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विज्ञान कथा : दंभ

अप्रैल, सन् 2101

यूँ धरती के सीने पर उगी आधुनिकतम संरचनाओं ने उसे एक विशिष्ट सौंदर्य प्रदान किया है, लेकिन कुछ ज़ख़्म ऐसे हैं जो छिप नहीं पाते। ये ज़ख़्म जलवायु परिवर्तन ने दिए हैं। अप्रैल-मई माह के दौरान भारत में उत्तर से दक्षिण की यात्रा करें तो सिकुड़े हुए हिमालय शिखर हृदय में शूल की तरह चुभते हैं। सूखी नदियाँ किसी दीन स्त्री के विदीर्ण आँचल-सी प्रतीत होती हैं। पीलिया ग्रस्त धरती ज्वर से तपती है। दक्षिणी भागों में अक्सर ही बादल ऐसे बरसते हैं, जैसे धरती को आकंठ डुबोकर उसका ताप कम करना चाहते हों।

जलवायु कठोर हुई तो विज्ञान ने भी नई सुविधाएँ जुटा दीं। मुश्किलों के हल, नए विकल्प खोज लिए। समुद्र ने धरती छीन ली तो क्या हुआ जवाब में मनुष्य ने भी समुद्र के ऊपर नन्हें-नन्हें कितने ही कृत्रिम द्वीप निर्मित कर दिए। पर सबके लिए जीवन इतना आसान नहीं होता। इतिहास के हर कालखंड में एक आम आदमी अवश्य ही होता है, सुविधाएँ जिससे मुख मोड़े रहती हैं। विज्ञान के हाथ जिस तक पहुँच नहीं पाते।

आज हम भारत के दक्षिणी तट और तट के निकट समुद्र में बसे आइलैंड सेरेनिटी की सैर करेंगे। देखेंगे कि जीवन किसके लिए आसान है और किसके लिए कठिन... पहले अभ्रा के परिवार से मिलते हैं। अभ्रा आइलैंड सेरेनिटी पर परमाणु ऊर्जा विभाग की कॉलोनी में रहती हैं। परमाणु वैज्ञानिक कौशिक उनके साथी हैं।

आइलैंड सेरेनिटी

बाहर बेतहाशा बारिश हो रही थी। हवाएँ तो जैसे उस दिन पगला गई थीं। बालकनी के शीशे पर सिर पटकती ये तूफ़ानी हवाएँ घर के भीतर घुसने को आतुर थीं। अभ्रा ने पर्दे की झिर्री से बाहर देखा। वह उत्तेजना से काँप उठी। उसका मन हुआ कि इस तूफ़ान के लिए पूरे शीशे खोल दे। उसने परदे हटा दिए। उफनते समुद्र का विहंगम दृश्य सामने था।

पिछले दिनों मौसम काफ़ी गर्म रहा था। तीन-चार दिनों से जो भारी उमस थी, इसी का परिणाम था यह। वैसे आजकल हवाओं के बहकने का कोई तय समय नहीं हैं। बादल कई दिनों तक बिसूरते रहते हैं और कभी ऐसे रूठ जाते हैं कि उनकी झलक तक देखने को आँखें तरस जाती हैं, लेकिन मौसम कहर बरसाए या इनायत यहाँ किसे परवाह है? आइलैंड सेरेनिटी की सुरक्षित और आरामदेह इमारतों में रहने वाले बाशिंदों को कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता। भीतर सारी सुविधाएँ और मनोरंजन के विविध साधन हैं। एक अजीब एकरस सुख का एहसास घुला हुआ है, यहाँ के लोगों के जीवन में। बाहर झाँकने की फ़ुर्सत ही किसे है!

यह अभ्रा ही थी जो मौसम के हर बदलाव पर मचल-सी जाती थी। सेरेनिटी का सौंदर्य, उफनता समुद्र और नीला आसमान। पिघले स्वर्ण-सी चटख धूप या फिर गरजते हुए बादलों का रौद्र रूप! हाँ, इससे आगे उसकी कोई कल्पना नहीं थी।

उस दिन हाफ़ डे था। कॉलेज से वह जल्दी घर आ गई थी। दुपहर के इस समय घर में सूनापन पसरा होता था। यह सन्नाटा समय-समय पर AI नित्या की मधुर-मशीनी आवाज़ से ही टूटता। बाहर से आने वाली प्राकृतिक ध्वनियों को ध्वनि अवरोधक दीवारें बाहर ही रोक देतीं। ऐसी नीरवता में थोड़ी देर के लिए ही सही उसका बालकनी के शीशे खोल देने का मन होता। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाता था। बाहर बिगड़ैल हवाएँ, बारिश या पचास डिग्री सेल्सियस की अंगारे बरसाती गर्मी होती।

कपड़े बदलकर वह हॉल में आ गई थी। ठीक इसी समय तेज़ हवा के साथ बारिश शुरू हुई थी। अभ्रा को हमेशा की तरह मौसम में यह बदलाव अच्छा लगा। पानी की मोटी-मोटी बूँदों के फिसलने से बालकनी के शीशे में धुँधलापन आ गया था। बाहर कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था। धुँधले शीशे के पार आसमान था, जिस पर बिजली कड़कने से चमकीली रेखाएँ बन-बिगड़ रही थीं। वह रूमानी एहसासों में डूब गई। बालकनी के मोटे-मोटे पर्दों को समेटकर वह देर तक बाहर देखती रही।

कल छुट्टी है... उम्मीद है बारिश के बाद मौसम सुहावना रहेगा। वह बालकनी में बैठ सकेगी। कौशिक के साथ ड्रिंक लेना... उफनते समुद्र को देखते हुए तेज़ म्यूजिक सुनना उसे पसंद है। हालाँकि कौशिक इन सब बातों से प्रभावित नहीं होता। वह एक बबल में बंद रहता है, हमेशा जिसमें से खींचकर उसको बाहर निकालना पड़ता है। उसने बेडरूम में झाँककर देखा वह अभी तक सो रहा था। नाइट ड्यूटी करने के बाद वह दिनभर नींद निकालता है। शाम की चाय अक्सर वह अकेले ही पीती है। लेकिन कल तो छुट्टी है... उसको जगाने का उसका बहुत मन हुआ। मौसम के इस उन्माद को वह कौशिक के साथ देखना चाहती है। उसके क़दम बढ़े पर उसके बेड तक जाकर वह लौट आई।

फिर उसने बेबी के कमरे पर दस्तक दी। उसका दरवाज़ा नहीं खुला। ऐसा ही होता है... वह ऑनलाइन गेम खेल रही होगी या फिर पढ़ाई... उसके कान हैडफ़ोन से ब्लॉक होंगे। दस्तक वह कैसे सुनेगी? उसको बाहर बुलाने के लिए रिंग करनी पड़ेगी। वैसे भी उसको बाहर मौसम की इस हलचल से ख़ास मतलब नहीं। उसको झल्लाहट-सी हुई।

कल के लिए सोचेगी वह कुछ स्पेशल... कौशिक का कल कोई और प्रोग्राम हुआ तो वह अपनी सहेलियों को बुला लेगी... पर कल के दिन को बेकार नहीं जाने देगी। उसने ख़ुद को समझाया और घूम-फिरकर फिर वापस हॉल में आ गई। हॉल के कुछ शेल्फ़ कलात्मक ढंग से जमी पुस्तकों से सजे थे। ये पुस्तकें उसको अपनी दादी से विरासत में मिली थीं और आज भी अच्छी हालत में थीं। पीले से काग़ज़ और मोटी जिल्द वाली ये पुस्तकें इस युग में दुर्लभ थीं। लेकिन, बेबी और कौशिक ने शायद ही कभी इनको छुआ होगा। अपनी पसंदीदा कविताओं की एक पुस्तक लेकर वह बालकनी के पास ही बैठ गई। शाम के पाँच बज गए थे। उसके मोबाइल फ़ोन पर AI नित्या का मैसेज आ गया। चाय तैयार थी। एक कविता गुनगुनाते हुए वह चाय के सिप भरने लगी।

फुहारों ने जलते मन को छुआ
ये बादलों से कौन-सा मय झरा
हवाओं ने हँसते हुए पी लिया...

आज शुक्रवार है। AI नित्या ने हर दिन का मेन्यू सेट किया हुआ है। उसने चेक किया कि आज के डिनर में क्या है। डिनर में उसके लिए उबली सब्ज़ियाँ, बेबी के लिए नूडल्स और कौशिक के लिए दाल-चपाती थे। नहीं, आज सादा खाने का मन नहीं। वेज कटलेट्स और आइसक्रीम खाने का मन है उसका। उसने मेन्यू रिसेट किया तो AI का तुरत मैसेज आ गया। कुछ सामग्री कम थी। उसका मन उदास हो गया। जितनी सुविधा होती है, व्यक्ति उतना ही उदासीन होता जाता है। उसको फ़ोन पर रिमाइंडर आते रहते हैं और वह टालती रहती है। कल सुबह ही वह सब आवश्यक चीज़ें मँगवा लेगी ताकि पार्टी की जा सके।

ऑटोमेटेड किचन में उसको कुछ ख़ास करने की ज़रूरत नहीं होती। उसने अपने कॉम्बी ओवन के अलग-अलग कंपार्टमेंट्स में कच्ची सामग्री रखी और निर्धारित मेन्यू पर सेट कर दिया। खाना हमेशा वह ख़ुद ही परोसती है। भोजन को आकर्षक तरीक़े से सजाकर परोसना उसे पसंद है। डिनर के समय तक कौशिक हाथ-मुँह धोकर बाहर आ गया था। बेबी भी अपने कमरे से बाहर आकर डाइनिंग टेबल पर खाने की प्रतीक्षा करने लगी।

“ममा, आज क्या बना?” रोज़ उसका पहला प्रश्न यही होता है।

“वाओ! नूडल्स! नूडल्स तो मैं रोज़ ही खा सकती हूँ।”

अभ्रा जवाब नहीं देती तो वह ख़ुद चेक करने आ गई। नूडल्स देखकर वह ख़ुश हो गई थी। कौशिक डाइनिंग चेयर पर बैठा, फ़ोन पर समाचार देख रहा था। देर तक उसके सामने खाना नहीं आया तो वह भी उठकर रसोई में चला गया। देखा, अभ्रा खाना लगाने का कोई उपक्रम नहीं कर रही थी। वह फ़ोन में आए पुराने रिमाइंडर चेक करके एक लिस्ट तैयार कर रही थी, साथ ही नित्या को रिसेट कर रही थी। उसको बेबी और उसकी उपस्थिति का पता ही नहीं चला या जानबूझकर आज उसने उन दोनों की उपेक्षा की। वह उसके पीछे चुपचाप खड़ा हो गया, फिर कान के पास चिल्लाकर जोर से बोला—“अभ्रा!”

उसने चौंककर पीछे देखा और चेहरे पर नितांत उपेक्षा का भाव लाकर वह सपाट आवाज़ में बोली—“क्या बात है?”

