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तुम्हें विदा करने में असमर्थ हूँ!

यह दिन पिछले दिनों से कितने भिन्न हैं, इन दिनों तुम्हें खोने के भय के सिवा मेरे पास और कुछ भी नहीं। प्रेम-प्रसंग के ये अंतिम दिन इतने अरुचिकर और अवसादमय भी हो सकते हैं, यह मैंने कभी नहीं सोचा था। सोचता भी कैसे? सभी योजनाएँ सुख के दिनों की जो थी।

यह मेरी आत्मस्वीकृति सरीखा है। मेरे अब तक के जीवन में मेरी कई प्रेमिकाएँ हुईं। मैं उनका प्रेमी था, पर वे मेरी प्रेमिकाएँ थीं/हैं या नहीं यह ठीक-ठीक बताना कठिन है। तुम अंतिम होगी, यह बताना भी कठिन है। पर तुम मेरी प्रेमिका थी, यह ठीक-ठीक बता सकता हूँ।

मैं ताउम्र अतिशय प्रेम से डरता रहा और अतिशय प्रेम ही मिलता रहा। मेरी देह की भी कोई गंध हो सकती है, मेरे बालों को भी सहलाया जा सकता है—यह मुझे तुमसे पता चला। उस दिन मेरे बालों में हाथ फेरते हुए, तुमने बोला कि मैं प्रेमी की अपेक्षा दोस्त बेहतर हूँ। जब मैंने पूछा क्यों? तो तुम शांत रही। बालों से हाथ को अलग किया।

मेरे पास तो सीमित बातें हैं, सीमित चुटकुले और गिने-चुने शेर, जो मैं हर लड़की से दोहराता आया हूँ। ऐसे में तुम्हें यह मानने में कठिनाई हो सकती है कि मैं सच में तुम्हारा प्रेमी हूँ भी या नहीं? पर यह तो आत्मस्वीकृति है। मैंने पहली दफ़ा जब किसी को चूमा होगा तो अबोधपन में चूमा होगा, उसकी छुअन मुझे तनिक भी याद नहीं।

पर तुम्हें चूमने से पहले मैंने तुम्हारे होंठों को छुआ था और वो कोई परखना नहीं था। तुम्हारे होंठ कोमलता की हद तक कोमल हैं। मैं उनसे इस हद तक परिचित हो चुका हूँ कि उन्हें अचेतन में भी पहचान सकता हूँ।

पर अब तो यह हमारे संबंधों के अंतिम दिन हैं। इन दिनों मैं यह भी नहीं जान पा रहा कि तुम मुझसे दूर हो रही हो। यह कितना अजीब है कि तुम्हारे साथ दिन भर लड़ते-झगड़ते हो जाने वाले काम, इतने ख़ाली होने पर भी पूरे नहीं होते।

मेरी नींद से होने वाली शिकायतें शायद अब हल हो सकती हैं। मुझे नींद आना कम हो चुका है। मेरे स्वप्नों में भी तुम अब गाहे-बगाहे ही आती हो। मैं जिन भयावह स्वप्नों से डर कर उठ जाया करता था, अब पुनः उन्हीं स्वप्नों में जाना चाहता हूँ।

उस दिन देवालय में तुम्हारे साथ जाता हुआ कुछ सकुचाया था, अनास्था से नहीं! बल्कि कभी रखी अतिरेक आस्था से! मैं कब तक किसी से कितना माँग सकता हूँ? जिन देवालयों में हाथ जोड़ते, शीश नवाते, अधजाने ग़लत मंत्रों को बड़‌बड़ाते, मैंने कभी तुम्हें इन्हीं देवताओं से माँगा था। आज इन्हीं को गरियाते हुए इन्हीं से ‘तुम्हारे साथ न रह पाने’ की बात करता मैं अपराधी जान पड़ता हूँ। किसी और के लिए फूल ख़रीदता अत्याचारी और ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूँ’ कहता हुआ दोगला।

इन अंतिम दिनों में तुम्हारे मुख से निकली गालियाँ मेरे कानों में कर्णफूल-सी टंगी हैं। मेरे पास गिन‌ने को ख़ुद के पाप हैं, संवरने को वे कर्णफूल, निरखने को तुम्हारी तस्वीरें, मैं इन दिनों तुमसे ज़्यादा तुम्हारी स्मृतियों से प्रेम करने लगा हूँ।

इतनी व्यस्तताओं में अगर तुम्हें विदा करने में असमर्थ होऊँ तो मुझे माफ़ करना।

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