शहर पर उद्धरण
शहर आधुनिक जीवन की आस्थाओं
के केंद्र बन गए हैं, जिनसे आबादी की उम्मीदें बढ़ती ही जा रही हैं। इस चयन में शामिल कविताओं में शहर की आवाजाही कभी स्वप्न और स्मृति तो कभी मोहभंग के रूप में दर्ज हुई है।
दिन-रात गर्द के बवंडर उड़ाती हुई जीपों की मार्फ़त इतना तो तय हो चुका है कि हिंदुस्तान, जो अब शहरों ही में बसा था, गाँवों में भी फैलने लगा है।
कविता-कहानी-नाटक के बाज़ार में जिन्हें समझदारों का राजपथ नहीं मिलता; वे आख़िर देहात में खेत की पगडंडियों पर चलते हैं, जहाँ किसी तरह का महसूल नहीं लगता।
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मुझसे सीखें, यदि मेरे उपदेशों से नहीं, तो मेरे उदाहरण से सीखें कि ज्ञान की खोज कितनी ख़तरनाक है और वह व्यक्ति जो अपने मूल शहर को ही दुनिया मानता है, वह उस व्यक्ति की तुलना में कितना ख़ुश है जो अपनी शक्ति से बड़ा होने की आकांक्षा रखता है।
नागरक को चाहिए कि नगर, राजधानी तथा गाँव में उस स्थान पर मकान बनवाए, जहाँ पर जलाशय हों। मकान के चयन में नागरक को इसका ध्यान रखना चाहिए कि नदी, सरोवर आदि के किनारे वृक्ष, वाटिका, उद्यान से सुशोभित भवन होना चाहिए। नागरक के घर में दो खंड होने चाहिए—एक अंतःप्रकोष्ठ, दूसरा बहिःप्रकोष्ठ।
कोई भी शहर तानाशाही में विकसित नहीं हो सकता, क्योंकि जब निगरानी की जाती है, तब सब कुछ बौना रह जाता है।
आधुनिक सभ्यता रूपी लक्ष्मी जिस पद्मासन पर बैठी हुई है, वह आसन ईंट-लकड़ी से बना हुआ आज का शहर है।
लखनऊ विचारकों का नहीं—स्वप्न-द्रष्टाओं का नगर है।
मैंने अपने दम पर शहर में घूमने का जोख़िम उठाया है। मैं पुस्तकालय के मानचित्रों, भूमिगत मानचित्रों, बस के मानचित्रों और नियमित मानचित्रों को देखती हूँ और उन्हें याद रखने की कोशिश करती हूँ। मुझे खो जाने का डर है; नहीं, मुझे किसी बालूपंक में डूबने की तरह शहर में डूबने से डर लगता है। मैं ऐसी चीज़ द्वारा सोखे जाने से डरती हूँ, जिससे मैं कभी नहीं बच सकती हूँ।
मैं जहाँ भी जाती हूँ—शहर के चौक पर—किताबों की दुकानें अभी भी सबसे प्रिय हैं।
शहर में चायघर, कमेटी-रूम, पुस्तकालय और विधानसभा की जो उपयोगिता है, वही देहात में सड़क के किनारे बनी हुई पुलिया की है।
शहर अमीरों के रहने और क्रय-विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है।
क़स्बे अब शहर बन गए हैं पर महानगरों के पास आने की जगह और दूर चले गए हैं, भले नई संचार व्यवस्था यह दावा करते नहीं थकती कि उसने भौगोलिक और सामाजिक दूरियाँ मिटा दी हैं।
बड़े शहरों की जो बात मुझे सबसे ज़्यादा बुरी लगती है, वह यह कि वहाँ का कलाकार अपनी कला को बेचना चाहता है। उसके भीतर अपनी कला की रचना करने से ज़्यादा, बेचने का भाव भरा होता
लोक की अभिरुचि के अनुसार—विविध मनोरंजक क्रीड़ा ही जिसका एकमात्र उद्देश्य हो—ऐसी गोष्ठी के साथ आचरण करता हुआ नागरक, लोक में सफलता को प्राप्त करता है।
शहर में हर दिक़्क़त के आगे एक राह है और देहात में हर राह के आगे एक दिक़्क़त है।
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नागरिक स्त्रियाँ भी अन्य स्त्रियों की भाँति; उसी प्रकार चौंसठ कलाओं का प्रयोग एवं अश्लील हरक़तें करती हैं, लेकिन वे एकांतप्रियता पसंद करती हैं।
गाँव के गँवईपन में भी एक तरह की शोभन सभ्यता है यह शहरी गँवई बहुत कुत्सित है।
नगर अपने और अपने नगरवासियों के स्वभाव के अनुसार जब अपने रूप का आभास कराता है, तभी उसका स्वाभाविक चित्र बनता है।
शहर देहातियों को चूसने के लिए है।
शहर के जिन कोनों में 'स्वनिर्मित' लोग रहते हैं, वहाँ बहुत-से अनाम लोग छिपे रहते हैं।
यौवन रूपी नगर में अपने रूप को बेचना। जितना उचित हो, उतना ही मोल भाव करना।
'गंज' अब कई जगहों से जुड़ चुका है पर उसका अनुभूत अर्थ 'गंजिंग' की क्रिया से ही उभरता है जो इतिहासकार शाहिद अमीन के अनुसार लखनऊ के हजरतजंग में इधर-उधर नज़र डालते हुए दुकानों के बीच तफ़री करने का नाम था।
ग्रह का उज्ज्वल पक्ष अंधकार की ओर बढ़ रहा है और सभी शहर अपनी-अपनी घड़ी के अनुसार नींद में डूबते जा रहे हैं। और मेरे लिए, अब भी वैसा ही है, यह सब बहुत ज़्यादा है। दुनिया बहुत बड़ी है।