कहानी : प्रेम और अपराध और दंड
आसित आदित्य
09 जुलाई 2026
इतनी बारिश!
इतनी बारिश कब हुई थी, याद नहीं आता। संभव है कभी हुई ही न हो...
गाँव के दक्खिन की तरफ़ की बसावट जिसे कुछ लोग ‘हरिजन बस्ती’ भी कहते थे और उन कुछ में कुछ वे लोग थे जो एक मँझे हुए राजनीतिज्ञ को संत मानते थे कुछ लोग वे जिनका जात-पात में यक़ीन नहीं था और कुछ वे जिनको ‘हरिजन’ कहना नहीं सुहाता था कि एक झोपड़ी में छोटे उर्फ़ लंगड़ा उर्फ़ बड़े का छोटा भाई उर्फ़ घूरे का लड़का उर्फ़ तिलेसरी का लड़का अपनी खाट से उठा।
एक ज़ोरदार बिजली चमकी और फिर भयावह बादलों की गड़बड़ाहट...
तिलेसरी उर्फ़ छोटे की माँ पास पड़े खटिया पर दाईं करवट घुटने मुड़े सोई थी। कितनी तो सूख गई है माँ! देह पर मांस का एक भी लोथड़ा नहीं, चर्बी का एक भी क़तरा नहीं। स्तन-नितंब यों जैसे पिघल चुका मोम। बाबू उर्फ़ घूरे की खाट ख़ाली पड़ी है। शायद घाट-मैदान गए हो। परसों बासी ताड़ी और ताज़ा मछली जो खा ली... पेट ख़राब।
छोटे चंद क़दम आगे बढ़ा कि पाँव फिसले। गिरते-गिरते बचा। छप्पर चूने लगी है। घर बनवाना है। कम से कम एक पक्की कोठरी तो हो जाए कि आँधी-पानी में काम आए। पर घर कैसे बने? घर बड़ा या रोटी? जो कमाओ सब तो रोटी ही खा जाती है। बड़े होता तो घर बन जाता—कम से कम ईंट-पत्थर का जुगाड़ तो अब तक हो ही चुका होता। पर कहाँ है बड़े? नहीं है। जो नहीं है वह नहीं होता है क्या?
यह भला क्या बात हुई कि नीचे से गर्म पानी हम गिराएँ और ऊपर से ठंडा पानी भगवान जी! यही मूतेंगे। यह सोच छोटे झोपड़ी के दरवाज़े पर खड़ा हो, जिसके सामने और भी झोपड़ियाँ थी, मूतने लगा। रात थी वरना देखता कि कैसे ठंडे-साफ़ पानी में पीला गर्म बिला रहा था। एकाकार। पीला गर्म भ्रम। माया...
सामने एक ख़ाली हौदी पड़ी थी। बरसों से वहीं। छोटे ने धार तेज़ करने की कोशिश की; धार तेज़ हुई भी, पर इतनी नहीं की गर्म-पीला पानी हौदी में जा गिरे। उसे बड़े की याद आई। चूँकि बड़े बड़ा था और छोटे छोटा, बड़े का बड़ा था और छोटे का छोटा। तभी तो... तभी तो वरना पाँच-सात फ़ीट दूर तक कौन मूत पाता है!
हालाँकि बड़े के इस कारनामे को गुज़रे बारह-पंद्रह बरस गुज़रे, लेकिन इन दिनों हर जगह छोटे को बड़े दिखाई देता है। ज्यों रेगिस्तान में प्यासे को मरीचिका या कचरे के ढेर पर भूखे को रोटी। पर बड़े नहीं है। कहाँ है बड़े? बड़े वहाँ है, जहाँ उसे नहीं होना चाहिए... पर भला ये क्या बात हुई? इस तरह देखें तो हर कोई वहाँ है, जहाँ उसे नहीं होना चाहिए। हर कोई उस स्थान से पीछे ही है—अपनी योग्यता-दक्षतानुसार—जहाँ उसे होना था। बहस नहीं। वाक़ई बड़े वहाँ है जहाँ उसे नहीं होना था।
बड़े उर्फ़ छोटे का बड़ा भाई उर्फ़ घूरे का लड़का उर्फ़ तिलेसरी का लड़का उर्फ़ ये उर्फ़ वो... कहाँ है?
