कॉकरोच और क्रांति!
विशाल कुमार
09 जून 2026
भारत एक अपवाद है और भारतीयता स्वयं अनेक अपवादों का समुच्चय है। जब भी आपको यह आभास होगा कि आपने भारत को समझ लिया है—इसके लोग, इसकी संस्कृति और इसकी राजनीति आपको पुनः चौंका देगी। भारत का लोकतांत्रिक, आर्थिक और सामाजिक इतिहास ऐसे ही अप्रत्याशित मोड़ों, विचित्र विरोधाभासों और अनपेक्षित परिवर्तनों से निर्मित हुआ है। यही विविधता, यही अनिश्चितता और यही निरंतर परिवर्तन भारत की सबसे बड़ी विशेषता है।
हम मसाला-पसंद लोग हैं। मसालेदार चाय के साथ हमें जीवन में भी मसाला ख़ूब पसंद है। यूँ ही बिग बॉस जैसा टीवी रियलिटी शो नंबर एक नहीं है। हम शांतिप्रिय लोग हैं, लेकिन केओस भी हमें उतना ही प्रिय है। थोड़ा थ्रिलर, थोड़ा सार्काज़्म यहाँ की जीवंतता को पूर्ण करने के लिए अपरिहार्य है। हम चाय की प्याली में समुद्र की लहरों के आवेग-सी क्रांति चाहते हैं। सच कहें, तो हम क्रांतिप्रिय लोग हैं।
अब यहाँ दिक़्क़त यह है कि यहाँ की क्रांति, यहाँ की शांति से टकराती है। समाजशास्त्री कहते हैं कि भारत कभी भी क्रांति का देश नहीं रहा। हमने बाह्य शक्तियों तक को अपने भीतर समाहित कर लिया। ग्रहणशीलता और सहिष्णुता में हम सदैव अव्वल रहे हैं। छिटपुट आंदोलन अवश्य हुए, पर सामाजिक विविधताओं के विराट विस्तार में वे अक्सर बिखर गए। जो नहीं बिखरे, वे भी आधी-अधूरी सफलताओं के साथ अंततः उसी व्यवस्था का हिस्सा बन गए, जिसे बदलने के लिए उठे थे। शायद यही भारत की विशेषता है—यह विरोध को भी आत्मसात कर लेता है और परिवर्तन को भी अपने ढंग से पचा लेता है।
हालाँकि, हमारे साझे स्वप्न में क्रांति का स्वप्न हमेशा मौजूद रहता है। हालिया घटनाक्रम ने इस स्वप्न को एक बार फिर से उद्वेलित कर दिया है। निराश, हताश और व्यवस्था से पीड़ित लोग अपनी टकटकी निगाहें कॉकरोच जनता पार्टी पर लगाए बैठे हैं। उन्हें इसमें बदलाव की एक किरण दिखाई देती है। वे सब कुछ बदल देना चाहते हैं—सब कुछ तो नहीं, लेकिन वह सब जिसे बदलने की ज़रूरत है।
यह अलग सवाल है कि क्या-क्या बदलना है। इस पर तस्वीर अभी साफ़ नहीं है, लेकिन इतना साफ़ है कि वे बदलना चाहते हैं।
सबसे पहले तो शिक्षा मंत्री। फिर शायद सरकार।
फिर?
फिर क्या?
यह सवाल चुभता है, भटकाता है, भीतर एक बेचैनी पैदा करता है और सबसे बढ़कर, सोचने पर मजबूर करता है। हमें सोचना पसंद नहीं। हम कल्पना नहीं करना चाहते। हमें वही समझ आता है जो आसान हो। जो प्रत्यक्ष है, सिर्फ़ वही दिखता है। अदृश्य और कल्पना हमें अक्सर भटकाव मालूम होते हैं, इसलिए जो प्रश्न हमें परेशान करते हैं, हम अक्सर उन्हीं प्रश्नों को निपटा देते हैं। या यूँ कहें कि उनके बारे में सोचते ही नहीं।
यहाँ एक ज़रूरी प्रश्न है कि क्या बिना कल्पना के भी क्रांति हो सकती है?
