शंखनाद : ...और कोई विवाद न हुआ
शंखधर दुबे
23 मार्च 2026
वह वरिष्ठ कवि हैं। कवि होने के बाद, वरिष्ठ होने के लिए कुछ ख़ास नहीं करना पड़ता। सिर्फ़ जीते रहना ही काफ़ी होता है। वैसे भी राजनीति की तरह ही साहित्य का उम्र बोध अलग है, जैसे साहित्य का सच अलग होता है। यहाँ मौक़ा, गुंजाइश और सहूलत हो तो आदमी 60 वर्ष तक युवा कवि कहलवा सकता है। फिर अचानक युवा पुरस्कारों की सारी संभावनाओं को निःशेष करता हुआ—वह शॉल, नक़द, नारियल और प्रशस्तिपत्र सँभालता हुआ, अचानक वरिष्ठ हो जाता है। यह एक वरिष्ठ कवि की पीड़ा है—जो सब कुछ पाते हुए भी ख़ाली-ख़ाली, सूना-सूना महसूस करता है। कवि का अफ़सोस यह है कि कोई विवाद नहीं हुआ! शहीद होने का मौक़ा नहीं दिया हिंदी समाज ने... जीवन भर मानसिक नोट्स तैयार किया कि विवाद होगा तब ये कहेंगे और वो कहेंगे... तहलका मचा देंगे, पर यह गले में काँटे-सा फँस गया है। चिंता खाए जा रही है कि कोई विवाद नहीं हुआ।
ऐसा नहीं था कि कोशिश नहीं की, लेकिन इससे दार्शनिक संकट खड़ा हो गया। संकट यह था कि उन्हें ख़ुद को लेकर संशय हो रहा था कि वह हैं भी या नहीं, अगर वह हैं तो क्या वह इतने बेकैड़े हैं कि कोई उन्हें किसी विवाद में घसीटने लायक़ भी नहीं समझ रहा। तमाम यूरोपीय लेखकों/कवियों की रचनाओं/कविताओं की पंक्तियाँ उड़ाई, लेकिन किसी ने नक़ल का आरोप न लगाया। अल्लम-गल्लम लिखा कोई वबाल न हुआ, भाषणबाज़ी की कोई हल्ला न हुआ, पुरस्कृत हुए, कुछ लोगों ने बधाई दी, बाक़ी ठंडे पड़े रहे। उन्हें उम्मीद थी, इस बार हल्ला मचेगा। उन्हें किसी कवि विशेष के घराने का साबित करके उन पर छुरियाँ चलाई जाएँगी। वह चर्चा के केंद्र में आ जाएँगे। कुछ दिनों हमलों का सुख भोगेंगे, फिर एक दिन शहीदाना अंदाज़ में बयान देंगे—‘लानत है ऐसे समाज पर जो साहित्य के लिए [आप साहित्य अकादेमी पढ़े] अपना जीवन होम कर चुके निरीह कवि पर इस तरह के हमले करता है। मेरे पास कोई हथियार नहीं है सिवाय सच के... मैं जनता का कवि हूँ [जनता रोटी-दाल को ही कविता मानकर उसके पीछे पिली पड़ी है, सम्प्रति रोटी-दाल ही उसका आख़िरी सच है] जनता नाम की जनता को पता ही नहीं चलता कि इस महादेश में कितने ही लोग उसकी लड़ाई लड़ते हुए आपस में लड़ रहे हैं!
उम्र के आख़िरी मोड़ पर अब विवाद की उम्मीद भी धुँधली पड़ती जा रही है। कवि का आइडेंटिटी क्राइसिस गहराता जा रहा है। कवि निराश है और निराशा में अपनी ही नाड़ी पकड़कर देख रहा है कि क्या वह ज़िंदा है? या कोई सपना देख रहा है? या वह अपनी ही परछाई है, जिसका कोई ठोस वजूद ही नहीं है? कवि आर्तनाद करता है, कोई तो विवाद दो मौला... मेरे भी नाम से बवंडर उड़ाओ मौला...
अब हम सब आमीन के सिवा क्या कहें...
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