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बड़े—उम्र बाईस, रंग साँवला, हेयर-स्टाइल अजय देवगन सरीखा, क़द औसत और नाटे के बीच कहीं। शिक्षा : हिंदी पढ़ लेते हैं, लिख भी लेते हैं, बस ‘परिश्रम’, ‘शृंगार’ मत बक देना। पेशा : मौसम व उपलब्धतानुसार—रंगाई-पुताई, भट्ठे पर ईंट पाथना, धान रोपना आदि।
गाँव के ही ठहरे श्रीवास्तव जी। अजय श्रीवास्तव पुत्र कन्हैया लाल श्रीवास्तव। पेशा : कपड़े की एक बड़ी भारी दुकान, बनारस, लखनऊ, इलाहाबाद आदि में ज़मीन, प्रॉपर्टी डीलिंग, ग्राम प्रधान खड़ा करना-बिठाना, काफ़ी हद तक हराना-जिताना भी। इन सबके साथ गाँव के मंदिर की मरम्मत करवाना और उस पर ‘ॐ नमः शिवाय’, ‘जय हनुमान’, ‘श्री गणेशाय नमः’, ‘जय श्री राम’ (‘जय सिया राम’ नहीं) आदि की जगह अपना नाम लिखवाना।
इन श्रीवास्तव जी उर्फ़ अजय भइया उर्फ़ बड़का घराने के मालिक की दो औलादें : अस्मिता उर्फ़ अस्मि उर्फ़ बच्ची और अयान उर्फ़ बाबू उर्फ़ लिटिल स्टार। बच्ची ने क़स्बे के एक कॉलेज से बीए, फिर डीएलएड कर लिया था और अब ‘मैडम जी’ बनने की राह पर अग्रसर थी, वहीं लिटिल स्टार—जो बच्ची से कुल आठ बरस छोटे थे—शहर के एक नामी-गिरामी स्कूल में पढ़ते थे। बस से आते-जाते। टाई-बेल्ट, नीला मोज़ा, काला जूता... यों कि यदि वह दक्खिन से गुज़र जाएँ तो बिन आँखवाला भी कह दे कि चाँद को ग्रहण लग गया।
...एक रोज़ स्कूल में हुआ यह कि बाबू उर्फ़ लिटिल स्टार को उनके बेस्ट फ़्रेंड ने बताया की उनकी मून—जिसका बेस्ट फ़्रेंड पड़ोसी था—का रूम इतना ब्यूटीफ़ुल है कि क्या बताएँ! लिटिल स्टार ने बेस्ट फ़्रेंड को प्रेस किया और सूचनाओं के बवंडर में अब उड़ी कि तब हमारी दुनिया में लिटिल स्टार के हाथ एक बेहद महत्त्वपूर्ण सूचना लगी। उनको मालूम चला कि ब्रह्मांड का वह कोना जहाँ उनकी मून रहती है, सोती है, पढ़ती है—चार रंगों से घिरा हुआ है। हल्का पिंक, स्काई ब्लू, शाइनिंग यलो और... और लिटिल स्टार भूल गए; पर कोई बात नहीं, पता चल जाएगा।
उस रोज़ स्कूल से लौटते ही लिटिल स्टार उर्फ़ बाबू ने मम्मा उर्फ़ मम्मी उर्फ़ मॉम से पूछा कि पापा उर्फ़ डैड कहाँ हैं? नहीं हैं। शाम को आएँ। लिटिल स्टार ने अपनी बात रखी कि उनको अपने रूम का बोरिंग कलर नहीं पसंद। उन्होंने डैड से रिक्वेस्ट की कि वह प्लीज़ उसे चेंज करा दें और यह भी जोड़ा कि पिंक, ब्लू, यलो, रेड कूल लगेगा। श्रीवास्तव जी ने बच्चे को बहुत समझाया; यहाँ तक कहा कि अगले बरस जब लखनऊ वाला घर बनेगा तो वह उसे पूरा का पूरा नीला, पीला, लाल, हरा करवा देंगे; पर अयान तो ठहरे शैतान, नहीं मानें। तब भी नहीं जब मॉम उनको धमकाने के बाद झल्लाई किचन में चली गईं, जहाँ श्रीवास्तव जी द्वारा काली पॉलीथीन में झुलाते हुए लाए गए बकरे का गर्म गोश्त उनकी राह ताक रहा था।
यों एक नई कहानी ने जन्म लिया। लेकिन कहानियाँ तो हर क्षण जन्म लेती हैं... तो क्या? हर मिनट हज़ारों बच्चे लेते हैं जन्म—जंगल में, पहाड़ों पर, झुग्गियों में, बदबूदार-सीलनयुक्त सरकारी अस्पताल के अँधियारे गलियारों में... क्या हो जाता है इससे? बात तो तब हो जब अंबानी, अडानी, टाटा, बिरला के घर प्रकट हो कोई—देवदूत!
एक कहानी ने जन्म लिया था और उस कहानी को दर्ज किया गया, लेकिन इसलिए नहीं कि उसमें बड़े उर्फ़ छोटे के भाई, उर्फ़ एक ‘हरिजन’ की हिस्सेदारी थी, बल्कि इसलिए कि उसमें वह सब कुछ था जिस सब कुछ से हम रचे-बुने गए हैं।
प्रेम कहानी में केवल प्रेम नहीं होता, ज्यों स्वयं प्रेम में।
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केवल एक कमरे के रंग-रोगन की बात थी। चंद दिनों का काम। सो बड़े उर्फ़ पेंटर को याद किया गया।
पहला-पहला दिन था काम का, जब सुबह-सवेरे बड़े-बड़े घर के बाहर अपनी टूटी-फूटी-सिली चप्पल उतारकर घर के अंदर घुसा और काम पर लग गया।
दुकान जाने से पहले मालिक उर्फ़ अजय भइया एक दफ़ा लिटिल स्टार के उस कमरे में आएँ जिसे अब ख़ाली किया जा चुका था, काम का मुआयना किया, तू-तड़ाक में बड़े को हिदायतें दीं और चलते बने।
इसके थोड़ी देर बाद, चूँकि कमरे का दरवाज़ा बड़े की पीठ की तरफ़ था, उसे अंदेशा हुआ कि कमरे में कोई घुसा है। वह पलटा। उसके सामने, अलमारी पर कुछ टटोलता एक खिला गुड़हल—अपने होने को विस्तार देने के प्रयास में रत, एक पका महुआ—अब चुआ कि तब, भोरे-भोर की ताड़ी—सफ़ेद, मीठी, हल्की नशीली।
बच्ची उर्फ़ अस्मि उर्फ़ अस्मिता। हल्के पीले सूट में जिस पर हल्के हरे फूल-पत्ते। गोरी इतनी कि छूने में यह भय कि दगइल न हो जाए कहीं। बाल ज्यों स्प्रिंग, मैक्रोनी, चाउमिन... बड़े ने झट नज़रें फेर लीं। मरना है क्या! आँख निकाल के गाँ... में डाल देंगे मालिक!
दुपहर बच्ची फिर आई। ठंडे पानी की एक बोतल और एक पॉकेट पारले-जी लिए। कोने में पड़े स्टूल पर रखते हुए उसने बड़े से पानी पी लेने के लिए कहा। कुछ बोलो भों... के, कुछ तो बको। नहीं, नहीं—जीभ से क्या-क्या चटवा देंगे मालिक। नहीं...
