शपथ पर ग्रहण
ललन चतुर्वेदी
24 अप्रैल 2026
वह श्वेतवस्त्रधारिणी अचानक मेरे सामने उपस्थित हो गई। उस म्लानमुख, नतशीश नायिका ने आते ही आग्रह किया—“मुझे ग्रहण करें कवि!”
मैंने अपरिचय की दीवार को ढाहने के उद्देश्य से प्रश्न किया—“पहले अपना नाम तो बताएँ सुमुखी!”
उसने नज़रें नीची करके जवाब दिया—“मुझे लोग शपथ कहते हैं।”
मैंने दोहराया—“सपथ!”
उसने कहा—“कवि! आपसे सही उच्चारण की अपेक्षा करना अनुचित नहीं होगा।” अपनी भूल पर मैं संकोच में पड़ गया।
उसने कहा—“कोई बात नहीं सुकवि! मैं पथ की तलाश में भटक रही हूँ। आज तक अनेक लोगों ने मुझे ग्रहण किया, लेकिन कोई साथ नहीं निभा सका। मैं ऐसे नायक को ढूँढ़ रही हूँ जो मुझे साथ लेकर सुपथ पर चले। दुख है कि कोई वैसा नहीं मिला। आपके पास बड़ी उम्मीद लेकर आई हूँ। मुझे निराश मत करें...”
मैंने बिना कोई विलंब किए कहा—“देवी! अपराध क्षमा हो तो एक बात कहूँ?” उसके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए बग़ैर कहा—“मैं सुपात्र नहीं हूँ। मैं आपके योग्य भी नहीं हूँ। आप भली-भाँति जानती हैं कि शायर, सिंह और सपूत—सुपथ पर चल ही नहीं सकते। उनमें भी कवि तो कुपथ पर चलने के लिए कुख्यात हैं। शपथ ग्रहण करने की पात्रता राजनेताओं में होती है। वे समय-समय पर शपथ ग्रहण करते रहते हैं। उन्हें ग्रहण करने का पर्याप्त अभ्यास है। उन्हें इस कार्य का सुदीर्घ अनुभव प्राप्त है।”
मेरी बात धैर्यपूर्वक सुनकर उसने कहा—“सुकवि! आप शब्द-साधक हैं और अगर यह समझ रहे हैं कि मुझे अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से टाल दीजिएगा तो आपकी मनोकामना पूर्ण नहीं होगी।”
थोड़ी देर के लिए हम दोनों के बीच चुप्पी छा गई। मुझे अपने पुराने दिन याद आ गए, जब मैंने प्रेम-पथ पर सफ़र करते हुए सैकड़ों बार शपथ ग्रहण किया था। मुझे याद है, वे सारी शपथें टूट गईं। मुझे अपने पूर्व कर्म पर पछतावा होना अभी शुरू ही हुआ था कि क़समें-वादे, प्यार-वफ़ा वाला सुपरहिट नग़मा याद आ गया। मैं ऊर्जस्वित महसूस करने लगा, लेकिन फिर भी स्वयं को अभिव्यक्त करने में असमर्थ महसूस करने लगा। मेरा लंबा मौन जब उसके क़ाबिल-ए-बरदाश्त नहीं रहा तो उसने लंबी साँस लेकर कहा—“कवि! मैं बहुत थक गई हूँ। यदि कोई मन से मुझे ग्रहण नहीं कर सकता तो त्याग क्यों नहीं देता?” उसने मुझे लगभग निरुत्तर कर दिया। मैं उसकी दीन-हीन दशा से कातर हो उठा।
उस अशरीरी नायिका के साथ मैंने भी जाने-अनजाने में अनेक बार छल किया है। सच कहूँ तो मेरे जैसे अनेक लोग हैं जो इस छल में नियमित रूप से संलिप्त हैं। मैं उन्हें क्यों दोष दूँ जो सार्वजनिक जीवन में रोज़ शपथ ग्रहण करते हैं और मंच से उतरते ही उसे भूल जाते हैं! किस शकुंतला में हिम्मत है कि उन्हें अँगूठी दिखाकर याद कराए कि आपने मुझे ग्रहण किया था। किस कालिदास को फ़ुर्सत है कि शकुंतला की व्यथा दर्ज कर सके। आधुनिक कालिदासों को अपना लिखा छपाने, छपने के बाद विज्ञापित करने और एक-एक प्रति के लिए धन्यवाद ज्ञापन करने से फ़ुर्सत मिले, तब तो किसी का दर्द बाँच सके। अब इस इमोजी-कल्चर में अँगूठा दिखाना ही ज़रूरी और महत् कार्य हो गया है। जो भी हो, इन दिनों शपथ लेना एक प्रकार से पेशा बन गया है। इसके बिना कोई भी आयोजन पूरा नहीं होता। यह अनिवार्य औपचारिकता बन गया है। इसके बिना सेवा अधूरी मानी जाती है। हम स्वच्छता की शपथ लेते हैं और स्थल से लेकर अंतस्तल तक गंदगी से भरे होते हैं। जगह साफ़ करने की कोशिश करते हैं तो वैचारिक प्रदूषण फैलाते हैं। ईमानदारी की शपथ लेने वाले अफ़सर को नोटों की शय्या पर ही नींद आती है।
