Font by Mehr Nastaliq Web

विष्णु खरे के इर्द-गिर्द

समादृत कवि-आलोचक और कला-प्रशासक अशोक वाजपेयी आज 86वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ उन्हें शुभकामनाएँ देते हुए प्रस्तुत है—उनके द्वारा समादृत कवि-आलोचक और अनुवादक विष्णु खरे के लिए लिखा गया संस्मरणात्मक गद्य। यह गद्य अशोक वाजपेयी और सुपरिचित कवि-गद्यकार-संपादक पीयूष दईया के बीच संवाद से नि:सृत हैं। इस इंटरव्यू का प्रश्न या केंद्रीय विषय हैं—विष्णु खरे।

विष्णु खरे

‘अ और र’

जब मैं सागर में था तब विष्णु खरे शायद छिंदवाड़ा में थे। एक तरह से हम दोनों ने कविताएँ लिखना एक साथ ही शुरू किया, लेकिन तब उनसे मेरा विशेष परिचय नहीं था। ‘समवेत’ के लिए मैंने उनसे कोई कविता नहीं ली। उनकी कुछ कविताएँ इधर-उधर प्रकाशित हो रही थीं। जब वह बी.ए. के छात्र थे, तभी उन्होंने टी.एस. इलियट की बड़ी कविता ‘वेस्टलैंड’ का हिंदी अनुवाद कर लिया था और वह अनुवाद पुस्तकाकार ओडिशा के किसी प्रकाशक ने छापा था।

विष्णु खरे से पहली मुलाक़ात कब हुई, यह मुझे ठीक से याद नहीं है; शायद दिल्ली में ही हुई होगी। जब मैं पहले चरण में पाँच बरस दिल्ली में था, तब वह यहाँ आ गए होंगे, क्योंकि दिल्ली में राजधानी कॉलेज में वह अँग्रेज़ी के अध्यापक होकर आए थे। यही वह कॉलेज था, जहाँ कैलाश वाजपेयी भी अध्यापक थे। यह मेरे दिल्ली रहते हो गया था। वह कुशाग्र थे, तल्ख़ ज़ुबान भी; काफ़ी हद तक कटूक्तियाँ और दूसरों पर व्यंग्य करने का उन्हें बहुत अभ्यास था। वह अपना मज़ाक़ बनाते हों, ऐसा मुझे याद नहीं आता, लेकिन कई बार अपने वक्तव्यों में दूसरों पर डाँट लगाने में उतर आते थे। उनसे मित्रता का एक कारण यह बना कि हम दोनों मध्य प्रदेश के थे और लगभग समवयसी। मैं महासमुंद में था। मेरे विवाह की पहली वर्षगाँठ पर, मेरे निमंत्रण पर, विष्णु खरे, उनकी पत्नी और मेरी पत्नी रश्मि की छोटी बहन कीर्ति जैन दिल्ली से महासमुंद आए थे। महासमुंद के एक छोर पर एक अभयारण्य था, जहाँ शेर देखने की संभावना थी। पहले हम लोग सिरपुर गए जहाँ प्राचीन मंदिर हैं और उसके बाद अभयारण्य गए थे। वहाँ वन विभाग के अतिथि-गृह में रुके थे। शाम के वक़्त, जब शेर दिखने की संभावना होती है, खुली जीप में हम लोग निकले। एक-डेढ़ घंटे तक इधर-उधर भटकते रहे पर शेर नहीं दिखा। यह मानकर कि शेर नज़र नहीं आने वाला, बत्तियाँ नीचे कर लीं, पर ठीक उसी समय एक शेर रास्ता काटते हुए गया। हम लोगों ने देखा। विष्णु खरे ने एक कविता भी लिखी थी, जो ‘अ और र’ के लिए थी—‘वर्ष-राग’। बाद में यह कविता उनके कविता-संग्रह ‘पिछला बाक़ी’ में प्रकाशित हुई।

‘वयम्’ और ‘पहचान’

उससे पहले उन्होंने, कुछ दिनों, मध्य प्रदेश में काम किया था। रतलाम से ‘वयम्’ नाम की एक पत्रिका भी निकाली थी; उसमें मेरे पहले कविता-संग्रह की समीक्षा भी छपी थी। बाद में जब मैं सीधी में था, तब ‘पहचान’ की योजना बनी और उसकी पहली संख्या में ही उनका छोटा-सा कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ। उसके थोड़े दिनों बाद वह साहित्य अकादेमी में आ गए; शायद भारत भूषण अग्रवाल की सेवानिवृत्ति के बाद उपसचिव हुए थे।