गुड़हल, महुआ, ताड़ी—जो भी कह लें—कमरे से बाहर चली गई और बड़े के गिर्द एक चटख़ सतरंगी तितली चक्कर काटने लगी।
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दूसरे दिन मालिक के दुकान चले जाने के बाद बच्ची फिर रँगाने-पुताने वाले उस कमरे में आई, कुछ खोजती-सी। नहीं मिला। चली गई। थोड़ी देर बाद फिर आई। बड़े से पूछा कि क्या उसने बाल विकास की एक किताब कमरे में देखी? नहीं। फिर चली गई।
अब की आई कुल तीन घंटे बाद। वही ठंडे पानी की बोतल और बिस्कुट और अबकी आई तो रुक गई। कमरे का मुआयना करने लगी; इधर-उधर पड़ी छोटी-मोटी चीज़ों को उलटने-पलटने लगी, दाहिने हाथ के अँगूठे को छोड़ बाक़ी की चारों उँगलियों के पोरों को चार अलग-अलग रंग के रंगों में डुबो चहकने लगी... और अबकी वह सतरंगी तितली, जो अब तक बड़े के गिर्द चक्कर काट रही थी, ढीठ हो आई और उसके सीने पर बैठ गई।
यों ही उसके आगे चहकती रहे बच्ची तो बड़े पूरी दुनिया रँग दें—लाल, पीला, हरा, नीला... फिर कितना विशाल काली माई तर का बर या भूमिहारों के खेत!
तभी घर के भीतर से एक आहट आई, फ़र्श पर पड़े एक रद्दी अख़बार से एक झटके में बच्ची ने अपनी उँगलियाँ पोंछीं और भाग गई।
अबकी वह भागी तो भागी रही। दिखी सीधा शाम को जब सूरज अस्त हो चुका था, लिटिल स्टार स्कूल से लौट चुके थे, मालिक दुकान से लौटने ही वाले थे और बिजली चली गई थी और बड़े ने काम बंद कर दिया था।
वह गलियारे से बाहर निकल रहा था जब बाईं तरफ़ के कमरे से बच्ची अचानक निकली और उजाले अँधेरे के बीच अटके उस क्षण में बड़े से जा टकराई सीने पर बैठी तितली अचानक बड़ी हो गई बहुत बड़ी और उसने बड़े के होने को उसके जीवन में जो नहीं था उन सबके न होने को और जो हो सकता था पर नहीं हुआ और जो नहीं हो सकता था पर जिसका होना चाहा उसने सब कुछ को अपने पंखों में छुपा लिया।
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छट्ठू उर्फ़ बड़े का दोस्त उर्फ़ बड़े का पड़ोसी ने कहीं से देसी दारू जुगाड़ ली थी उस रात जिसके पीछे सतरंगी तितली ने बड़े को समूचा ढाँप लिया था दोनों यानी छट्ठू और बड़े यानी दो अनुसूचित जाति के जन नहर किनारे सिवान में बैठे पी रहे थे और वह नशे की एक शीतल बयार ही थी जिसमें बड़े बह गया और सब कुछ बक गया चार उँगलियों के चार पोरों पर चार रंग और सात रंगों वाली तितली और प्रेम और मोहब्बत और इश्क़ और लभ...
मारे हँसी के छट्ठू लोटपोट हो गया। बड़े ने उसे जी भरकर गलियाँ दी। ये साले क्या जाने प्यार... जाति, रंग, पैसा देखकर थोड़ी न होता है।
उस रात बड़े खटिया की पाटी पकड़े भर रात लेटा रहा। उसके ऊपर सतरंगी तितली के नाज़ुक परों की सतरंगी चादर थी और उसकी साँवली उँगलियों में मैगी-चाऊमीननुमा बाल उलझे थे।
रात चल रही हो जैसे कछुए की चाल... प्रतीक्षा हिंदी में, उर्दू में इंतिज़ार...
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अगले रोज़ बड़े लाल जल्दी ही बड़े घर की तरफ़ निकल गए। उनका साँवला चेहरा सतरंगी हो आया था। जिससे भी मिलते, मुस्कुराकर। पहली बार उनको मृत्यु से डर लगा था। वे अब जीना चाहते थे; पूरी दुनिया पर नीला, पीला, लाल, गुलाबी रंग पोत देना चाहते थे।
दूर से ही दिख गए मालिक उर्फ़ अजय भइया—छत पर टहल-टहलकर दाँत माँजते। पगला गए हैं क्या हम? बड़े तो ख़ुद को लताड़ लगाई। धराने-पकड़ाने का भय! और फिर सतरंगी छटा बिखेरते वह काली माई के मंदिर पर आ धमके।
वहीं पड़े रहे बड़े लाल—घंटे-दो घंटे। खैनी मलते, पिच-पिच थूकते। तब तक, जब तक कि वह बखत नहीं आन पहुँचा जब वह पिछले दो दिनों से बड़े घर पर दस्तक दे रहे थे।
कहना न होगा कि इस पूरे वक़्त सतरंगी तितली उनके पास ही रही। उनके चर्बीलेस सीने पर बैठी अपने सतरंगी पंखों को फैलाती-समेटती।
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तीन घंटे हो चले थे। अब तो ठंडे पानी और बिस्कुट का वक़्त हो आया था। बच्ची? अस्मि? कहाँ? कहीं गई तो नहीं? बाज़ार? सतरंगी तितली का हाल ऐसा जैसे उसे ज़हरीली गैस के सघन वातावरण में छोड़ दिया गया हो।
वह आई। उसके साथ आई ठंडे पानी की बोतल और बिस्कुट। स्टूल पर रखते हुए उसने बड़े से कहा कि बग़लवाले कमरे में टाँड पर कुछ किताबें हैं, वह उन्हें उतार दे। उसके स्वर में मालिक-सा आदेश नहीं था, बल्कि एक मिन्नत थी—मिठास से लबरेज़। जैसे लौंगलते में होती है या बालूशाही में या मोतीचूर के लड्डू में। बड़े को थोड़ा डर लगा जिसे सतरंगी तितली ने अपने सतरंगी परों से परे ठेल दिया। उसने बाँस की सीढ़ी उठाई और बच्ची के पीछे चल पड़ा। एक टाँग में लहरता भय का करंट, दूजे में रोमांच का।