“अरे! क्या हो गया? नाराज़ क्यों हो?” वह उसको मनाते हुए बोला।

“तुम्हें पता है, शाम को मौसम कितना अच्छा था! कल छुट्टी है, फिर भी तुम सोते रहे... तुम्हें क्या फ़र्क़ पड़ता है? तुम्हें तो अब भी पता नहीं होगा कि बाहर बारिश हो रही है। मौसम में कितनी ठंडक आ गई है...” वह नाराज़गी के स्वर में बोली।

“मौसम अच्छा था? इसे अच्छा कहते हैं? तुम भी क्या बात करती हो। ख़राब मौसम की चेतावनी तो दो दिन पहले ही आ गई थी। उन लोगों को अलर्ट कर दिया गया है, जो लो कोस्टल एरियाज़ में रहते हैं। मैं तो इस मामले में हमेशा अपडेट रहता हूँ, और तुम न्यूज़ देखती हो कभी ठीक से?” वह उसका मज़ाक़ उड़ाता हुआ बोला।

एक क्षण के लिए वह उलझन में पड़ गई। वह इतनी व्यावहारिक नहीं है कि इस दृष्टिकोण से सोचे। वैसे भी अपने जीवन में उसने लो कोस्टल एरियाज़ को इतने क़रीब से देखा नहीं है कि वह इस बारे में कल्पना करके उन लोगों के अस्त-व्यस्त जीवन को महसूस कर सके और कौशिक के लिए भी यह बस एक समाचार भर है, जो उसे पहले से मालूम है। ख़ैर, इस बारे में ज़्यादा बहस करके वह अपने अच्छे मूड को बर्बाद नहीं करना चाहती। उसने बनावटी ग़ुस्से से कौशिक को घूरा। वह हँसने लग गया। उसके हँसते ही वह अपना सारा ग़ुस्सा भूल जाती है।

“तुम्हारा कल शाम का कोई प्रोग्राम है?” सामान्य होते हुए उसने पूछा।

“अभी से क्या कह सकता हूँ। अभी तक तो नहीं है, पर कोई एमरजेंसी ड्यूटी आ जाए तो अलग बात है।  मेरा काम ही ऐसा है।” वह गंभीर होते हुए बोला।

“ओके। ऐसी सूरत में मैं अपनी फ़्रेंड्स को बुलाकर पार्टी करूँगी।” उसने अपने उत्साह को बरक़रार रखने की कोशिश की। बेबी अब तक अपना खाना ले चुकी थी और उनकी बातें सुनते हुए नूडल्स खा रही थी। उसने चिल्लाकर मम्मी की बात का समर्थन किया। अभ्रा अपना फ़ोन रखकर खाना लगाने के लिए प्लेट्स निकालने लगी। फिर खाने के साथ वह और बेबी अगले दिन के लिए योजनाएँ ही बनाते रहे। न्यूज़ देखता कौशिक बीच-बीच में अपनी राय दे देता।

रात भर रिमझिम होती बारिश सुबह फिर बहुत तेज़ हो गई थी। नींद खुलने पर उसने खिड़की से बाहर देखा तो घना अँधेरा था। छुट्टी के दिन भी वह समय पर ही उठ जाती है। पर लगा जैसे आज जल्दी उठ गई। समय देखा तो आठ बज रहे थे।

“ओह, आज तो समय का पता ही नहीं चला...” उसने मन में सोचा।

थोड़ी एक्सरसाइज़ करने के बाद वह तेज़ी से काम निपटाने में लग गई।

“दो दिन के अंदर भयानक तूफ़ान आने के आसार हैं, डियर।” कौशिक ब्रश करता हुआ कमरे के बाहर आ गया था।

“तूफ़ान! एक्साइटिंग!! इन गर्मियों से तो तूफ़ानी मौसम ज़्यादा अच्छा है। मज़ा आएगा।” उसको रोमांच हुआ।

“तुम भी यार... यह मज़े की बात है! तुम्हें तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, पर हम लोगों का तो कितना काम बढ़ जाएगा न। अपनी ड्यूटी के बाद तरह-तरह की मीटिंग्स और आलतू-फ़ालतू गवर्नमेंट ऑर्डर्स फ़ॉलो करो। सैलरी से डोनेशन की बड़ी रक़म और कट जाएगी। समुद्र किनारे की ग़रीब बस्तियों में डिजास्टर मैनेजमेंट के लिए यहीं से फ़ूड पैकेट्स और ज़रूरी चीज़ें जाएँगी। फ़ालतू का सर दर्द! छुट्टी में भी चैन नहीं लेने देंगे।” कौशिक को पिछली बार के तूफ़ान की सब बातें याद आ गईं। कौशिक ऊर्जा विभाग में बड़ा अधिकारी है। ज़िम्मेदारी वाला पद है। अभ्रा का क्या? वह एक कॉलेज में साहित्य पढ़ाती है। ख़ाली समय में कविताएँ, मौज-मस्ती, रूमानी दुनिया में रहती है, बस... उसको इन सब बातों से क्या मतलब है। वह सोच रहा था।

अभ्रा यहीं बड़ी हुई है। उसने यहाँ से बाहर के जीवन को बहुत क़रीब से नहीं देखा। कभी-कभी लोगों से इस बारे में सुनती ज़रूर है। फिर मन ही मन उसको संतुष्टि और गर्व का एहसास होता है। अच्छा है कि उसका परिवार यहीं सेटल हो गया है। आइलैंड ‘सेरेनिटी’ का निर्माण समुद्र के भीतर तट के समीप इस प्रकार किया गया है कि उसकी मज़बूत संरचना समुद्री तूफ़ानों को झेलने में सक्षम है। उसे बनाया ही इस अनिश्चित मौसम और तूफ़ानों को ध्यान में रख कर है। प्रतिवर्ष तटीय क्षेत्रों में विनाश का तांडव होता है, पर इन द्वीपों में रहने वाले मुट्ठी भर लोग सुरक्षित रहते हैं। सुरक्षित ही नहीं बल्कि इनके आराम और सुविधाओं में भी कोई कमी नहीं आती।

उसकी पड़ोसन मिसेज पांडेय ने ही एक बार बताया था कि कैसे उनके नौकर विश्वा के परिवार पर पिछले तूफ़ान के बाद मुसीबतें आई थीं। उसके बाद ही वह यहाँ काम तलाशने आया था। एक किटी पार्टी में वे विश्वा और उसके जैसे लोगों के क़िस्से लेकर बैठ गई थीं। बता रही थीं कि कैसे इन निम्न-मध्यवर्गीय लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। मौसम के पूर्वानुमान और संचार साधनों की बदौलत हालाँकि जन हानि नहीं होती, पर हालात कष्टप्रद हो जाते हैं। फ़ार्म उजड़ जाते हैं, आजीविका के साधन नष्ट हो जाते हैं और संपत्ति का विनाश होता है सो अलग। भले ही वे ज़िंदा रह सकें इतनी सरकारी मदद मिल जाती है उन्हें, पर यह जीवन भी कोई जीवन है? और वे लोग यहाँ से जाएँ भी कहाँ? मैदानी भागों में गर्मी और सूखे से हालात और विकट हैं। यह मिसेज पांडेय भी अजीब महिला है... ये भी कोई बातें होती हैं पार्टी में करने की? सारा माहौल ग़मगीन कर दिया था। कुछ महिलाओं ने इन बातों को लेकर उनका मज़ाक़ भी बनाया था।

पर उस दिन पहली बार ऐसी अनहोनी बात हुई कि उसे अच्छे मौसम की अपनी परिभाषा को बदलना पड़ा।  अगले दिन शनिवार की बात है। वे लोग टीवी देखते हुए लंच कर रहे थे, तभी अचानक से नेट चला गया। थोड़ी देर बाद ही घर की बिजली भी चली गई। टीवी बंद हो गया था। पूरे घर में अँधेरा-सा छा गया। घर का कूलिंग सिस्टम बंद हो जाने से थोड़ी देर में ही बहुत गर्मी हो गई। वे दोनों भी हतप्रभ थे। अभ्रा उठकर हॉल के परदे हटाने लगी ताकि थोड़ा प्रकाश आ सके। बाहर बारिश के बावजूद दुपहर के वक़्त ख़ासी गर्मी और उमस थी। शायद शरीर भी सुविधाओं का इतना आदी हो गया था कि ज़रा-सी भी असुविधा बर्दाश्त करने में असमर्थ था। वे लोग बेचैन से हॉल में चक्कर काटने लगे। उन लोगों के जीवन में इस प्रकार का यह पहला अनुभव था। यहाँ समुद्र जल की तरह ही अपार और निर्बाध इंटरनेट उन्हें सुलभ था। नवीकरणीय स्त्रोतों की बदौलत ऊर्जा की भी कोई कमी नहीं आती थी। फिर यह कैसे हुआ?

“यह क्या हुआ पापा?” बेबी ने परेशान होकर रोना शुरू कर दिया था। कौशिक इधर-उधर फ़ोन लगाने की कोशिश करने लगा पर नेटवर्क बहुत ख़राब था। कुछ ही देर में कौशिक के पास ऑफ़िस से अर्जेंट कॉल आ गया था। शायद कोई बहुत बड़ा फ़ॉल्ट हो गया था।

इसी तरह शाम हो गई। कौशिक अब तक नहीं लौटा था। अभ्रा का मूड बहुत ख़राब था। उसकी इस शाम के लिए बनाई सारी योजनाएँ चौपट हो गई थीं। घर में अब अँधेरा गहराने लगा। यह घटना अप्रत्याशित थी इसलिए घर में अँधेरे से निपटने के इंतज़ाम भी नहीं थे। फिर उसको सजावट के उद्देश्य से रखी हुई डिजाइनर मोमबत्तियों की याद आई। मोमबत्तियाँ क्या थीं, ये उनकी शक़्ल के बैटरी चालित नन्हें लैंप थे। छह-सात मोमबत्तियाँ जलाने के बाद घर में हल्का प्रकाश हो गया था। उसने बालकनी का स्लाइडर थोडा-सा खोल दिया। बाहर तूफ़ान का शोर उठ रहा था। वेग से तूफ़ानी हवा का एक झोंका बारिश की बूँदों के साथ भीतर घुस आया। माहौल सचमुच रूमानी हो गया था। पर फिर भी समय नहीं कट रहा था। और अब यह भी चिंता होने लगी कि भोजन कैसे बने? बिना बिजली और नेट के नित्या बिल्कुल शांत थी। बेबी के असाइनमेंट अधूरे थे। उसके शो का समय निकला जा रहा था, इसलिए वह चिड़चिड़ाने लगी।

बाहर कोई लगातार दस्तक दे रहा था। पर तूफ़ान के शोर में वह आवाज़ दब-सी गई थी। किसी ने अभ्रा को पुकारा भी।

“बाहर कोई है... शायद पापा आ गए हैं।” बेबी का ध्यान गया।

अभ्रा फ़ुर्ती से उठकर दरवाज़ा खोलने गई। उसके मन में इस घटना के संबंध में बहुत उत्सुकता थी।

बाहर उसकी पड़ोसन मिसेज पांडेय थी। इस महिला को वह बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। पुराने विचारों की रूढ़िवादी महिला! इस युग में भी हाथ से काम करेगी या घरेलू नौकर का सहारा लेगी। इनकी खाने-पीने की आदतें भी उसको बहुत अस्वास्थ्यकर लगती हैं। तला हुआ और चिकनाई वाला खाना पसंद करती हैं। लड्डू, पकौड़े और कचौड़ी... उफ़! शुरू में अपने यहाँ कुछ पार्टियों में बुलाया था उसने इनको, तो कैसे हाथ नचाकर बोली थीं—“मुझे तो नहीं भाता ऐसा खाना भाई। मशीनी खाने का स्वाद हमेशा एक जैसा बोरिंग होता है। पता नहीं तुम रोज़ कैसे खा लेती हो।” उसको बहुत बुरा लगा था।

