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शंखनाद : मूर्खताएँ प्रेम में होने की अनन्य कसौटी हैं

कभी-कभी मैं विधाता की मनुष्य के रूप में कल्पना करता हूँ तो लगता है कि विधाता भी कोई परम मसख़रा ही होगा और यह भी कि विधाता ने यह दुनिया सिर्फ़ मसख़री और खेल-खेल में ही बना दी है।

और प्रेम?

प्रेम तो कुत्ते की पूँछ पर बैठी कुकुरमच्छी जैसा कुछ होता होगा और जब हम उसे पाने के लिए गोल-गोल घूमते हैं तो विधाता अपने स्वर्ग के हाई-फ़ाई रूम में बैठकर हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाता होगा। पश्चिम के किसी चिंतक ने ऐसा ही कहा है, लेकिन अँग्रेज़ी में कहा है कि जैसे शरारती बच्चों के लिए मक्खियाँ होती हैं; हम देवताओं के लिए वैसे ही हैं—वे अपने मौज के लिए हमें गढ़ देते हैं।

प्रेम सरासर मूर्खता है, वरना सृष्टि का सबसे समझदार प्राणी प्रेम में पड़कर तमाम मूर्खतापूर्ण कृत्य करता हुआ धन्य न महसूस करता। प्रेम करके मूर्खतापूर्ण हरकतें करना प्रेम में होने की अनन्य कसौटी है। यों हिंदुस्तान प्रेम की चाहना का देश है, प्रेम के पैरेलल और प्रेम की कामना का देश। हम जीवन बीमा की टैगलाइन की तरह ही हमेशा दो-चार प्रेम कर बैठने के लिए अहर्निश तैयार बैठे रहते हैं। हमारे पुरखों की ऐसी बहुत-सी कहानियाँ हैं कि प्राण-प्रण से खेलकर किसी की बेटी ब्याहकर लौट रहे थे कि राह चलते-चलते दो-तीन ब्याह और कर लिए।

लेकिन मैं जो कथा कहने जा रहा हूँ, उसके नायक श्रीयुत वृजेश कुमार वर्मा ऐसे पुरुष नहीं थे। विधाता ने उनके साथ प्रेम वाला मज़ाक़ कुछ ज़्यादा ही जल्दी शुरू कर दिया था, लिहाज़ा जीवन तमाम प्राथमिकताओं की दिशा में चलने से पहले वह प्रेम मार्ग पर चल पड़े। प्रेम के मोर्चे पर ख़ासे दिनों तक ग्रेसफ़ुल तरीक़े से—जिसके तहत “तेरे दीवार खड़े हैं, तेरा क्या लेते हैं, तेरे कुत्ते को ही सीने से लगा लेते हैं”, उसे देखकर आहें भरना, अपनी प्रेम पात्राओं की साइकिल में हवा भरने का अवसर पाकर कई दिन तक अभुआना, दसों दिशाओं के नाम इस आशय का ख़त लिखना कि कोई आए, मेरा दिल थाम ले आदि जैसे हज़ारों सघन मूर्खतापूर्ण कृत्य शामिल थे। सक्रिय रहने के बाद बात बनती न देख, विरह-व्याकुल वृजेश (आप चाहें तो अनुप्रास के लिए दाद दे सकते हैं) काफ़ी ठोस मात्रा में डिसग्रेसफ़ुल हो चले। इसके तहत वह हर उस व्यक्ति से, जो इतिहास में कभी भी और किसी भी लड़की से बात करते हुए उन्हें दिखा था, ‘सेटिंग’ करा देने की दरख़्वास्त करने लगे। प्रेम के स्वर्णिम समय के निकलते चले जाने के साथ उनकी बेचैनी का आलम यह था कि अनजाने में एक लड़की के सगे भाई से कह बैठे, “भाई, भाई! वह तो तुझसे बहुत बात करती है, मेरी भी बात चलवा दे”, और इस एवज़ में पिटते-पिटते बचे थे।