सीढ़ी का ऊपरी हिस्सा टाँड से तथा निचला फ़र्श से टिकाया गया। बच्ची ने बड़े के बिन कुछ कहे ही सीढ़ी थाम ली। बड़े लाल ऊपर चढ़ें और नीचे आएँ तो यों जैसे एवरेस्ट फ़तह कर। गर्दाई किताबें उन्होंने बच्ची की तरफ़ बढ़ाई। साँवली उँगली से गोरी उँगलियाँ छू गईं। कितने तो पास हैं वह उसके! थोड़ा हिले, आगे बढ़े तो देह से देह सट जाए।
सतरंगी तितली ने पंख फैलाया समेटने के लिए और उसके पंख समेटते-समेटते एक और तितली कहीं से आ बैठी—बड़े की जाँघों के बीच, मीनार के अंतिम तल्ले पर। उजली। चिपचिपी। तितली।
बड़े ने झटके से बच्ची को धर दबोचा। दो देहों के बीच किताबें दबी, मुड़ी फिर फ़र्श पर गिर पड़ी। एक हल्का, हँसी-ठिठोली वाला विरोध था। बस।
दो जिस्म। एक साँवला, दूजा गोरा। एक सवर्ण, दूजा अवर्ण।
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कहानी जो चली तो चलती चली गई। पाँव जो बढ़े तो बढ़ते गए।
वे मार्च के अंतिम दिन थे। गर्मी के गेस्ट रूम में घुस आने के। बेडरूम तक पहुँचने में अभी थोड़ा वक़्त था।
होता यूँ था कि मालिक चले जाते थे दुकान, कभी-कभार दुकान से यहाँ-वहाँ और लिटिल स्टार स्कूल। घर में बचती थी मिसेज श्रीवास्तव उर्फ़ मालकिन और मालकिन की बेटी उर्फ़ बच्ची। ये सस्ते धारावाहिकों का किया-धरा था कि मालकिन भर रात जागती और फिर ये भर रात जागने की देन थी कि वह भर दुपहरिया सोती—हाथ-पाँव फेंक कर ऐसे जैसे सावन-भादों में सड़क पर सड़क हो गए पिचके मेंढक।
इसी बीच वह आती थी—बच्ची, अस्मि, अस्मिता; और हल्की आहट पर भाग जाती। इस दरमियान उजली तितली, चिपचिपी बड़े की जाँघों के आस-पास चक्कर काटती रही।
सतरंगी तितली कहाँ गई? वो तो वहीं थी। दो-दो तितलियाँ। एक सतरंगी, दूजी उजली। दो जिस्म। एकमएक। ज्यों दो छिपकलियाँ। दो साँप।
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काम ख़त्म होने वाला था। लिटिल स्टार को ब्रह्मांड का वैसा ही कोना मिलने वाला था जैसे में उनकी मून रहा करती थी।
यह काम ख़त्म होने के एक दिन पहले की शाम थी, जब बड़े लाल पुलिया पर बैठे छट्ठू को अपना दिल चीरकर दिखा रहे थे, जिस पर बच्ची का नाम लिखा था। वह उदास थे। कल क्या होगा नहीं, कल के बाद क्या होगा ये थी उनकी चिंता। कैसे पोतेंगे वे दुनिया पर नीला, पीला, हरा, गुलाबी रंग जब नहीं होगी बच्ची उनके संग? उनकी नज़र धुँधला गई। उनके साँवले गाल अब गीले हुए कि तब।
छट्ठू को अपने साथी पर तरस आया और किसी पर ग़ुस्सा। किस पर? ये न छट्ठू बता सकते थे, न हम बता सकते हैं। भों... के जन्म लिए तो कहाँ लिए? यहाँ। यहाँ लिए तो किस धरम में? इस धरम में। और जब इस धरम में लिए तो किस जाति में? इसकी माँ की...
ख़ैर, कुछ देर बाद छट्ठू उर्फ़ बड़े के मित्र की मित्र-भावना जागृत हुई और उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ। उन्होंने जी कड़ा किया और ग़ुस्से को परे ठेला।
बड़े की पीठ पर एक धौल जमाते हुए उन्होंने कहा कि वह नाहक़ ही परेशान हो रहा था। उन्होंने उसे ऐसे बताया जैसे याद दिला रहे हों कि वह मोबाइल का युग था, भाटसैप का, यूटूब का। बड़े को थोड़ी राहत मिली। रोज़ मिल न सही, बतिया तो सकेंगे।
अगले दिन साँप-साँप, छिपकली-छिपकली खेलने के बाद लजाते-शरमाते-संकोचाते बड़े ने बच्ची की गुलाबी हथेली पर सलीक़े से चार तह मोड़ा काग़ज़ का एक टुकड़ा रख दिया, जिस पर पिछली रात उन्होंने आड़ी-तिरछी रेखाओं का सहारा लेकर अपना मोबाइल नंबर लिखा था और कोने में एक दिल बनाया था और दिल को चीरता तीर बनाना नहीं भूला था।
दिन ढले काम बंद करते बखत; बड़े घर को छोड़ते बखत बड़े को यक़ीन था कि बच्ची उनसे ज़रूर मिलेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अपना औज़ार-हथियार समेटा बड़े ने, बड़े घर के सामने गड़े हैंडपंप पर रोज़ की तरह हाथ-मुँह धोया और भारी क़दमों से दक्खिन की तरफ़ बढ़ चले।
उजली तितली का कहीं अता-पता नहीं था। हाँ, सतरंगी तितली ज़रूर थी, पर अब सतरंगी नहीं... काली। कौन था जिसने सतरंगी तितली पर राख उछाली थी?
बड़े के साँवले गालों पर खारी बूँद की एक लकीर खिंच गई थी।
‘चल ख़ुसरो घर आपने...’
