04 मई 2026
वे बंगाली लड़कियाँ आततायी नहीं थीं!
वे अनपेक्षित बाढ़ की तरह आती रहीं। उनका पानी मैला नहीं था, न ही उतना साफ़। वे मेरे भीतर बने घर को—जो पहले से खंडहर था और खंडहर करती चली गईं। वे खुला मैदान चाहती थीं, जिसमें वे अपने मुताबिक़ खेलना और
शपथ पर ग्रहण
वह श्वेतवस्त्रधारिणी अचानक मेरे सामने उपस्थित हो गई। उस म्लानमुख, नतशीश नायिका ने आते ही आग्रह किया—“मुझे ग्रहण करें कवि!” मैंने अपरिचय की दीवार को ढाहने के उद्देश्य से प्रश्न किया—“पहले अपना नाम
बल के बारे में
श्रम काग़ज़ है। कर्म हस्ताक्षर। व्यक्ति को अपना काम करना चाहिए। मेहनत से। ईमानदारी से। समर्पण से। सजगता के साथ और अद्यतन कर्मठता से। लेकिन कर्म करने से पहले चुनाव करना ही चाहिए कि कौन-सा काम करने योग्य