हमारी क्रांति की अवधारणा क्या है? हमारी विरोध की परिधि क्या है? हमारा विरोध किससे है? इन्हीं प्रश्नों से यह भी तय होगा कि हम विरोध कहेंगे किसे। विरोध को समझना ज़रूरी है। जब तक हम विरोध की अवधारणा को नहीं समझेंगे, तब तक उसके स्वरूप, उसकी प्रणाली और उसके उद्देश्य को भी नहीं समझ पाएँगे।
आज़ादी के पश्चात भारत में यदि दो बड़े आंदोलनों की बात की जाए, तो उनमें जयप्रकाश आंदोलन और 2011 का अन्ना आंदोलन प्रमुख रूप से शामिल किए जा सकते हैं। लेकिन क्या ये आंदोलन क्रांति का रूप ले सके? इसका सहज उत्तर होगा—नहीं।
जाक लाकाँ के शब्दों में कहें, तो वह कहते हैं, “जिस चीज़ की आकांक्षा तुम क्रांतिकारियों के रूप में कर रहे हो, वह एक स्वामी है। और तुम्हें एक स्वामी मिल भी जाएगा।” दरअस्ल, अधिकांश आंदोलन एक स्वामी को दूसरे स्वामी से बदलने की प्रक्रिया भर रह जाते हैं। वे सत्ता तो परिवर्तित करते हैं, लेकिन अक्सर उसी संरचना को नए चेहरों के साथ पुनः स्थापित कर देते हैं।
ग़ौर करने की बात यह है कि क्या सत्ता परिवर्तन से सत्ता के चरित्र में कोई परिवर्तन आता है? भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें, तो ऐसा स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। कई बार तो सत्ता परिवर्तन के बाद परिस्थितियाँ और अधिक जटिल हो जाती हैं।
दरअस्ल, समस्या हमारी कल्पनाशक्ति में है। समस्या विरोध की अवधारणा में ही निहित है। हम समस्याओं की जड़ तक पहुँचते ही नहीं। समस्या केवल सरकार में नहीं है; समस्या पूरी की पूरी उस सभ्यता में है, जिसकी ईंटों पर हमने अपनी समूची इमारत खड़ी कर रखी है। हम उस ईंट को हटाना ही नहीं चाहते। हम तो बस किराएदार को हटाकर ही क्षणिक ख़ुश हो जाते हैं।
क्या कॉकरोच जनता पार्टी भी केवल किराएदार को बदलना चाहती है? इसका उद्देश्य क्या है, यह अभी तक पूरी तरह साफ़ नहीं है। लेकिन इतना अवश्य आभास होता है कि यह मौजूदा किराएदार से ख़ुश नहीं है। इसी नाख़ुशी को यह बदलाव की आकांक्षा में तब्दील करने की कोशिश में जुटी है।
लेकिन यह आंदोलन पिछले आंदोलनों से अलग है। यह एक उत्तर-आधुनिक आंदोलन है। पिछले आंदोलनों के पास विचारधारा थी; वही उन्हें जोड़ती थी, लोगों को घरों से निकलकर सड़कों पर आने के लिए प्रेरित करती थी। इसके विपरीत, यह एक विचारधाराहीन आंदोलन प्रतीत होता है। इसकी कोई स्पष्ट विचारधारा दिखाई नहीं देती। तो क्या बिना विचारधारा के भी आंदोलन सफल हो सकते हैं? या शायद इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कोई आंदोलन वास्तव में विचारधाराहीन हो सकता है?