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दृश्य-अदृश्य आवश्यकता की आड़ में कोई याद करे और फ़ोन करे टूं-टें, पें-पी... कितना वाहियात! लेकिन हमेशा से नहीं, तब से जब बड़े के सीने पर बैठी सतरंगी तितली।
बड़े ने अपने फ़ोन का रिंगटोन बदल दिया था। ‘मेरा दिल भी कितना पागल है...’ बड़े का दिल पागल था, लेकिन उसका जिसके लिए उसका दिल पागल था? बड़े ख़ुद से कहता कि कोई मजबूरी ही होगी जो अब तक उसके फ़ोन ने उसे नहीं बताया कि बच्ची का दिल कितना पागल था। लेकिन छट्ठू को ऐसा कोई गुमान नहीं था, यह अलग बात रही कि उसने बड़े से ऐसा कुछ नहीं कहा।
तीन दिन की क्रूर प्रतीक्षा के बाद एक सुबह बड़े, बड़े घर पर धमक पड़ा। बहाना था मेहनताना, और बहाने की ओट में थी एक झलक की आस, उसकी तरफ़ उछाले गए काग़ज़ के एक टुकड़े की उम्मीद या चोरी-चुपके हथेली में सरका दी गई। एक बार फिर ऐसा कुछ नहीं हुआ। बड़े ने अपनी मजूरी का आधा हिस्सा लेकर एक बार फिर अपने आप को अंतहीन प्रतीक्षा के चौखट पर खड़ा पाया।
भर रात बच्ची से फ़ोन पर कसमसाते बतियाने के बड़े के ख़्वाब, उसको लेकर फुर्र हो जाने का उसका ख़याल, उस ख़याल से उपजा भय और रोमांच—सब पर रात के सन्नाटे में जब तब खारी बूँदें गिरतीं—टप... टप्... टप... और रंगहीन से काली हो जातीं। कौन जाने कि ये वही रहीं जो सतरंगी तितली के परों को काला, काला और काला करती रही थीं!
तितली काली हो रही थी और दुनिया भी। बड़े की आँखों के आगे जब तब अँधेरा छा जाता और लगता कि वह पीछे की तरफ़ अब गिरा कि तब। नींद आती नहीं थी, रोटी निगली जाती नहीं थी।
जैसे-तैसे एक हफ़्ता गुज़रा कि अब बड़े सूरज निकलने के साथ दक्खिन के उस तरफ़ निकल पड़ता जहाँ से बड़का घर साफ़-साफ़ दिखता था। उसे उम्मीद थी कि सुबह-सवेरे वह छत पर बच्ची को अपने बाप की तरह टहल-टहलकर दाँत घिसते देख सकेगा। बड़े की मति मारी गई थी, वह भूल चुका था कि बच्ची वॉशरूम वाली थी, छत-वत वाली नहीं।
इसी बीच एक रात बड़े ने छट्ठू के साथ छक कर देसी दारू पी। ख़ाली पेट ‘अनडिस्टिल्ड’ या ‘नॉट एनफ़ डिस्टिल्ड’ एल्कोहल बर्दाश्त नहीं कर पाया और फिर उल्टी और दस्त की जो झड़ी लगी की बस।
झोलाछाप नाऊ डॉक्टर के घर के सामने पड़ी चौकी पर लेटे-लेटे बाएँ हाथ में ड्रिप लगवाए बड़े इस विचार में तल्लीन था कि दक्खिन की किस लड़की को वह इस काम पर लगाए कि वह बच्ची से मिले, उससे पूछे कि क्या उसका भी दिल पागल है और यदि है (जो है ही) तो फिर बड़े का फ़ोन उसे यह सूचना क्यों नहीं दे रहा? कि तभी छोला-समोसा, चाय-नमकीनवाले दुकान का मालिक नगदू आया और डॉक्टर से उसने आग्रह किया कि वह उसे जल्दी फ़ारिग़ करे। कारण : बड़के घर के लिए समोसा तलना है, बच्ची को देखने...
बड़े के पेट में एक तेज़ मरोड़-सी उठी, लेटे-लेटे उसने अपनी देह का ऊपरी हिस्सा चौकी के बाईं तरफ़ को झुकाया और पेट में जो कुछ भी था उसे पलट दिया। कुछ नहीं था पेट में सिवाय पानी के। बड़े की माँ उर्फ़ तिलेसरी अपने सपूत की तरफ़ लपकी; जिनका पिछले कुछ दिनों से ख़याल था कि बड़का घर में किसी भूत या चुड़ैल आदि का वास है कि वह बड़का घर ही है जिसमें काम ख़त्म करने के बाद उनका बेटा बीमार पड़ा।
डॉक्टर की जली-खोटी सुनते हुए नगदू हलवाई के बिचकते मुँह को तकते हुए और अपनी माँ पर तरस खाते हुए बड़े ने महसूस किया कि सतरंगी तितली जो अब काली हो चुकी थी... तितली नहीं रह गई थी।
यदि बड़े को विश्व-साहित्य में रुचि होती और यदि वह उस घटना के विषय में किसी विश्व-साहित्यप्रेमी से बात करता तो कहता कि उस वक़्त उसे काफ़्का के ‘मेटामॉरफ़ासिस’ की याद आई थी।
