मोक्ष पर दोहे

भारतीय दर्शन में दुखों

की आत्यंतिक निवृत्ति को मोक्ष कहा गया है। मोक्ष प्राप्ति को जीवन का अंतिम ध्येय माना गया है ,जहाँ जीव जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पा लेता है। अद्वैत दर्शन में ‘अविद्या: निवृत्ति: एव मोक्ष:’ की बात कही गई है। ज्ञान और भक्ति दोनों को ही मोक्ष का उपाय माना गया है। बौद्ध और जैन जैसी अवैदिक परंपराओं में भी मोक्ष की अवधारणा पाई जाती है। बुद्ध ने इसे ‘निर्वाण’ कहा है।

जग-नद में तेरी परी, देह-नाव मँझधार।

मन-मलाह जो बस करै, निहचै उतरै पार॥

दुलारेलाल भार्गव

साधु संगति पूरजी भइ, हौं वस्त लइ निरमोल।

सहज बल दिया लादि करि, चल्यो लहन पिव मोल॥

रैदास कहते हैं कि साधु−संगति के धन को मैंने अनमोल वस्तु के रूप में प्राप्त कर लिया है। इस सत्संग से प्राप्त चेतन शक्ति को अपने हृदय में समाहित करके मैं अपने पीव को प्राप्त करने चला हूँ।

रैदास

अधम अजामिल आदि जे, हौं तिनकौ हौं राउ।

मोहूँ पर कीजै दया, कान्ह दया दरियाउ॥

हे भगवान्! अजामिल आदि जितने भी नीच पापी हुए हैं, मैं उनका भी सरदार हूँ। इसलिए हे श्रीकृष्ण, हे दया के सागर, जिस प्रकार आपने अजामिल आदि अनेक पापियों का उद्धार किया वैसे ही मेरा भी उद्धार कीजिए।

मतिराम

जो निसिदिन सेवन करै, अरु जो करै विरोध।

तिन्हैं परम पद देत प्रभु, कहौ यह बोध॥

हे भगवन्! आपकी भी यह क्या समझ है कि जो लोग रात-दिन आपका भजन करते हैं, उन्हें तो भला आप मोक्ष देते ही हैं किंतु जो लोग (रावण आदि) आपका विरोध करते हैं, उन्हें भी आप मोक्ष दे देते हैं। अर्थात् भगवान् शत्रु और मित्र को समभाव से देखते हैं।

मतिराम

तारनहार समर्थ है, अवर दूजा कोय।

कह यारी सत्तगुरु मिलै, अचल अरु अम्मर होय॥

यारी साहब

मरना-मरना सब कहे, मरिगौ बिरला कोय।

एक बेरि एह ना मुआ, जो बहुरि ना मरना होय॥

दरिया (बिहार वाले)

आसा मनसा सब थकी, मन निज मनहिं मिलान।

ज्यों सरिता समुँदर मिली, मिटि गो आवन जान॥

संत केशवदास

साध रूप हरि आप हैं, पावन परम पुरान।

मेटैं दुबिधा जीव की, सब का करैं कल्यान॥

दयाबाई