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बुरा पर उद्धरण

आचार्य शुक्ल जिसे मर्यादा कहते हैं, वह वास्तव में रूढ़ि है।

मैनेजर पांडेय

आदमी जब बिगड़ता है तो स्वभाव से ही कुछ ऐसा है कि जब वह एक चीज़ में बिगड़ता है, तो पीछे सब चीज़ों में ही बिगड़ जाता है।

महात्मा गांधी

एक फ़ालतू विचार कोई विचार नहीं होता।

महात्मा गांधी

बंबई के सिनेमा वाले संगीत का सलाद तैयार करने में परम निपुण हैं।

श्रीलाल शुक्ल

बाहर से हमारे मन में सुंदर जिस मार्ग से आता है, असुंदर भी इसी मार्ग से आता रहता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

रूढ़ियाँ केवल शास्त्र की ही नहीं होतीं, लोक की भी होती हैं।

मैनेजर पांडेय

बुराइयों को जाने बग़ैर, अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए।

लीलाधर जगूड़ी

बुरे विचार फूलगोभी में कीड़े की तरह होते हैं!

अमोस ओज़

हमें बुरे स्वभाव की व्याख्या हीन भावना की निशानी के रूप में करनी चाहिए।

अल्फ़्रेड एडलर

यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है।

स्वामी विवेकानन्द

जंगली फल आदि के द्वारा जीवन व्यतीत करना सफल है, परंतु खल के साथ निवास अच्छा नहीं।

भर्तृहरि

हम अपने हृदय को साफ़ करें, गंदी चीज़ को पसंद करें। गंदी चीज़ को पढ़ना छोड़ दें। अगर ऐसा करेंगे तो अख़बार अपना सच्चा धर्म पालन करेंगे।

महात्मा गांधी

संसार में अधिकांश दुष्कर्म, व्यक्तिगत आसाक्ति के कारण ही किए गए हैं।

स्वामी विवेकानन्द

नैतिकता की असली कसौटी है, बुराई को निरुत्साहित करने की क्षमता।

जॉन स्टुअर्ट मिल

जब आप ख़ुद के बारे में बुरा महसूस करते हैं, तो आप प्रेम के रास्ते में बाधा खड़ी कर लेते हैं और ऐसी स्थितियों तथा लोगों को आकर्षित करते हैं, जो आपको बुरा महसूस कराएँगे।

रॉन्डा बर्न

बाल-विवाह का समर्थन किसी भी शास्त्र में नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द

जो भक्त होना चाहता है; वह दुष्ट प्रकृति के मनुष्यों के साथ भोजन करे, क्योंकि उनकी दुष्टता का भाव भोजन द्वारा फैलता है।

स्वामी विवेकानन्द

लोग कहते हैं—दुष्ट के सारे ही काम अपराध होते हैं। दुष्ट कहता है— मैं भला आदमी हो जाता किंतु लोगों के अन्याय ने मुझे दुष्ट बना दिया है।

बंकिम चंद्र चटर्जी

राजन्! दूसरों की निंदा करना या चुग़ली खाना दुष्टों का स्वभाव ही होता है। श्रेष्ठ पुरुष तो सज्जनों के समीप दूसरों के गुणों का ही वर्णन करते हैं।

वेदव्यास

दुनिया का इतिहास इस बात का साक्षी है कि शुभ के समान अशुभ भी क्रमशः बढ़ ही रहा है।

स्वामी विवेकानन्द

कवि के पास अच्छे लोगों के अलावा, बुरे लोगों के बीच रहने के भी अच्छे-खासे अनुभव होने चाहिए।

लीलाधर जगूड़ी

सब प्रकार की बुराइयों में से गुज़रते हुए संसार की जो उन्नति हो रही है, वह उसे धीरे-धीरे तथा निश्चित रूप से इन आदर्शों के उपयुक्त बना रही है।

स्वामी विवेकानन्द

बुराई एक भ्रांति मात्र है।

स्वामी विवेकानन्द

यह धारणा कि शुभ और अशुभ ये दोनों पृथक् वस्तुएँ हैं और अनंत काल से चले रहे हैं—नितांत असंगत है।

स्वामी विवेकानन्द

क्या दुनिया पारस्परिकता पर चलती है? इसका मतलब है कि आप जो अच्छे कर्म करेंगे, वह आपके साथ होगा और जो बुरे कर्म करेंगे—वह भी आपके साथ होगा।

शम्स तबरेज़ी

हे निशाचर! जैसे विषमिश्रित अन्न का परिणाम तुरंत ही भोगना पड़ता है, उसी प्रकार लोक में किए गए पापकर्मों का फल भी शीघ्र ही मिलता है।

वाल्मीकि

रवि की तरह कवि को भी सब जगह बिना घृणा के जाने, रहने और सहने का तजुर्बा और साहस होना चाहिए। लाचारी और मजूबरीवश ऐसा होना कवि की अयोग्यता है। सोच-समझकर, जान-बूझकर, जिज्ञासु भाव से ऐसा हो, तो वह अपने कवि के निर्माण में बेहतर सहायक हो सकता है।

लीलाधर जगूड़ी

दुःसमय में जब मनुष्य को आशा और निराशा का कोई किनारा नहीं दिखाई देता तब दुर्बल मन डर के मारे आशा की दिशा को ही ख़ूब कस कर पकड़े रहता है।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