पर आज उसको इनका आना भी ठीक लगा। दिन भर से इस तरह बैठी वह ऊब गई थी।

“अभ्रा, कौशिक घर में है? कुछ पता चला फ़ॉल्ट का? कब तक बिजली आएगी?” उन्होंने दरवाज़े पर ही यह सब पूछ लिया।

“अरे आइए न, मिसेज पांडेय। कौशिक तो दुपहर से ही गया है, अब तक नहीं लौटा। बात भी नहीं हो पाई, नेटवर्क भी चला गया है।” वह बोली और उनको हाथ पकड़कर भीतर ले आई।

“हाँ, बहुत परेशान हो गए हैं बिना बिजली और नेट के। क्या करें? उदित ने बहुत कोशिश की, पर कुछ पता नहीं चल पाया। उनका डिपार्टमेंट भी अलग है। मैं इसीलिए आई थी कि कौशिक को पता हो इस बारे में...” वह बोलीं।

“नहीं... नहीं... कुछ पता नहीं अभी तो।” उसने कहा।

“अरे मिसेज पांडेय, आपके यहाँ काम करता है न विश्वा, उससे बाहर डिपार्टमेंटल स्टोर से खाने को कुछ मँगवाना था। अब बारिश भी कुछ कम हो गई है।” एकाएक अभ्रा को विश्वा की याद आई।

“विश्वा तो दो दिन से छुट्टी पर है, पर तुम चिंता मत करो। बैटरी का एक एमरजेंसी चूल्हा है मेरे पास। दाल-चावल तो उबल ही जाएँगे। और लड्डू और कचौड़ी बनाकर रखी हुई है मैंने। तुम तो तला हुआ खाती नहीं हो, पर बेबी और कौशिक खा लेंगे।” उन्होंने स्नेह से कहा।

अभ्रा के मन की सारी कड़वाहट धुल गई थी। वह बैठकर बातें कर रही थीं कि तभी कौशिक आ गया।

“अब चलती हूँ अभ्रा। खाना लेने बेबी को भेज दो मेरे साथ।” कौशिक को देखकर वह उठ खड़ी हुईं।

“कब तक आएगी बिजली, कौशिक?” चलते-चलते उन्होंने पूछा।

“कुछ समय लगेगा पर आशा है देर रात तक आ जाएगी।” कौशिक ने बुझा हुआ-सा जवाब दिया। उसका चेहरा उतरा हुआ था। उसके चेहरे की थकान देखकर उन्होंने आगे कुछ नहीं पूछा। वह बेबी को साथ लेकर घर चली गईं।

“तुम बहुत थके लग रहे हो। कहाँ फ़ॉल्ट हुआ ऐसा?” अभ्रा उसके लिए पानी ले आई थी।

“बहुत बड़ी घटना हो गई अभ्रा! सिटी के नार्थ-वेस्ट एरिया में जहाँ हम रहते हैं, वहाँ के एनर्जी आइलैंड का सिस्टम पूरी तरह से ठप्प हो गया है। विंड फ़ार्म और सोलर एनर्जी फ़ार्म की जो पॉवर स्टोरेज यूनिट्स थीं, वे भी काम नहीं कर रहीं। एटॉमिक पॉवर स्टेशन सेफ़ है, पर यहाँ भी पॉवर ग्रिड में फ़ॉल्ट आ गया है। ख़राब मौसम के कारण ‘लॉन्ग लूप’ फ़ेलियर डिटेक्ट हुआ है इसलिए पॉवर सप्लाई कुछ समय के लिए रोक दी गई है।” उसने गहरी साँस भरते हुए कहा।

“ओह! पर यह कैसे हुआ? वहाँ तो बहुत ज़्यादा सेफ़्टी...” अभ्रा को धक्का लगा।

“इसकी तो जाँच होगी कि कैसे एकदम से सिस्टम फ़ेल हो गया। पर अभी ख़राब मौसम के चलते हम ज़्यादा कुछ नहीं कर पा रहे हैं।” उसने कहा।

“इतनी बड़ी घटना हो गई, हमें अब पता चला!” उसे तो अब भी यक़ीन नहीं हो पा रहा था।

“नेट तो अभी चालू हो जाएगा, सिक्यूरिटी कारणों से बंद किया गया था। बिजली भी चालू हो जाती लेकिन बारिश और तूफ़ान के कारण फ़ॉल्ट ठीक करने में दिक़्क़त हो रही है। हम लोग कोशिश कर रहे हैं, हो जाएगा... पर एक बहुत बड़ी समस्या सर पर है, अभ्रा।” उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गई थीं।

“क्या!” अभ्रा सोच नहीं पा रही थी कि इससे बड़ी और क्या समस्या हो सकती है।

“समुद्री पानी को छानने के लिए जो डीसेलिनेशन सिस्टम है, वह पूरा विंड और सोलर एनर्जी से ही काम करता है। नेट और बिजली के बिना हम रह सकते हैं लेकिन पानी के बिना बहुत दिक़्क़त आ जाएगी। अगर कल तक यह नहीं सुधरा तो पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच जाएगी। ज़्यादा प्रॉब्लम मौसम के कारण हो रही है। इस संकट को भी तूफ़ान वाले दिन ही आना था।” कौशिक की आवाज में हताशा भर गई थी।

बिजली और नेट के बिना ही अभ्रा असहाय महसूस कर रही थी, खाने के ठिकाने नहीं थे; अब बिना पानी क्या होगा। वह दहशत से भर गई। आज के दिन को आनंद से मनाने के लिए उसने क्या-क्या योजनाएँ बनाई थीं और बुरे से भी बुरा दिन रहा यह।

बेबी खाना लेकर आ गई थी। कौशिक ने जल्दी-जल्दी थोड़ा बहुत खाया और वापस ड्यूटी पर निकल गया।

वह आशंकाओं से घिरी उसको जाते हुए देखती रही।

तटीय शहर स्वर्णामुगि

स्वर्णामुगि यानि स्वर्ण, पर यह अलग बात है कि यहाँ स्वर्ण नहीं बल्कि चहुँ ओर स्वर्ण-सी चमकती रेत बिखरी है। और इस रेत में है भारी खनिजों का बेशुमार खजाना। समुद्र किनारे की इस रेत में मोनाजाइट, जिरकॉन, इलमेनाइट और गार्नेट जैसे दुर्लभ मृदा तत्त्वों के खनिज हैं। यहाँ से थोरियम, यूरेनियम और टाइटेनियम का खनन किया जा रहा है। कई वर्ष पहले पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से यहाँ खनन रोक दिया गया था। लेकिन अब जबकि हर कार्य का रोबोटाइजेशन हो गया है, खनन भी प्रारंभ कर दिया गया। खनन के बाद ऊर्जा सस्ती हो गई और इस क्षेत्र की तेज़ी से प्रगति हुई। कृत्रिम द्वीपों और इस नए शहर ‘स्वर्णामुगि’ का विकास हुआ।

पुराने शहर के जलमग्न होने के बाद यह सुंदर शहर कोई तीस वर्ष पहले अस्तित्व में आया था। वह साल पिछले पचास वर्षों में सबसे अधिक गर्म रहा था। विश्व भर में अनेक विनाशकारी घटनाओं के घटित होने के कारण उस साल को संयुक्त राष्ट्र ने ‘ब्लैक ईयर’ घोषित कर दिया था। भारत के तटीय क्षेत्रों में भी बार-बार भयंकर तूफ़ानों की पुनरावृत्ति से जन-धन की अपार हानि हुई थी और ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा समुद्र की भेंट चढ़ गया था। इसके बाद दक्षिणी तट पर यह शहर अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लेकर पुनः बसाया गया। यहाँ की कुछ जनसंख्या जो नव धनाढ्य वर्ग से ताल्लुक़ रखती है, कृत्रिम द्वीपों पर बस चुकी है।

बावजूद इसके आज भी बहुत से लोग ख़तरे की सीमा में रहने को मजबूर हैं। नियमों की धज्जियाँ उड़ाता यह शहर अब धीरे-धीरे दो हिस्सों में बँटने लगा है—‘लो लाइंग कोस्टल सिटी’ और ‘हाई एरिया’। हाई एरिया योजनाबद्ध रूप से बसाया हुआ वैध शहर है जो कृत्रिम पहाड़ियों जैसी संरचनाओं पर बसा है। क़रीब तीन मिलियन आबादी वाला यह शहर कुछ महँगा है। इस शहर के चारों ओर निचले भागों पर कुकुरमुत्तों की तरह फैलती जा रही बस्तियाँ ही ‘लो कोस्टल सिटी’ कहलाती हैं। वास्तव में यह बस्तियाँ शहर के प्लान के बाहर हैं और अवैध हैं, लेकिन राजनीतिक संरक्षण के चलते अब शहर का ही हिस्सा हो गई हैं। यह भाग समुद्री तूफ़ानों के चलते ख़तरे की सीमा के अंदर आता है। यहाँ ऐसे लोग आ बसे हैं जो ऊपर शहर में महँगे घर नहीं ख़रीद सकते। इनमें अधिकतर मज़दूर, किसान, छोटे व्यापारी, मछली पालक और विक्रेता हैं। चेतावनियों के बावजूद ये बस्तियाँ लगातार तट की तरफ़ बढ़ती जा रही हैं।

स्वर्णामुगि के समुद्र तट पर विनोदन की छोटी-सी दुकान है, जिसमें पर्यटकों के आकर्षण की वस्तुएँ हैं। उसने सुबह अपनी दुकान खोली ही थी कि तूफ़ान की चेतावनी आ गई। हल्की बारिश तो पिछले दो दिन से हो रही थी। अब मौसम और ख़राब होने लगा था। निश्चिन्त घूमते पर्यटक लौटने लगे थे। उसको लोभ हो रहा था कि इन जल्दबाज़ी में जा रहे पर्यटकों को कुछ सामान और बेच दे पर तूफ़ान की ख़बर से उसका मन अशांत हो गया था। उसके दिमाग़ में वो सारी परेशानियाँ घूम गईं जो अब उसके परिवार को कई दिनों तक उठानी थीं। उसके पिता फ़ार्म पर काम में व्यस्त होंगे, वे तो चेतावनी वाली न्यूज़ सुन भी नहीं पाए होंगे। उसे दुकान का सामान सुरक्षित जगह शिफ़्ट करना पड़ेगा। फ़ार्म पर रखे हुए सारे औज़ार-उपकरण हटाने पड़ेंगे। तूफ़ान के विनाश के बाद काफ़ी दिनों तक उनका काम बंद रहेगा तो नए घर के लोन की किश्त चुकाना भारी पड़ जाएगा। उन्होंने अभी-अभी हाई एरिया में घर लिया है। माथे का पसीना पोंछकर वह अपने पिता को फ़ोन मिलाने लगा।

बात करते हुए ही उसने विश्वा को वहाँ से गुज़रते देखा था। उसने हाथ के इशारे से उसको रुकने को बोला।

“और भाई, सब ठीक है? तूफ़ान की ख़बर सुनकर चले आए हो घर?” उसने आत्मीयता से पूछा। विश्वा उसका बचपन का मित्र है। उसके पिता मछली पालक हैं और इधर लो एरिया में ही उसका परिवार रहता है।