दरअस्ल, अगर इसे दूसरे चश्मे से देखने की कोशिश करें, तो इस आंदोलन की भी एक विचारधारा है। उत्तर-आधुनिकतावाद और विचारधाराहीनता, दोनों ही एक मिथ्या हैं। उत्तर-आधुनिकतावाद आधुनिकतावाद का प्रतिपक्ष नहीं, बल्कि उसका विस्तार है; उसका ही पूरक है।
विरोध का पूरा इकोसिस्टम इंटरनेट-आधारित है। पूरा आंदोलन लाइक्स, शेयर और फ़ॉलोअर्स से संचालित हो रहा है। यह एक सामाजिक आंदोलन है, जो विखंडित वास्तविकताओं को एक साथ जोड़ने की कोशिश करता है और यही उसका सबसे बड़ा विरोधाभास है। इस सामूहिकता का गोंद बेहद पतला है, कई बार तो यह जुड़ाव पूरी तरह कृत्रिम प्रतीत होता है।
इंटरनेट पर स्वयं को व्यक्त कर पाना, अपनी बात कह पाना और विरोध दर्ज कर पाना हमें यह एहसास कराता है कि हमने सचमुच विरोध किया है। विरोध अब एक सामाजिक और सांस्कृतिक पूँजी के रूप में उभरा है। युवा प्रायः विरोधी स्वर में दिखाई देते हैं, अधिकांश युवा सत्ता-विरोधी हैं। विरोध उन्हें समूह के भीतर एक अलग पहचान प्रदान करता है। विरोध करना सम्मान का प्रतीक बन चुका है। कुछ लोग तो हर चीज़ का विरोध करते हैं क्योंकि उन्हें विरोध के लिए ही विरोध करना है। इन्हें विरोधजीवी कहना ग़लत नहीं होगा।
अब जब समाज में इतना विरोध व्याप्त है, तो यह विरोध किसी और रूप में प्रतिपादित क्यों नहीं होता?
इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। वास्तव में हमने विरोध के तरीक़े भी उसी विचारधारा से ग्रहण किए हैं, जिसके विरुद्ध हम लड़ने का दावा करते हैं। या यूँ कहें कि उसी विचारधारा ने हमें ये तरीक़े उपहार स्वरूप प्रदान किए हैं, ताकि हम विरोध की अनुभूति मात्र से संतुष्ट हो जाएँ। सत्ता को कुछ गालियाँ देकर, सीना चौड़ा कर दो-चार स्टेटस और स्टोरी लगा लें और फिर उसी संतोष के साथ गहरी नींद में सो जाएँ। मगर आंदोलन नींद के सपनों में सफल नहीं होते।
आज तक वही आंदोलन सफल हुए हैं, जिनकी नींव निर्नैतिकता पर टिकी रही है। सत्ता और संरचना द्वारा निर्मित नैतिक तथा अनैतिक अनुबंधों को तोड़ना किसी भी आंदोलन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
आंदोलन की रूपरेखा न पूरी तरह नैतिक हो सकती है, न पूरी तरह अनैतिक। क्योंकि यदि हम सत्ता को उन्हीं औज़ारों से काटना चाहेंगे, जो उसने स्वयं हमें दिए हैं तो जाहिर है कि उन औज़ारों की शक्ति, उनकी सीमा और उन पर नियंत्रण—सबसे अधिक उसी के पास होगा।
फिर भी क्या सचमुच आंदोलन निर्नैतिक हो सकते हैं?
