सत्संग पर दोहे

भक्तिधारा में संत-महात्माओं

की संगति और उनके साथ धार्मिक चर्चा को पर्याप्त महत्ता दी गई है। प्रस्तुत चयन में सत्संग विषयक भक्ति काव्य-रूपों को शामिल किया गया है।

भजन भलो भगवान को, और भजन सब धंध।

तन सरवर मन हँस है, केसो पूरन चँद॥

संत केशवदास

माला टोपी भेष नहीं, नहीं सोना शृंगार।

सदा भाव सतसंग है, जो कोई गहे करार॥

दरिया (बिहार वाले)

जे जन हरि सुमिरन बिमुख, तासूँ मुखहुँ बोल।

राम रूप में जे पगे, तासूँ अंतर खोल॥

दयाबाई

साध संग जग में बड़ो, जो करि जानै कोय।

आधो छिन सतसंग को, कलमष डारे खोय॥

दयाबाई

साध-साध सब कोउ कहै, दुरलभ साधू सेव।

जब संगति ह्वै साध की तब पावै सब भेव॥

दयाबाई

सेवा अरु तीरथ-भ्रमन, फलतेहि कालहि पाइ।

भक्तन-संग छिन एक में, परमभक्ति उपजाइ॥

ध्रुवदास