“हाँ, बड़ी मुसीबत है दोस्त। सामान सारा बाँधना है और फिर सुरक्षित कहीं रखने की जगह तलाशनी पड़ेगी।  घर को तो उठाकर ले जा नहीं सकते, वह तो टूटेगा ही। थक गए हैं अब तो हम लोग इस कीट-पतंगे समान ग़लीज़ जीवन से... अच्छा है तुमने ऊपर घर ले लिया। हमारे लिए भी देखो यार उधर ही कोई घर।” मित्र की सहानुभूति पाकर वह फट पड़ा। उसकी आवाज़ में ग़ुस्से और परेशानी की झलक थी।

उसकी बात सुनकर विनोदन को थोड़ा आश्चर्य हुआ। शायद इसे पता नहीं है ऊपर घर कितने महँगे हैं। वह ख़ुद घर लेकर फँस गया है। थोड़ा भी बिज़नेस गड़बड़ हुआ कि लोन की किश्त भारी पड़ जाती है। अब क्या कहे इससे, वह कौन-सा सुखी है? केवल ऊपर घर लेने मात्र से जीवन स्तर नहीं सुधर जाता। बल्कि सौ नए ख़र्च और बढ़ जाते हैं। सच है, राष्ट्र प्रगति कर रहा है पर विकास सब तरफ़ एक समान नहीं होता। अमीरी बढ़ती है, पर ग़रीबी पूरी तरह ख़त्म नहीं हो पाती... लोगों के बीच खाई बढ़ती ही जाती है। इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि वे भूलने लगते हैं कि वे भी मानव हैं। उन कथित उच्चवर्गीय लोगों द्वारा उन्हें मानव समझा ही कब जाता। इस स्तर तक पहुँचने के लिए भी उसने जी तोड़ परिश्रम किया है। उसका मन कड़वा हो गया।

“मुसीबत तो है ही। अच्छा, अब जल्दी शिफ़्ट कर लो। कोई मदद की ज़रूरत हो तो बोलना।” कहते हुए वह मुँह फेरकर दुकान के बाहर रखे कुछ आर्ट पीस हटाने में व्यस्त हो गया। उसने विश्वा को मदद के लिए बोल तो दिया पर मन में उसको लग रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि वह सचमुच ही मदद माँगने आ जाए। उसको सामान समेटते देख विश्वा आगे बढ़ गया था।

बारिश तेज़ हो गई थी। वह फ़ुर्ती से अपनी दुकान के भीतर से सामान निकालकर काउंटर पर रखने लगा। फिर सामानों को कार में भरकर अपने फ़ार्म की तरफ़ रवाना हो गया। वह और उसके पिता पहले तो देर तक अपने फ़िश पोंड की सुरक्षा के इंतज़ामों की जाँच करने में लगे रहे। दोनों ने मिलकर पोंड और उसके फ़िल्टर साफ़ किए। फिर उसके बाद एयर पंप और साइफ़न को चेक किया। फिर उन्होंने ज़रूरी सामानों को समेटकर घर रवाना किया। अपनी तरफ़ से वे जो भी कर सकते थे उन्होंने किया। फिर यह तो तूफ़ान के बाद ही पता चलेगा कि कितना नुक़सान हुआ। मन में ढेरों आशंकाएँ थीं।

घर पहुँचकर अब इन सबके लिए जगह भी बनानी थी। दुकान का सामान तो कार में ही रहने दिया। फ़ार्म पर पड़े हुए छोटे-मोटे सामान घर में जगह बना कर रखे गए और कुछ बड़े सामान घर के नीचे ही छोड़ दिए। दुपहर बाद तक इन कामों को निपटाकर उसने राहत की साँस ली ही थी कि विश्वा का फ़ोन आ गया। वह भी अपने कुछ सामान उसके यहाँ रखना चाहता था। उसकी बात सुनकर उसको ग़ुस्सा तो बहुत आया, पर वह शांत स्वर में बोला—“देखो भाई, तुम ख़ुद आकर देख लो मेरे घर में कहाँ जगह है? वन बीएचके घर है। हमारे सामानों से ही भर गया। कुछ सामान तो घर के नीचे ही छोड़ दिए।” फिर उसका जवाब सुने बिना उसने फ़ोन काट दिया था। फिर वह फ़ोन बंद करके सो गया था।

शाम तक तूफ़ान का असर साफ़ दिखाई देने लगा था। तेज़ गति से हवाएँ चल रही थीं और लगातार बारिश शुरू हो गई थी। ऊपर से सभी तरफ़ अफ़रातफ़री-सी मची थी। लोग अपने ज़रूरी सामानों के साथ सुरक्षित स्थानों की तरफ़ जा रहे थे। यहाँ ज़्यादातर लोगों के घर सस्ते और काम चलाऊ प्रकार के ही थे। हर साल ये घर तूफ़ान में बह जाते। ये लोग इस प्रकार के घर फिर से बना लेते थे। कुछ लोग इस जीवन से ही संतुष्ट थे पर कुछ अपना जीवन स्तर ऊपर उठाने के लिए कसमसा रहे थे।

शाम तक हाई एरिया के सभी कम्युनिटी हॉल और स्कूल लोगों के लिए खोल दिए गए थे। दड़बों की तरह लोग इन इमारतों में बंद हो गए। बाहर तेज़ गति की तूफ़ानी हवाएँ खिड़की-दरवाज़ों के शीशों से लगातार टकरा रही थीं। विश्वा का परिवार एक स्कूल के कमरे में टिका हुआ था। उसके माँ-बाप और छोटी बहन अपने साथ थोड़ा-सा ही सामान ला पाए थे। ज़रूरी कपड़े और नक़दी बस। गवर्नमेंट ने उसके जैसे छोटे मछुआरों के लिए एक सुरक्षित पार्किंग बनवा दी थी, जहाँ वे अपनी नाव रख सकते थे। इसलिए कुछ सामान अन्य मछुआरों की तरह उन्होंने नाव पर रख छोड़ा था। पर इस बार घर में कुछ ज़्यादा ही सामान हो गया था।  विश्वा ने मिसेज पांडेय से पुराना फ़्रिज, एलइडी और कुछ अन्य सामान ख़रीद लिए थे। मिसेज पांडेय के लिए ये सामान आउट डेटेड थे, पर उसके लिए लक्जरी थे। यूँ ये सब सामान नए से ही दिखते थे, बस बाज़ार में इनके अपग्रेडेड वर्जन आ जाने से रिजेक्ट कर दिए गए थे। उसके पिता ने उसको बहुत मना किया था। पर उसने एक नहीं सुनी थी। बोला था—“पापा, कहाँ तक जियोगे तुम ऐसे? एक बार सेरेनिटी आकर देखो लोग कैसे रहते हैं।”

“पर हम कहाँ लेकर भागते रहेंगे इन सामानों को। इतने महँगे सामान हैं। टीवी तो हम टेबलेट में ही देख लेते हैं और फ़्रीजर नाव में है तो सही। वही काफ़ी है।” माँ ने भी समझाने की कोशिश की थी।

“अरे माँ, अगले तूफ़ान के पहले ही हम ऊपर घर ले लेंगे। चिंता न करो।” वह बोला था तो माँ को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ था। बहुत महत्त्वाकांशी हो गया यह सेरेनिटी में रह कर। पर वहाँ वेतन ही कितना पाता है, दो जगह पार्ट टाइम नौकरी करके भी। वहाँ सब ऑटोमेटिक है, उसके जैसे युवकों के लिए कहाँ नौकरियाँ हैं। आख़िर वही बात हुई... तूफ़ान आ गया। अब सामान कहाँ रखें।

विश्वा अपने मित्रों से पूछने गया था कि यदि थोड़ी जगह हो तो वह अपने सामान कुछ दिनों के लिए उनके यहाँ रख दे। वह अब तक नहीं लौटा था। माँ को पता था कि यह बहुत मुश्किल होगा क्योंकि उन लोगों के घर काफ़ी छोटे हैं और सच बात तो यह कि आजकल लोग किसी की मदद भी नहीं करना चाहते। उसके पिता लगातार उसके दोस्तों को फ़ोन लगा रहे थे। पर कहीं से कोई ठीक जवाब नहीं मिला।

रात हो गई थी। यहाँ पानी और रेडीमेड फ़ूड पैकेट्स की व्यवस्था शाम को ही कर दी गई थी। कुछ वालंटियर अब फ़ूड पैकेट्स सर्व कर रहे थे, लेकिन चिंता और डर के कारण लोगों की भूख मर गई थी। माँ विश्वा की चिंता कर रही थीं, वह अभी तक नहीं लौटा था। समय के साथ तूफ़ानी हवाओं की गति बढ़ती जा रही थी।  बारिश से बाहर इमारत के आस-पास पानी भरने लगा था इस ऊँचाई पर भी। तभी बहुत ज़ोर की आवाज़ हुई और बिजली चली गई। खिड़की से काँच के टुकड़ों के साथ ढेर सारा बारिश का गंदा पानी और पेड़ की पत्तियाँ-टहनियाँ कमरे में आ गिरीं। लोग दहशत से सूखे पत्ते की तरह काँप उठे। पेड़ की कोई टहनी गिरकर खिड़की के काँच पर ज़ोर से लगी थी। चीख़-पुकार मचने लगी। कुछ लोगों के चेहरे और हाथों पर काँच के टुकड़े आ लगे थे। एक वालंटियर इमरजेंसी लाइट लेकर आया। पानी से बचने के लिए लोग कमरे के एक कोने में सिमट गए थे। चोटिल लोग कराह रहे थे। फ़र्स्ट ऐड के बाद लोगों को दूसरे कमरे में शिफ़्ट कर दिया गया। वालंटियर उन पर बरस रहे थे—“खिड़की-दरवाज़ों से दूर रहने को बोला था न? खिड़की खोली किसने थी? बिल्कुल गंवार लोग हैं।” किसी ने बाहर देखने की उत्सुकता में खिड़की के धातु के पल्लों को खोल दिया था।

विश्वा की माँ को भी आँख के पास चोट आई थी। वह उसके पिता के मना करने के बावजूद बेटे को देखने के चक्कर में खिड़की के सामने ही खड़ी थी। उस दूसरे कमरे में अब ज़्यादा लोग हो गए थे। बहुत से लोगों को सोने के लिए जगह नहीं मिली तो उन्होंने बैठे हुए ही रात बितायी।

रात को आठ बजे जब विनोदन की आँख खुली तो विश्वा के पिता के कई मिस्ड कॉल थे। इतने फ़ोन क्यों किए उन्होंने? सामान रखने को कहीं जगह नहीं मिली? ऐसा क्या हो गया? उसको अब अपनी बेरुख़ी पर थोडा अफ़सोस भी हो रहा था। उसको उसकी मदद करनी चाहिए थी। कोई व्यवस्था तो हो ही जाती। नीचे ग्राउंड फ़्लोर पर ही कहीं... वह उसके पिता को फ़ोन मिलाने लगा। रिंग जाती रही पर उन्होंने फ़ोन नहीं उठाया। फिर उसने विश्वा को फ़ोन मिलाया तो स्विच्ड ऑफ़ था। उसने ख़ुद को तसल्ली दी। आजकल विश्वा बड़े लोगों के बीच उठता-बैठता है, उसको क्या कमी है। हो गया होगा काम उसका।

