मार्जान सतरापी : एक स्त्री और पैग़म्बर बनने का ख़्वाब
अभिषेक कुमार सिंह
09 जुलाई 2026
एक बात हमेशा से खटकती रही है और शायद आने वाले समय में और भी खटकने लगे, आख़िर क्यों किसी लेखक को सर्वविदित होने के लिए अपनी मौत का इंतिज़ार करना पड़ता है? एक उभरते और शायद गुज़रते हुए साहित्यकार बता रहे थे कि एक लेखक की विकास-यात्रा में उसकी मृत्यु ही उसके प्रकाशक के लिए सबसे ज़रूरी प्रचार-सामग्री होती है; ज्यों लेखक रुख़्सत हुआ, उसका संपूर्ण साहित्य नए कलेवर में बिना किसी शर्त के बाज़ार में अवतरित हो जाता है।
ख़ैर, मार्जान सतरापी को इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी; लेकिन हिंदी के सामान्य पाठकों तक उनकी ‘पर्सेपोलिस’ पहुँची कुछ यूँ ही। उनके बचपन और उनकी वापसी की कहानी सिर्फ़ ईरान ही नहीं, शायद पूरी आधी आबादी की अनकही कहानी है।
यहाँ मेरा व्यक्तिगत कौतूहल बस इतना ही है कि कैसे कोई बच्ची इतनी कल्पनाशील हो गई कि उसने पैग़म्बर बनने का ख़्वाब देख लिया? आख़िर यह ख़्वाब उठा कैसे? औरों को ऐसे सपने कभी क्यों नहीं आते? अगर हर देश के बहुत सारे बच्चे पैग़म्बर बनने का ख़्वाब पालते तो यह दुनिया आज कैसी होती? मुझे तो अब लगता है कि शायद आइंस्टीन ने भी बचपन में पैग़म्बर बनने का ख़्वाब ज़रूर देखा होगा।
स्कूल के दिनों में, जहाँ तक भी मेरी स्मृतियों का दायरा है, एक सवाल उमड़-घुमड़कर हर बार वापस आता था और एक समय तो इसका उत्तर सुनियोजित और सुसंस्कृत तरीक़े से कंठस्थ करवाया जाता था—“व्हाट डू यू वांट टू बी इन योर लाइफ़?” ...तुम क्या बनना चाहते हो—यह सवाल और इसका जवाब ही किसी भी बच्चे की पृष्ठभूमि से लेकर उसकी अभिरुचि और उसकी सतत आलोचना का पैमाना बन जाता था।
इलाहाबाद के कमोबेश सारे अँग्रेज़ी स्कूलों में डॉक्टर सबसे तार्किक ख़्वाब माना जाता था। बाक़ी शहर के मिज़ाज के हिसाब से कुछ जुनूनी लोग कलाकार, सैनिक और फिर कैफ़ और कलाम साहब के उदय के बाद तो स्कूलों में खिलाड़ी और वैज्ञानिक बनने के ख़्वाब भी स्वीकृत होने लगे थे। संगम के किनारे धर्मगुरु बन जाने के तो उधर पुराने शहर में इमाम बनने के भी कुछ सपने थे, लेकिन कल्पनाओं की आख़िरी सरहद तक पैग़म्बर बनने के ख़्वाब की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं होती थी।
मार्जान सतरापी एक ज़रूरत से ज़्यादा ख़ूबसूरत दुनिया का ख़्वाब देखती थीं और उस ख़्वाब को पूरा करने के लिए वह गुपचुप तरीक़े से पैग़म्बर हो जाना चाहती थीं; ऐसा पैग़म्बर जिसका दिमाग़ कार्ल मार्क्स का हो और दिल ज़रथुष्ट्र का हो, वह पैग़म्बर सब कुछ ऐसा कर दे जिससे सतरापी की नौकरानी उनके परिवार के साथ एक ही मेज़ पर खा सके और खिड़की के उस पार रहने वाले अमीर लड़के से बिना शर्त इश्क़ भी कर सके! उस पैग़म्बर का प्रभाव ऐसा हो जिससे स्कूल की टीचर्स हर सवाल का जवाब देने को बाध्य हो और शायद जेंडर-फ़्लूडिटी जैसा भी कुछ हो ही जाए। लेकिन मार्जान सतरापी का पैग़म्बर यकायक ग़ायब हो जाता है, इस्लामिक क्रांति की हलचल हर ओर फैल जाती है, नए कलेवर में युद्ध लंबे समय तक चलता रहता है और सब कुछ सही करने के लिए चहुँओर पहरा बैठा दिया जाता है।
मार्जान सतरापी की आत्मकथा बार-बार तसलीमा नसरीन और बराक ओबामा के संस्मरणों की याद दिलाती है; लेकिन सतरापी का परिवार ख़ालिस लिबरल है, वह ख़ुद ज़रूरत से ज़्यादा बाग़ी हैं और एक लड़खड़ाती सभ्यता में फँसे देश को बदल डालने का ख़्वाब है; वहीं तसलीमा नसरीन ईमानदारी से कौतूहल की हद तक रूढ़िवादी परिवार और भ्रमित राष्ट्र के बीच अटके हुए बंगाली समाज को अंत तक जीती जाती हैं। ओबामा एक राष्ट्र का स्वप्न और एक पहचान की जीत के स्वप्न के बीच भरपूर संभावनाओं को तलाशते हुए आगे निकल जाते हैं।