प्रबल विश्वास

विष्णु खरे के चार-पाँच बहुत ही प्रबल विश्वास थे। पहला यह कि अगर कोई वामपंथी नहीं है, तो उसके सारी प्रतिभा और कौशल के बावजूद महत्त्वपूर्ण होने की कोई संभावना नहीं है। दूसरा यह कि कुछ लेखकों को लेकर, जैसा कि शायद कई और लेखकों के साथ होता ही होगा, उनके स्थायी पूर्वग्रह थे। जैसे, अज्ञेय को लेकर प्रचलित पूर्वग्रह और मुक्तिबोध को लेकर अनुकूल पूर्वग्रह था। उनका तीसरा विश्वास यह था कि अगर कविता तथाकथित सामाजिक यथार्थ के कुछ अभागे और अलक्षित जा रहे पक्षों की अभिव्यक्ति नहीं करती, तो वह अपने धर्म से विरत हो रही है। उनका चौथा विश्वास यह था कि अगर कोई लेखक उनकी रुचि या मानदंड के पैमानों पर खरा नहीं उतरता, तो उसकी सार्वजनिक निंदा, पिटाई इत्यादि किसी भी सीमा तक की जा सकती है; इसमें किसी तरह के नैतिक संकोच से काम नहीं लेना चाहिए; बल्कि इसी पक्ष को लेकर अशोक सेक्सरिया से मेरा पत्राचार भी हुआ, जिसमें उन्होंने तथाकथित अनैतिक पिटाई पर गहरी आपत्ति की थी।

दुचित्तापन

साहित्य में जो भी सत्ता बनती है और व्यापक राजनैतिक, सामाजिक जीवन में जो सत्ता बनती है उसकी विष्णु खरे को अच्छी समझ थी, लेकिन उनमें दुचित्तापन भी था, जो बाद में उनकी कविता में भी प्रकट हुआ। उन्होंने ऐसी राजनीतिक कविताएँ लिखीं, मसलन नरसिम्हा राव और सोनिया गांधी पर, जिनसे प्रगट होता है कि राजनैतिक सत्ता को लेकर उनमें दुचित्तापन था। अगर सत्ता से उनको कुछ नज़दीकी का अवसर या कोई संरक्षण या प्रोत्साहन मिलने लगता था, तो फिर वह उस सत्ता के लगभग प्रवक्ता बन जाने से संकोच नहीं करते थे। अपनी बेबाकी और व्यंग्योक्तियों के कारण उनको एक तरह की लोकप्रियता भी मिलनी शुरू हुई। बहुत सारी गोष्ठियों आदि में अगर वह शिरकत करते थे, तो बहुत सारे लोगों को यह अपेक्षा भी होने लगी, जिसको वह दुर्भाग्य से पूरा भी करते थे, कि अब वह किसी न किसी की पिटाई करेंगे। उनको यह भी हुनर हासिल था कि वह, जो विषय है, उस पर बात करते-करते किसी और पर भी एक दुलत्ती लगा देंगे। वह, आगे जाकर, केदारनाथ सिंह और कुँवर नारायण के काफ़ी निकट भी रहे; उनके बड़े प्रेमी भी थे। नामवर सिंह से उनका रिश्ता कुछ बदलता-बिगड़ता रहा। शुरू में उन्होंने ‘आलोचना’ में काफ़ी लिखा; उन दिनों जब मध्य प्रदेश कला परिषद् के अंतर्गत बहुत सारी गतिविधियाँ हो रही थीं, तब उनकी निंदा करते हुए भी लिखा और संस्कृति के अतिरेक से होने वाले ख़तरों का भी ज़िक्र किया। यह सब उन्होंने ‘आलोचना’ पत्रिका के अंतर्गत किया। मैं उनसे ‘पूर्वग्रह’ में लिखने का आग्रह करता था, तो गाहे-बगाहे लिखते थे। कविता-पाठ और वैचारिक परिसंवादों के लिए भी हमारे आयोजनों में आते रहे। इस बीच उन्होंने कई विदेशी भाषाओं में महारथ हासिल कर ली थी। बहुत दिनों तक प्राग (चेकोस्लोवाकिया) में भी रहे। जर्मन साहित्यविद् लोठार लुत्से के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध बने। दोनों ने मिलकर जर्मन में हिंदी कविता और उसके बारे में निबंधों का एक संचयन भी प्रकाशित किया।

‘छोटा शहर’

विष्णु खरे की दो तरह की कविताओं पर शायद उतना ध्यान नहीं गया है। हिंदी में ‘खेल’ पर किसी ने ऐसी कविताएँ नहीं लिखीं, जैसी विष्णु खरे ने लिखी हैं। उन्होंने कुछ ‘महाभारत’ के प्रसंग से भी कविताएँ लिखी हैं। उनकी अधिक लोकप्रिय कविताओं में ‘टेम्पो में घर लेकर एक आदमी कहीं घर बसाने की सोचता है’, ‘लालटेन’ वगैरह हैं। उनकी एक और कविता, जो शायद अलक्षित चली गई, वह चिड़ियों की मृत्यु से संबंधित है, जो उनके शुरू के कविता-संग्रह में है। अकवियों के मुक़ाबले, जिसको अँग्रेज़ी में ‘फोर लैटर वर्ड’ कहते हैं, उसका ज़्यादा सटीक इस्तेमाल विष्णु खरे ने किया, जैसे उनकी एक कविता ‘नौजवान इंस्पेक्टर से दोस्ती करो’। एक तरह से वह छोटे शहर के कवि थे। जब वह महानगर में आ गए, इतने दिन रहे, तब भी उनसे ‘छोटा शहर’ छूटा नहीं। दूसरी तरफ़, महानगर के ऐसे बहुत सारे पक्ष उनके ध्यान में आते रहे जो छोटे शहर वाले के ध्यान में ही आते हैं।