वृजेश की एक अदद ख़्वाहिश पापी प्रेमी की होने की थी, लेकिन विडंबना यह थी कि कहीं भी किसी दिशा से कोई जवाब नहीं आ रहा था। वह बहुत निराश थे—मतलब बहुत ही निराश थे। वह आत्मदया के उस स्तर पर पहुँच गए थे, जहाँ उनके क़रीबी मित्रों की राय थी कि “साला कभी भी आत्महत्या कर सकता है।” पर वृजेश की समस्या यह थी कि यह तय हो जाए कि मैं किसके लिए मर रहा हूँ, तो आत्महत्या कर भी लूँ। लेकिन अभी समस्या यह है कि मर भी जाऊँ तो आशिक़ों की सूची में नाम न आएगा, पागलों और विक्षिप्तों की सूची में ज़रूर आ जाएगा। हालाँकि वह कुछ देर तक ज़रूर यह रोमांटिसाइज़ करते थे कि उनके मरने का ‘उन’ पर क्या असर होगा, पर कौन ‘उन’—यह तय नहीं था। लिहाज़ा ‘उन’ के जवाब में नादान जवानी से नाबदान जवानी तक देखे और एकतरफ़ा चाहे गए चेहरों का अंगूर की शक्ल में गुच्छा उभरता था और फिर मरना मुल्तवी कर देते थे।

नारी की तलाश में डूबती नाड़ी की इसी भाव-विह्वल भावभूमि के साथ हमारे चिर-प्रेमातुर वृजेश भाई विजय तिवारी से मिले। विजय तिवारी पढ़ाई-लिखाई से ख़ासे दूर रहने वाले एक दुर्लभ क़िस्सागो आदमी थे, जो इतनी विश्वसनीयता से झूठ बोलते थे कि बड़े से बड़ा ज़िरही आदमी भी उन्हें उखाड़ नहीं सकता था। वह अपनी तरह के इकलौते आदमी थे, जो काफ़ी गंदे और गंदी जगह में रहते थे। सर्दियों में खाने-पीने के बाद हाथ धोने से भी परहेज़ करते थे, जिससे उनके हाथ की गंध से सप्ताह भर का मेन्यू कार्ड मिल सकता था। संक्षेप में विजय एक लोकल राय बहादुर थे, जो उन सभी विषयों पर : जिनसे वह प्रत्यक्षतौर पर दूर-दूर तक न जुड़े हों, राय रखते थे। उन्हें क़रीब से जानने वाले एक अवधी कहावत के सहारे अपनी राय रखते थे—“आन के सगुन बतावें, आपन (गाड़ी) कुकुरे से नोचवायें।”

उपरोक्त विजय से ‘प्रेम में विजय कैसे पाएँ’ विषय पर उनके अनुभवजन्य ज्ञान को सुनकर वृजेश जी ख़ासे मुतमइन थे कि अब उनकी प्रेम की नैया पार निकलकर ही रहेगी। भोले वृजेश को पड़ोसन फ़िल्म के गुरु मिल गए थे। अयोध्या के रामघाट मोहल्ले के मंदिर के अँधेरे, सीलन वाले तलघर के जिस एक कमरे में विजय रहता था, वहाँ रोशनी और हवा की गुंजाइश कम थी, पर फिर भी विजय को बिजली की लंबी कटौती के बीच भी बीड़ी-माचिस ढूँढ़ने में कोई दिक़्क़त नहीं थी, इसलिए कुल मिलाकर वह कमरे से संतुष्ट थे। बीकापुर के किसी हरे-भरे खुले गाँव में रहने वाले वृजेश का उस कमरे में दम घुट रहा था। उन्हें लगा, उनके भीतर की बेचैनी बाहर निकल आई हो, पर फिर भी यह दिखाने के लिए कि वह इस कमरे में बहुत सहज हैं, विजय की चिर-परिचित गंध वाली कथरी पर आराम से लेट गए और विजय के ‘प्रेम में आगे कैसे बढ़ें’ या ‘लड़की का दिल कैसे जीतें’ नामक विषयों पर दिल थामकर विलंबित गति में अंतहीन लेक्चर सुनने लगे।

उस कमरे, जो कमरा नहीं था—में एक खिड़कीनुमा संरचना थी, जो निस्संदेह खिड़की नहीं, बल्कि दीवार में छोड़ा गया एक छेद था। उसके सामने ही एक घर था, जो वास्तव में किसी खाते-पीते गृहस्थ का घर था। उस घर में संयोग से एक लड़की थी, जो बक़ौल विजय ‘बदचलन’ थी। लगभग उदासीन से और थके-थके विजय ने कहानी बताई : वह यह थी कि लड़की प्रेम के वशीभूत होकर सामने की बजबजाती नाली से होकर विजय के कमरे में अक्सर आ जाती थी और सुबह चली जाती थी। कई किस्तों में सुनाई गई इस कहानी का वृजेश पर ऐसा असर हुआ कि वह अनजाने में स्टोव की लौ पर हाथ धर बैठा। विजय की राय थी कि वह दोस्ती के नाम पर इस लड़की के साथ अपने प्यार का बलिदान करेंगे और अगर ‘सच्चाई’ को जानते हुए भी वृजेश उसे अपनाना चाहें तो वह लड़की से बात करेंगे।

