फ़ुरसत निकालना भी एक कला है। गधे हैं जो फ़ुरसत नहीं निकाल पाते। फ़ुरसत के बिना साहित्य चिंतन नहीं हो सकता, फ़ुरसत के बिना दिन में सपने नहीं देखे जा सकते। फ़ुरसत के बिना अच्छी-अच्छी, बारीक-बारीक, महान बातें नहीं सूझतीं।
-
संबंधित विषय : गजानन माधव मुक्तिबोधऔर 3 अन्य
आत्म-साक्षात्कार बहुत आसान है, स्वयं का चरित्र-साक्षात्कार अत्यंत कठिन है।
जहाँ कोई क़ानून नहीं होता, वहाँ अंतःकरण होता है।
हर एक को अपनी अंतरात्मा की आवाज़ का हुक्म मानना चाहिए। अंतरात्मा की आवाज़ न सुन सकें तो जैसा ठीक समझें वैसा करना उचित होगा, लेकिन किसी भी सूरत में दूसरों की नकल नहीं करनी चाहिए।
-
संबंधित विषय : आत्मनिर्भरताऔर 1 अन्य
भीतर को बाहर के आक्रमण से बचाओ।
शांति को चाहो। लेकिन ध्यान रहे कि उसे तुम अपने ही भीतर नहीं पाते हो, तो कहीं भी नहीं पा सकोगे। शांति कोई बाह्य वस्तु नहीं है।
तुम्हारे पास क्या है; उससे नहीं, वरन् तुम क्या हो उससे ही तुम्हारी पहचान है।
न तो हमारे अंतःकरण से अधिक भयंकर कोई साक्षी हो सकता है और न कोई दोषारोपण करने वाला इतना शक्तिशाली।
-
संबंधित विषय : आत्मविश्वासऔर 1 अन्य
सच्चे संवाद के लिए अक्षमता का अर्थ है—सहिष्णुता, आत्म-चिंतन और सहानुभूति की अक्षमता।
बुद्ध की तरह कबीर भी मनुष्य से यही कहते हैं कि अपना दीपक स्वयं बनो।
बाहरी अनुष्ठान की श्रेणी सबसे निकृष्ट है, जहाँ कि मनुष्य के लिए सूक्ष्म विचारों का होना प्रायः असंभव है।
आप अपनी आंतरिक शक्ति का जितना ज़्यादा इस्तेमाल करेंगे, उतनी ही ज़्यादा शक्ति को अपनी ओर आकर्षित करेंगे।
-
संबंधित विषय : आत्म-सम्मानऔर 1 अन्य
कवि के लिए सतत आत्म-संस्कार आवश्यक है, जिससे बाह्य का आभ्यंतीकरण सही-सही हो।
जो लोग प्रामाणिक रूप से जनता से प्रतिबद्ध होते हैं, उन्हें निरंतर अपनी पुनर्परीक्षा करते रहना चाहिए।
अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूँजने दो: 'मैं कौन हूँ?' जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो उसे अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है।
कर्म, उपासना, मन, संयम अथवा ज्ञान—इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ।
एक बार अपने भीतर निहार का देखो, प्रतिदिन तुम किस जगह पर स्थित हो।
जो प्रकाश स्वरूप है; अगर उसका प्रकाश न हो तो वही तो उसकी बाधा है—प्रकाश ही उसकी मुक्ति है।
-
संबंधित विषय : आत्मज्ञानीऔर 3 अन्य
अपनी असंपूर्णता में, संपूर्णता का आविष्कार करने में समय लगता है।
"मैं कौन हूँ?" जो स्वयं इन प्रश्न को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं।
आत्मसात्कृत जीवन-जगत्, कलात्मक आवेग में तरंगायित होकर कवि के हृदय में जब एक कलात्मक वेदना बन जाता है—तब वह अपने बाह्मीकरण के लिए छटपटाने लगता है।
-
संबंधित विषय : अभिव्यक्तिऔर 2 अन्य
बुद्धत्व का आगमन दूसरे द्वारा नहीं होता, इसका आगमन स्वयं आपके अवलोकन एवं स्वयं की समझ से ही होता है।
जब हम ख़ुद से सच्चा प्यार करेंगे, तभी हम भविष्य के लिए बेहतर रिश्तों की बुनियाद रख सकेंगे।
हे मूढ़! व्रतधारण और साज-सज्जा कर्तव्य कर्म नहीं है। न ही मात्र काया की रक्षा कर्तव्य कर्म है। भोले मानव! देह की सार-संभाल ही कर्तव्य कर्म नहीं। सहज विचार (आत्म-तत्त्वचिंतन) वास्तविक उपदेश है।
आप बिना किसी पुस्तक को पढ़े या बिना साधु—संतों और विद्वानों को सुने अपने मन का अवलोकन कर सकते हैं।
-
संबंधित विषय : आत्म-अनुशासनऔर 2 अन्य
बुद्धत्व का आगमन किसी नेता या गुरु द्वारा नहीं होता, आपके भीतर जो कुछ है उसकी समझ द्वारा ही इसका आगमन होता है।
-
संबंधित विषय : आत्म-सम्मानऔर 2 अन्य
कभी-कभी जिसे हम कठिन समय के रूप में मानते हैं, वह वास्तव में हमारी छिपी हुई ताकतों को खोजने का अवसर होता है।
ख़ुद की तलाश का रास्ता हमेशा परेशानियों और अनिश्चितताओं से ही भरा रहता है।
तुम जो चुनते हो, तुम वही बन जाते हो।
एकांत को आत्ममंथन का अवसर मानकर गले लगाइए।
जिसके संकल्प मज़बूत नहीं है, जो प्रमादी और मिथ्याचारी हैं, उसे आत्मदर्शन नहीं हो सकता।
-
संबंधित विषय : आत्म-शुद्धि
मैं महसूस करता हूँ कि मैं शून्य हूँ और इसका मतलब है मैं अपने आप को निश्चय ही प्यार करता हूँ।
साक्षात्कार ही वास्तविक धर्म है, बाकी सब तो केवल तैयारी है। व्याख्यान सुनना, किताबें पढ़ना या तर्क करना—मात्र आधार तैयार करना है, यह धर्म नहीं है।
संबंधित विषय
- अकेले
- अक्षमता
- अभिव्यक्ति
- आज़ादी
- आत्म
- आत्म-अनुशासन
- आत्म-चिंतन
- आत्मज्ञान
- आत्मज्ञानी
- आत्म-तत्व
- आत्मनिर्भरता
- आत्मविश्वास
- आत्म-शुद्धि
- आत्म-सम्मान
- आत्म-संयम
- आत्मा
- कबीर
- कर्म
- खोज
- गजानन माधव मुक्तिबोध
- चेतना
- चयन
- ज्ञान
- जिज्ञासा
- जीवन
- दर्शन
- देह
- दिल
- धर्म
- नियम
- प्रकाश
- प्रेम
- बुद्ध
- मुक्त
- मनुष्य
- महात्मा गांधी
- रवींद्रनाथ ठाकुर
- शक्ति
- शांति
- संतुष्टि
- समय
- सहनशीलता
- सहानुभूति
- साहित्य