रात भर दो सौ किमी/घ. की रफ़्तार से चल रही तूफ़ानी हवाएँ हाहाकार मचाती रहीं। बादलों का पानी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा था। रोशनी में चमचमाता शहर उस दिन अँधेरे में भूतहा-सा लग रहा था। मानव निर्मित मजबूत इमारतें स्थिर खड़ी शक्तिशाली तूफ़ान को मुँह चिढ़ा रही थीं और प्रचंड तूफ़ान कुंठित-सा पूरे शहर में घूम-घूम कर इन इमारतों को ताश के पत्तों की तरह गिरा देना चाहता था। लोग बंद घरों में चिपचिपाती गर्मी में सहमे बैठे थे। बिजली शाम से ही बंद थी तो घरों के कूलिंग सिस्टम भी बंद हो गए थे।

रात ऐसे ही बिना बिजली के बीती। सुबह हवा की रफ़्तार कुछ कम हो गई थी, लेकिन मूसलाधार बारिश जारी थी। सरकारी स्कूल की इमारत अब कई जगह टपकने लगी थी। बारिश और गर्मी से वातावरण में अजीब-सी चिपचिपाहट घुली हुई थी। बंद कमरों में लोगों की साँसों, नम दरियों और गंदे जूतों की मिली-जुली गंध भरने लगी थी। लोगों के पीले पड़ चुके चेहरे और माथे की सलवटें उनके हृदय के भीतर उमड़ते एक और तूफ़ान की पुष्टि कर रहे थे। बीच-बीच में परेशान हो रहे छोटे बच्चों के रोने की आवाज़ें और बीमार लोगों के छींकने-खाँसने की आवाज़ें तनाव को बढ़ा देतीं। विश्वा की अब तक कोई सूचना नहीं थी। उसके पिता ने वालंटियर्स और यहाँ की व्यवस्था देखने आए अधिकारियों को यह बात बताई थी। तब उन लोगों ने उनसे विश्वा के बारे में बहुत-सी बातें पूछी थीं और उसका फ़ोटो माँगा था। फिर वे लोग सहयोग का आश्वासन देकर चले गए थे। आशंकाओं से घिरे तीन दिन बीत गए थे।

चौथे दिन मौसम में बदलाव आने लगा था। बारिश रुक गई थी। दिन में 12 बजे तक कोमल धूप खिल आई थी। शहर में नीचे जाकर विध्वंस के दृश्य को देखने की हिम्मत जुटाना बड़ा मुश्किल था। शहर का निचला भाग पूरा उजड़ चुका था। घरों की छतें उड़ गई थीं। कई घर बह गए और सड़कें उखड़ गईं। टूटे हुए पेड़ों ने जगह-जगह रास्ते रोके हुए थे। विनाश होने में तो एक पल लगा लेकिन नवनिर्माण में कितने ही दिन लग जाएँगे कहना मुश्किल था। तूफ़ान के बाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के कर्मचारी लो एरिया से गंदगी और कचरे से अटी जगहों को साफ़ करने में जुट गए थे। सड़ांध मारते मरे हुए जानवरों और मछलियों को शीघ्र हटाना ज़रूरी था। नहीं तो महामारी फैलने से एक नई समस्या के खड़े होने की संभावना रहती है। बड़े पैमाने पर सैनीटाइज़ेशन शुरू कर दिया गया था। कचरे के ढेर और जानवरों की लाशों के बीच ही एक आदमी की क्षत-विक्षत लाश मिली थी। जाँच-पड़ताल के बाद पता चला यह आदमी विश्वा था।

अपने टूटे घर को ठीक करने में लगे हुए उसके माता-पिता को जब यह सूचना मिली तो उनके हाथ वहीं रुक गए। वे जड़ से हो गए। उस दिन शाम तक तो तूफ़ान ने इतना ज़ोर नहीं पकड़ा था कि उसके साथ कोई दुर्घटना हुई हो। वह तो दुपहर में ही निकल गया था सामानों को लेकर। क्या उसकी हत्या हुई? कौन मार सकता था विश्वा को? वह पढ़ा-लिखा युवक महत्त्वाकांशी ज़रूर था, पर कुछ ग़लत नहीं कर सकता था।  वह आगे बढ़ना चाहता था, पर अपने परिश्रम से। उसके परिवार को यक़ीन नहीं हो पा रहा था। आख़िर किसको शत्रुता होगी उससे? रो-रोकर उसकी माँ का बुरा हाल था। विनोदन को अपराधबोध ने घेर लिया था। काश वह उसकी मदद कर देता तो उसको क्यों भटकना पड़ता। इस ख़बर के बाद वह रात भर नहीं सो सका था। घायल पड़े निचले शहर की साँसें धीरे-धीरे लौटने लगी थीं, लेकिन इस घटना से एक अजीब ठंडापन पसर गया था। विश्वा की मृत्यु को दुर्घटना मान लिया गया। तूफ़ान के बाद हत्या के साक्ष्य ढूँढ़ना हास्यास्पद था, वह भी लो एरिया में रहने वाले अति सामान्य व्यक्ति की।

साइबर अटैक

तूफ़ान के एक दिन पूर्व ही आइलैंड का उत्तरी-पश्चिमी भाग अंधकार में डूब गया था। ऊर्जा विभाग में सीनियर इंजीनियर कौशिक और उनकी टीम रात भर से कंट्रोल रूम में बैठे पॉवर सप्लाई को बहाल करने की कोशिशों में जुटे थे। विंड और सोलर पॉवर सिस्टम पूरी तरह फ़ैल हो चुके थे। हैकर्स ने इन दोनों स्मार्ट पॉवर सिस्टम्स के संचालन को हथिया लिया था। यानि मैलवेयर ऊर्जा उपकरणों के विशिष्ट नियंत्रण केंद्र तक पहुँच चुका था। इसको ऑपरेशनल एक्सेस कहा जाता है। एडवांस्ड सिक्यूरिटी सिस्टम ‘पॉवरशील्ड’ भी मैलवेयर को ट्रैक नहीं कर पाया था। कंट्रोल रूम में तनाव का वातावरण था। डीसेलिनेशन संयंत्र बंद पड़े थे। फ़िलहाल टंकियों में पानी था लेकिन यदि कल तक संयंत्र चालू नहीं हुआ तो भारी जल संकट खड़ा होने की संभावना थी। ख़राब मौसम के चलते शुद्ध जल का किसी अन्य स्थान से परिवहन भी मुश्किल था। इसके अलावा उस जल से यहाँ की आवश्यकताओं की पूर्ति भी असंभव थी।

सुबह तक एक अच्छी बात हुई थी। नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र के पॉवर ग्रिड काम करने लगे थे। अँधेरे में डूबा आधा शहर रोशन हो गया था। इधर तूफ़ानी हवाओं ने ज़ोर पकड़ लिया था। मूसलाधार बारिश जारी थी।

सुबह जब कौशिक अपनी ड्यूटी से घर आया तो अभ्रा और बेबी दोनों निश्चिंत सो रहे थे। तूफ़ानी हवाओं से बचने के लिए घर की खिड़कियाँ बंद थीं तो बहुत उमस हो गई थी। रात भर शायद गर्मी के कारण वे दोनों सो नहीं पाई थीं। अभी-अभी बिजली आई थी तो उनकी आँख लगी ही थी। कौशिक का भी मन हुआ कि सो जाए। लगातार सोलह-सत्रह घंटे काम करने के बाद वह बेहद थका हुआ था, लेकिन तनाव के कारण नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। वह बाथरूम और किचन में जाकर देखने लगा कि कितना पानी संग्रहित किया जा सकता है। नलों में पानी का दबाव कम हो गया था। एक विवशता भरी झुंझलाहट से उसने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।

सुबह के साढ़े आठ बजे थे। इन सब परेशानियों से बिल्कुल अनभिज्ञ AI नित्या, अपने मधुर और कोमल स्वर में बार-बार कॉफ़ी का रिमाइंडर दे रही थी। वह चिढ़ गया था। उसका मन हो रहा था कि इस आवाज़ को हमेशा के लिए शांत कर दे। कपड़े बदल कर वह सोफ़े पर ही लेट गया।

दो घंटे बाद अभ्रा ने उसको नाश्ते के लिए जगाया तो वह अचकचाकर उठ बैठा। उसको बहुत गहरी नींद आई थी, पर यह नींद तरह-तरह के दु:स्वप्नों से भरी थी। उसका शरीर अब भी टूट रहा था। धीमे क़दमों से चलकर वह डाइनिंग स्पेस तक आया।

“अब तो सब सब ठीक है न, कौशिक? बिजली और नेट वगैरह तो आ गए हैं।” अभ्रा पूछ रही थी।

“कुछ भी ठीक नहीं है, सारा पॉवर सिस्टम हैक हो गया है। पॉवर ग्रिड्स का ऑपरेशन हमारे हाथ से चला गया है। केवल एटॉमिक पॉवर प्लांट का फ़ॉल्ट ठीक हुआ है लेकिन डीसैलीनेशन सिस्टम काम नहीं कर रहे। हमारे इंजीनियर्स इस तूफ़ान में ज़्यादा कुछ कर भी नहीं पा रहे हैं। फ़िलहाल पानी की एक-एक बूँद क़ीमती है, थोड़ा ध्यान रखना। ऐसी सिचुएशन तूफ़ान रुकने तक यानि दो-तीन दिन तक रह सकती है।” उसने चिंतित स्वर में कहा।

“सब ठीक हो ही जाएगा। इतना ज़्यादा बर्डन मत लो।” उसने लापरवाही भरे स्वर में कहा। अभ्रा आनंदजीवी है। तनाव भरा वातावरण उसको पसंद नहीं है, न उसमें तनाव झेलने की क्षमता है।

आज नाश्ते की मेज़ पर सन्नाटा छाया था। बेबी सो रही थी। कौशिक चुपचाप एक-एक कौर बेमन से निगल रहा था। अभ्रा नाश्ता कर चुकी थी और कौशिक के तने हुए चेहरे की तरफ़ ध्यान से देख रही थी। तूफ़ान की वजह से उसके कॉलेज की आज छुट्टी थी, पर आज के दिन के लिए उसके पास कोई प्लान नहीं था। वह बेमतलब मेज़ पर बिछे कपड़े को मोड़ने लगी। तभी फ़ोन की कर्कश ध्वनि ने अचानक से इस सन्नाटे को तोड़ दिया। एटॉमिक पॉवर प्लांट से फ़ोन था। कौशिक ने लपककर फ़ोन उठाया।

“व्हाट!!! ओह माय गॉड... हाउ?? अब क्या सिचुएशन है? यस, आइ विल बी देयर विदिन फ़ाइव मिनट्स...” उसका चेहरा सफ़ेद फक्क पड़ गया था। लगभग दौड़ते हुए ही उसने हॉल और बेबी के बेडरूम का एयर कूलिंग सिस्टम बंद किया।

“बेबी को जगाओ जल्दी... तुम और बेबी एंटीरेडिएशन ड्रग लो... और मुँह-हाथ धोकर कपड़े चेंज करो... जल्दी करो...”

