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लल्लेश्वरी

1320 - 1392 | श्रीनगर, जम्मू कश्मीर

लल्लेश्वरी की संपूर्ण रचनाएँ

सवैया 1

 

उद्धरण 3

अभी में अल्पायु बाला थी। दम भर में ही पूर्ण-यौवना बनी। अभी मैं चलती-फिरती थी और अभी जलकर राख बन गई।

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विचारहीन लोग धर्मग्रंथों को उसी प्रकार बाँचते रहते हैं, जिस प्रकार पिंजरे में तोता राम-राम की रट लगाता है।

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शेरनी का शिकार बाज़ को क्या मालूम! बाँझ को पुत्र के प्रति वात्सल्य का क्या ज्ञान !

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