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चुंबन पर उद्धरण

चुंबन प्रेमाभिव्यक्ति

का एक ख़ास स्पर्श है और बेहद नैसर्गिक है कि हर युग हर भाषा के कवि इसके अहसास की अभिव्यक्ति को प्रवृत्त हुए हैं। इस चयन में चूमने के प्रसंगों के साथ प्रेम के इर्द-गिर्द डूबती-इतराती कविताएँ हैं।

जब नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे के पीछे की ओर बैठकर; एक-दूसरे की ठुड्डी पकड़कर थोड़ा पीछे की ओर घुमाकर चुम्बन करते हैं, तो उसे 'उद्भ्रांत' चुम्बन कहते हैं।

वात्स्यायन

नायक के अन्यमनस्क रहने पर, कलह की स्थिति में होने पर अथवा दूसरी ओर ध्यान लगाए हुए हो, अथवा सोने की स्थिति में होने पर, नायक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अथवा निद्रा-भंग करने के लिए नायिका द्वारा किया गया चुम्बन 'चलितक' चुम्बन कहलाता है।

वात्स्यायन

रात्रि में देर से घर लौटे हुए नायक के द्वारा, शय्या पर सोती हुई नायिका का चुम्बन—'प्रातिबोधिक' चुम्बन कहलाता है।

वात्स्यायन

परस्पर प्रीति को उत्पन्न करने वाले अपने अनुकूल आलिंगनादि भावों के अनुसरण से, क्षणभर में नाराज़ होकर मुख फेर लेने से और क्षणभर में ही, परस्पर प्रेम भरी निगाहों से देखने से रति की इच्छा बढ़ती है।

वात्स्यायन

जब नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे के अधरों का कसकर चुम्बन करते हैं, तो 'अवपीड़ितक' चुम्बन कहलाता है।

वात्स्यायन

चुम्बन की बाज़ी में यदि स्त्री हार जाए; तो वह सिसकती हुई हाथ को इधर-उधर कंपित करे, नायक को ठेलकर दूर कर दे, दाँतों से काटे और करवट बदल ले। यदि नायक ज़बरदस्ती अपनी ओर करना चाहे, तो उससे विवाद करे और कहे कि फिर से बाज़ी लगा लो और उसमें भी यदि हार जाए, तो दुगुना हाथ-पैर पटके और रोने लगे। इस प्रकार के चुम्बन-कलह से रागोद्दीपन होता है।

वात्स्यायन

चुम्बन की बाज़ी में नायक के विश्वास के साथ असावधान हो जाने पर, मौक़ा पाकर नायिका नायक के अधर को पकड़कर, अपने दाँतों के अंदर दबोच कर अपनी जीत पर हँसे, ज़ोर से चिल्लाए, धमकाए, ताना मारे, व्यंग्य कसे और नाचने लगे तथा भौहों को नचाती, चंचल नेत्रों से हँसती हुई, मुख से बार-बार, तरह-तरह के व्यंग्य वचन बोले। इस प्रकार के प्रणय-कलह से कामेच्छा जागृत होती है और अनुराग में वृद्धि होती है।

वात्स्यायन

नायक के प्रति संकेतों के द्वारा; अपने प्रेमभाव को प्रकट करती हुई संवाहिका नायिका का, चुम्बन की इच्छा रखने वाली अकामा नायिका के समान भाव प्रदर्शित करती हुई, नींद के बहाने नायक के जाँघों पर अपना मुख रखना और जाँघों का चुम्बन करना प्रेमवर्द्धक होता है।

वात्स्यायन

नायक-नायिका दोनों में जो पहले अधर को पकड़ ले, उसी की जीत होती है।

वात्स्यायन

अपने प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए, संभोगेच्छा प्रकट करने के लिए दर्पण में, दीवार में अथवा जल में प्रतिबिम्बित नायक या नायिका की छाया का चुम्बन करना 'छाया-चुम्बन' कहलाता है।

वात्स्यायन

काम-भावना को प्रकट करने के लिए जैसा पुरुष करे, वैसा ही स्त्री को भी करना चाहिए। जिस प्रकार नायक नायिका पर ताड़ना या आघात करे, उसी प्रकार नायिका भी पुरुष को ताड़ित करे। जिस प्रकार नायक जिस अंग से; नायिका के जिस अंग का चुम्बन करे, उसी प्रकार नायिका भी उसी अंग से पुरुष के उसी अंग का चुम्बन करे।

वात्स्यायन

प्रथम बार संभोग के समय चुम्बनादि का प्रयोग नहीं करना चाहिए, किंतु विश्रब्धिका नायिका में अर्थात नायिका में रत की वृद्धि होने पर विकल्प से प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि इस क्रम से राग की वृद्धि होती है। उसके बाद नायिका में राग-वृद्धि हो जाने पर, काम को प्रज्ज्वलित करने के लिए अत्यंत शीघ्रता से, एक-एक करके अथवा एक साथ चुम्बनादि का प्रयोग करना चाहिए।

वात्स्यायन

सोए हुए नायक के मुख को देखती हुई नायिका; जब किसी विशेष अभिप्राय से चुम्बन करती है, तो उसे 'रागदीपन' चुम्बन कहते हैं।