एक और छवि

विष्णु खरे ने थोड़े दिन पत्रकारिता भी की। साहित्य अकादेमी में जब शानी ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संपादक होकर आ गए, तो दोनों में बहुत अच्छी मित्रता थी। उत्तर भारतीय समाज में मुसलमान लेखकों के प्रति जो बे-रुख़ी थी या उनको उनकी प्रतिभा या कृतित्व के आधार पर स्वीकार करने में कुछ संकोच था, उससे विष्णु खरे हमेशा मुक्त रहे। उनकी एक और छवि बनना शुरू हुई कि वह भंडाफोड़ करने में बहुत माहिर हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से पता है कि अगर किसी गोष्ठी में विष्णु खरे हों, हम लोग कई गोष्ठियों में साथ ही होते थे, तो ख़ासकर नामवर सिंह और केदारनाथ सिंह, दोनों, को यह आशंका होती थी कि पता नहीं वह क्या कह दें और किस पर आगबबूला हो जाएँ। वह कुछ न कुछ भंडाफोड़ करेंगे, ऐसी भी उनकी एक छवि बनती गई।

श्रद्धांजलि

यह विचित्र बात है कि हिंदी में क़ायदे की ऑबिच्यूरी (श्रद्धांजलि), बौद्धिक या आलोचनात्मक श्रद्धांजलि, सबसे सटीक व मार्मिक, विष्णु खरे ने ही लिखी है। उन्होंने अज्ञेय की मृत्यु के बाद, उनका आकलन करते हुए जो ‘श्रद्धांजलि’ लिखी, वह उनके स्वयं प्रसारित-प्रचारित पूर्वग्रहों से सर्वथा मुक्त थी। उनमें यह कुव्वत थी। हम लोग मज़ाक़ में कहते थे कि एक अच्छी श्रद्धांजलि पाने के लिए विष्णु खरे से पहले मरना होगा, तभी आपके बारे में वह वस्तुनिष्ठ और थोड़ा ऊष्मा से भरा हुआ आकलन कर सकते हैं।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

विद्यानिवास मिश्र जब नवभारत टाइम्स के संपादक होकर आए, तो विष्णु खरे को जयपुर भेज दिया गया और उनको तरह-तरह से शायद तंग भी किया गया होगा, हालाँकि ऐसा करना उचित नहीं था। पर यह भी है कि वह विद्यानिवास मिश्र का नाम लेकर उन्हें ‘चोटीधारी ब्राह्मण’ कहकर प्रहार करते रहते थे। एक प्रसंग महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय का भी है। विश्वविद्यालय की अनुवाद विद्यापीठ के लिए मुझे लगा कि विष्णु खरे सबसे योग्य व्यक्ति होंगे; उसमें हल्की मुश्किल यह थी कि कार्यकारिणी समिति में विद्यानिवास मिश्र भी थे। इसको ध्यान में रखकर कुछ नाज़ुकक़दमी करना ज़रूरी थी। मैंने विष्णु खरे से बात की; वह राजी थे। मैंने सोचा कि इसके पहले कि उनको विधिवत् प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्त किया जाए, पहले कोई परियोजना देकर उनको विश्वविद्यालय में ले आया जाए। उस समय तक वह फ़िनलैंड के एक महाकाव्य, काले वाला, का अद्भुत अनुवाद कर चुके थे। इतने लंबे महाकाव्य का इतने परिश्रम, समझ और संवेदना से किया गया अनुवाद शायद हिंदी में कोई दूसरा नहीं है। मुझे परियोजना के ब्यौरे ठीक से याद नहीं हैं, पर मैंने उनसे कहा था कि वह यूरोप की कुछ कविताओं का हिंदी में अनुवाद करें। उन्होंने कहा कि अनुवाद करने के लिए उन्हें पंद्रह दिन कई देशों की यात्रा पर जाना पड़ेगा। हर बार उनकी हवाई यात्रा का और वहाँ ठहरने का प्रबंध करना होगा और उनको दैनिक भत्ता भी देना होगा। इसके अलावा सौ डॉलर प्रतिदिन देने होंगे। विश्वविद्यालय तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नियमावली से बँधा हुआ था। यह किया नहीं जा सकता था कि हम उनको सौ डॉलर दें। बात वहीं रह गई, आगे नहीं बढ़ी। इसको लेकर उनके मन में काफ़ी कटुता थी कि मैंने ऐसा नहीं किया, जबकि मैं कर सकता था, जो कि नासमझी की बात है; मैं ऐसा नहीं कर सकता था, क्योंकि मेरे पास ऐसे कोई वित्तीय अधिकार नहीं थे कि मैं किसी को कुछ भी कर दूँ। वैसे मैंने अनौपचारिक रूप से अपनी कार्यकारिणी के कई सदस्यों से यह बात कर ली थी और उन्होंने कहा था कि अगर आपको ठीक लगता है, तो कर लीजिए। मुश्किलें और भी थीं—उनके पास एम.ए. के अलावा कोई डिग्री नहीं थी, जबकि वहाँ पीएच.डी. की अनिवार्यता है। अध्यापन का अनुभव भी थोड़ा-सा ही था।

