शंखनाद : बनियान, बुल दुबे और बाक़ी असफलताएँ
शंखधर दुबे
27 जुलाई 2026
पढ़ाई-लिखाई में डबल-बिलो औसत प्रदर्शन के बाद हमने यह स्वीकार कर लिया कि संप्रति यह हमारा क्षेत्र नहीं है और अपनी पहचान किसी दूसरे क्षेत्र में तलाशनी चाहिए।
कुलदीप की राय थी कि हमें डॉक्टर बनने की संभावना तलाशनी चाहिए। डॉक्टर बनने का मतलब पीएमटी या सीपीएमटी पास करना नहीं था। उन दिनों हमारे इलाक़े में किसी झोलाछाप डॉक्टर का असिस्टेंट बनकर और बाद में क्लीन शेव होकर भी डॉक्टर बना जा सकता था। किसी कथित मानद डॉक्टर के यहाँ प्रैक्टिस करने के बाद क्लीन शेव होना इस तरह की डॉक्टरी में बहुत अहमियत रखता था। यह एक तरह का दीक्षांत समारोह माना जाता था। संक्षेप में कहें तो डॉक्टर का असिस्टेंट बनना यदि एमबीबीएस था, तो क्लीन शेव होना एमडी के समकक्ष था।
सालिक राम कन्नौजिया के यहाँ तीन दिन बैठने के बाद ही मैं समझ गया था कि मेरी इनर कॉल डॉक्टर बनने की नहीं, बल्कि चिर-मरीज़ बने रहने की है। हमने कुलदीप को राय दी कि हम टेलर बन सकते हैं, जहाँ बिना किसी विशेष पात्रता के भी ‘मास्टर’ कहलाया जा सकता है।
हमने स्थानीय चौराहे पर एक उस्ताद जी को चुना, जो दुबौलिया बाज़ार से इस चौराहे पर कपड़े सिलने की उम्मीद में आते थे और अंततः कुछ चीकट थिगलियाँ, बोरों की सिलाई और तुरपाई करके अपनी खटारा साइकिल पर कांखते हुए वापस चले जाते थे।
कुलदीप की व्यावहारिक राय थी कि जिस इलाक़े में बहुसंख्यक लोगों के पास खाने के लाले हों, वहाँ उनके नए कपड़े सिलवाने की उम्मीद पालना आत्मघाती विचार है। बात ठीक भी थी। उन दिनों गाँव-गिराँव की अधिकांश आबादी टांगों के उद्गम में ही वस्त्र पहनने भर की प्रगति कर पाई थी। यह जो कपड़े थे भी, वे सालों से ख़ास-ख़ास जगहों पर फटे रहते थे, लेकिन लोग उसी पारदर्शी जीवन से संतुष्ट थे। उनमें नए कपड़े सिलवाने की संभावना लगभग शून्य थी।
शादी-ब्याह तक में लोग माँगे हुए कपड़ों से रंग जमा लेते थे। नए कपड़ों को लेकर स्थिति इतनी ख़राब थी कि लोग नई बनियान तक को थ्री-पीस सूट की इज़्ज़त और मान देते थे।
मान लीजिए किसी ने नई बनियान के ऊपर पुरानी फटी शर्ट पहन रखी है—हालाँकि कोई ऐसा नहीं करेगा—तो वह किसी न किसी तरह आपको अपनी नई बनियान ज़रूर दिखाएगा या बहुत महीन तरीक़े से घुमा-फिराकर उसकी चर्चा छेड़ देगा।
मसलन :
“ससुरी बनियान टाइट हो गई है”; “लक्स की बनियान बढ़िया होती है, लेकिन इस बार अमूल की ले आए”; “रास्ते भर बनियान का स्टिकर ससुरा चुभता रहा”; जनेऊ निकालने के बहाने बनियान लहरा दी जाएगी। बारात में पहुँचते ही शर्ट या कुर्ता उतारकर सिरहाने रख दिया जाएगा और बनियान को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाएगा।