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घटनाओं के बीच घटनाएँ सरक आती हैं जैसे खचाखच भरी बसों-ट्रेनों में घुस आते हैं लोग और जैसे वहाँ जगह बन जाती है वैसे ही कहानियों में भी। इससे क्या कि थोड़ी कठिनाई होती है—वहाँ भी, यहाँ भी।
जिस गाँव की बात चल रही है उसमें युवकों की दो मुख्य टोलियाँ थीं—एक दलितों की, दूजी सवर्णों की। एक में सभी चर्मकार थे; दूजे में श्रीवास्तव, मिश्रा, सिंह, राय, पांडेय आदि।
एक शाम की बात है—गाँव के बाहरी हिस्से में स्थित पुलिया पर दलित टोले के कुछ युवक—छट्ठू, छोटू, गोलू, कालू, दीपू, टेलू आदि—बैठ हँसी-ठिठोली कर रहे थे, जब अजय भइया का भतीजा उर्फ़ कृष्ण श्रीवास्तव उर्फ़ कृष अपनी नई-नवेली चमचमाती काली बुलेट पर मोहन मिश्रा और प्रिंस राय को बिठाए पुलिया से फट-फट की कानफाड़ू आवाज़ करते गुज़र रहे थे। बीस वर्षीय दीपू—आई फ़ोन, बुलेट, थार आदि का शौक़ीन—काली, हाथीनुमा दुपहिया पर जो लोभाया कि उसकी दृष्टि उसके साथ-साथ चली और उसका मुँह खुला का खुला रह गया। बुलेट पर पीछे बैठे प्रिंस राय ने यह दृश्य देखा और चुटकी ली, “*** बुलेट चलाई का!” कुछ पुरानी रंजिश थी और दीपू का गर्म लहू था बावजूद इसके कि वह ब्रह्मा की भुजाओं से नहीं जन्मा था कि इस अपमान ने उसकी देह में हलचल पैदा की और वह उठ खड़ा हुआ। प्रिंस ने यह देखा और उसने कृष को गाड़ी रोकने के लिए कहा। रुकते-रोकते गाड़ी पुलिया की दूजे तरफ़ रुकी। प्रिंस, मोहन और कृष ने पलटकर देखा। दीपू ज्यों का त्यों खड़ा था, धधकती आँखों से तीनों को घूरता। सवर्ण गाड़ी फट-फट करते मुड़ी और दीपू के सामने आ लगी। दीपू पूर्ववत्। प्रिंस ने उसे माँ की गाली देते हुए आँखें नीची करने को कहा। दीपू अभी भी पूर्ववत्। सवर्ण लहू ने उफान मारा, पूर्वजों की आत्माओं को ठेस पहुँची, परंपराओं की बेड़ियों ने खन-खन की आवाज़ की और प्रिंस राय उर्फ़ राय साहब का बेटा झट गाड़ी से नीचे उतरा और दीपू को एक ज़ोरदार थप्पड़ रसीद कर दिया।
टोली के बाक़ी सदस्य—जो अब तक बुत बने तमाशा देख रहे थे—लपके, इस उद्देश्य से की बात आगे न बढ़े... बात आगे बढ़ चुकी थी। काली चमचमाती बुलेट की टंकी पर दीपू के टूटते हवाई चप्पल की छाप पड़ चुकी थी। फिर बात बढ़ती गई, बढ़ती गई और इतनी बढ़ी कि छट्ठू ने कृष्ण श्रीवास्तव उर्फ़ कृष उर्फ़ अजय भइया के भतीजे की पीठ पर एक मुक्का दे मारा।
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दक्खिन था वह। वे दक्खिन के मकान थे। मकान क्या थे, झोपड़ियाँ थीं। सो शौचालय नहीं थे। पुरुषों का क्या था, वे दिन-दहाड़े लोटा या पानी की बोतल लटकाए निकल लेते। दिक़्क़त महिलाओं को थी। वे तब निकलतीं, जब जग किन्हीं अदृश्य हाथों द्वारा काली चादर में लपेट दिया जाता।
यह पुलिया पर हुई झड़प के एक रोज़ बाद की बात है। खड़ंजे की तरफ़ गई कुसुम उर्फ़ छोटे की छोटी बहन तेज़-तेज़ कदमों से चलती लौटी और सीधा घर में घुस गई। बाहर खटिये पर लेटे हुए, फ़ोन में घुसे छट्ठू ने नहीं देखा कि उसके बाल अस्त-व्यस्त थे, उसके कपड़े जहाँ-तहाँ से फटे हुए थे, उसकी आँखें रक्तिम थीं, उसके गालों पर आँसू थे और उसके माध्यम से छट्ठू से बदला लिया गया था और दलितों को सबक़ सिखाया गया था और उनको याद दिलाया गया था कि वे क्या थे।
छट्ठू को और परिवार के अन्य सदस्यों को यह बात तब पता चली जब पड़ोस की एक भौजाई कुसुम के लौटने के कुछ मिनट बाद आ टपकी और सबको बताया कि बड़का घरवाले का भतीजा और मिसिरवा का लईका और भुईहरवा वाला ने कुसुम का...