अंतरराष्ट्रीय सेमिनार

लोठार लुत्से से मेरा थोड़ा परिचय बढ़ा, क्योंकि वह क्राकोव में अतिथि आचार्य के रूप में आते थे। वहाँ मेरी उनसे मुलाक़ात हुई। विष्णु खरे भी थे। हमने ‘यूरोपीय भाषाओं में हिंदी साहित्य’ पर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार क्रॉकोव में किया; उसमें विष्णु खरे आए और लोठार लुत्से भी। भारत से मनोहर श्याम जोशी, श्रीलाल शुक्ल, विनोद कुमार शुक्ल आदि थे और आनी मान्तो व यूरोप के बहुत सारे विदेशी भी आए थे। उस कान्फ्रेंस की संयोजक दो युवतियाँ थीं—-रेनाता चेकाल्स्का और अग्नेशिका। एक दिन इस बात को लेकर दोनों मेरे पास आईं कि विष्णु खरे अजब आदमी हैं। इन दोनों को उन्होंने मेरे विरुद्ध कुछ कहा, मेरे निजी संबंध को लेकर कुछ कहा। उनको वह असभ्य लगा। उनसे कहने की क्या ज़रूरत या क्या दरकार थी, पता नहीं। विष्णु खरे में यह विचित्र तत्त्व था। उन दोनों युवतियों ने शायद इसकी शिकायत लोठार लुत्से से भी की थी।

शुद्ध ईर्ष्या

अगली बार जब लोठार लुत्से भारत आए, तो उन्होंने मुझे फ़ोन किया। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में रुके हुए थे। उन्होंने कहा, ‘‘अगर तुम्हारे पास एक शाम ख़ाली हो, तो मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूँ।’’ मिलने पर उन्होंने मुझसे पूछा, ‘‘विष्णु खरे तुम्हारे इतना विरुद्ध क्यों है? तुम दोनों साथ के लोग हो; तुम्हारी बड़ी दोस्ती रही है। फिर ऐसा क्या हो गया?’’ मैंने अपनी ओर से विष्णु खरे के लिए क्या-क्या किया, इसकी एक छोटी गाथा सुना दी कि मुझे जब भी अवसर आया है मैंने उनको आमंत्रित किया है, उनकी मदद की है, पर इसके बावजूद वह मेरे विरुद्ध हैं तो मुझे नहीं मालूम कि ऐसा क्यों है। शायद उनके स्वभाव में ही होगा; मैं क्या कर सकता हूँ! काफ़ी देर बाद, कोई दो घंटे हो गए, लोठार लुत्से ने कहा, ‘‘नहीं। इसमें कोई और कारण नहीं है, इसका कारण उनकी शुद्ध ईर्ष्या है।’’ मैंने कहा, “ईर्ष्या का कारण क्या हो सकता है? उन्होंने जो तय किया वह नौकरियाँ कीं, पहले अध्यापन में फिर पत्रकारिता में। मैंने भी थोड़े दिन अध्यापन किया फिर दूसरी नौकरी की। इसमें दोनों की स्पर्धा नहीं है। मैंने यह चुना, उन्होंने वह चुना। दोनों में कोई रक़ाबत तो है नहीं। मैंने प्रशासन में ऐसे अवसर जुटा लिए कि संस्कृति के क्षेत्र में कुछ हो; उसमें भी उनको हमेशा शामिल किया, जहाँ तक हो सका शामिल किया। वगैरह।” वह बोले, ‘‘नहीं। इतना तो है न कि तुम लोग साथ के हो! तुम कहाँ पहुँचे, वह कहाँ रह गया?’’ मैंने कहा, “वह कवि हैं। आलोचना उनके स्वभाव में है।” फिर उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘वह मेरा मित्र है; मैं उसका साथ छोड़ूँगा नहीं।’’ मैंने कहा, “आप क्यों छोड़ें? मैं भी उनका मित्र हूँ। मैं भी उनका साथ नहीं छोड़ूँगा। उनकी जो मदद मुझसे हो सकती है, मैं ज़रूर करूँगा।” उसके बाद विष्णु खरे से इस बीच कभी-कभार इधर-उधर मुलाक़ात होती रहती थी, कुछ गपशप भी।