अगर किसी ने बनियान देखकर भी अनदेखा कर दिया, उस पर चर्चा नहीं की और आँखों में ईर्ष्या का भाव नहीं आया, तो यह बात दिमाग़ की स्थायी डायरी में दर्ज कर ली जाती थी।
बनियान से एक और बात याद आई।
मैं तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ता था। पड़ोस के एक भाई की शादी थी। बारात की विदाई और द्वारपूजन के लिए मेरे लिए नया ड्रेस, मतलब एक नई बनियान लाई गई थी। जिसे अपनी मड़गिल्ली, मई-जून की झुलसी काया पर चीकट पुरानी जाँघिया के कॉम्बो के साथ पहनकर मैं इतने कॉन्फिडेंस में अकड़कर चल रहा था, मानो बनियान नहीं, पेरिस से आया कोई सूट पहन रखा हो।
बस, यहीं गच्चा खा गया।
बारात जाने वाली ट्रॉली में एक नई बनियान और पुरानी जाँघिया के आत्मविश्वास के साथ नंगे पैर चुपचाप जाकर बैठ गया। भगवानदीन बाबा मुझे चिपटाकर अपने साथ बारात ले गए। पसीने से आँख का सुरमा फैलकर आँखों के दायरे लाँघते हुए मुँह के कई इलाक़ों तक पहुँच गया था। पहले से हास्यास्पद शक्ल अब दयनीय रूप से हास्यास्पद हो चुकी थी, लेकिन मुझे इसका एहसास नहीं था।
नीचे उतरा तो ट्रॉली के झटकों का असर अब भी बना हुआ था। उतरते ही धड़ाम से गिर पड़ा। बाबा ने सँभालकर एक खटिया पर बैठाया।
बारात में इत्र लगाए, जूते पहने, कुर्ते, पुरानी ही सही मगर मुचड़ी शेरवानी या स्कूल यूनिफ़ॉर्म में बैठे हँसते मुस्कराते परिचित बच्चों को देखकर मेरा आत्मविश्वास हिल गया। लेकिन अब कोई रास्ता भी नहीं था, इसलिए चुपचाप लो-प्रोफाइल बैठा रहा।
बारात थोड़ी स्थिर हुई तो जनता ने हँसना शुरू किया। थोड़ी ही देर में मुझे लगा कि बारात का हर आदमी, बल्कि पेट्रोमैक्स का जलता मिंटल तक मुझ पर हँस रहा है। बाराती तो बाराती, वधू पक्ष के लड़के भी झुंड बनाकर मुझ पर हँस रहे थे।
अब मुझे पूरा यक़ीन हो गया कि सृष्टि का कण-कण मुझ पर हँस रहा है।
ख़ैर, जैसे-तैसे सज़ा काटकर घर लौटे और कूटे भी गए। लेकिन यह कुटाई उस जग-हँसाई के सामने कुछ भी नहीं थी।
किसी दिशा में कोई प्रगति न होती देखकर हमने अंतरराष्ट्रीय तैराक बनने की ठानी।
उन दिनों राष्ट्रीय फ़लक पर बुला चौधरी का बोलबाला था। लिहाजा मैंने ख़ुद से कमिट किया कि तैराकी की दुनिया में आने के बाद अपना नाम बदलकर ‘बुल दुबे’ रख लूँगा, क्योंकि ‘शंखधर’ जैसा नाम किसी खिलाड़ी का कम और कथावाचक का ज़्यादा लगता है।
मैं अपने स्थानीय इंग्लिश चैनल—रामरेखा नदी (जो बड़े होने पर नाला साबित हुई) और जिब्राल्टर अर्थात् मनोरमा—को मई-जून में पार कर चुका था। इसलिए उस साल आदरणीय शिवपूजन वर्मा, गेम्स टीचर, बिहार इंटर कॉलेज की इस घोषणा पर कि जिला स्तरीय तैराकी प्रतियोगिता के लिए इच्छुक विद्यार्थी अपना नाम दें, कुलदीप के मना करने के बावजूद मैंने मोटे अक्षरों में अपना नाम लिख दिया।