वात्स्यायन

जब नायक नायिका के दोनों होंठों को अपने होंठों में समेटकर चुम्बन करे, तब नायिका को भी प्रत्युत्तर में नायक के दोनों होंठों को अपने होंठों से पकड़कर चुम्बन करना चाहिए। अगर नायक के मुख पर मूँछें हों तो चुम्बन करना चाहिए, यदि नायक के मुख पर मूँछें हों, तो नायिका को चुम्बन नहीं करना चाहिए। इस प्रकार के चुम्बन को ‘सम्पुटक’ कहा जाता है।

वात्स्यायन

यदि नायिका नायक के अधर को चूमने लगे, तो नायक को भी नायिका के ऊपरी होंठ को चूमना चाहिए। यह चुम्बन 'उत्तरचुम्बित' कहलाता है।

वात्स्यायन

रात्रि में नाटक देखने के समय, अथवा किसी सामाजिक उत्सव में पास में आई हुई नायिका के हाथ-पैर की उँगलियों का चुम्बन करना—'अँगुलि-चुम्बन' कहलाता है।

वात्स्यायन

चुम्बन, नखक्षत और दंतक्षत के प्रयोग में कोई पौर्वापर्य (अनुक्रम) क्रम नहीं होता। अनुराग की अधिकता से; संभोग के पहले इनका प्रयोग प्रधान रूप से करना चाहिए और प्रहणन एवं सीत्कार का प्रयोग, संभोग-काल में करना चाहिए।

वात्स्यायन

जब नवोढ़ा नायिका; नायक के मुख में अपना होंठ रख देती है या नायक, नायिका के मुख में अपना होंठ डाल देता है, तब वह थोड़ी-सी लज्जा को धारण करती हुई; चुम्बन के लिए अपने ओठ को कुछ हिलाती है, किंतु लज्जावश चुम्बन नहीं कर पाती—उसे 'स्फ़ुरितक' चुम्बन कहा जाता है।

वात्स्यायन

नायक के आग्रह करने पर चुम्बन के लिए तैयार कन्या मुख पर मुख तो रख देती है, किन्तु लज्जावश चूमने की चेष्टा नहीं करती। इस प्रकार के चुम्बन को 'निमित्तक' चुम्बन कहते हैं।

वात्स्यायन

ललाट, केश, कपोल, नेत्र, वक्षस्थल, स्तन, ओष्ठ और मुख का भीतरी भाग—ये आठ चुम्बन के स्थान हैं।

वात्स्यायन

चुंबन भी एक कर्मकांड है, किंतु वह सड़ी हुई औपचारिकता नहीं है। पर कर्मकांड वहीं तक स्वीकार्य है, जहाँ तक वह चुंबन की तरह प्रामाणिक है।

लुडविग विट्गेन्स्टाइन

नायक-नायिका जब एक-दूसरे के सामने बैठकर या लेट कर, परस्पर एक-दूसरे के ओठों का चुम्बन करते हैं तो वह 'सम' चुम्बन कहलाता है।

वात्स्यायन

रागवश अर्थात् राग के बढ़ जाने से; कामवश लोग देशाचार के अनुसार विभिन्न अंग-स्थानों का चुम्बन करते हैं, किंतु सभी लोगों को उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

वात्स्यायन

जब नायिका नायक के ओठ को अपने ओठों से थोड़ा पकड़कर; लज्जावश आँखें बंद कर और अपने हाथ से नायक की दोनों आँखें बंद कर, अपने जीभ के अग्रभाग से नायक के ओठों को रगड़ती है, तो उसे 'घट्टितक' चुम्बन कहा जाता है।

वात्स्यायन

राग की अपेक्षा होने के कारण, चुम्बन का सर्वत्र हर समय प्रयोग करना चाहिए।

वात्स्यायन

सम चुम्बन की अवस्था में जब नायक-नायिका, परस्पर अपने-अपने मुखों को थोड़ा तिरछा करके चूमते हैं, तो 'तिर्यक' चुम्बन कहलाता है।

वात्स्यायन

बालक, चित्रकारी और प्रतिमा का चुम्बन और आलिंगन—'संक्रांतक' चुम्बन कहलाता है।

वात्स्यायन

स्त्री को एक हाथ से पुरुष के बालों को पकड़कर; दूसरे हाथ से उसकी ठुड्डी उठाकर उसका मुख चूमना चाहिए, और पुरुष से लिपट कर, उन्मत्त हो दंतक्षत करना चाहिए।

वात्स्यायन

जब संपुटक चुम्बन में रत नायक; अपनी जीभ से नायिका के दाँतों, तालु और जिह्वा को अच्छी तरह रगड़े, तो उसे 'जिह्वायुद्ध' कहते हैं।

वात्स्यायन

कर्णपूर का चुम्बन और नखक्षत एवं दंतक्षत का प्रयोग—ये तीनों बाएँ कपोल के अलंकरण माने जाते हैं।

वात्स्यायन

यदि पत्नी विवाह के पूर्व परिचिता है, तो उन्मत्तयौवना पत्नी का दीपक के प्रकाश में आलिंगन करना चाहिए और यदि विवाह के पहले दोनों का पूर्व परिचय हो, तो अभुक्तपूर्वा लज्जाशील बाला का अंधकार में आलिंगन करना चाहिए।

वात्स्यायन

स्वैरिणी स्त्रियों के साथ रति-प्रसंगों में नायक को उसके मनोनुकूल स्पर्श करना चाहिए। चुंबन के लिए उसके बालों को पकड़ कर, उसे कसकर चिपकाए और ठुड्डी पर अँगुलियों की चुटकी से चिकोटी काटना चाहिए।

वात्स्यायन