मैं जहाँ कहीं भी जाता हूँ, शपथ ग्रहण करने वालों की भीड़ नज़र आती है। उन्हें देखकर पंचतंत्र वाले बूढ़े बाघ का स्मरण होने लगता है। मैं डर जाता हूँ, पर बाघ मुझे अंततः कीचड़ में घसीट ही लेता है। यह भय दिनों-दिन इतना बढ़ता जा रहा है कि मुझे हर शपथ लेने वाले आदमी से चिढ़ होने लगी है। मुझे उनपर ज़्यादा विश्वास होता है जो कभी शपथ नहीं लेते। जो आदमी बात-बात पर शपथ लेता है, उससे बड़ा झूठा कोई हो ही नहीं सकता। अब देखिए, विवाह में आदमी शपथ लेता है और पत्नी से सरासर झूठ बोलता है। वह ऐसा इसलिए कर पाता है, क्योंकि वह प्रेमिका से झूठ बोलते-बोलते प्रशिक्षित हो चुका होता है। आदमी सबसे अधिक झूठ अपने इष्ट से बोलता है, क्योंकि उससे उसे अभीष्ट प्राप्त करना है। ऐसा करके वह ख़ूब ख़ुश होता है। आपने देखा होगा देवता अपनी तस्वीरों में सदैव मुस्कुराते हुए दिखते हैं, क्योंकि वे देख रहे होते हैं कि मेरा ही बच्चा मुझे ठग रहा है। जो छोटा-मोटा आदमी है—वह धीरे से किसी के कान में झूठ बोलता है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो जो बड़ा आदमी है—वह झूठ बोलने के लिए समारोह आयोजित करता है, फूल-मालाओं से मंच सजवाता है, मीडिया को बुलाता है, विधिवत सारे कर्मकांड होते हैं, फिर लाउडस्पीकर से सबसे बड़े झूठ को मंत्र की तरह पढ़ता है।
ज्योतिष के जानकार विभिन्न राशि के जातकों पर सूर्य-ग्रहण और चंद्र-ग्रहण के इष्ट-अनिष्ट प्रभाव की भविष्यवाणी करते हैं। परंतु शपथ ग्रहण के प्रभाव के संबंध में सारे पंडित मौन साध लेते हैं। वैसे इस संबंध में कुछ कहने की आवश्यकता भी नहीं है। यह सर्वविदित है कि शपथ ग्रहण का प्रभाव सदैव शुभ होता है, जैसे ही व्यक्ति शपथ लेता है—विशिष्ट हो जाता है। उसकी सुरक्षा चाक़-चौबंद कर दी जाती है। मोटर-बंगला आदि उपलब्ध करा दिए जाते हैं। उसे अभिव्यक्ति की पूर्ण आज़ादी मिल जाती है। शपथ-ग्रहण करते ही वह ऊँचे आसन पर सुशोभित हो जाता है। वह मुहूर्त शुभ होता है, जब कोई मंच पर जाकर शपथ लेता है। सामान्य आदमी का इतना ही सौभाग्य है कि वह इस नयनाभिराम दृश्य को टीवी पर देखकर अपना जीवन धन्य समझता है। उसके मन भी लालसा होती होगी कि कभी उसे भी शपथ ग्रहण करने का मौक़ा मिले, लेकिन ऐसा सौभाग्य इस देश के चुनिंदा लोगों को ही मिलता है; इसे हम लोग लोकतंत्र की ख़ूबसूरती कहते हैं। जो भी हो ताली बजाने की ख़ुशी प्राप्त करने से हमें कोई रोक नहीं सकता।
बहरहाल। हम कवि-लेखकों की आँखें तो अलग होती हैं। हमें शपथ पर लगा हुआ सर्वकालिक ग्रहण दिख रहा है। मालूम नहीं इसे कब मोक्ष प्राप्त होगा?
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बेला पॉपुलर
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