गुरुजी मेरी छोटी-सी ज़िंदगी में आए सर्वश्रेष्ठ स्पोर्ट्स टीचरों में से एक थे। वह स्कूली राजनीति से दूर रहते और दिन भर मैदान में पसीना बहाते थे।
मई के पहले सप्ताह में मनोरमा में हमारा ट्रायल हुआ, जिसमें मैं सफल रहा, क्योंकि मनोरमा में बमुश्किल तीन-चार फ़ीट पानी था।
अंत में फ़्री-स्टाइल तैराकी के लिए पाँच सदस्यीय टीम का चयन हुआ और मुझे उसका कप्तान बनने का सौभाग्य मिला।
सर अगले पंद्रह दिनों तक फ़ील्ड में ही हमें तैराकी के गुर सिखाते रहे।
प्रतियोगिता कुआनों नदी में होनी थी, जो टलते-टलते जुलाई में पहुँची। तब तक बरसात हो चुकी थी। कुआनों में बाढ़ तो नहीं थी, लेकिन नदी करारों करार तक भरी हुई थी। उसे देखते ही मेरे पैर काँपने लगे।
हमारी टीम बाइस किलोमीटर साइकिल चलाकर वहाँ पहुँची थी। बाक़ी सदस्यों का पता नहीं, लेकिन मेरा तो इतने में ही कचूमर निकल गया था।
लिहाजा जब हम स्विमिंग कॉस्ट्यूम मतलब लंगोट पहनकर और देह में सरसो का तेल मलकर जब 10 स्कूलों की टीम एक साथ पानी में उतरी तो मुस्तंदो से भरी टीमों में सबसे मरियल टीम हमारी ही थी जिसमें हम अलग से मरियल थे ।यह जानकर हमारी सांस हलक में अटक गई।फिर भी अब वापसी की राह नहीं थी लिहाजा मरता क्या न करता।
जब हम स्विमिंग कॉस्ट्यूम अर्थात् लंगोट पहनकर और शरीर पर सरसों का तेल मलकर पानी में उतरे, तब दस स्कूलों की टीमों के बीच सबसे मरियल टीम हमारी ही थी और उसमें भी सबसे मरियल मैं था। यह जानकर हमारी साँस हलक में अटक गई।
फिर भी अब वापसी का कोई रास्ता नहीं था, लिहाजा मरता क्या न करता।
सीटी बजी।
हम सब लपके और पहली ही छलाँग में कप्तान साहब तीन फ़ीट पीछे रह गए। पूरी ताक़त लगाकर थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि लगा किसी टॉरपीडो ने टक्कर मार दी हो। मैं टाइटैनिक की तरह डूबने लगा।
दरअस्ल भीड़ में किसी ने मेरी नाक पर ज़ोरदार मुक्का मार दिया था और मैं डूबने लगा।
आगे बढ़ने के बजाय मेरी टीम और एक-दो वॉलंटियर मुझे किनारे की ओर ले आए। जब वॉलंटियर मेरी काँपती काया को थामे खड़े थे, तब मेरी आँखों में सचमुच टियर थे।
वर्मा जी ने फिर भी शायद मेरी जान बच जाने की ख़ुशी में पूरी टीम को शाबाशी देते हुए कहा—"वेल डन, बॉयज़!”
लौट के बुद्धू यह कसम खाते हुए वापस आए : “आज के बाद नो मोर स्विमिंग कंपटीशन।”
इस तरह मैं ‘बुल दुबे’ होते-होते रह गया।
और तब से भाग्य के शिखर पर झूला झूल रहा हूँ। अब जो संयोग से हो जाए, वही मेरी प्लानिंग है।
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