केशव और बिहारी की नायिका का आकर्षक शरीर, आज नमक और हल्दी से भी सस्ता हो गया है।
प्रेयसी नायिका को प्राप्त करने के लिए, नायक को बाह्य उपायों के बाद आभ्यंतर उपायों का प्रयोग करना चाहिए। नायक को चाहिए कि वह नायिका के पैर धोते समय; उसके पैर की अँगुलियों को अपने पैर की अँगुलियों से दबाए, कोई वस्तु लेते-देते समय नाख़ून से उस पर निशान बना दे, हाथ-मुख धोने से बचे हुए जल से नायिका के ऊपर छींटा मारे, एकांत अथवा अँधेरे में एक साथ; एक आसन पर सटकर बैठे हुए नखक्षत करे या चिकोटी काटे और अपने प्रेम-भाव को प्रकट करे। फिर 'मैं तुमसे एकांत में कुछ कहना चाहता हूँ' ऐसा कहकर नायिका के मनाभावों को समझने का प्रयास करे।
जो युवक नायक दरिद्र होते हुए भी वश में रहने वाला हो, गुणहीन होने पर भी अपनी जीविका चला लेता हो—वह वरण के योग्य है, किंतु गुणों से युक्त होने पर भी अनेक पत्नियों वाला पति विवाह के योग्य नहीं होता।
युवती नायिकाएँ अपने प्रेमी युवकों को सामने से नहीं देखतीं, और नायक के द्वारा देखे जाने पर अर्थात् आँखें मिल जाने पर लज्जा से आँखें नीचे कर लेती हैं। किंतु अपने प्रेमी नायक को अपने अंगों को (स्तनादि अंगों को) किसी-न-किसी बहाने दिखा देती हैं। यदि नायक असावधान, अकेला दूर हो तो वह उसे बार-बार देखती है।
दूती को यह विश्वास हो जाए कि नायिका; नायक के प्रति पूर्ण रूप से अनुरक्त हो गई है, तो वह उस नायिका के मन से नायक के प्रति शंका, माता-पिता तथा गुरुजनों का भय और लज्जा निकाल दे।
जब नायिका को यह विश्वास हो जाए कि 'नायक मुझ पर पूर्ण रूप से अनुरक्त है और वह मुकरेगा नहीं अर्थात किसी भी दशा में मुझे छोड़ेगा नहीं' तभी वह संभोग के लिए नायक के कहने पर, अपने कौमार्य को भंग करने के लिए जल्दी करे अर्थात संभोग के लिए तैयार हो।
नायिका को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए, नायक नायिका की विश्वासपात्र सहेलियों तथा धाय की लड़की से मेल-जोल बढ़ाए। क्योंकि वे नायिका के मनोभावों को अच्छी तरह समझकर, उससे नायक के गुणों की प्रशंसा कर, नायक की ओर उसे आकृष्ट कर सकती हैं।
जब नायक को यह विश्वास हो जाए कि मनोभिलाषित कन्या मुझे चाहती है, तो वह उस कन्या की प्राप्ति के लिए उपाए करे।
काम के परवश होने पर भी युवती, नायक से स्वयं संभोग की इच्छा प्रकट न करे। क्योंकि स्वयं अपनी ओर से संभोग में प्रवृत्त होने वाली नायिका अपने सौभाग्य को खो बैठती है, अपनी प्रतिष्ठा नष्ट कर देती है, किंतु नायक की ओर से संभोग क्रिया का प्रयोग (उपक्रम) किए जाने पर अनुकूलता तथा उत्सुकता से स्वीकार कर ले।
नायक-नायिका; दोनों के अनुराग बढ़ जाने पर यदि नायिका नायक की बातों में मन लगाए, तो नायक अवसर के अनुकूल प्रेम की मनोरंजक कथाएँ सुनाकर उसका मनोरंजन करे।
जब नायक-नायिका परस्पर शतरंज आदि खेल-खेल रहे हों, तो नायक नायिका से किसी बात पर बनावटी झगड़ा कर ले और झगड़ते हुए उसका हाथ इस प्रकार पकड़ ले कि मानो उसका पाणिग्रहण (विवाह) कर रहा।
स्त्री का जहाँ मन रम जाए, उसे ही अपना पति बना ले—इस प्रकार की नायिका 'पुनर्भू' कहलाती है।
जो नायक अपने प्रति प्रीति उत्पन्न करना, स्त्रियों का आदर-सम्मान करना और नवोढ़ा कन्या में विश्वास उत्पन्न करना जानता है—वह स्त्रियों का अत्यंत प्रिय होता है।
दूती बनकर नायिका के पास जाने वाली धाय की लड़की, नायिका को समझाए कि और वरों की अपेक्षा, यह वर सब वरों में श्रेष्ठ और विवाह करने के योग्य है। इसके साथ विवाह करके तुम अखंड सुख प्राप्त करोगी।
जब नायिका पूर्ण रूप से सिद्ध (वश में) हो जाए, तब उसके साथ संभोग करने का उपक्रम करे।
जो विधवा नारी अपनी इंद्रियों की दुर्बलता के कारण कामातुर होकर, किसी गुणवान विलासी पुरुष को पति के रूप में प्राप्त कर लेती है, उसे 'पुनर्भू' नायिका कहते हैं।
जो आत्मबल से युक्त है, मित्र संपत्ति से संपन्न है, जो नागरकवृत्ति से युक्त है, जो मनोभावों को समझने वाला है और देश-काल की परिस्थितियों का ज्ञाता है—वह नायक अनायास ही अलभ्या नायिका को प्राप्त कर लेता है।
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नायक अपनी प्रेयसी नायिका को देर तक; बार-बार देखने के लिए अपने घर पर गोष्ठी का आयोजन करे, जिसमें और भी बहुत-सी लड़कियों को आहूत करे। उस गोष्ठी में नायक अन्य लड़कियों के साथ भी गोष्ठी-बातचीत छेड़ता रहे, जिससे उसकी प्रेयसी नायिका भी रुकी रहे। किंतु किसी से घुल-मिल कर बात न करे, क्योंकि स्त्रियाँ घुल-मिल कर बात करने वाले युवक नायक से प्रेम करने में हिचकती हैं और उन्हें कार्यसिद्धि में संदेह रहता है।
चेष्टाओं और इशारों द्वारा अपनी भावनाओं को प्रकट कर चुकी नायिकाएँ, उचित स्थान और उचित समय पर नायक के आग्रह को मना नहीं कर सकतीं, और नायक की प्रार्थना स्वीकार कर संभोग के लिए तैयार हो जाती हैं।