हार्ट सर्जरी

एक दिन पता चला कि विष्णु खरे की तबियत ख़राब है; उनको हार्ट सर्जरी कराने की ज़रूरत है या उनकी हार्ट सर्जरी हुई है। मैंने अपने से फ़ोन करके उनसे पूछा। उन्होंने बताया, ‘‘हाँ’’। मैंने पूछा, “कितना ख़र्चा आया? बिल भेज दो; रज़ा फ़ाउंडेशन से मदद करेंगे।” जहाँ तक मुझे याद है, तीन-चार लाख रुपये थे, जो हमने उनको भेज दिए।

फ़ैलोशिप

उन्हीं दिनों की बात है। मुझे लग रहा था कि मुक्तिबोध की कविताओं का अँग्रेज़ी में कोई अनुवाद ठीक-सा नहीं हुआ है। मैंने विष्णु खरे से कहा कि आपको एक फ़ैलोशिप देते हैं, उसके अंतर्गत यह अनुवाद कर दें। उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है।’’ मुक्तिबोध की कविताएँ लंबी भी हैं, इसलिए अनुवाद के लिए क़रीब पैंतीस कविताएँ चुनी गईं। उन्होंने कहा कि वह इन कविताओं का अनुवाद कर देंगे। इस बीच विष्णु खरे छिंदवाड़ा चले गए। दिल्ली से मुंबई शिफ़्ट कर गए थे। जब मैं भोपाल में था तब एक बार विष्णु खरे, उनकी पत्नी और उनका बेटा आए। उनका बेटा कोई फ़िल्म बना रहा था; उसकी शूटिंग के लिए उसको जहाँ-जहाँ जाना था, वहाँ-वहाँ के कलेक्टर को मैंने फ़ोन करके कह दिया कि इनकी मदद कर दें। वह मदद मैंने कर दी थी।

वक़्फ़े

हिंदी के नाटककार परवेज़ अहमद शानी के दामाद थे। उज्जैन के थे। मैं उनको अलग से भी जानता था। उन्होंने मुझे एक बार बताया, ‘‘मेरा मनीष सिसोदिया, जो दिल्ली सरकार में उप मुख्यमंत्री थे, से अच्छा परिचय है। मैं उनसे बात कर रहा हूँ कि विष्णु खरे को हिंदी अकादेमी, दिल्ली के अध्यक्ष पद पर बुला लिया जाए। आपकी क्या राय है?’’ मैंने कहा, “बहुत अच्छा है। ज़रूर बुला लो।” मेरे पास विष्णु खरे का फ़ोन आया कि मुझे ऐसा प्रस्ताव आया है। क्या सोचते हो? मैंने कहा, ज़रूर आ जाओ। इस बहाने दिल्ली आ जाओगे। अभी दिल्ली अकादेमी मृतप्राय है। तुम्हारे आने से उसे पुनर्जीवन मिलेगा। पहले वहाँ मैत्रेयी पुष्पा थीं और दिल्ली अकादेमी की पत्रिका ‘इंद्रप्रस्थ भारती’ के हर अंक में उनकी तस्वीरें ही छपती थीं, बल्कि तस्वीर के साथ उनका संपादकीय नोट भी छपता था। मैंने उस पर आपत्ति भी की थी; उनको चिट्ठी भी लिखी थी। विष्णु खरे दिल्ली आ गए। उन्होंने आकर बताया कि वह एक अंक केदारनाथ सिंह पर और एक अंक कुँवर नारायण पर निकाल रहे हैं। बहुत उत्साहित थे। उन्होंने दो अंक निकाले भी। मैंने उनसे पूछा कि फ़ैलोशिप के अंतर्गत मुक्तिबोध की कविताओं के अनुवाद का क्या हुआ? उन्होंने कहा, ‘‘मुझे थोड़ा वक़्त मिले, तो मैं उनको अंतिम रूप दे दूँगा। मैंने सब पहले ड्राफ़्ट्स बना लिए हैं।’’ उसके पहले उनको फ़ैलोशिप की अधिकांश राशि दी जा चुकी थी, बावजूद हमारे दफ़्तर के यह कहने के कि उन्होंने कोई रिपोर्ट भेजी नहीं है। चूँकि मैं जानता था कि उनको वित्तीय कठिनाई है, तो मैंने अपने दफ़्तर में कहा कि फ़ैलोशिप की राशि जारी कर दो, रिपोर्ट आ जाएगी। यकायक उनको किसी क़िस्म का स्ट्रोक हुआ। मुझे पता चला; मैं अस्तपाल गया। एक-दो दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई। मैंने परवेज़ अहमद को ही यह ज़िम्मेदारी दी कि वह उनके परिवार से पता कर लें कि अनुवाद की स्थिति क्या है, जब ग़मी का बड़ा वक़्फ़ा बीत जाए। उनके बेटे और पत्नी ने कहा कि हमें ऐसा कुछ नहीं मिला; अनुवाद संबंधी कोई फ़ाइल या काग़ज़ात नहीं मिले।