ढूँढ़ने पर हमें हाल के वर्षों में कुछ उदाहरण अवश्य मिलते हैं। 2022 के अग्निवीर आंदोलन को इसमें रखा जा सकता है। किसान आंदोलन को भी इसी श्रेणी में देखा जा सकता है। वैसे किसी आंदोलन की आकस्मिकता और अप्रत्याशिता ही उसकी सबसे बड़ी ताक़त होती है। इन आंदोलनों में आक्रोश होता है और आक्रोश प्रायः निर्नैतिक होता है। वह नैतिक-अनैतिक के हिसाब-किताब में नहीं पड़ता, अन्याय के विरुद्ध, भावनाओं के अतिरेक में वह हर सीमा तक जाने को तैयार रहता है।
ऐसे आक्रोश तभी जन्म लेते हैं—जब संस्थाएँ सड़ने लगती हैं, विश्वास के सारे खंभे दरकने लगते हैं और व्यवस्था अपनी वैधता खोने लगती है। जब विध्वंस ही नए सृजन की पूर्वशर्त प्रतीत होने लगे, तब क्रांति की संभावना जन्म लेती है। क्रांति असल मायने में तभी सफल होती है और यदि सफल न भी हो, तो एक सफल आंदोलन के रूप में वह कुछ न कुछ हासिल अवश्य कर लेती है।
1970 के दशक की संपूर्ण क्रांति ने शायद संपूर्णता के साथ बदलाव न किया हो, लेकिन उसने आने वाली राजनीति की दशा और दिशा अवश्य तय कर दी। आज देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में जेपी आंदोलन से निकले अनेक लोग मौजूद हैं।
यह आंदोलन आज के युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत हो सकता है। 1977 के चुनाव में जब जॉर्ज फर्नांडिस जेल में बंद थे, तब मुज़फ़्फ़रपुर से उन्हें जिताने के लिए युवाओं ने जिस समर्पण और प्रतिबद्धता का परिचय दिया, वह आज भी विस्मित करता है। जॉर्ज फर्नांडिस का बिहार से कोई विशेष नाता नहीं था, फिर भी युवाओं ने उन्हें अपना उम्मीदवार बना लिया।
उनके प्रचार के लिए छात्रों और युवाओं ने जूता पॉलिश तक किया, चंदा इकट्ठा किया, पोस्टर बनाए, गाँव-गाँव और मोहल्ले-मोहल्ले घूमे, नुक्कड़ नाटक किए और जनसभाएँ आयोजित कीं। यह केवल एक उम्मीदवार का चुनाव प्रचार नहीं था—यह एक विचार, एक आकांक्षा और एक आंदोलन में उनकी आस्था का प्रदर्शन था। अंततः जॉर्ज फर्नांडिस भारी मतों से विजयी हुए।
आंदोलन में इस प्रकार की ऊर्जा, सहभागिता और आत्मत्याग आज के इंटरनेट-आधारित आंदोलनों में विरले ही दिखाई देते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं :
उत्तर-आधुनिकता और व्यक्तिवाद के मिश्रण से जिस संसार का हमने निर्माण किया है, उसने सबसे पहले हमें एक-दूसरे से जुदा कर दिया है। विश्वास के सारे स्रोत सूख गए हैं, सामुदायिकता के केंद्र ख़त्म हो चुके हैं। आंदोलन को दशा और दिशा दिखाने वाले लोग नहीं बचे और जो बचे हैं, उन पर विश्वास नहीं बचा।
साथ ही मुझे साहित्य और कला के विध्वंस में भी दिखाई देता है। आज के युवाओं के पास साहित्य के नाम पर बहुत कम बचा है। तीस सेकंड की रीलें और नेटफ़्लिक्स के मिथकीय सिनेमाई संसार उन्हें ज़मीन और सामाजिक यथार्थ से लगातार काट रहे हैं। वर्तमान साहित्य और कला में न चेतना दिखाई देती है, न परिवर्तन की कोई बेचैनी। यह सब अचानक नहीं हुआ है। साहित्य और कला पर जिस प्रकार धीरे-धीरे आक्रमण हुआ है, यह उसी का प्रतिफल है।