कहकर वह फ़ुर्ती से अपने कपड़े बदलने के लिए बेडरूम में चला गया। अभ्रा उसका चेहरा और भाग-दौड़ देखकर सहम गई। आख़िर फिर ऐसी क्या मुसीबत आ गई? वह भी उठकर उसके पीछे-पीछे बेडरूम तक गई।

“क्या हुआ, कौशिक?” उसने हिम्मत करके पूछा तो कौशिक के धैर्य का बाँध टूट गया। वह अभ्रा पर ज़ोर से चिल्ला पड़ा।

“तुम से जो कहा वह करो तुम जल्दी... जाओ... यहाँ से! समझ नहीं आ रही तुम्हें इतनी-सी बात?” कहता हुआ वह बाथरूम में घुस गया।

चारों तरफ़ सायरन बजने लगे थे। आम जनता के लिए चेतावनी संदेश प्रसारित किए जा रहे थे। आपात घोषित कर दिया गया था। दस किमी के क्षेत्र में जो लोग घर के बाहर थे, उनको शीघ्र सुरक्षित स्थान पर पहुँचने को कहा गया था। कौशिक बाथरूम से निकलकर अपने गीले चेहरे को पोंछ रहा था। उसने देखा अभ्रा बहुत घबरा गई थी। वह बदहवास-सी मेडिकल किट में एंटीरेडिएशन दवाएँ ढूँढ़ रही थी। उसका चेहरा बुझ गया था। हाथ काँप रहे थे... कौशिक को ग्लानि महसूस हुई। कपड़े बदलकर वह उसकी मदद करने के लिए आ गया।

“हाँ, यह दवा न्यूपोजेन... मुझे भी दो।”

कहते हुए उसने अभ्रा के कंधे पर कोमलता से अपना हाथ रख दिया। अभ्रा ने ऐसी परिस्थिति का सामना ही कब किया है जो उसे कुछ पता हो... और वह भी उसे कितना समय दे पाता है जो कभी इस बारे में बात हो। वह स्वयं ही अपने आस-पास मनोरंजन की कृत्रिम दुनिया बसाए रखती है और प्रसन्न रहती है।

“पानी है अभी बाथरूम में। तुम भी जल्दी से चेंज करके बेबी के रूम में चली जाओ। हाँ और ध्यान रहे... घर की दीवारों को मत छूना, दूरी बनाकर रखना। मैं ज़रूरी मीटिंग अटेंड कर रहा हूँ।” उसने धीमी आवाज़ में कहा।

उसका दिमाग़ सामने खड़ी इस भयानक मुसीबत के बारे में विचार करते-करते अब सुन्न हो चला था। तूफ़ान के दौरान इतनी बड़ी गड़बड़ हो गई थी कि इसके बाद में कितने ही गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते थे।

सुबह शायद 7.40 के आस-पास न्यूक्लियर पॉवर प्लांट से कुलेंट का रिसाव हुआ। उस समय सिक्युरिटी अलार्म नहीं बजे क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस सिस्टम ठप्प हो गया था और रेडिएशन को पकड़ ही नहीं पाया। वह अपनी ड्यूटी ख़त्म करके 7.45 पर वहाँ से निकल गया था। तब तक पॉवर ग्रिड के ‘लॉन्ग लूप’ फ़ॉल्ट को सुधार दिया गया था। रिसाव के बाद प्लांट की वह यूनिट ट्रिप हो गई लेकिन तब तक स्टोरेज यूनिट के पास रेडिएशन का स्तर 100 mSv तक पहुँच गया था। यह ग़नीमत थी कि कोई कर्मचारी इसके सीधे संपर्क में नहीं आया था।

सुबह जब फ़ॉल्ट ठीक हुआ था तो इस बात को ये अपनी सफलता मान रहे थे। लेकिन पॉवर ग्रिड चालू होने के साथ ही यह गड़बड़ भी हो गई। प्लांट का ऑपरेशन और सिक्यूरिटी दोनों हैकर्स के हाथ में आ गए थे।  हालाँकि फ़िजिकल पैट्रोलिंग लगातार जारी थी, लेकिन हैकर्स ने ऐसा समय चुना था जब सुबह शिफ़्ट बदलती है। कैसे इतनी बड़ी चूक हुई, अभी इसी संदर्भ में एक उच्च स्तरीय बैठक लेने का निर्णय लिया गया था।

जब उसने कंट्रोल रूम बात की थी तो उस यूनिट में त्वरित गति से रेमेडियल ऑपरेशन चल रहा था। द्विस्तरीय सुरक्षा प्रणालियों के फ़ैल हो जाने पर तीसरे स्तर की सुरक्षा प्रणाली सक्रिय हो गई थी। इस समय कंट्रोल रूम में सुबह की शिफ़्ट के सभी अधिकारी-कर्मचारी मौजूद थे। ये लोग रेमेडियल ऑपरेशन पर कड़ी निगाह रखे हुए थे। राहत की बात यह थी कि यह ऑपरेशन पूर्णतया रोबोटिक और स्वचालित था।

नाइट शिफ़्ट के भी सभी अधिकारी कंट्रोल रूम से वरचुअली जुड़ चुके थे। रेमेडिअल ऑपरेशन के साथ ही कुछ गिने-चुने अधिकारियों की एटॉमिक एनर्जी बोर्ड के सदस्यों के साथ गोपनीय इमरजेंसी मीटिंग थी। कौशिक को इस मीटिंग में भाग लेना था।

उसका सर तनाव से फट रहा था। वह नाइट शिफ़्ट का इंचार्ज था। चूँकि उसके निकलने के पाँच मिनट पहले ही यह हादसा हो गया था। इसलिए इस घटना का सारा उत्तरदायित्व उसका बनता था। शिफ़्ट बदलते समय कुछ देर के लिए पैट्रोलिंग कैसे रोकी गई। कहाँ और किससे ग़लती हुई? या यह सबकुछ जानबूझकर किया गया? उसे इस मीटिंग में अपने जवाब से अधिकारियों को संतुष्ट करना था।

लगभग ढाई-तीन घंटे चली इस मीटिंग में सारे घटनाक्रम का बारीकी से विश्लेषण किया गया। यह थोरियम आधारित अति सुरक्षित, चौथी पीढ़ी का SCWR (सुपर क्रिटिकल वॉटर रिएक्टर) पॉवर प्लांट था। प्लांट के सूचना तकनीक नेटवर्क में सेंध लगाकर हैकर्स द्वारा कई माह से नज़र रखी जा रही थी। इसके बाद वे ऑपरेशन नेटवर्क तक पहुँच गए थे। सिक्यूरिटी कोड हासिल करने के बाद उन्होंने प्लांट की सुरक्षा युक्तियों की गहन पड़ताल की थी। योजनाबद्ध रूप से फिर इस सारी घटना को अंजाम दिया गया। सुबह बीस मिनट के लिए रोबोटिक पैट्रोलिंग क्यों रुक गई, इसकी जाँच भी बेहद आवश्यक थी। यह भी संभव था कि कुछ महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ किसी कर्मचारी द्वारा ही लीक की गई हों। इस मैलवेयर को सॉफ़्टवेयर इंजीनियर डीकोड करने में जुटे थे। उन्होंने इस वायरस को ‘बीस्ट’ नाम दिया था।

तूफ़ान ने गति पकड़ ली थी। तेज़ हवाएँ, बारिश और रेडिएशन... इस आपात स्थिति ने सबको घर में सीमित कर दिया था। बंद घरों में गर्मी में कैसे लोगों का समय बीत रहा था, ये वही जान सकते थे। दो दिनों में पानी की एक-एक बूँद का महत्त्व समझ आ गया था। दो दिन जैसे दो युगों की तरह बीते थे। जो लोग घर से बाहर थे, उन्हें यहाँ से दूर इवेक्यूएशन केंद्रों में शरण लेनी पड़ी थी। अभ्रा ने ऐसा कठिन दौर पहली बार देखा था।  उसको इस कष्ट की अनुभूति के बाद लो एरिया में रहने वाले लोगों के कष्ट का एहसास हो रहा था। दुर्घटना वाले दिन उसकी माँ और बहन बाहर ख़रीददारी कर रहे थे, उन्हें कई घंटों तक मॉल में ही रुके रहना पड़ा था। मिसेज पांडेय ने पार्टी में विश्वा के परिवार की जो भी बातें सुनाई थीं, उसने उस वक़्त फुर्र से उनको हँसी में उड़ा दिया था। आज वो सारी बातें जाने कहाँ से आ-आकर उसके कानों में टकरा रही थीं।

अगले दिन सुबह हालात काफ़ी हद तक काबू में थे। प्लांट में रेमेडियल ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूर्ण हो चुका था। शायद यह छोटी-सी दुर्घटना एक धमकी थी, जो हैकर्स द्वारा चेतावनी स्वरूप दी गई थी। कौशिक घर पर भी कंट्रोल रूम से निरंतर संपर्क में रहा था। अभी-अभी ड्यूटी पर निकलने के पहले ही उसको सूचना मिली थी कि मैलवेयर को इंजीनियर्स डीकोड कर चुके थे। यह एक अच्छी ख़बर थी। अब शीघ्र ही इस वायरस के स्त्रोत का पता चलने की उम्मीद थी।

घर की चाहरदीवारी के भीतर भय और आशंकाओं से भरे हुए, वे दस दिन बहुत अवसाद भरे थे। एनर्जी आइलैंड अब सामान्य रूप से अपना कार्य कर रहा था। वातावरण में विकिरण भी धीरे-धीरे हल्का हो रहा था। डोसीमीटर की रीडिंग सामान्य आ रही थी। लोगों ने एंटीरेडिएशन दवाओं की ख़ुराक अब कम कर दी थी। अभ्रा के कॉलेज में पढ़ाई अभी ऑनलाइन ही चल रही थी। ऐसी ही एक सूनी-नीरस दुपहर में घंटी बजी। अभ्रा कुछ ख़ुशी और उत्तेजना से भर कर दरवाज़ा खोलने उठी। दरवाज़े पर मिसेज पांडेय थी, कुछ घबराई और बदहवास-सी।

उन्होंने बोलने के लिए मुँह खोला पर शब्द उनके मुँह में ही अटक गए। उनके चेहरे पर उड़ती हवाइयों को देखकर अभ्रा भी डर-सी गई।

“क्या हुआ मिसेज पांडेय? आप इतनी घबरा क्यों रही हो? घर में तो सब ठीक है न?” अभ्रा ने पूछा।

“अभ्रा, वो... वो... विश्वा की डेथ हो गई।” उनका गला भर आया।

“कब? कैसे...” उसका मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। “आप अंदर आ जाइए। आराम से बात करते हैं।” वह उनको सहारा देकर अंदर ले आई।

“लीजिए, पानी पी लीजिए पहले” उसके आदेश पर रोबो ट्राली में पानी लेकर आ गई थी। पानी पीकर वह कुछ संयत हुईं। विश्वा क़रीब तीन साल से उनके यहाँ काम कर रहा था। इस ख़बर से उनको बड़ा आघात लगा था।

“तुमको पता है न, वह तूफ़ान के पहले छुट्टी लेकर गया था। फिर यह रेडिएशन एक्सीडेंट हो गया। इसी बीच मैंने उसको फ़ोन भी किया था लेकिन उसका फ़ोन बंद था। आज उसके पिता का फ़ोन आया तो यह पता पड़ा। वह विश्वा के सामान के लिए पूछ रहे थे। विश्वा का सामान यहीं उसके क्वार्टर में ही पड़ा है न। बहुत दुखी थे बेचारे...” बोलते हुए उनकी आँखों में आँसू आ गए थे।