अतिरेक

विष्णु खरे के मन में कई तरह के दुचित्तेपन थे, उनमें से एक दुचित्तापन मेरे बारे में भी उनके मन में था। अतिरेक से काम लेना उनका स्वभाव था। सुधीश पचौरी ने मेरे ऊपर एक पुस्तक निकाली थी, ‘पाठ-कुपाठ’ नाम से। उसमें उन्होंने विष्णु खरे से एक इंटरव्यू लिया था, जिसमें विष्णु खरे ने यह कहा था कि संस्कृति के क्षेत्र में चार बड़े नाम हैं, अकबर, नेहरू रबींद्रनाथ टैगोर और मैं। एक ओर ऐसा प्रशंसातिरेक और दूसरी ओर उन्होंने एक जगह कहा या लिखा कि हिंदी में मुझसे ज़्यादा ख़राब अनुवादक कोई नहीं है।

हक़ और वाम-दृष्टि

हिंदी में कुछ ऐसे लेखक भी हुए हैं जिनका यह एहसास गहरा रहा है कि उन्हें उनका ड्यू नहीं मिला, कि उनको ऐसा समर्थन या सहायता मिलने का कोई मौलिक अधिकार है। ऐसे कई लेखक हैं जिनको उनका ड्यू नहीं मिला, जिनमें विष्णु खरे भी कहे जा सकते हैं। विष्णु खरे को साहित्य अकादेमी का सचिव बनना चाहिए था। उन्होंने अकादेमी छोड़ी, क्योंकि उस समय इंद्रनाथ चौधरी सचिव होकर आ गए थे। अगर विष्णु खरे सचिव हुए होते तो बावजूद उनके पूर्वग्रहों आदि के अकादेमी को कुछेक प्राणवायु मिलती और वह साहित्य के लिए अधिक मैटर करती बजाय अकादेमिक जगत् के। विष्णु खरे की एक विडंबना यह थी कि उनको लगता था कि हर चीज़ के लिए उनकी पात्रता है और यह उनका हक़ है, जो हक़ उन्हें नहीं मिल रहा है। जैसे, जब उनको मैं विश्वविद्यालय में कोई जगह नहीं दे पाया, तो उनको लगता था कि यह उनका हक़ है और यह उनको मिलना चाहिए। ‘मिलना चाहिए’ के बारे में तो मैं भी सहमत हूँ, लेकिन ‘हक़’ तो बनता नहीं है, क्योंकि आख़िर विश्वविद्यालय नियमों की व्यवस्था से चलते हैं, उनमें मनमानी थोड़ी चलती है! उनका स्वभाव ही ऐसा था। उनका जो स्थायी पूर्वग्रह बना, वह यह था कि तथाकथित भोपाल स्कूल के सब लेखक उनके लिए अग्राह्य थे। इसे उनकी आलोचना बुद्धि की सबसे अक्षम्य चूक कहा जा सकता है; क्योंकि वह कुशाग्र थे, उनको पता था कि ये लोग अधिक प्रतिभाशाली हैं, इनके पास अधिक आलोचना बुद्धि व अधिक कौशल है। यह नहीं हो सकता कि उनको यह पता न हो, लेकिन चूँकि उनको अपनी वाम-दृष्टि के आधिपत्य में रहना था, ये लेखक स्वीकार्य नहीं थे।

‘सतह से उठता आदमी’

विनोद कुमार शुक्ल को लेकर फिर वह अतिरेक पर पहुँचे थे। उन्होंने घोषित कर दिया था कि संसार में उनकी कोटि का कोई लेखक नहीं है। जिन लोगों को वह क़ायदे का लेखक मानते थे, उनमें से ऐसे अनेक थे जिनको मैं भी मानता था—-मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, शमशेर बहादुर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल आदि। एक तरह से यह कह सकते हैं कि कविता के क्षेत्र में उन्होंने फिर भी कुछ न कुछ हासिल कर लिया, पर आलोचना के क्षेत्र में ज़्यादा नहीं कर पाए। उनकी कुछ पुस्तकें सिनेमा और दूसरी चीज़ों पर हैं; उनके कृतित्व का एक पक्ष यह भी था। पर उसमें मेरी बहुत गति नहीं है। मुझे सिर्फ़ यह याद है कि जब मुक्तिबोध से संबंधित मणि कौल की फ़िल्म ‘सतह से उठता आदमी’ दिल्ली में त्रिवेणी कला संगम में दिखायी गई, तो उस समय विष्णु खरे मणि कौल के साथ लगभग शारीरिक सुलूक पर उतर आए थे। उनको वह फ़िल्म इतनी ख़राब लगी थी। यह विचित्र बात है कि वही फ़िल्म निर्मल वर्मा को भी ख़राब लगी थी; उनसे भी इस पर मेरा बहुत झगड़ा हुआ था, पर वह अलग प्रसंग है। अब वही फ़िल्म मणि कौल के पूरे कृतित्व में एक केंद्रीय फ़िल्म मानी जाती है। उस समय कई वामपंथी मणि कौल के ख़िलाफ़ थे, क्योंकि किसी बड़े लेखक को देखने का उनके अलावा कोई तरीक़ा हो सकता था यह मानने को वह तैयार नहीं थे।