बात फैल गई और फैलते-फैलते बड़े को भी छू गई। पूरे दक्खिन के साथ वह भी छट्ठू के दुआर पर उमड़ आया। फिर क्रोध की लपटों में जलते दक्खिन की युवाशक्ति उसी रात पुलिस चौकी पहुँच गई। “साहब खाना खा रहे हैं, कल आना।” उन्हें सुनने को मिला। अगली सुबह आदेश-सा जवाब आया, दुपहर को। बताया गया कि साहब गश्त पर गए हैं। फिर वे शाम को गए—और जैसा कि होता है—शाम को जानेवालों में शाम के पहले गए में से काफ़ी लोग नहीं गए थे। प्रत्येक जाने के साथ जानेवालों की संख्या घटती रही। शाम को गए में छट्ठू था, उसके माँ-बाप, बड़े, छोटे और दीपू बस। शाम को साहब मिलें और बेहद अपनेपन से उन्होंने पीड़िता के माँ-बाप उर्फ़ छट्ठू के माँ-बाप को अकेले में समझाया कि बड़े लोगों से पंगा लेने में किसी तरह से समझदारी नहीं थी। उनका कहना था कि धीरे-धीरे लोग सब कुछ भूल जाते हैं, सो यह भी भूल जाएँगे। आगे उन्होंने जोड़ा : शादी का क्या है, वह तो लँगड़ी-लूली, अंधी-बहरी की भी हो जाती है।
लब्बोलुआब यह कि रपट नहीं लिखी गई। पुलिस चौकी के प्रांगण में गड़े सरकारी हैंडपंप के पास बैठे चारों युवा तिलमिलाए... पर पीड़िता के बेबस और भयाक्रांत माँ-बाप के हथजोड़ी के आगे बेबस थे।
कुछ ही दिन गुज़रे कि पुलिस चौकीवाले साहब की बात पूर्णतः न सही, परंतु आंशिक रूप से सच होती नज़र आने लगी। लोग पूर्णतः तो नहीं पर आंशिक रूप से जो हुआ था उसे भूल गए। साफ़-साफ़ कहें तो लोगों ने यह तो याद रखा कि किसके साथ क्या हुआ था और किसने किया था, लेकिन लोग यह भूल गए कि क्यों हुआ था। हर बार की तरह लोग इस बार भी नहीं समझें कि ‘क्यों हुआ था’ में ही होना था, और बग़ैर ‘क्यों हुआ था’ को समझे होने को नहीं रोका जा सकता था।
हालाँकि एक अपवाद था—बड़े। एक और अपवाद गढ़ता—छट्ठू।
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महीना भर रीता कि एक शाम बड़े को बच्ची दिखी और फिर हर-हर शाम दिखने लगी। बड़े बच्ची को देखने लगा पर उस देखने की तरह नहीं जिसकी आड़ में स्वप्न पलते थे—उसकी त्वचा की गंध अपने नथुनों में भर लेने के, उसके मैगी-चाउमीननुमा बालों को अपनी उँगलियों में उलझा लेने के, ठसाठस भरी पैसेंजर ट्रेन की जनरल बोगी में उसे ले कहीं दूर निकल जाने के। इस देखने में दुःख था कि उसे तज दिया गया था, क्रोध था कि उसका इस्तेमाल किया गया था, घृणा थी कि वह उसका भाई था, जिसने कुसुम के साथ... कि वह सवर्ण थी और ‘उस’ पाले की थी।
बच्ची दिखने लगी। क्यों और कैसे? तो ऐसे की कोई फ़ितूर उस पर सवार हो चला था—अच्छे वर का या वर से निभने का या वर को पूजा-पाठ वाली कन्या चाहिए, सो अभ्यास का। कारण जो भी रहा हो, बच्ची दिन ढले नहा-धोकर हाथ में लकड़ी की छोटी-सी डोलची लटकाए जिसमें माचिस, अगरबत्ती, फूल-पत्ती, दीया-बाती आदि सलीक़े से सजाकर रखे होते, नंगे पाँव गाँव के शिव मंदिर की तरफ़ निकल पड़ती। कभी लिटिल स्टार उर्फ़ उसके छोटे भाई उसके साथ होते, कभी नहीं होते।
बड़े अक्सर उसे देखता, कहीं मिले तो पलटकर न देखना उसको की तरह। वह बड़े को देखती कभी-कभार न देखना चाहने की तरह। बड़े का दिल कहता कि वह उसे देखती है अछूत की तरह।
रूप बदलती तितली रूप बदलती रही। अब तेज़ी से। वह और काली होती गई। इतनी काली जितना शिव मंदिर का शिवलिंग...
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अप्रैल का महीना था जिसमें अप्रैल-सी गर्मी थी। तन-बदन पसीने से तर। बग़लों से उठती बदबू। साँझ के झुरमुट में वे बड़े और छट्ठू थे, छट्ठू और बड़े, मंदिर के दाहिने तरफ़ घने बबूलों और झाड़ियों में छिपे-लुकाए।
बच्ची आती दिखी। हल्के नीले सूट में, हल्के गीले बाल पीछे की तरफ़ रबर से बँधे। दाहिने हाथ में लटकती वही छोटी डोलची, और डोलची में रखा वही सब—अगरबत्ती, माचिस, दीया, बाती, फूल, गंगाजल...
उकड़ू बैठे बड़े ने अपनी उत्तेजित आँखें 360 डिग्री के कोण पर घुमाई। कहीं कोई नहीं था, सिवाय दूर सिवान में लौटती नीलगायों के एक झुंड के।
बच्ची ने मंदिर की सीढ़ियाँ छूने के लिए अपने गोरे लचकदार जिस्म के ऊपरी हिस्से को झुकाया कि तभी बड़े ने पीछे से उसे जकड़ लिया; उस तरह नहीं जैसे वह लौटते ठंड की दुपहरियों में एकमएक होते थे, साँप-छिपकली की तरह नहीं। लपककर छट्ठू ने अपने मटमैले गमछे से उसका मुँह बाँध दिया। फिर वह उसे कुछ-कुछ घसीटते, कुछ-कुछ हवा में उठाए मंदिर के उस तरफ़ ले गए जो ऊसर था, जहाँ फ़सल नहीं होती थी, जहाँ की मिट्टी थोड़ी बलुई थी और बहुत कंकड़ीली और जिस पर कँटीली झाड़ियों का आधिपत्य था।
दोनों—बड़े और छट्ठू, छट्ठू और बड़े—ने एक नाज़ुक-नर्म छटपटाते पसीने से तरबतर गोश्त के टुकड़े को झटके से उसी ऊसर में लेटा दिया। सिर की तरफ़ बैठा बड़े, अपनी टाँगें सामने की तरफ़ फैलाए, दो हाथों को पीछे की तरफ़ खींचे, अपनी मुट्ठियों में दबाए। वहीं झटकते पैरों को अपने एक हाथ से सँभालने की जुगत में लगा छट्ठू—जैसा कि तय किया गया था—अपने एक हाथ से अपनी पैंट सरका रहा था।
बड़े की जाँघों के आस-पास तितली नहीं उड़ी। उजली। चिपचिपी। तितली।
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क्या क्या कहें कितना कहें और किस विध कहें कि छट्ठू जो कर रहा था वह होने के बाद बड़े ने डाँट डपटकर उसे घर भगा दिया कि छट्ठू के हाथ-पाँव फूलने लगें भर रस्ते उसे लगता रहा कि कोई उसका पीछा कर रहा था कि घर पहुँचते ही उसके सामने चूल्हे पर कुसुम दिखी और वह वहीं ढेर हो गया कि देर रात गए जब उसकी आँख खुली या खोली गई तो एक बार फिर सामने कुसुम को देख वह ज़ोर ज़ोर से चीख़ने लगा कि वह भय खाने लगा कुसुम से बच्ची से या अपने आप से कौन जाने!