अच्छे काम के प्रति आदर और बुरे के प्रति तिरस्कार होना ही चाहिए। भले-बुरे काम करने वालों के प्रति सदा आदर अथवा दया रहनी चाहिए।

महात्मा गांधी

लक्षणरहित (सदोष या दूषित) काव्य से दुष्टपुत्र के समान सर्वत्र निंदा होती है।

भामह

यह हमारी प्राचीन परंपरा है, वैसे तो हमारी हर बात प्राचीन परंपरा है, कि लोग बाहर जाते हैं और ज़रा-ज़रा सी बात पर शादी कर बैठते हैं।

श्रीलाल शुक्ल

किताब लिखना—घटिया किताब तक लिखना नरक है।

श्रीलाल शुक्ल

जिस तरह दानशीलता मनुष्य के दुर्गुणों को छिपा लेती है, उसी तरह कृपणता उसके सद्गुणों पर पर्दा डाल देती है।

प्रेमचंद

नापाक साधन से ईश्वर नहीं पाया जा सकता और बुरी चीज़ को पाने का साधन साफ़ नहीं हो सकता।

महात्मा गांधी

जो ज़ालिम है उसको यह हक़ नहीं कि दूसरे ज़ालिम को सज़ा दे।

महात्मा गांधी

राम और रावण के बीच की भारी लड़ाई में, राम भलाई की ताक़तों के प्रतीक थे और रावण बुराई की ताक़तों का। राम ने रावण पर विजय पाई, और इस विजय से हिंदुस्तान में रामराज्य क़ायम हुआ।

महात्मा गांधी

दूसरों को अपमानित करके लोग अपने को सम्मानित कैसे समझ सकते हैं, इस पहेली को मैं आज तक हल नहीं कर सका हूँ।

महात्मा गांधी

जब मैं अच्छा करता हूँ तो मुझे अच्छा महसूस होता है। जब ग़लत करता हूँ तो बुरा महसूस होता है—यही मेरा धर्म है।

अब्राहम लिंकन

एक बड़ी भारी भूल जो हम लोग बहुधा करते हैं, वह यह कि शुभ को हम सदा बढ़ने वाली वस्तु समझते हैं और अशुभ को एक निश्चित राशि मानते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

इस ख़राब दुनिया में नियत कुछ भी नहीं है—हमारी मुश्किलें भी नहीं।

चार्ली चैप्लिन

माशूक़ वह बला है, जिसमें कोई ख़ामी नज़र नहीं आती, जिससे प्यार के बदले प्यार नहीं माँगा जाता, जो हाड़-माँस का होकर भी अशरीरी होता है, जिसकी हर ख़ता माफ़ होती है, हर ज़ुल्म पोशीदा।

मृदुला गर्ग

धर्म में और अन्य सभी मामलों में, हर उस चीज़ को त्याग दें जो आपको कमजोर करती है, उससे कोई संबंध रखें।

स्वामी विवेकानन्द

यह संसार है ही ऐसा। जब एक दुःखी होता है, तभी दूसरा सुखी होता है। जब एक को नुक़सान होता है, तभी दूसरे को फ़ायदा होता है। जब एक हारता है, तभी दूसरा जीतता है। एक का दुर्भाग्य, दूसरे का सौभाग्य होता है। भगवान ने ऐसी सृष्टि क्यों बनाई?

अमृतलाल वेगड़

कोई भी कवि अच्छा या बुरा नहीं होता, वह कवि या अकवि ही हो सकता है, अर्थात् उसमें चेतना या जड़ता हो सकती है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

कुसंग से बढ़कर पाप संसार में नहीं है और कुसंगी के साथ रहने के कारण बहुत दुःख झेलना पड़ता है।

गंगाधर मेहेर

संतों के द्वारा दिया गया संताप भी भला होता है और दुष्टों के द्वारा दिया गया सम्मान भी बुरा होता है। सूर्य तपता है तो जल की वर्षा भी करता है। परंतु दुष्ट के द्वारा दिया गया भक्ष्य भी मछली का प्राण ले लेता है।

दयाराम

साथ निवास करने वाले दुष्टों में जल तथा कमल के समान मित्रता का अभाव ही रहता है। सज्जनों के दूर रहने पर भी कुमुद और चंद्रमा के समान प्रेम होता है।

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

लज्जावान् पुरुष को शिथिल, व्रतधारी को दंभी, पवित्र को पाखंडी, शूर को निर्दयी, सीधे स्वभाव वाले को मूर्ख, प्रिय बोलने वाले को दीन, तेजस्वी को गर्वीला, वक्ता को बकवादी और स्थिरचित्तवाले को आलसी कहते हैं। इससे यह जान पड़ता है कि गुणियों में कौन सा ऐसा गुण है, जिसे दुर्जनों ने कलंक नहीं लगाया।

भर्तृहरि

अगर कामयाबी ग़लत और ग़ैर-वााजिब तरीक़ों से मिलती है, तो उस कामयाबी की साख ख़त्म हो जाती है।

जवाहरलाल नेहरू

ग़ैर-वाजिब तरीक़ों से मिला साध्य, सही हो ही नहीं सकता।

जवाहरलाल नेहरू