अच्छा काम, दुर्गुण भी

मैं हाल ही में दिल्ली आया था और नेमिजी के साथ ही रह रहा था; उन दिनों मुझे सरकारी आवास नहीं मिला था। मुझे यूनेस्को के एक सम्मेलन में भाग लेने जिनेवा जाना था। मेरी उड़ान चार-पाँच घंटे बाद ही थी और मैं एक घंटे के बाद ही घर से निकलने वाला था। तभी विष्णु खरे का फ़ोन आया। उन्होंने मुझे बताया कि पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर की मृत्यु हो गई है। तुम जाने के पहले अगले एकाध घंटे में उन पर एक लेख लिख दो। मैंने कहा, “मैं तो अभी जा रहा हूँ।” वह बोले, ‘‘नहीं। बैठो और लिख दो।’’ मैंने उसी समय बैठ कर मंसूरजी पर एक लेख लिखा और उन्हें भेज दिया। फिर एयरपोर्ट रवाना हुआ। उनमें यह प्रतिभा थी; पत्रकारिता में भी उन्होंने अच्छा काम किया था। लेकिन पत्रकारिता का एक दुर्गुण भी उनमें था कि वह पॉलिमिक्स में बहुत रेटोरिकल हो गए थे, और फिर जैसे दूसरों को इस पर मजबूर करना कि वह उनकी किसी ख़राब आदत को भी हँसते-हँसते सहें। जैसे, उनको कविता-पाठ के लिए बुलाइए, तो वह पाठ के लिए लंबी कविताएँ चुनते थे; कविता-पाठ के लिए पंद्रह मिनट का समय निर्धारित है और वह पैंतालीस मिनट तक कविता-पाठ कर रहे हैं, जबकि दूसरे कवि समय पर अपना पाठ पूरा कर लेते थे। इससे थोड़ी अभद्रता होती थी। लेकिन यह उनका स्वभाव था।

एक प्रसंग

विष्णु खरे ने एक बार मुझसे कहा, ‘‘कल शाम को मंगलेश (डबराल) आया था। बहुत रो रहा था और कह रहा था कि बस एक ज्ञानपीठ पुरस्कार और मिल जाए। मैंने उससे कहा कि तुमको ज्ञानपीठ पुरस्कार पहले कैसे मिल जाएगा! दूसरे इतने बड़े-बड़े वरिष्ठ लोग हैं, उनको छोड़कर तुमको कैसे मिल जाएगा?’’ अब इस तरह की बातें भी वह इधर-उधर उड़ाया करते थे। कितनी सही हैं, कितनी ग़लत हैं, कहना मुश्किल है। मेरी ऐसी धारणा है कि अगर लोगों के बीच कुछ कहा-सुनी, झगड़ा, कुछ भेदभाव हो जाय, तो उनको अच्छा लगता था।

दो बातें

जब कमला प्रसाद मध्य प्रदेश कला परिषद् के सचिव बने, तो मुझे कहीं विष्णु खरे मिल गए और उन्होंने कहा, ‘‘कमला प्रसाद को कला की क्या समझ है! उसमें कला की रत्ती भर समझ नहीं है, पर उनको सचिव बना दिया!’’ फिर जब मध्य प्रदेश कला परिषद् के अंतर्गत होने वाली गतिविधियों में विष्णु खरे को बुलाया जाने लगा, तो मुदित मन जाने लगे। इस सिलसिले में दो बातें कहीं जा सकती हैं। सत्ता की अवसरवादिता और उसकी विकृतियों की बहुत अच्छी पकड़ विष्णु खरे को थी, लेकिन उसी सत्ता से अगर उनको कुछ मिलने लगे, चाहे मान्यता हो, चाहे अवसर हो, चाहे साधन हों, तो उनको कोई संकोच नहीं होता था। उनमें एक क़िस्म की स्वाभाविक दुष्टता भी थी, जो कई बार हावी हो जाती थी, क्योंकि उससे कुछ सार्वजनिक मान्यता मिलने में शायद आसानी होती होगी।