वहीं दूसरी तरफ़ घटना-स्थान पर, नंग-धड़ंग छटपटाती बच्ची के दोनों हाथ जकड़े बैठा बड़े तितली, दुपहरी, ट्रेन, फ़ोन आदि बड़बड़ाता रहा। फिर अचानक बच्ची का एक हाथ छोड़ पास पड़ी बीयर की एक बोतल उठाई और अपने सिर पर दे मारी। लहू की एक धार फूटी, गोरे मुखड़े पर गिरी—गर्म जैसे उजली चिपचिपी तितली बच्ची की मांसल जाँघों पर चिपकी। उसने एक बार फिर, अंतिम बार, ख़ुद को उस चांडाल के चंगुल से छुड़ाने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगाई और... और बीयर की टूटी बोतल का नुकीला हिस्सा उसकी गोरी गर्दन में उतर गया। लहू का एक फ़व्वारा उछला। सवर्ण और अवर्ण लहू मिले, एक-दूजे में खो गए। एकमएक। साँप। छिपकली।
यह तो बहुत बाद में—जब अतीत की दिशा से एक तेज़ अंधड़ चला—बड़े के भीतर बैठे हत्यारे ने उसे बताया कि हत्या करने वाला दरअस्ल बड़े नहीं था कि यह तो प्लान में ही नहीं था कि वह तितली थी—पहले सतरंगी, फिर काली, फिर बिच्छू में बदल चुकी। ज़हरीला काला बिच्छू। हवा में ज़हरीली पूँछ लहराता।
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काफ़ी देर बाद भी जब बच्ची की घर वापसी नहीं हुई तब—चूँकि मिस्टर श्रीवास्तव दुकान से अभी लौटे नहीं थे—मिसेज श्रीवास्तव ने तहक़ीक़ात करने लिटिल स्टार को भेजा जो थोड़ी देर बाद ‘दीदी नहीं दिखी’ के साथ लौट आएँ। घबराई मिसेज श्रीवास्तव ने मिस्टर श्रीवास्तव को फ़ोन किया। मिस्टर श्रीवास्तव बाहर-बाहर ही झट मंदिर पहुँचे। बच्ची का कुछ अता-पता नहीं। फिर कृष आया, उसके साथ मोहन आया, उसके थोड़ी ही देर बाद प्रिंस आया, फिर अन्य सवर्ण युवाशक्ति आई, फिर पूरा सवर्ण समाज आया... और थोड़ी ही देर बाद क्या सवर्ण, क्या अवर्ण!
वह तो रोमांच के क्षीण हो जाने पर घर लौटने से पहले जनेऊधारी एक बुढ़ऊ ने ऊसर में निपटने की ठानी और ज्यों टॉर्च की चमकती-चमकाती गोलाई ख़ून सने एक मुंडी पर पड़ी, वह चीख़ पड़े।
सायरन बजाती पुलिसिया गाड़ी आई, फिर गाड़ियों का एक जत्था आया, तेज़ नाकवाला एक कुत्ता आया, आस-पड़ोस के गाँवों के लोग आए, क्षेत्रीय पत्रकार आए...
बाक़ी बस इतना कि घटना-स्थान से एक मटमैला गमछा बरामद हुआ जिसकी पहचान अगले रोज़ ही की जा सकी थी कि अगले रोज़ बड़बड़ाते और रह-रहकर चीख पड़ते छट्ठू को घसीटकर पुलिस जब पुलिसिया गाड़ी में ठूँसने का प्रयास कर रही थी तभी कृष प्रिंस मोहन समेत दर्ज़नों सवर्ण युवाओं का हमला हुआ और पुलिस की मौजूदगी में दक्खिन के बीचोबीच लाठी हॉकी लात घूसों से पीट पीटकर छट्ठू की हत्या कर दी गई कि अजय भइया के विधायक मामा ने पुलिस पर दबाव बनाया और बनवाया और मात्र दो दिनों में हत्या की गुत्थी सुलझा ली गई कि अपराधी छट्ठू और बड़े थे... एक मृत, दूजा लापता।
बड़े का न होना उसके परिवार और दक्खिन टोले के कई युवकों पर क़हर बनकर गुज़रा। इन सबमें जिसकी सबसे अधिक साँसत हुई तो वह छोटे उर्फ़ बड़े का छोटा भाई था। वह पुलिसिया हिंसा थी, शक्ति-संरचना का स्याह पक्ष था, जिसने उसे उम्र भर के लिए लँगड़ा बना दिया।
फिर एक दिन बड़े पकड़ा गया—रेलवे स्टेशन पर। क़ानून के लंबे हाथ! यह अलग बात है कि जब तक कोई नेता-परेता या रुसूख़दार उँगली न करे, तब तक यही क़ानून ‘शोले’ का ठाकुर बना रहता है।
ख़ैर, बड़े पकड़ा गया!
पत्रकार बंधुओं के सामने सीना फुलाए बैठे पुलिस के एक उच्च अधिकारी ने बताया कि हत्यारा मुंबई भागने की फ़िराक़ में था कि उसके पास से चरस बरामद हुआ है कि वह लंबे अरसे से अपराध में लिप्त था और कई आपराधिक घटनाओं को अंज़ाम दे चुका था कि पुलिस उसके साथियों की तलाश कर रही है।
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अनुत्तरित रह गए प्रश्न लौटते हैं, लौटते रहते हैं और उनके लौटने की आवृत्ति ही उनके होने का वज़्न बयान करती है।
प्रश्न कि बड़े कहाँ है का उत्तर अभी भी हमारे पास वही है, जो पहले था : बड़े वहाँ है, जहाँ उसे नहीं होना चाहिए। कम से कम छोटे का तो यही मानना है। आप की आप जानें।
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बेला पॉपुलर
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