आख़िर कितना चक दे इंडिया!
गगन तलरेजा
25 फरवरी 2026
पिछले कुछ वर्षों से क्रिकेट नित्यकर्म की तरह हो चला है। हर रोज़ क्रिकेट खेला जा रहा है। हर रोज़ फेंकी जा रही है बॉल, हर रोज़ घुमाया जा रहा है बल्ला और हर रोज़ ही छूट रही हैं कैचें! इस रोज़मर्रा की क्रिकेटबाज़ी में अपना देश भी बड़ा आगे निकल गया है। एक ज़माने में टुटपुँजिया क़िस्म की समझी जाने वाली टीम इंडिया आज क्रिकेट के आसमान में काले बादल की तरह इस क़दर छाई है कि हर रोज़ चक दे रही है। टीम इंडिया का बिज़नेस हो चला है चक देने का। बस मौक़ा दिखे और चक दो! चकते रहो! चकते चले जाओ! हफ़्ते के सात में से दस दिन मैच होते हैं और उनमें से ग्यारह दिन ऐसे होते हैं, जिनमें टीम इंडिया चक दे रही होती है। लोग भी हर दिन बैठ कर उसी उत्साह से टीम इंडिया को चक देते हुए देखते हैं। लोगों की इच्छा है कि टीम इंडिया के चक देने का सिलसिला इसी तरह अनवरत चलता रहे। जब-जब टीम इंडिया चक देती है, लोग—दफ़्तर, स्कूल, सड़क, घर, पखाना, जेल—हर जगह केवल टीम इंडिया के चक देने की ही चर्चा करते हैं।
“यार, कल देखा आपने मैच? कितना बढ़िया चक दिया कल इंडिया ने!”
“अरे हाँ भाईसाब! आख़िरी के चार ओवर में जो गेम बदल के रख दी अपने लड़के ने! वरना तो चक देना मुश्किल था।”
“और परसों वाली मैच भी आपने देखी ही होगी? उसमें भी क्या बढ़िया चक दिया था इंडिया ने। रोहित तो 150* [नॉट आउट] रहा!”
“हाँ भाईसाब! ये रोहित और विराट ही हैं, जिनकी वजह से टीम इतना सारा चक दे पाती है। क्या बढ़िया खेलते हैं लड़के!”
“हाँ, बस आज के मैच में भी इसी तरह चक दे इंडिया तो मज़ा ही आ जाए!”
“क्यों नहीं चक देगी भाईसाब। बिल्कुल चक देगी। आज भी चक देगी और कल भी! चकती ही चली जाएगी ये टीम!”
लेकिन चक देने का इतना अभ्यास होने के बावजूद हर साल में कुछ दिन ऐसे निकल आते हैं, जब इंडिया टीम के राहु-केतु बिगड़ जाते हैं। वे टीम इंडिया की कुंडली के चक देने वाले घर में अपनी टांग घुसा के बैठ जाते हैं। जिस दिन राहु-केतु मन बना लिया कि आज तो भैया इन लोगों को चकने नहीं देना है, उस दिन टीम इंडिया चक नहीं दे पाती। इसके फलस्वरूप अगले 10-15 दिन तक लोग टीम से ख़ास तौर पर नाराज़ रहते हैं। ‘एक्स’ [पहले ‘ट्विटर’] पर आकर टीम को गालियाँ देते हैं। खिलाड़ियों की माँओं-बहनों-पत्नियों के नाम लंबे-लंबे पोस्ट [पहले ट्वीट] लिख कर ये बताने का प्रयास करते हैं कि टीम इंडिया अगर नहीं चक दे रही तो उसमें उनके घर की औरतों का हाथ है और अगर अगले मैच में टीम ने चक नहीं दिया तो फिर खिलाड़ियों को सही से चक देने का सबक़ सिखाने के लिए, वे सभी उनके घर की औरतों से निकटता बढ़ाने का नेक विचार भी मन में रखते हैं।
इस बेरोज़गार देश के घरों में दो जून की रोटी भले न हो, क्रिकेट देखने के लिए इंटरनेट या टीवी पर केबल-डिश का इंतज़ाम ज़रूर है। ऐसे में टीम इंडिया का हाल नई दुल्हन की तरह है, जिसके हर क़दम पर सासू की नज़र है। बुढ़िया आतुर बैठी है कि जल्दी से बहु कुछ ग़लती करे तो दो-चार कड़वी बातें बोल कर अपना मन हल्का कर ले। इस फ़्री देश का हर जवाँ-ओ-बुज़ुर्ग भी इसी नज़र से मैच देखता है और टीम इंडिया के चक न दे पाने पर ख़ासा सासू टाइप हो जाता है। वह टीवी तोड़ने लगता है। गालियाँ बकने लगता है। कपड़े फाड़ने लगता है। छाती पीटने लगता है। पछाड़ें खा-खाकर रोने लगता है। इंडिया के चक न दे पाने पर हर घर में ग़मी टाइप माहौल बन जाता है। नौजवान दो-दो दिन रोटी नहीं खाते। बुज़ुर्ग चार-चार दिन दवा नहीं लेते—सब केवल इसलिए कि टीम इंडिया ने चक नहीं दिया! अतः ऐसी अनगिनत सासुओं का चित्त शांत रखने के लिए यह लाज़मी है कि टीम इंडिया किसी भी मैच में चक देने से ना चूके!
हालाँकि मैं यह ज़रूर कहूँगा कि एक मामले में हम बड़े उदार हैं—हमने टीम इंडिया से चक देने की उम्मीद केवल क्रिकेट में रखी हुई है। बाक़ी किसी खेल से हमें कोई मतलब नहीं। किसी और खेल में अगर टीम इंडिया चक देती है तो भी किसी को कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता। दो दिन की हो-हो के बाद सब नार्मल हो जाता है। सब क्रिकेट पर लौट आते हैं। फिर से क्रिकेट में चक देने की बातें होने लगती हैं। भले हमने भाला फेंक में स्वर्ण पदक जीत लिया हो, लेकिन दो दिन बाद आदमी यही कहता मिलेगा कि भाला-वाला तो ठीक है लेकिन तरसों के मैच में उस एक हरामी ने इतना आसान कैच छोड़ दिया कि उस वजह से इंडिया चक देते-देते रह गई। इस बात का बेनिफ़िट बाक़ी खेलों के खिलाड़ियों को ये है कि वे बेफ़िक़्र होकर जीवन जी सकते हैं। उनकी माँ-बहनों को कोई नहीं पूछेगा। उन्हें भी कोई नहीं पूछेगा। वे आराम से हारते रहें या चाहे मेहनत कर के जीत भी जाएँ—सानू की...? हम तो क्रिकेट में व्यस्त हैं और वहाँ इंडिया का चक देना बड़ा ज़रूरी है। भले चक दे इंडिया करते-करते टीम थक दे इंडिया हो जाए, लेकिन हम उसे देखते-देखते नहीं थकेंगे। हम चाहते हैं कि टीम इंडिया हर दिन चक दे—आज के मैच में भी चक दे और परसों के मैच में भी। नरसों भी और फिर तरसों भी।
हर रोज़ बस चक दे इंडिया!
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