“पर यह हुआ कैसे?” उसे तो अब भी यक़ीन नहीं हो पा रहा था।

“कुछ भी पता नहीं चला, उसके पिता ने तो हत्या की आशंका जताई है। पर कौन करेगा उसकी हत्या! उदित आएँगे शाम को तब उसका कमरा खोलेंगे। उसके पिता आएँगे कल, तब सारी बात होगी।”

उस दिन काफ़ी देर तक मिसेज पांडेय बैठी रही थीं। ख़ूब सारी बातें हुई थीं उनके बीच जो शायद पहले कभी नहीं हुई थीं। तूफ़ान से उजड़ा हुआ लो एरिया और यहाँ रेडिएशन दुर्घटना के बाद पसरा भूतहा सन्नाटा। तेज़ भागते मशीनी जीवन के बीच कृत्रिम सुख तलाशती अभ्रा जैसे संवेदनाओं के महीन धागों में उलझकर वहीं रुक गई थी। मिसेज पांडेय के जाने के बाद भी वह देर तक इस बारे में ही सोचती रही।

रात को कौशिक ड्यूटी से आया तो उसका मूड काफ़ी ठीक लग रहा था। वह ख़ुद रसोई में जाकर नित्या को रात के खाने के लिए विशेष निर्देश दे रहा था। शायद कुछ गुनगुना भी रहा था। अपने बबल से बाहर आकर यदि वह कुछ अलग कर रहा है... सबके साथ समय बिता रहा है, इसका अर्थ है कि वह ज़्यादा ही प्रसन्न है। शायद रेडिएशन एक्सीडेंट गुत्थी सुलझने के क़रीब थी। पर यह सब अभी बहुत गोपनीय था। उसने अभ्रा को कुछ नहीं बताया था।

देर रात कौशिक के पास मिस्टर उदित पांडेय का फ़ोन आया था। बहुत लंबी बात चली। सामान्यतः वह फ़ोन नहीं करते क्योंकि कौशिक से उनकी फ़ील्ड में अक्सर ही मुलाक़ात हो जाती है। उन दोनों की एक ही शिफ़्ट होती है, लेकिन मिस्टर पांडेय का विभाग अलग है तो उनका सीधा एक-दूसरे से काम भी नहीं पड़ता। अभ्रा को आश्चर्य हो रहा था कि क्यों इतनी रात गए उनका फ़ोन आया? वह कौशिक के चेहरे के बदलते भावों को ध्यान से देख रही थी। शायद विश्वा के बारे में बात हो रही थी उसने अनुमान लगाया। वह बहुत धीमी आवाज़ में बात कर रहा था, फिर अचानक उठकर स्टडी में चला गया। अभ्रा उसको देखती रह गई। उसको समझ नहीं आया कि मिस्टर पांडेय विश्वा की बात कौशिक से क्यों कर रहे हैं? उसकी मृत्यु के मामले में कौशिक को क्या दिलचस्पी हो सकती है। अभ्रा इस बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सकी। फिर वह कब स्टडी से लौटकर आया उसे पता नहीं। तब तक वह सो चुकी थी। वह उससे हर बात साझा नहीं करता। विशेष तौर पर प्लांट से संबंधित बातें। सुरक्षा संबंधित कारणों के कारण ऐसी बातें बहुत गोपनीय रखी जाती हैं। पर विश्वा की बात?

सुबह अभ्रा अपने मन में उत्सुकता होते हुए भी कौशिक से कुछ पूछ नहीं पाई क्योंकि कोई फ़ायदा नहीं था। पर अपनी इसी उत्सुकता के कारण उसने मिसेज पांडेय के घर जाने का निश्चय किया। शायद इतने सालों में पहली बार... मिसेज पांडेय ने दरवाज़ा खोला तो अभ्रा को देखकर दंग रह गईं।

“आओ अभ्रा, आज इतनी सुबह कैसे! सब ठीक तो है न...” उनके चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी के भाव थे।

“वो, वो... मिसेज पांडेय! वो ऐसे ही... आप कल बहुत परेशान लग रही थीं तो लगा आपसे मिल आऊँ...” अभ्रा बोली। न चाहते हुए भी उसकी आँखें उनके हॉल का मुआयना करने लगीं। सादगी भरी सज्जा... विश्वा के जाने के बाद उनका घर कुछ अस्त-व्यस्त-सा लग रहा था।  उनका घर पूर्ण रूप से ऑटोमेटेड नहीं था। आजकल वह घर का काम स्वयं ही कर रही थीं।

“बहुत थकी हुई लग रही हैं। विश्वा के जाने के बाद आपका काम बढ़ गया है। वैसे, आजकल तो आपका बुटीक बंद होगा न?” उसने बातचीत छेड़ी।

“हाँ, तूफ़ान के बाद से बंद ही है। तभी तो घर को देख पा रही हूँ। विश्वा बड़ा मेहनती लड़का था। मेरे यहाँ काम करता, फिर उसके बाद प्लांट के कैंटीन में काम करता। अब वैसा लड़का मिलना बहुत मुश्किल है। आजकल सर्वेन्ट्स मिलते ही कहाँ हैं? मिलते हैं तो काफ़ी हाई सैलरी की डिमांड करते हैं। अब मुझे भी घर रिनोवेट करवाना पड़ेगा। क्या करें...” वह एक साँस में कह गईं। उनका मन कल से बहुत भारी हो रहा था।

“वैसे भी, उदित ने अब सर्वेंट के लिए साफ़ मना कर दिया है।” कहते हुए मिसेज पांडेय के ललाट पर कुछ सलवटें उभर आईं।

“कल मिस्टर पांडेय का फ़ोन आया था, शायद विश्वा के बारे में ही...” बात के सूत्र को पकड़कर अभ्रा असल बात पर आ गई।

“दरअस्ल... दरअस्ल, कल हमने उसका कमरा खोला था। उसके पिता सामान लेने आए थे उसका। सामानों में एक-दो चीज़ें ऐसी थीं कि उदित आश्चर्य में पड़ गए। शायद वह किसी ग़लत गतिविधि में लिप्त था, पर... पर, उदित ने मुझे ज़्यादा कुछ बताया नहीं।” वह कुछ हिचकिचाते हुए बोलीं। असल में उदित ने उनको पूरी बात बताई थी, लेकिन किसी को भी बताने को मना किया था। पर उन्होंने आधी-अधूरी बात अभ्रा को बता ही दी थी।

“ओह... अच्छा! ग़लत कामों में फँसने का यही नतीज़ा है। उन्हीं लोगों ने उसका ख़ून कर दिया होगा शायद...”

“शायद! पर मुझे तो अब भी यक़ीन नहीं। बहुत ही अच्छा लड़का था। हो सकता है वह सामान उसका न हो। अब क्या कहें...” उन्होंने एक लंबी साँस भरी।

अभ्रा घर लौट गई। उसके मस्तिष्क में अजीब-सी हलचल मच गई थी।

पर्यावरण बचाओ आंदोलन

तूफ़ान और फिर विश्वा की मौत के बाद स्वर्णामुगि के लो एरिया में एक सन्नाटा पसर गया था। इस ठंडे-मुर्दा सन्नाटे के भीतर ही भीतर गर्म लावा दबा था, भले ही ऊपरी तौर पर सब ठीक-ठाक दिखाई देता था। इधर तूफ़ान के सदमे से लोग उबरे नहीं थे कि दूसरी विपत्ति आन पड़ी। इसके बाद तो दबे हुए लावे में उबाल आना ही था। आख़िर एक दिन लोगों के आक्रोश का ज्वालामुखी फट ही गया। रेडिएशन दुर्घटना के बाद लोगों के धैर्य का बाँध टूट गया था। आपात स्थिति से निपटने के लिए इस बस्ती में सुरक्षात्मक प्रबंध नहीं थे, न ही पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएँ उन्हें उपलब्ध करवाई गईं। उनके तो घर भी टूट-फूट गए थे। इसी वजह से अब आक्रोश का यह लावा शहर के अत्याधुनिक ढाँचे को भस्म कर देना चाहता था। यह निकटवर्ती लकदक द्वीपों को इनके सुविधाजीवी निवासियों सहित निगल जाना चाहता था। रात्रि के अँधेरे में लो एरिया के किन्हीं गुमनाम से दड़बों जैसे घरों में भोर होने तक बैठकें चलतीं। उनके अनुसार पर्यावरण की बिगड़ी हुई सेहत, विकिरण, उच्च तापमान, कठोर जलवायु, तूफ़ानों की बार-बार पुनरावृत्ति और उस पर आसमान छूती महँगाई के लिए चंद लोग ज़िम्मेदार थे। वे लोग जो संसाधनों का जमकर दोहन करते थे। वे लोग जिनको इन विकट हालातों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था।

विश्वा के कुछ युवा साथी, लोगों के भीतर सुलगती इस आक्रोश की अग्नि को हवा दे रहे थे। इसी का परिणाम था कि इस आग ने धीरे-धीरे आंदोलन का रूप ले लिया था।

हाई एरिया में हरे रंग की एक ख़ूबसूरत इमारत। इस इमारत के ऊपर बाईं ओर चमकते हुए अक्षरों में लिखा था—‘एनकांस’ (ENCONS)। यह इमारत एक अंतरराष्ट्रीय ‘पर्यावरण संरक्षणवादी संगठन’ का कार्यालय थी। ये लोग विश्व भर में पर्यावरण हित में कार्य करते थे। लो एरिया में इस संगठन का बड़ा प्रभाव था। यहाँ के लोग इस संगठन को अपने हित चिंतक के रूप में देखते थे। अभी विश्वा के साथी भी इसी संदर्भ में ‘एनकांस’ के पदाधिकारियों से मिले थे। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि वे लोग उनकी मदद करेंगे। जैसा कि आशा थी, संगठन ने प्रशासन के ख़िलाफ़ जन आंदोलन में इन लोगों का पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया। इस आंदोलन की प्रमुख माँगें थीं—विश्वा की तूफ़ान में फँसने से हुई असामयिक मृत्यु की जाँच, रेडिएशन से पूर्ण सुरक्षा, तूफ़ान के समय लो एरिया में बेहतर प्रबंधन, स्वास्थ्य सुविधाएँ और आजीविका सुरक्षा।

यह एक सुहानी सुबह थी। अल सुबह वातावरण में हल्की ठंडक थी। आकाश में छितरे बादलों से छनकर आती सुनहरी कोमल धूप किनारे की रेत को स्वर्णिम आभा प्रदान कर रही थी। इस स्वर्णिम रेत पर मज़बूत भुजाओं वाले अनेक रोबोट और भारी-भारी मशीनें खनन कार्य में जुटे थे। पंक्तिबद्ध खड़े ट्रक खनिज को शोधन संयंत्र तक ले जाने के लिए तैयार थे। किनारे के पास एक कई मीटर ऊँची कृत्रिम पठारी संरचना पर खनन विभाग का कार्यालय था। यहाँ से खनन कार्य का संचालन और नियंत्रण होता था।

देखते ही देखते काले चींटियों के झुंड की भांति हज़ारों लोगों की उग्र भीड़ ने इन विशाल मशीनों को घेर लिया। इन लोगों ने काली पोशाक पहन रखी थी और चेहरे पर शील्ड व मास्क लगा रखे थे। सैकड़ों लोग नियंत्रण कार्यालय के बाहर जमा हो गए थे। वे चिल्ला रहे थे। उनके हाथों में नारे लिखी हुई तख्तियाँ थीं :

हमें पर्यावरण के हत्यारों से बचाओ
हमें पृथ्वी के ठेकेदारों से बचाओ
.

