवाओं के हाथ में फ़ोन है, इसीलिए यह उससे ज़्यादा इंटरनेट पर भी हुआ। सब जगह विट, हाज़िरजवाबी और आक्रोश दिखा। सोशल मीडिया का आलम तो यह रहा कि लोगों ने इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी और शिक्षा मंत्री की बेटी के मेसाचुसेट्स आधृत ‘द फ़्लेचर स्कूल’ तक को आंदोलन में शामिल कर लिया। पुलिस के बग़ल से गुज़र रहे लोग पूछ बैठते रहे कि ‘लाठी तो नहीं मारोगे सर!’ नारों में ‘भड़वा’ और ‘चोर’ जैसे शब्दों की बढ़त हुई। इनके साथ ही नेताओं को दी जा रही लोकप्रचलित माँ-बहन से संबद्ध गालियाँ तो... इन सारी अभिव्यक्तियों और पोस्टरों के बारे में लिखने के लिए एक बहुत बड़े लेख की आवश्यकता होगी।

• जेन-ज़ी और उसके व्यवहार को डिकोड करने की फ़ोमोग्रस्त बहार उसी तरह चल पड़ी है, जैसे कि इस आंदोलन के हिस्सेदारों के बीच बन रहे ब्रांडों और चमक रहे चेहरों के लिए लिखी जा रही प्रशस्तियों और अपनी चहेती पार्टियों के पक्ष में क़यासबाजियों की बहार है... या फिर जैसे अब इसके दूसरे दौर में सिंक चुकी रोटी में से एक बड़ा टुकड़ा हासिल करने की छिपी-ज़ाहिराना कोशिशें हैं।

जेन-ज़ी कोई अजूबा नहीं है और न ही उसकी भाषा कोई अजूबा है। यह भाषा सोशल-मीडिया के हैशटैगों और चैट-बॉक्सों में दिनोंदिन मिलेनियल्स से होकर विकसित होती रही हैं। ये नए इशारे और नई संक्षिप्तियाँ निर्वात में नहीं पनपे, भाषा और व्यवहार एक सातत्य में ही विकसित होते हैं। स्लैंग और क्रूडनेस भी कोई नई परिघटना नहीं है, इस पर हम शुरुआती बिंदुओं में बात कर ही चुके हैं। जेन-ज़ी जिस तरह मिलेनियल्स के ढोए जा रहे अनावश्यक बोझों से प्रायः मुक्त रहा है और उसकी इसी मुक्तावस्था ने उसकी तमाम चीज़ों को अलहदा शेप दिया, उसी तरह वह देश और समाज को ढोने की तमाम पुरानी व्यंजनाओं के चपेट से ख़ुद को जल्दी ही मुक्त कर लेगा। अभी अगली पीढ़ी भी आ रही है और दिखना-चमकना शुरू कर रही है... इसे अल्फ़ा कहते हैं। बहरहाल, आंदोलन के मुख्य नारे को सफलता मिली; अब देखना यह है कि इस सफलता से शिक्षा कैसी मिलती है...

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अन्य बिंदुघाटी : 2.0 यहाँ पढ़िए : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है | मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है | बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं

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