सतरापी आगाह करती हैं उन अभिभावकों को जो ख़ुद खुले विचारों के झंडाबरदार तो होते हैं, लेकिन अपने बच्चों के विप्लववादी लहज़े से हमेशा असुरक्षित महसूस करते हैं; सतरापी उन नवजवानों को भी आगाह करती हैं जो विप्लववाद के ख़ुमार में पश्चिम की वैचारिक ग़ुलामी करने लगते हैं; उनकी मौत के बाद ‘पर्सेपोलिस’ पढ़ने का मुख्य आकर्षण था—प्रकाशक का इसका विश्व की पहली चित्रात्मक आत्मकथा के तौर पर प्रस्तुतिकरण। भारत में ‘अमर चित्र कथा’ और ‘चाचा चौधरी’ के पाठकों की पीढ़ी शायद ही कभी सोच सकती थी कि चित्रात्मक कार्टून भी एक बौद्धिक एवं संवेदनशील विमर्श का आधार होते हैं; सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि सतरापी ने सारे चित्र ख़ुद बनाए हैं, जो कि उनकी उसी क्षेत्र की अकादमिक कुशलता का परिणाम है—लेकिन यह असंभव-सा लगता है कि पूरे जीवन को असंख्य पंक्तियों में बाँधना और हर पंक्ति के लिए एक चित्र दर्ज कर देना। वह इतनी ज़हीन हैं कि अपने बदलते चेहरे से ईरान का दमन और ऑस्ट्रिया के समाज का भटकाव और दोहरा चरित्र दोनों ही दिखा देती हैं।
सबसे ज़रूरी बात सतरापी की नज़रों में यह है कि अगर ईरान खुले तौर पर कट्टर एवं दमनकारी है तो वहीं पश्चिम का समाज आंतरिक तौर पर रूढ़िवादी है; अगर ईरान में मॉरल पुलिसिंग है तो ऑस्ट्रिया में कैथोलिक हॉस्टल और अप्रवासियों के साथ दोयम दर्जे के नागरिक जैसा बर्ताव है; ईरान में अगर लिपस्टिक और पॉप म्यूजिक पर पहरा है तो ऑस्ट्रिया में अप्रवासी महिलाओं को चरित्रहीन मानना सामान्य सार्वजनिक समझ है। वह एक दिलचस्प शब्द का प्रयोग करती हैं—‘विपरीत-पूरक’, यह शब्द वह अपने हमसफ़र रज़ा के लिए, अपनी कला के लिए और अपने ख़्वाब के लिए करती हैं।
सतरापी बहुत ही विस्तृत तौर पर रूढ़िवाद के संगठित होने की पूरी यात्रा दिखाती हैं—कैसे उनके माँ और पिता को कलाकारों के पोस्टर्स ओवरकोट में छिपाने पड़ते हैं, कैसे बाज़ार में लिपस्टिक लगाने के लिए किसी निर्दोष को दंडित करवाना पड़ता है, कैसे स्कूलों में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग सीढ़ियाँ बन जाती हैं और अंत में कैसे फ़ाइन आर्ट्स की क्लास में मानव शरीर के चित्रण को बुर्क़ानशीं के चित्रण में बदल दिया जाता है। दिलचस्प तौर पर दमन के प्रतिकार में आधा समाज और तेज़ी से वेस्टर्नाइज़ होता है और बाक़ी का आधा समाज युद्धोन्माद में शहीदों के महिमा-मंडन की संस्कृति का दूत बनकर रह जाता है।
सबसे अचंभित करने वाली बात है घुटन के प्रतिकार में पैग़म्बर बनने के सपने का मर जाना, आज़ादी को पाने की जिद्द-ओ-जहद में नैसर्गिक कला का मंद पड़ जाना और आख़िर में राष्ट्रीयता बनाए रखने के लिए राष्ट्र छोड़ने को विवश हो जाना। अपने परिवार, अपने दोस्तों, अपने सहयात्रियों, अपने समाज, अपने देश, अपने प्रेमी, अपने पति और अपने पैग़म्बर बनने के ख़्वाब को जीने की अंतहीन लड़ाई में सतरापी अवसाद में इस दुनिया को छोड़ जाती हैं। ऐसा नहीं है कि अब कोई और क्रांति और दमन के बीच के सच को उजागर नहीं करेगा या कोई और सतरापी जैसा होगा नहीं लेकिन अब कोई और इस दुनिया में पैग़म्बर बनने का ख़्वाब देखेगा या नहीं... यह सवाल बना रहेगा!
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