हमें चाहिए, हमें चाहिए
आजीविका रक्षा जीवन सुरक्षा
.

बहुत हुआ शोषण, बहुत हुआ दमन
नहीं हैं कीट-पतंगे, मानव हैं हम

इन लोगों ने बाहर जमकर तोड़-फोड़ और विरोध प्रदर्शन किए। भीड़ जैसे पगला गई थी। कार्यालय के भीतर बैठे कर्मचारी इस अप्रत्याशित हमले से घबरा गए। बाईसवीं सदी के सभ्य समाज में इतने बर्बर विरोध प्रदर्शन की किसी को उम्मीद नहीं थी। पुलिस की वास्तविक समय में आभासी गश्त हर पल जारी रहती थी। कुछ ही मिनटों में भीड़ के ऊपर आकाश में अनेक ड्रोन नज़र आने लगे और आँसू गैस के गोलों से भीड़ को नियंत्रित किया गया। थोड़ी-सी ही देर में ही लो एरिया के युवा नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया।

इस घटना के चार दिन बाद एक छोटा चार्टेड विमान पॉवर आइलैंड पर उतरा। इस विमान में भारत के बाहर से ‘IAEA’ (इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी) के कुछ महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी आए थे। ये लोग पॉवर आइलैंड में सुरक्षा मानकों की जाँच करना चाहते थे। इनके अनुसार न्यूक्लियर पॉवर प्लांट की सुरक्षा व्यवस्थाएँ अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुकूल नहीं थी। इनमें अनेक तकनीकी ख़ामियाँ तो थीं ही, साथ ही पॉवर आइलैंड में साइबर सुरक्षा के प्रबंध भी उच्च स्तरीय नहीं थे। उनके अनुसार इस परमाणु संयंत्र से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों को ख़तरा था।

यह भारत का आधुनिकतम परमाणु ऊर्जा संयंत्र था। इसके सुरक्षा मानकों और तकनीक पर संदेह एक अप्रत्याशित बात थी। आख़िर वही हुआ जिसका अंदेशा था। जाँच कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर IAEA ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया था। ऐसा निर्णय जिससे देश के परमाणु विभाग के उच्चाधिकारियों के होश उड़ गए थे। आइलैंड सेरेनिटी के परमाणु ऊर्जा संयंत्र की कुछ यूनिट्स को तकनीक बदलने तक बंद करने के निर्देश दिए गए थे। IAEA के इस निर्णय से आइलैंड सेरेनिटी सहित देश कई शहरों में ऊर्जा संकट खड़ा होने की संभावना थी। ऊर्जा विभाग में हड़कंप मच गया था।

यह रविवार की एक उदास सुबह थी। आसमान साफ़ था और समुद्र शांत। आठ बजे ही सूर्य रश्मियाँ प्रखर हो उठी थीं। अभ्रा हॉल में बैठी सूनी आँखों से ख़ाली-ख़ाली आकाश और उससे एकाकार हो रहे समुद्र को देख रही थी। आज छुट्टी के दिन भी कौशिक एक आपातकालीन मीटिंग के लिए तैयार हो रहा था। वह इतना तनाव में था कि अभ्रा से बात किए हुए भी उसको कई दिन हो गए थे।

अभ्रा और कौशिक की चिंताएँ अलग-अलग थीं। हालाँकि कौशिक की ग़लती सिद्ध नहीं हुई थी, लेकिन यूनिट्स के बंद होने के चलते उसकी बदली हो सकती थी। अभ्रा को आइलैंड का सुविधा संपन्न जीवन और अपनी नौकरी छूटने की चिंता सता रही थी। कौशिक को अपनी बदली का दुःख नहीं था, लेकिन वह अचानक हुई इस अप्रत्याशित घटना के बाद से बहुत तनाव में था। अनेक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठन खुलकर इस एटॉमिक पॉवर प्लांट के विरोध में आ गए थे। यह सारा मामला उसको एक षड्यंत्र लग रहा था। एनर्जी आइलैंड का हैक होना और फिर दो बाद ही यह दुर्घटना।

IAEA के पॉवर आइलैंड के निरीक्षण के बाद मुश्किल से एक माह गुज़रा था। राजस्थान के एटॉमिक पॉवर स्टेशन में भी इसी प्रकार की घटना घटी। सारा देश सकते में आ गया था। पर्यावरण आंदोलन और विरोध प्रदर्शन देश में जगह-जगह होने लगे। पूरे देश में अराजकता और अस्थिरता का वातावरण बन गया। ऊर्जा संकट खड़ा होने और विभिन्न आंदोलनों के चलते जैसे विकास के पहिये थमने लगे थे।

नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी त्वरित गति से पूरे मामले की पड़ताल में जुट गई थी। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था। जाँच में पॉवर आइलैंड हैकिंग के तार एक मध्य पूर्वी देश से जुड़े मिले। बाद में एक आतंककारी संगठन ने इसकी ज़िम्मेदारी ले ली थी। विकिरण रिसाव की घटनाएँ प्राकृतिक थीं या आतंककारियों की करतूत और हैकिंग से इसका क्या संबंध था, इसकी जाँच चल रही थी। जाँच एजेंसी को अभी तक पुख्ता सबूत नहीं मिले थे। हालाँकि विश्वा के कमरे में मिली कुछ संदिग्ध वस्तुओं से जाँच को एक दिशा मिल गई थी। विकिरण रिसाव और विश्वा की हत्या दोनों घटनाओं को परस्पर संबंधित करके देखा जा रहा था।

विश्वा के फ़ोन कॉल डिटेल्स से NIA (नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी) को कुछ महत्त्वपूर्ण सुराग मिले थे। पॉवर आइलैंड में कार्यरत एक पूर्व अधिकारी विश्वा के संपर्क में था। वह रेडिएशन की घटना के कुछ माह पहले ही नौकरी छोड़कर चला गया था। उसको यू.एस. की एक कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव आया था। जाँच में पता लगा कि उसने वहाँ जाने के कुछ दिन बाद ही अवसाद में आकर आत्महत्या कर ली थी। यह आश्चर्य की बात थी कि वह अधिकारी विश्वा जैसे कैंटीन में काम करने वाले मामूली व्यक्ति के निरंतर संपर्क में क्यों था!

विश्वा एन्कोंस का भी सक्रिय सदस्य था। उपद्रव और तोड़-फोड़ की घटनाओं के बाद एन्कोंस के भी कुछ सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया था, जिनसे कड़ी पूछताछ की जा रही थी। संदेह की सुई एक पर्यावरण अतिवादी संगठन की तरफ़ घूम गई थी। जाँच में पता चला कि एन्कोंस को इसी संगठन से वित्तीय मदद मिलती थी। इसका मतलब था कि पर्यावरण अतिवादी भारत के परमाणु ऊर्जा गृहों को अपना निशाना बना रहे थे। विश्वा की हत्या में भी इनका ही हाथ होने की संभावना थी।

आइलैंड सेरेनिटी
(कई माह बाद)

आज फिर लगातार बारिश हो रही थी। मौसम की भविष्यवाणी के अनुसार अगले तीन दिनों में भयानक तूफ़ान के आसार बन रहे थे। तूफ़ानी हवाएँ आज फिर बालकनी के शीशों से टकराकर अभ्रा के लिविंग रूम में घुसना चाह रही थीं। अभ्रा बालकनी से परदे हटाकर निर्निमेष दृष्टि से बाहर देख रही थी। आज उसके मन में किसी प्रकार का उद्वेग नहीं था, न पार्टी की इच्छा थी।

“अभ्रा... अभ्रा... चलो आज पार्टी करते हैं। तुम अपनी सहेलियों को भी बुला लो।” कौशिक पीछे से लगभग चिल्लाता हुआ आया। वह काफ़ी ख़ुश लग रहा था।

“क्यों? मेरा मन नहीं है कौशिक...” वह उदासीनता से बोली।

“क्यों न हो पार्टी? षड्यंत्रकारी पकड़े गए हैं। परमाणु आयोग ने अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में उनके विरुद्ध मुक़द्दमा डाल दिया है। इधर सरकार ने एन्कोंस को प्रतिबंधित कर दिया है। कुछ दिनों से तो लगता था जैसे सब कुछ रुक-सा गया है। अब सब नार्मल हो जाएगा।” कौशिक उत्साह से भरा हुआ था।

“अच्छा! सच कह रहे हो?” अभ्रा की आँखों में चमक जागी।

“हाँ, बिल्कुल सच। तुमने हमेशा की तरह आज भी न्यूज़ नहीं देखी न।” कौशिक हँसने लग गया।

“अभ्रा, एक और बात है जो तुमको बतानी है...” वह कुछ गंभीर होकर बोला।

“क्या!” उसने उत्सुकता से पूछा।

“हम लोगों ने एक बात तय की है। देखो... मेरी बात समझना, हमारे देश ने सतत विकास की राह अपनाकर हाल ही में ख़ूब तरक़्क़ी की है। लेकिन फिर भी एक तबक़ा ऐसा है जो विकास के बावजूद ग़रीब है। ख़राब मौसम और गर्मी के कारण यही लोग सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं। ये आतंकवादी पर्यावरण का नाम लेकर इन्हें ही फुसलाते हैं। विश्व की महाशक्तियाँ जो हमारे विकास से ईर्ष्या रखती हैं, परोक्ष रूप से इन आतंकवादियों को शह देती हैं। पर्यावरण का सर्वनाश इन्होंने किया है, और... और ये उँगलियाँ हम पर उठाते हैं।

अभ्रा, देश के हर नागरिक तक सुविधाएँ पहुँचनी चाहिए। हमें सबको साथ लेकर चलना होगा। तुमने देखा... हमारा बड़प्पन का दंभ कैसे एक झटके में टूट गया था। बिना बिजली-पानी के तीन दिन कैसे बीते थे... इन लोगों को तो आए दिन ऐसी परेशानियाँ आती हैं।”

“असली बात बताओ यार, तुमने क्या तय किया है! तब से भूमिका ही बनाए जा रहे हो?” अभ्रा ने उसकी बात बीच में ही काट दी।

“इस दुर्घटना के बाद सरकार ने लो एरिया वाले लोगों के लिए एक प्रोजेक्ट शुरू किया है। उन्हें कम बजट में भी सारी सुविधाएँ मिलेंगी। हमने भी एक ट्रस्ट बनाया है, इस प्रोजेक्ट के लिए। आइलैंड सेरेनिटी से हम लोग एक बड़ी रक़म डोनेट करने वाले हैं।” कौशिक ने बताया।

“अरे वाह! यह तो सचमुच ख़ुशी की बात है। मैं अपनी सहेलियों को बुलाती हूँ। हम लोग भी डोनेट करेंगे।” आज शायद पहली बार अभ्रा को एक अनोखी अनुभूति हुई थी... सब कुछ होने के बाद भी मन में जो एक अजीब-सा ख़ालीपन था, वह आज भर गया था।

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