कहानी को विश्वसनीय बनाने की गरज से उन्होंने चीकट तकिए से काले रंग की अंगिया इस सूचना के साथ निकाली कि किसी रोज़ वह जल्दबाज़ी में इसे भूल गई थी और फिर उसे यह कहते हुए धूप के चश्मे-सा आँखों पर रख लिया कि इससे आत्मा को ठंडक मिलती है।

(अंगिया आँधी में उड़कर आई थी।) विजय ने उसे ग़ैर-रस्मी तरीक़े से उतारकर वृजेश को पहना दिया। इसकी प्रतिक्रिया में वृजेश का दिल पसलियाँ तोड़ गति से धड़क रहा था—मुश्किल था, पर फिर भी वह संयत बैठे रहे।

सर्दियाँ आने वाली थीं। धान की बालियों पर ओस चमकना शुरू हो गई थी। शरद की ऐसी ही एक शाम को वह लड़की डूबते सूरज की लालिमा में गोल-गोल घूम रही थी और उसके खुले बाल और उसकी स्कर्ट भी उसके साथ नाच रहे थे। वृजेश को लग रहा था कि पूरी अयोध्या, बल्कि पूरा ब्रह्मांड नृत्य कर रहा है। खाना-पानी राँधने के बाद विजय ने बड़े चलताऊ अंदाज़ में सूचना देकर कि आज रात वह आ रही है, तुम सो मत जाना—पड़ोस के किसी के यहाँ सोने चले गए।

इधर वृजेश फ़िलहाल इतने जज़्बाती हो गए कि उसी दिन प्रण करके यह तय पाया कि वह आज क्या, आज के बाद कभी नहीं सोएँगे और उसके इंतज़ार में जगते-जगते जान दे देंगे। थोड़ी देर में खुले दरवाज़े पर आहट हुई। विरह-व्याकुल वृजेश हाज़िर थे, पर यह क्या, उनके उफनते जज़्बातों पर पानी फेरते हुए विजय ख़ुद वहाँ खड़े-खड़े बीड़ी खींच रहे थे। विजय फिर सतर्क रहने की हिदायत देकर चले गए।

सुबह-सुबह विजय ने उन्हें रतजगे के लिए बधाई दी तो वृजेश भकुवा गए और जानकारी दी, लड़की की तो बात ही जाने दीजिए, इधर कोई मक्खी-मच्छर भी न आया होगा। लेकिन विजय ने साबित कर दिया कि वृजेश को ऐन मौक़े पर नींद आ गई होगी और वह यह जान ही नहीं पाए होंगे कि वह कब सो गए थे। ऐसा ख़ुद उनके साथ कई बार हो चुका है।

कई रातों तक इस तरह का खेल होने के बाद, एक रात क़रीब चार बजे, नाले—जो मूलतः सड़क ही थी, पर फ़िलहाल सीवर का उपनिवेश हो गई थी—इस पार चिर-प्रतीक्षारत, पथराए वृजेश के दरवाज़े पर लाठी पटक-पटक कर चार-पाँच नागा साधु गाली-गलौज कर रहे थे और “बाहर निकल, बाहर निकल” का आह्वान कर रहे थे। विजय का कहीं अता-पता नहीं था। प्रेम की तलाश में वृजेश के लाश होने की संभावना बन आई थी। वह सरपट भागे और जूड़ी बुखार से पीड़ित रहे। महीनों बाद अपनी प्रिय साइकिल लेने आने की हिम्मत जुटा सके—जो विजय पहले ही बेच चुके थे।

अपनी और वृजेश की दोस्ती टूटने के बारे में दरयाफ़्त किए जाने पर विजय ने नयाघाट, अयोध्या में यही कहानी सुनाई थी—और हाँ, मरने-मारने पर आमादा कथित नागा संतों में वे ख़ुद भी शामिल थे।

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