उत्तरार्द्ध

मेरे और विष्णु खरे के बीच के संबंधों के उतार-चढ़ाव, आरोह-अवरोह आते रहते थे, जो उनके जीवन के लगभग उत्तरार्द्ध में बहुत बढ़ से गए थे। हम दोनों शायद इसके दोषी रहे होंगे। इस मामले में मैंने फिर यह रुख़ अपनाया कि अब कोई मुझसे अकारण क्षुब्ध है या ईर्ष्या करता है या मेरी अवमानना करता है, तो मुझे अपने को अलग रखना चाहिए। अपने किसी काम में मुझे उनकी कोई ज़रूरत नहीं थी, कि वह इसलिए रुक जाएगा या उसकी गुणवत्ता में कोई फ़र्क़ पड़ जाएगा, अगर विष्णु खरे नहीं होंगे तो। ऐसा मुझे लगना बंद हो गया था। मैं समझ चुका था कि बावजूद सारी कुशाग्रता के इनकी दुष्टता इनको हर बार कुछ क़ायदे का करने से रोक देगी। मेरे द्वारा की गई उपेक्षा से शायद विष्णु खरे और उत्तेजित व अधिक उग्र होते होंगे, तो मुझे पता नहीं।

कलाओं में रुचि

हम दोनों की दोस्ती का कारण निरा साहित्य नहीं था; उसका सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष साहित्य था ही, पर उसमें दूसरी कलाओं में विष्णु खरे की रुचि भी थी। उनके पास साफ़-सुथरी भाषा थी, जिसका उपयोग वह कई बार कलाओं के बारे में लिखने के लिए करते थे। हिंदी में कलाओं पर लिखने वाले और जो बहुत सारे लोग हैं वे अजब-सी गोलमाल भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसका कोई विशेष अर्थ नहीं लगता, जिसमें हर चीज़ की प्रशंसा होती है। उसके मुक़ाबले विष्णु खरे में ज़्यादा समझ थी और उसके मर्म को पकड़ सकने की क्षमता और उसको भाषा में विन्यस्त करने का भी कौशल था।

नाम लेकर लिखना

विष्णु खरे की अधकचरी या अपरिपक्व कविताएँ बहुत कम हैं, औरों के मुक़ाबले, शायद मेरे मुक़ाबले भी। एक तरह की सावधानी उनके यहाँ शुरू से है और उनका कविता का संसार बाद में और परिष्कृत व विस्तृत होता गया है। कई बार उस विस्तार में उन्होंने कुछ अजब क़िस्म की कविताएँ भी लिखी हैं; जैसे, नरसिम्हा राव पर और सोनिया गांधी पर, पर फिर भी यह कहना ही पड़ेगा कि ये ऐसे विषय हैं जिन पर हिंदी में किसी और ने कविता नहीं लिखी। जिसे तथाकथित राजनीतिक कविता कहा जाता है, वह अंततः तो एक तरह की नामहीन राजनीतिकता है न! विष्णु खरे में कम से कम इतना साहस था कि वह नाम लेकर लिखते थे, जैसे ‘नरसिम्हा राव’ पर लिखी कविता है; उसमें नरसिम्हा राव की बहुत तीख़ी आलोचना है, और सोनिया गांधी पर लिखी कविता, सोनिया गांधी के जीवन की विडंबना को समझने की कविता है।

वह सुदीप बैनर्जी के अध्यापक रह चुके थे; सुदीप बैनर्जी का आरंभिक काव्य-जीवन उनसे प्रभावित है। सुदीप बैनर्जी की जितनी भी दुखद मृत्यु हुई हो, पर यह इतना कारण नहीं है कि उन पर एक पत्रिका का पूरा विशेषांक संपादित कर दें, जो उन्होंने किया। उसके बावजूद सुदीप बैनर्जी कवि के रूप में बहुत प्रतिष्ठित हो गए हों, ऐसा तो नहीं है। सुदीप बैनर्जी ने अपनी वाम सहानुभूति के कारण इनमें से बहुत सारे लोगों को ‘साक्षरता मिशन’ में काम दिया था, उपकृत किया था। शायद उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रहा होगा, जो अपने आप में ठीक ही है, लेकिन साहित्य में ऐसे तो नहीं चलता। पर उन्हीं विष्णु खरे ने शमशेर बहादुर सिंह पर एक पूरा विशेषांक संपादित किया; पाब्लो नेरूदा पर भी किया। ये दोनों विशेषांक बहुत अच्छे थे। उनमें संपादकीय दृष्टि और कौशल दोनों का उत्कर्ष देखा जा सकता है। शमशेर पर यह विशेषांक उन पर निकला श्रेष्ठ विशेषांक है—-इतनी विविध और सुचिंतित सामग्री शमशेर पर अन्यत्र एकत्र नहीं हुई। पाब्लो नेरुदा पर विशेषांक भी किसी विदेशी कवि पर हिंदी में निकले विशेषांकों के लिए प्रतिमान ही है—शायद ही नेरुदा पर किसी और भारतीय भाषा में ऐसा विशेषांक निकला है।

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट