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जीवन से हारते बच्चे : दबाव, डर और टूटती उम्मीदें

दसवीं, बारहवीं और प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम घोषित हो चुके हैं। नतीजों का मौसम ख़ुशियों के बजाय अब डर पैदा करने लगा है क्योंकि आए दिन परीक्षाओं में विफल होने पर बच्चों के आत्महत्या कर लेने की ख़बरें सुनने को मिलती हैं। एक नतीजा जो जीवन का एक छोटा-सा पड़ाव या अनुभव मात्र है—को जीवन की पराजय मानकर युवाओं का इस तरह हार मान लेना चिंताजनक है। आख़िर ऐसा क्या हुआ कि नई पीढ़ी के भीतर का धैर्य और साहस इतना कम हो गया है?

हम अपना समय याद करते हैं। कितने अभाव थे, कितनी परेशानियाँ थीं, लेकिन हमारे ज़ेहन में कभी—कम से कम पंद्रह-सोलह साल की उम्र तक—आत्महत्या का ख़याल तक नहीं आया। वहीं कुछ महीने पहले चौथी कक्षा में पढ़ने वाली एक दस वर्षीय बच्ची ने अपने स्कूल की रेलिंग से कूदकर जान दे दी थी। एक जगह पढ़ा कि एक और छात्रा ने सिर्फ़ इसलिए जान दे दी क्योंकि उसके ‘केवल’ 93 प्रतिशत नंबर आए थे, जबकि उसे 95 प्रतिशत से ज़्यादा नंबर आने की उम्मीद थी। उसके पिता की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी और अपनी माँ के जीवन का वह एक मात्र सहारा थी। किस गुनाह की सज़ा दे रही है यह पीढ़ी अपने माता-पिता को...

यह बहुत ही भयावह स्थिति है। यह ख़तरे की घंटी है। अगर हम अब भी नहीं जागे तो यह मुश्किल बढ़ती जाएगी। हमें समाधान निकालना होगा। हमें सोचना होगा कि वह कौन-सी वजहें हैं जो उनको मजबूर करती है जिससे कि वे एक मामूली-सी असफलता से कमज़ोर होकर जीवन से ही मुँह मोड़ लेते हैं। यह पीढ़ी एक खेल में हार जाने पर भी अपनी जान देने को तैयार हो जाती है।

क्या हम उन्हें जीवन की दुर्लभता और जीवन-मूल्य समझाने में असफल हो गए हैं? क्या हमने उनके आस-पास सुख-सुविधाओं का ऐसा अंबार लगा दिया है कि वे अब थोड़े-से भी अभाव में विचलित हो जाते हैं?

हमें क्या करना चाहिए? सबसे पहले ज़रूरी है संवाद। हम एकल परिवारों में रहने वाले, अपनी-अपनी दुनिया में इतने खोए हैं कि बच्चे अकेले हो गए हैं। अगर माता-पिता दोनों काम पर जाते हैं तो बच्चों के साथ संवाद बहुत कम हो जाता है। जहाँ वे काम नहीं भी करते, वहाँ भी आजकल बच्चे बातचीत से भागते हैं। उन्होंने अपनी (प्राइवेसी) निजता का इतना बड़ा हौआ बना दिया है कि उसके नाम पर वे परिवार से भी दूर होते जा रहे हैं। आज उनके पास अपना कमरा है, फ़ोन है, लैपटॉप है और भी बहुत-सी नई तकनीक के साधन हैं, लेकिन दिल की बात सुनने वाला कोई नहीं।

हमें संवाद से शुरुआत करनी होगी। निरंतर बातचीत करते रहना होगा, ताकि हमें पता चलता रहे कि उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में क्या चल रहा है। इस संवाद में प्रेम बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हम सबको मिलकर बच्चों को एहसास दिलाना होगा कि हम उनसे कितना प्यार करते हैं। उनकी उपलब्धियों से कहीं ज़्यादा उनका ‘होना’ हमारे लिए मायने रखता है। यह प्रेम बहुत तरह से व्यक्त किया जा सकता है—उनके साथ कोई खेल खेलकर, खाने के समय, सोते समय या दिनभर की गतिविधियों के बारे में बात करते हुए। हालाँकि, यह काम बहुत सूझ-बूझ से करना होगा; ज़्यादा पूछताछ करने पर उन्हें यह भी लग सकता है कि उन पर कोई शक किया जा रहा है।

प्रेम के बाद दूसरी महत्त्वपूर्ण कड़ी जिससे हमें उन्हें जोड़ना है, वह है प्रकृति। दिन-रात स्क्रीन में डूबी यह पीढ़ी अपने आस-पास के वातावरण से कोसों दूर हो गई है। मैंने कहीं पढ़ा था कि अगर आपने अपने बच्चों को सूर्योदय और सूर्यास्त का आनंद लेना सिखा दिया, तो वे जीवन में कभी निराश नहीं होंगे। डूबता हुआ सूरज कितना ख़ूबसूरत लगता है! आप उसे देखते हुए अकेले वक़्त बिता सकते हैं। साथ ही वह यह संदेश भी देता है कि जो आज डूब रहा है, वह कल फिर उभरेगा। प्रकृति अपनी हर प्रक्रिया से हमें एक सीख देती है, चाहे वे बदलते मौसम हों, बहती नदियाँ हों या मरुस्थल में खड़ा एक बबूल का पेड़। प्रकृति से संवाद सिर्फ़ पर्यटन के तौर पर नहीं, बल्कि रोज़ हो सकता है। यह बच्चों के जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाएगा। इसी तरह पक्षियों, पालतू जानवरों के साथ समय बिताने पर भी उनका तनाव कुछ कम होगा।

आत्महत्या की इस समस्या से लड़ने का तीसरा और सबसे कारगर तरीक़ा है प्रार्थना। आज की पीढ़ी ईश्वर से बहुत दूर होती जा रही है। हमारे समय में जब परीक्षा ख़राब हो जाती थी, तो हम भगवान के सामने ‘प्रभु सँभाल लेना’ कहते हुए प्रार्थना कर निश्चिंत हो जाते थे। यह कितना आसान था। आज वे ईश्वर के अस्तित्व पर बहस करने लगते हैं। कोई बात नहीं, उन्हें कहिए कि वे जिस भी शक्ति में विश्वास रखते हैं, उससे प्रार्थना करें। वे चाहें तो सूरज को भगवान मान लें, पेड़ को या अपनी कल्पना के किसी सुपरहीरो को, लेकिन किसी एक शक्ति में यह विश्वास होना ज़रूरी है जो सब कुछ ठीक कर सकती है। जो बात आप दुनिया में किसी से नहीं कह सकते, वह ईश्वर या जिसे आप सर्वोच्च मानते हैं, उससे कर सकते हैं। प्रार्थना ने हमें जीवन के कठिन पलों में सहारा दिया है, यह हम अनुभव से जानते हैं।

प्रेम, प्रकृति और प्रार्थना की ओर मोड़ना यह सिर्फ़ शुरुआत है। हमें अपने बच्चों के व्यवहार के अनुसार जो सही लगे, वह करना चाहिए। इस पीढ़ी की सोच बदलने का रास्ता लंबा और मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं। मुझे आज की पीढ़ी की मानसिकता पर पड़ताल करती सीरीज़ ‘Adolescence’ के अंतिम दृश्य का यह संवाद याद आता है— ‘हम बेहतर कर सकते थे।’

बिल्कुल, सिर्फ़ अभिभावक के तौर पर नहीं, बल्कि समाज के तौर पर भी हम बहुत बेहतर कर सकते हैं। हमें नई पीढ़ी को समझाना होगा कि वे समाज में बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं। किसी परीक्षा का परिणाम उनके जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं हो सकता। हमें उन्हें ज़िम्मेदारी का एहसास कराते हुए पराग पावन के शब्दों में यह याद दिलाते रहना है कि :

हम दुनिया को
इतने ख़तरनाक हाथों में नहीं छोड़ सकते,
हमें अपनी-अपनी आत्महत्याएँ स्थगित कर देनी चाहिए।

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