ख़ैर, समय के साथ तब्दीलियाँ आती हैं। कॉकरोच जनता पार्टी भी अपने समय की ही उपज है। तमाम संशयों के बावजूद, इसमें आशा के कुछ स्रोत दिखाई देते हैं। इसका उदय किसी गंदे, कीचड़ से भरे तालाब में पत्थर फेंकने जैसा प्रतीत होता है। जो सड़न-सी स्थिरता में कुछ कंपन अवश्य पैदा करती हैं।
इसकी अपनी सीमाएँ हैं, लेकिन इसके बावजूद, प्रदर्शनशीलता और दृश्यता के लिए ही सही, यह सामाजिक और राजनीतिक संरचना में स्थापित कमियों को रेखांकित तो कर रही है। यह उन संस्थाओं को भी कटघरे में खड़ा कर रही है जिनका काम लोकतंत्र को सुदृढ़ करना था, जिन पर हमने सामूहिक रूप से आस्था जताई थी; और जिन्होंने हमारी उसी आस्था के साथ खिलवाड़ किया। इसमें एक गहरा प्रहार तत्कालीन मीडिया पर भी है, जिसके अस्तित्व और विश्वसनीयता पर अब गंभीर प्रश्नचिह्न लग चुके हैं। इस सबके साथ यह समझना भी आवश्यक है कि अंततः यह अपने समय की विचारधारा की ही उपज है और इसलिए उसे पूरी तरह ध्वस्त करने में सक्षम नहीं है। हमें इस आंदोलन से मुंगेरी लाल के हसीन सपने नहीं बुनने चाहिए।
जैसा कि स्पष्ट है, मौजूदा सत्ता भी ऐसे आंदोलनों से लाभान्वित होती है। अन्यथा जंतर-मंतर पर इतने बड़े स्तर पर आंदोलन की अनुमति मिलना कोई साधारण बात नहीं है। जिस जंतर-मंतर पर देश भर से आए मनरेगा मज़दूरों को अनुमति नहीं मिलती, किसानों को अनुमति नहीं मिलती, वहाँ इस प्रकार के आंदोलन को स्थान मिलना—यह संकेत देता है कि सत्ता भी अपने विरुद्ध व्याप्त असंतोष को एक सुरक्षित दिशा देना चाहती है। उसे पता है कि जो लोग स्वयं को कॉकरोच कह रहे हैं, वे कहीं न कहीं अपने ही मायाजाल में फँसे हुए हैं—आत्ममुग्धता से ग्रस्त लोग हैं, जिनके पास प्रदर्शनशीलता और कैमरे के अतिरिक्त बहुत कम है। वे सत्ता के लिए कोई वास्तविक ख़तरा उत्पन्न नहीं करते और सत्ता बड़ी चतुराई से उन्हें वैधता भी प्रदान करती है। इससे वह स्वयं को लोकतांत्रिक दिखाती है और जब चाहे उन्हीं समूहों में मौजूद कुछ अराजक तत्वों को चिह्नित कर पूरे आंदोलन को संदेहास्पद या राष्ट्र-विरोधी भी ठहरा सकती है।
सत्ता में बैठे लोगों को यह भी पता है कि जो सर्वहारा वर्ग दिन-रात कारख़ानों, दफ़्तरों और कंपनियों में घिस रहा है; जो धूल-मिट्टी फाँकते हुए सचमुच कॉकरोच जैसी ज़िंदगी जीने को विवश है। यदि वह सड़क पर उतर आया, तो सत्ता का वर्चस्व ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है। क्योंकि जनाक्रोश की प्रकृति अलग होती है। वह आकस्मिक होता है, अप्रत्याशित होता है, स्वतःस्फूर्त होता है और ऐसे जनाक्रोश अच्छे-अच्छे सिंहासनों को डोला देते हैं। इनके सपने किसी नई सत्ता को स्थापित करने के नहीं होते, उनके सपने एक ऐसी व्यवस्था के होते हैं जो उन्हें कॉकरोच नहीं, मनुष्य समझे। जो उन्हें कॉकरोच से मानव बनाने का वादा नहीं करे, बल्कि उनके भीतर पहले से मौजूद मनुष्य को स्वीकार करे और उसे अधिक बेहतर करें।
किसी को ‘कॉकरोच’ कहना और उससे भी बढ़कर, उस शब्द के अर्थ को आत्मसात् कर लेना—दोनों ही दुखद हैं। यह उस मानसिकता का परिणाम है जो विशेषाधिकारों की छाया में जन्म लेती है।
हम कॉकरोच नहीं हैं।
हम मनुष्य हैं।
हमें मनुष्य रहने दीजिए।
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